नवंबर 17, 2013

बतौर साज़िश

न चुप्पी थी
न ही बोलचाल
वह मुलाकात थी -
सौ साज़िशों का परिणाम
कह दूँ कि पानी पर सैर ,
वास्कोडि गामा की कब्र उनमें से एक थी
दूसरे शहर में
लोग बदल जाते हैं पर
प्रेम नहीं .....
हैरानी थी इसी बात की
कि
हमारा नाटक हमें नाटक नहीं लगा ।
हवाओं की तरह का
हमारे हाथों का स्पर्श
और उनका हंसकर दूर हो जाना
तीसरा लाख चाहकर भी
प्रेम न देख पाए पर
हवा में तैरता मोह तो
परखता ही होगा ...
कौन जाने !
अच्छा रहा
इस मुलाकात ने उन्माद नहीं दिया
बस पास होने ,
साथ चलने की
सुडौल ख़ुशी थी ।
जिस प्रेम ने कुछ बरस
बिता लिए
उसका दूसरे शहर में भी चलना
अपने शहर जैसा लगता है
जैसे रोज़ अपनी खिड़की से झांकना
और उस अलग होने जैसा
अलग होना न हो
साजिशों पर निगरानियाँ तो
जीत  ही जाती हैं
पर
यूँ खिड़की पर खड़ा होना
यूँ अफ़सोस में भी
हँसते हुए बाहर आना
ऐसे जैसे
फटे दूध की चाय
शहर जैसे शहरों में ही प्रेम
ऐसे जाता है
जैसे रूखी रोटी और नमक ।
कितना ही अजीब था न ये मिलना
न मिलने की तरह
होकर भी न होने की तरह
छूकर भी न छूने की तरह
बाहर आया तो
हवा का लहज़ा उतना ही नर्म
जानेवालों को जाने की उतनी ही जल्दी
कि भूल गए हों -
जल्दी को भी समय तो चाहिए ही

पर प्रेम तो
वहीँ रुका था तुम्हारे पास
हर बार
कुछ न कुछ तो छूटना रहता ही है ।
चलो तो
इस तरह
और साजिशें करते हैं ।
-आलोक रंजन

नवंबर 14, 2013

एक कविता को समझते हुए

एक कविता पढाता हूँ उषा । कविता शमशेर की है और लगी है कक्षा 12वीं में । यूँ तो इसका आकर और कथ्य बहुत छोटा है पर इसके भीतर के सन्दर्भ बहुत महत्वपूर्ण हैं । हाल के दिनों में इस कविता से एकाधिक बार जूझना पड़ा और वह इसलिए नहीं कि कविता जटिल है बल्कि इसलिए कि कविता इतनी छूट दे देती है कि अपनी और से व्याख्या की जा सके ।

जब इसे मैं अपने छात्रों को पढ़ा रहा था तो स्वाभाविक है कि यह सरल कार्य नहीं रहा होगा क्योंकि जिस वातावरण को कविता में रखा गया है वह इस कदर स्थानीय है कि उसे खींच खांचकर अधिकतम उत्तर भारत तक ही फैला सकते हैं और उसमें आई वस्तुएं तो यूँ कि दिल्ली तक में समझाने के लिए ऑडियो-विजुअल का सहारा लेना पड़ जाए ।  बहुत मुश्किल से समझा पाया कि चौका क्या होता है और उसको राख से लीपना । ऊपर से यह समझाना तो और कठिन था कि चौके को राख़ से ही लीपने की बात क्यों की गयी है ।  और नीला शंख । भैया नीला शंख कहाँ होता है ।

कमोबेश यह उन पाठों में से था जिसे पढ़ाने में खासी मशक्कत लगी थी । इसके लिए हम कवि को तो जिम्मेदार नही ही ठहरा सकते पर एक छात्र के लिए और अध्यापक के लिए कवि का ऐसे क्षणों में गले का घेघ बन जाना ही लगता है । तब लगता है कि स्थानीय स्तर पर पाठ विकसित किए जाते तो बहुत बेहतर होता । क्योंकि छात्रों को पाठ में अपना परिवेश मिलता और वे सहज रूप में उसके सन्दर्भों को समझ पाते । एन सी ई आर टी अपने को विकेन्द्रित तो कर रही है साथ ही पुस्तकों के निर्माण में बहुलता को भी स्थान देने का प्रयत्न कर रही है पर स्थानीयता को कम से कम हिंदी में ले पाना उसके लिए अभी भी संभव नहीं हो पाया है । शायद वहां बैठे  लोग स्थानीय के बदले हिंदी की केन्द्रीयता को बहुत मानते हैं और चूँकि वह दिल्ली से संचालित होती है तो दिल्ली सुलभ अहंकार का आ जाना कोई अनोखी बात भी तो नहीं है । बहरहाल कविता और उससे जुड़े कुछ और सन्दर्भ ।

अपने यहाँ यह 'उषा' कविता पढाकर मैं ट्रेनिंग के लिए गया था । वहां देश भर में काम कर रहे नए नियुक्त हुए शिक्षक पहुंचे थे अपनी अपनी विशेषताओं और विद्वता के साथ । थोड़े ही दिनों बाद कहा गया कि हम सबको अपन मन से कोई एक पाठ वहां डेमो क्लास के रूप में पढाना है । हममें से एक ने यह कविता चुनी पढ़ाने को । उसने कैसे पढाई और क्या इस पर न जाते हुए यह जानना जरुरी है कि उस दौरान हुआ क्या । वहां छात्र के रूप में हम सब ही बैठे थे इसलिए जो पढ़ा रहा होता था उसके लिए यह जरुरी हो जाता था कि पंक्तियों की व्याख्या में बहुत सावधानी बरते  अन्यथा फीडबैक देते समय बखिया उधेड़े जाने की पूरी सम्भावना रहती थी । कविता की पहली पंक्ति पर हइ जबरदस्त विवाद पैदा हो गया । पंक्ति थी - प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे । सारा विवाद इस नीला को लेकर शुरू हुआ । शंख तक तो ठीक है पर नीला शंख ? और यदि आसमान नीला है तो शंख कहने का मतलब ? शंख एक बिंम्ब हैं और उसमें नीला रंग कवि का प्रयोग है आखिर शमशेर भी तो प्रयोगवादी हैं । नहीं जी यहाँ आसमान नीला है और यह शंख पवित्रता का प्रतीक है । अच्छा जी पवित्रता का क्या मतलब है यह तो वाहियात बात हुई । तो क्या यह मामूली कविता नहीं है शमशेर ने  लिखी है । इसीलिए कहता हूँ कि शमशेर की कविता को समझ जाना इतना सरल नहीं है । और यदि वहां के समन्वयक बीचबचाव न करते तो आगे बढ़कर यह विवाद कोई भी रूप ले सकता था ।  और जो सज्जन पढ़ा रहे थे उन्होंने भले ही कितना घटिया पढाया हो इसी बात में खुश थे कि कुछ हो न हो मैंने अपने पढ़ाने के माध्यम से विवाद तो पैदा किया । रे पगले तूने कहाँ विवाद पैदा किया वह तो शमशेर की कविता की उस पंक्ति में अंतर्निहित ही है कि उसकी अलग व्याख्या हो सकती है । हमारी मैथिलि में एक कहावत है कुकुर माँड़ ले तिरपित( तृप्त ) ।

अब देखने की बात यह है कि जिस कविता में स्वयं इतनी अस्पष्टता हो उसे विद्यालय के छात्रों के लिए रखने का क्या तात्पर्य है । ठीक है कि अध्यापक उसे अपने सन्दर्भों से जोड़कर समझाता है और उसे बच्चा ग्रहण भी कर लेता है पर इस नीले की व्याख्या तो जांचने वाले के मन में ऐसी है कि उससे जरा भी अलग हुए तो नंबर गए । हाँ अब यहाँ यह तर्क भी दिया जा सकता है  कि कविता अंक प्राप्ति के लिए नही बल्कि समझ बढाने के लिए पढाई जाती है । तो उसका उत्तर ये है कि साहेब कितना भी कर लो अब अंक आधारित पढाई ही हो रही है क्योंकि  बाहर की दुनिया उसी की मांग कर रही है । ऐसी दशा में यह कविता नितांत व्यक्तिनिष्ठ अर्थ निकालने की स्वतंत्रता देती है ।

आगे छायावादोत्तर काव्य पर बात करने के लिए बाहर से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के प्रपौत्र - क्रांतिबोध जी आये । बेचारे घर से यह सोचकर चले थे कि शिक्षकों के बीच में जा रहे हैं जो कम से कम हिंदी साहित्य में एम् ए तो हैं ही । अपना पेपर जो उन्होंने रात भर जागकर तैयार किया होगा और कुछ किताबें ताकि कहाँ सन्दर्भ की जरुरत पड़ जाये । सब धरी की धरी रह गयी । उन्होंने भूमिका ही बांधी थी और अपने विषय पर आने ही वाले कि प्रशिक्षुओं में से एक जो पता नहीं क्यों उस उषा कविता को लेकर अपनी पवित्रता वाली बात मनवाना चाह रहे थे खड़े हुए और क्रांतिबोध से आग्रह कर बैठे कि उषा कविता पढ़ा दें । व्याख्या करने भी नहीं बल्कि पढ़ाने का आग्रह । क्रन्तिबोध ने सर पीट लिया । और उन्होंने उसे ज़ाहिर भी कर दिया । उनकी सब तैयारी धरी की धरी रह गयी और बेचारे कुछ और कवियों की वे कवितायेँ पढा कर गए  जो 12वीं के पाठ्यक्रम में लगी हैं । यह सीधे सीधे उस पंक्ति के 'नीला' शब्द की अंतिम परिणति थी ।

उस दिन दिल्ली से यहाँ केरल आने के लिए सुबह वाली उडान ली थी । हालाँकि वह सुबह कम और रात का मामला ज्यादा रहा। खिड़की के पास की सीट थी तो रात को दिन में बदलते देखने का अवसर मिला और वह भी खुले आकाश में । जितनी दूर तक आसमान दिख रहा था वह नीला नीला था और जब उसके आकर की बात करें तो कुछ कुछ शंख जैसा परवलित । फिर जल्दी ही नीला हल्का सलेटी होने लगा जैसे किसी छोटे बच्चे की स्लेट हो और उसके नीचे से उठ रही सूरज की लालिमा जैसे उसी बच्चे ने उस स्लेट पर लाल खड़िया घिस दी हो । हवाई जहाज जितनी तेजी से जा रहा था उतनी ही तेजी से वहाँ बदल रहे थइ दृश्य । लाल से सूरज का एक हिस्सा बाहर आया और जल्दी ही पूरा सूरज । हलके सलेटी  आसमान पर बड़ी सी लाल गेंद सा सूरज । और अगले ही पल जैसे उषा का तिलिस्म टूटा हो सूरज पीला होता गया और दुसह भी । फिर नींद ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था । पर सच कहूँ तो शमशेर की पंक्तियों का अर्थ वहां आसमान में सूरज को उगते देख  कर समझा ।जैसे मैं सूरज को जगाने उसके घर गया हूँ ।

नवंबर 10, 2013

दो साहित्यकारों की मृत्यु और फेसबुक : भाग दो


अब विजयदान देथा ।

फिर से वही सब हुआ । फेसबुक रंग गया कि विजयदान देथा सिधार गए । यहाँ-वहाँ से तस्वीरें लायी गयी उसके नीचे भावुक शब्द टांके गए और छोड़ दिया गया मैदान में लाइक और नमन’, श्रद्धांजलि जैसे कमेन्ट पाने के लिए । विजयदान देथा को विज्जी लिखा गया ताकि ज्यादा आत्मीय लग सके । अब चूंकि वे राजेंद्र यादव की तरह सक्रीय रहते हुए नहीं सिधारे थे इसलिए उन नयों के लिए जिनहोने आज ही जाना कि वे जीवित भी थे , बड़ा असहज मामला हो गया । बिचारे बस नमन या फिर श्रद्धांजलि आदि ही लिख पाये ।

दूसरे वे दिल्ली में नहीं रहते थे राजस्थान के एक जिला मुख्यालय से अस्सी किलोमीटर दूर के गाँव में रह रहे व्यक्ति तक पहुंचाना सबके वश की बात नहीं थी इसलिए इस बार थोड़ी सी कमी रह गयी लोगों के पास वही चंद तस्वीरें हैं जो इन्टरनेट पर हैं । वे न तो दिल्ली में रहते थे और न ही दिल्ली में आजकल कुछ ज्यादा ही होने वाले साहित्यिक जमघटों में जाते थे इसलिए उनके साथ लोग फोटो नहीं खींचा पाये । गिने-चुने लोगों के पास विज्जी के साथ खिंचाई गयी तस्वीर है जिनका दिखावा करने में वे स्वनमधन्य गिने-चुने जरा भी नहीं चूक रहे हैं । यहाँ पहली मुलाक़ात कैसी रही इसका भी अभाव देखा गया क्योंकि हिन्दी साहित्य का व्यक्ति दिल्ली में किसी से मिल ले और इन्टरनेट पर कहानी कविता पढ़ ले लेकिन राजस्थान जाकर एक मरणासन्न व्यक्ति से नहीं मिल सकता और किताबें खरीदकर नहीं पढ़ सकता ।

आगे इन साहित्यकारों के मरने के बाद फेसबुक पर यह होड भी लगी थी कि कौन किस्से बेहतर तरीके से यह लिख दे कि इनके मरने से साहित्य में एक शून्य आ गया , जगह खाली हो गयी , खालीपन की भरपाई नही हो सकती वगैरह । साहब जगह तो मामूली से पिल्ले के मरने के बाद भी खाली हो जाती है और ठीक उसी के द्वारा भरी जा सकती है जो कभी नहीं हो सकता फिर साहित्यकार तो साहित्यकार है । उस पर इस तरह से कहना कि शून्य आ गया या कि और इसी तरह की बड़ी बड़ी उदास बातें बहुत सही नहीं है । एक साहित्यकार अपने हिस्से का साहित्य लिखकर मरा । कई ऐसे साहित्यकार हैं जो न तो शून्य होने दे रहे हैं और न ही देंगे फिर ये शून्य हो जाना व्यर्थ की बात ही लगती । किसी भी पेशे, व्यवसाय या कला - संस्कृति में लोगों के मर जाने से यदि शून्य होने लगा तो इन सबका भट्ठा ही बैठ जाएगा । फिर ये तो है ही कि हिन्दी में जब प्रेमचंद के चले जाने से कोई शून्य नहीं आया तो किसी और के जाने से क्या ही होगा । इसके बावजूद लोग लगे हैं अपनी दीवार पर लोगों को आकर्षित करने में ।

बीबीसी की साइट पर छपे केदारनाथ सिंह से संवाददाता की बातचीत पर यकीन करें तो पता चलता है कि विजयदान देथा लंबे समय से बीमार थे और उनकी हालत बहुत खराब थी यहाँ तक कि वे बोल भी नहीं पाते थे । लेकिन इस बाबत एक दो खबरों के अतिरिक्त किसी की  फेसबुक की दीवार पर उनका नाम नहीं पाया । दरअसल साहित्यकारों का मरना देश के लिए कैसी भी क्षति क्यों न हो फेसबुक पर लोगों के लिए बड़ा ही कौतुक का विषय हो जाता है । जहां संवेदना दिखाने के बदले बटोरा जाता है और जो उसमें विघ्न डाले वह शाश्वत दुश्मन ।
आगे थोड़ी सी बात हमारी इस प्रवृत्ति से हो रहे नुकसान की ।

हम हिन्दी के लोग अपने साहित्यकार को तभी महत्व देते हैं जब वह मर जाता है । वहीं बाहर के देशों की बात को ताक पर रखते हुए अपने ही देश की अन्य भाषाओं की के लेखकों की बात करें तो वह अपने जीवन काल में ही वह ख्याति अर्जित कर लेता है जिसका वह हकदार है । इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है उसके साथ एक पाठकवर्ग का होना उसके प्रशंसकों का होना । यहाँ हिन्दी में पाठक ही लेखक है और हर पाठक को किसी न किसी लेखक से खुन्नस है जो खुन्नस उसके ऊपर की पीढ़ी ने उसे हस्तांतरित की है साहित्य में व्याप्त अलग अलग धड़ों के नाम पर । जब साहित्य ही धड़ों में बंटकर एक दूसरे के विरुद्ध बात करने लगे तो लेखकीय सम्मान और उसकी गरिमा की बात कहाँ से करे कोई । विश्वविद्यालयों में नौकरी दिलाने के नाम पर समीक्षा लिखकर स्थापित करवा देने के नाम पर गठजोड़ बनाए जा रहे हैं जो साहित्य से पाठकीयता का अंत कर उसे और उसके वाहकों को फ्रेम से बाहर हटा रहे हैं ।



दो साहित्यकारों की मृत्यु और फेसबुक : पहला भाग



यह श्रद्धांजलि नहीं है उन दो साहित्यकारों के नाम जिनका हाल ही निधन हुआ है यह एक प्रकार से गुस्से का इज़हार है जो ज़ाहिर है उनके प्रति नहीं है । यह गुस्सा उनके प्रति है जो जीते जी तो कभी सुध लेते नहीं (हाँ अपने फ़ायदे की बात हो तो कोई बात नहीं) पर उनके मरते ही यूं दिखाने लगते हैं कि उन दिवंगतों का उनसे बड़ा हितू / पाठक / करीबी कोई था ही नहीं । यह हास्यास्पद तो तब लगता है जब ऐसा करने वाले एक नहीं कई देखे जाते हैं कई बार तो यह संख्या हजार के आसपास भी जाती देखी गयी । भैया जब इतनी ही चिंता थी तो पहले कहाँ कान में तूर-तेल देकर सोये रहे ।

हाल ही में देश के दो बड़े साहित्यकारों का निधन हुआ । दोनों साहित्यकार किसी और देश में होते तो उससे ज्यादा बड़े होते जितने कि अपने देश में थे या हैं । बात राजेन्द्र यादव व विजयदान देथा की कर रहा हूँ । भारत में पैदा होना उनका एक तरह से देखा जाए तो भारत के लिए अच्छी बात थी पर उनके लिए बुरी । क्योंकि यहाँ भाषा के नाम पर जो राजनीति होती है उसमें तेलुगू , तमिल या मलयालम में एक मामूली सी किताब लिखकर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व हो सकता है पर हिन्दी में लिखकर वह  राष्ट्रीय स्तर का लेखक नहीं हो सकता । हम हिन्दी वाले कितना ही गाल बजा लें पर यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि हिन्दी क्षेत्र से बाहर इन साहित्यकारों के जीने या मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता । वहीं अभी यू आर अनंतमूर्ति की मृत्यु होगी तब यह एक राष्ट्रीय खबर बनेगी क्योंकि उन्हें जीते जी राष्ट्रीय चरित्र होने का गौरव प्राप्त है । पर राजेन्द्र यादव या कि विजयदान देथा ज्यादा से ज्यादा किसी हिन्दी के पाठ में संकलित कर दिए जाएँ और हिन्दी से संबन्धित नौकरियों के एक-दो साक्षात्कार में पूछ लिए जाएँ तो बस बहुत हो गया । न तो साहित्यकार को इससे ज्यादा चाहिए और न ही उसके कथित पाठक और हितू को ।

सबसे पहले राजेन्द्र यादव । इनकी मृत्यु जिस दिन हुई उस दिन मैं दिल्ली में ही था । यहाँ दिल्ली का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वर्तमान में यह हिन्दी साहित्य की राजधानी का रूप ले चुकी है । जिन मित्र के यहाँ ठहरा हुआ था उनके मोबाइल पर रात में ही संदेश आ गया होगा पर किसी भांति जागने पर सुबह ही वे स्वयं जान पाये और मुझ बता पाये । उसके बाद मैं और दोनों अपने अपने यंत्रों से फेसबुक की ओर दौड़े क्योंकि बाहर की दुनिया से ज्यादा साहित्यकार , पाठक और साहित्यकारों के हितू उधर ही पाये जाते हैं तो यहाँ वहाँ फोन करने की ज़हमत उठाने की कोई जरूरत नहीं थी और वहाँ चूंकि तत्काल फीडबैक देने की सुविधा है तो लोग जल्दी झूठ फैलाने की हिम्मत भी नहीं करते । चूंकि हम हिन्दी भाषा के छात्र रहे हैं इसलिए हमारा फेसबुक भी हमारी तरह का है तमाम हिन्दीगत विशेषताओं से परिपूर्ण । हमारी तरह ही अ ,, उप आदि से शुरू होने वाले संज्ञा और विशेषण से युक्त लोग वहाँ हमारे दोस्त हैं हाँ एक दो नामी-गिरामी कथाकार , पत्रकार व संपादक हमारी मित्रता सूची को कृतार्थ करने के लिए वहाँ चमकते हैं । यह भी नहीं कह सकता हूँ कि फेसबुक के तमाम चोर औजारों के रहते हुए हम उन नामी-गिरामियों की सूची में चमकते होंगे या नहीं । बहरहाल हमारी फेसबुक की दौड़ अकारथ नहीं गयी । वहाँ राजेन्द्र जी की मृत्यु से संबन्धित ही खबरें चमक रही थी । हिन्दी वालों के लिए इससे बड़ा न तो कोई साहित्यकार था और न ही इतनी बड़ी कोई खबर ।

यदि मैं अपनी उस दिन की फेसबुक दीवार का पाठ प्रस्तुत करूँ तो वह एक समूहिक रुदन और समूहिक स्यापे जैसा भाव दे रहा था । काल्पनिक भले ही हो पर इतना रुदन तो शायद किसी साहित्यकार की अकालमृत्यु पर भी नहीं हुआ होगा । लोग जहां से प्राप्त हो वहाँ से ला-ला कर उनकी फोटो लगा रहे थे तरह तरह के आदर्श और आँसू टपकाते वाक्य और उनसे बना स्टेटस ठेल रहे थे । राजेंद्र यादव फेसबुक पर भी थे इसलिए उनकी मृत्यु से उपजे दुख के हर कतरे को उनके साथ साझा करने के चक्कर में उन्हें भी टैग कर रहे थे जैसे वे अभी उठेंगे और जवाब भले ही न दें पर इन सब की संवेदनाओं को समझकर उनके प्रति अच्छी भावनाओं से भर जाएंगे । नए लोग तो इसी बात भाव-विभोर हुए जा रहे थे कि उनकी राजेंद्र जी से मुलाक़ात हुई थी और वह पहली मुलाक़ात कैसी रही । सबने अपनी पहली मुलाक़ात का वैसा ब्यौरा पेश किया हुआ था कि लगता था यार वो आदमी नहीं कुछ और ही था । यदि आदमी होता तो किसी के साथ तो बुरा बर्ताव करता ।

यह तो निश्चित ही है कि फेसबुक पर व्याप्त व्यापक रुदन और नाम स्मरण इतना वास्तविक नहीं था जितना कि उसे बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रहा था । एक दो लोगों को मैं जनता हूँ जो पहली बार राजेंद्र यादव से जब मिलकर आए थे तो लगभग गलियाँ सी दे रहे थे पर फेसबुक के उनके स्टेटस के अनुसार उनकी पहली मुलाक़ात शानदार रही थी और राजेंद्र यादव उन्हें उसी क्षण बहुत आदर्श साहित्यकार और अच्छे आदमी लग गए थे ।

उस फेसबुकीय रुदन के अवास्तविक होने का दूसरा कारण भी है । जिस दिन राजेन्द्र जी की मृत्यु हुई उससे तीन-चार दिन पहले ही उनहोने अपनी दीवार पर अपने और ज्योति कुमारी के संबंध में फेसबुक और उससे इतर मुश्किल से एक दो अन्य जगहों पर फैलाये जा रहे प्रलाप को अनर्गल कहा था । राजेंद्र यादव इससे कितने आहत थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें उसी पोस्ट में कहना पड़ा था कि उनके और ज्योति कुमारी के बीच में बाप-बेटी का रिश्ता है । मैं इस पर नहीं जाता कि क्या सच है क्या झूठ और कौन दोषी है कौन निर्दोष पर यह देखने की बात है कि हिन्दी जो जनता मरने से पहले तक अपने एक बड़े लेखक की नाक में दम किए हुए थी वही उसके मरने के बाद कितनी बदल जाती है ।

वह लेखक जो मरने पहले तक एक दुर्जय गुंडा था मरने के बाद अचानक से देवता में तब्दील हो गया । उसकी यह तबदीली उसके व्यक्तित्व के बदले हमारे व्यक्तित्व के कुछ कमजोर पक्षों की ओर इशारा करती है । यदि कोई गलत है तो वह जिये या मरे लेकिन गलत है ।

राजेन्द्र यादव के मरने के बाद के कम से कम एक-दो दिनों के लिए उनकी फेसबुक की दीवार पर लोगों ने जा जा कर बहुत कुछ लिखा और जो जा नहीं सके उनहोंने जोड़ कर लिखा । लोगों ने फोटो चिपकाए । ऐसे फोटो नहीं जिनमें राजेन्द्र जी की महत्ता साबित हो बल्कि ऐसे फोटो जिनमें चिपकाने वाले के साथ वह लेखक हो । मरने के बाद लेखक से आत्मीयता प्रदर्शित करना बड़ा ही आम सा चलन हो गया है । इससे फोटो लगाने वाला जनता में अपनी रौब गांठ रहा होता है वह भी दिवंगत व्यक्ति की परवाह किए बगैर ।


                                                   ... जारी  । 

दिल्ली हवाई अड्डे की उस सुबह के बहाने

दोस्त जब छोड़ कर गए तब भी सुबह नहीं हुई थी । बाहर अँधेरा था और जिस तरह लोगों की चहल पहल जारी थी उसको देखकर तो लग रहा था कि यहाँ कभी उजाला आएगा ही नही । ऐसा सोच इसलिए रहा था क्योंकि दिल्ली हवाई अड्डे पर सुबह के चार बजे भी लोग इतने तरोताजा और अँधेरे से मुतमईन लग रहे थे कि अँधेरे या कि उजाले के बारे में  सोचना भी एक शर्म ही देता । कहाँ मैं जब से इतनी सुबह का टिकट बनवाया तब से हैरान और परेशान था कि कैसे पकड़ पाउँगा सुबह की फ्लाईट और उस सुबह के आने से पहले तक कितने ही लोगों को अपनी परेशानी में साझीदार बना कर परेशां किया  और कहाँ ये सारे लोग ऐसे दिख रहे थे जैसे बस अभी नहा कर निकले हों । इतनी सुबह या कमोबेश रात ही कहिये फ्लाईट पकड़ने आये तो इतने सहज कि सर घूम जाये । शायद यही तरीका है हवाई यात्रा का क्योंकि वहां सहजता इतनी है कि कुछ भी उलझा अस्वाभाविक लगता ही नहीं है । जितनी बार सोचा उतनी बार मुझे यह सहजता ही अस्वाभाविक लगी है। लोगों को अपनी परेशानियाँ छिपाते देखा क्योंकि किसी और को न पता चल जाये कि वह परेशान है और लोग उसे हीन समझ लें इससे भी बड़ा डर ये कि लोग ये न मान बैठें कि यह उसकी पहली हवाई यात्रा है । पहली यात्रा है मतलब वह अभी उस क्लास के लिए नया है जो सबसे ऊपर है । हवाई जहाज में यात्रा करना मतलब सबसे श्रेष्ट होने का सामंती भाव जो बना हुआ है उसके भीतर असहजता ऐसे दुम दबाकर बैठती है कि ढूंढने से भी न मिले । लोग अपनी असुविधा छिपाते हैं कि पकडे न जाएँ । रात के चार बजे के अन्धकार में अपने अपने घरों से अपनी और अपने स्वजनों की नींद तोड़कर उन्हें असहज कर आये लोग कितने ही स्वाभाविक से चेहरे के साथ घूम रहे थे । घोर कृत्रिम वातावरण था महराज !

हवाई जहाज का होना और उससे किसी भी तरह से जुड़ना ही बहुत बड़ी बात मान ली जाती है जिससे कोई अपना समय बचाने के लिए या कि अन्य आवश्यकता और मजबूरी में भी यात्रा करे तो वह यात्रा नहीं बल्कि सुविधा को भोगने की श्रेणी में डाल दिया जाता है । इससे न सिर्फ यात्री का व्यवहार बदलता है बल्कि उसके आसपास के लोगों का व्यवहार भी उसके प्रति बदलता है । मैं जब भी दिल्ली से यहाँ स्कूल आता हूँ तब जो भी पहली बार मिलता है यह कहना नहीं भूलता है कि मैं अभी इसलिए हवाई यात्रा करता हूँ क्योंकि मुझ पर अभी कोई बोझ नहीं है । कई बार जब मैं पैसे की तंगी की बात करता हूँ तो लोग तपाक से कह डालते हैं कि साहब आप तो हवाई जहाज से यात्रा करते हैं आपके हाथ कहाँ से तंग होने लगे । अरे भैया वह तो यात्रा का एक माध्यम है उसका पैसे की कमी से वह स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है जो आप बनाये दे रहे हैं ।

मैं यह सब लिखना तो चाह रहा था पर कई बार लगा कि इस सम्बन्ध में लिखे हुए को भी उसी नजर से देख कर आगे बढ़ जाने बात होगी जिससे की हम हवाई जहाज को देखते हैं । इसके साथ यदि सामान्य बातें करें तो लोगों को वह नकली सा लगेगा । नकलीपन का ठप्पा लग जाना इस दशा में उतना ही सरल है जितना कि एक गिलास पानी पी जाना । 

पर एक बात तो है ही कि हवाई जहाज से जुड़ा हर पहलू नकली तो लगता ही है फिर चाहे सुबह के पाँच बजे  सजीधजी जहाज में  खड़ी एयर होस्टेस हो या बहार चेक इन करने वाले लोग । सबके 'वेलकम '  कहने से लेकर मुस्कराहट तक में लगातार की गयी ट्रेनिंग साफ दिख जाती है । तब यदि मैं या कि कोई और अपना सामान्य व्यवहार करे तो वह वहां असामान्य सा प्रतीत होता है । इसलिए वहां तो दिखावटी व्यवहार करना और उसी में रम जाना ही मुख्या हो जाता है । अभी पिछले जुलाई की बात है किसी कम से दिल्ली जाना और आना हुआ था और इस जाने और आने का अन्तराल था बस दो दिन का । जाते हुए एयरक्राफ्ट के समय पर न पहुँच पाने के कारण थोड़ी देरी हो गयी थी और वहां बोर्डिंग काउंटर पर खड़ी लड़की से थोड़ी देर बात करने का मौका मिल गया । कई बार लगा कि वह बातचीत में रूचि ले रही है । फिर जहाज आया और मैं दिल्ली । दो दिन बाद वापस आया तो लाउंज में वह लड़की फिर से दिखी पर उस समय उसने मेरे अभिवादन का उत्तर तक नहीं दिया क्योंकि अभी यह उसका काम नहीं था । जब विलम्ब हो रहा हो तब यात्रियों को इंगेज करना उसका काम है ताकि कोई अघट न घट जाये पर उसके बाद किसी को पहचानना उसकी ड्यूटी में नहीं है ।

दिल्ली हवाई अड्डे पर भी वही कृत्रिमता छायी हुई थी । उसमे कोई आश्चर्य नहीं बल्कि अब तो मै इसका आदी सा भी हो गया हूँ लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि लोग उतनी सुबह भी कृत्रिमता ओढ़कर आये होंगे दिल्ली में बढती ठण्ड में चादर की तरह । लोग आसपास बैठ कर इन्तजार कर तो रहे थे लेकिन किसी से कोई बात नहीं कर रहा था । बीच में कोई बच्चा यदि अपने बाप या माँ के स्मार्टफोन पर गेम खेलने की जिद करता दिख जाये तो दिख जाये सुनाई तो वह भी नहीं देता था । हाँ एयर इंडिया लाउंज के फ्लोर मैनेजरों में से दो बंगालीओं के गालियों से भरे आपसी संवाद को यदि हटा दिया जाये तो पूरा वातावरण स्वरहीन ही था । बीच बीच में की जा रही उद्घोषणा ऐसी लग रही थी जैसे बाप से छिपकर कोई रेडियो सुन रहा हो । मैं तो कुछ घंटों को छोड़ दें तो रात भर जगा ही था इसलिए जहाज पर पहुँचते ही नींद के झोंके लेने लगा । जागता भी तो क्या होता सुबह की कृत्रिमता में होते इज़ाफे को ही समेटता रहता ।

नवंबर 03, 2013

मूल्यों की चूँ-चूँ


यूं तो इसे इसी रूप में देखना चाहिए कि लोग अपनी दुकान को मजबूत करने के लिए कुछ न कुछ ऐसा लाने की कोशिश करते हैं जो उस खास समय में प्रचलन में न हो । इससे एक तो ऐसा माहौल बन जाता है कि वातावरण में एक नयी चीज आई है दूसरे जो आई है उसके लिए सभी अधिकारी नहीं है बल्कि कुछ खास लोग हैं जो इस पर विशेषज्ञता रखते हैं । यहाँ दूसरी बात भी है कि इस नए प्रकार के ज्ञान को सबके लिए नहीं माना जाता है बल्कि यहाँ और ज्यादा चयन और छंटनी की प्रक्रिया चलायी जाती ।

हर तरफ यह देखने में आ रहा है कि भारत में परंपरागत ज्ञान का प्रचलन न के बराबर रह गया है । हर क्षेत्र में पारंपरिक स्थानीय ज्ञान के बदले आयातित तरीके का ज्ञान बहुत गहरी जड़ें जमा चुका है । इसके कारण जो भी रहे हों पर यह इतने गहरे धंस चुका है कि स्वाभाविक ही लगता है । फिर भी कई धड़े ऐसे हैं जो फिर से पारंपरिक ज्ञान की ओर लौट जाने की वकालत करते हैं । इनमें एक दो ही होंगे जो ज्ञान के स्थानीय स्वरूप पर बल देते हैं अन्यथा बाकियों के लिए इसका अर्थ सीधे सीधे पिछली दुनिया में लौट जाना है । यहाँ पिछली दुनिया में लौटने का मतलब है आज से कुछ नहीं तो पाँच-छः सौ साल पहले चले जाना । वहाँ जाने का मतलब है आज की वास्तविकता से सीधा-सीधा पलायन । ये बहुत चालाक लोग हैं जो इसे स्थापित करने की प्रक्रिया में जुटे हैं । इसके पीछे उनका स्वार्थ यह है कि एक तो वे इसके लिए मुहिम चलाये हुए हैं इसलिए स्वतः ही वे इसके प्रणेता और विशेषज्ञ मान लिए जाएंगे दूसरे यह उन्हें उस वर्ग में लोकप्रिय कर देगा जो अभी भी समाज में अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है । पारंपरिक ज्ञान पर एक तो वे अपना अधिकार मानते हैं और जैसा कि हम देखते हैं यह पूर्व में भी उनके लिए ही था इसलिए वे इसी के माध्यम से फिर से वह निर्बाध अधिकार पाना चाहते हैं ।

इस संबंध में एक दलील तो यह दी जाती है कि इस तरह की ज्ञान पद्धति पर बाहर के लोग भी काम करना चाहते हैं और कर रहे हैं । अब चूंकि विदेशी भी हमारे पारंपरिक ज्ञान का लोहा मानने लगे हैं तो हमें तो इसे अपना ही डालना चाहिए । यहाँ यह समझने की जरूरत सबसे पहले बनती है कि विदेशी का नाम देखते ही बात उसके संदर्भ से क्यों होने लगती है ? जो लोग परंपरा पर जोर देते हैं वही उपनिवेशवादी मानसिकता से इतने प्रभावित हैं कि अपनी बात रखने के लिए भी उन्हें उन्हीं विदेशियों का सहारा लेना पड़ता है । दूसरे , बाहर के एक-दो लोग जो अपनी प्रणालियों और परिपाटियों से ऊब चुके होते हैं वे कुछ नया करने के चक्कर में यदि भारत की कोई जीवन पद्धति अपना लें तो हमारे देश में उन्हें हाथोंहाथ लिया जाता है फिर बार बार उनका ही हवाला देकर यहाँ माहौल को गरम रखने की कोशिश की जाती है ।

इस तरह की प्रवृत्ति के पैरोकार आजकल लगभग हर स्थान पर हैं जो हर सेवा और व्यवसाय में भारतीय संस्कृति के पक्ष को डालना चाहते हैं । इस संस्कृति को शामिल करना अपनी जगह पर सही हो सकता है पर हर बार सही नहीं हो सकता । इसके आगे जा कर देखें तो यह और जटिल व विवादित हो जाता है ।

अभी ट्रेनिंग हो रही थी । इसके शुरूआती दिनों में से एक दिन एक व्यक्ति रामकृष्ण मिशन से आए थे और उनका सीधा सा कहना यह था कि हिन्दी के शिक्षक के रूप में हम प्रशिक्षु शिक्षक भारतीय संस्कृति के वाहक हैं और हमें इसे समझते हुए काम करना चाहिए । पूरे सेशन के दौरान उनका जोर इस बात पर रहा कि भारतीय संस्कृति का पुनुरुत्थान हो जाना चाहिए । सबसे ध्यान देने वाली बात यह थी कि उनके पूरे वक्तव्य का आधार धार्मिक रहा । जिसमें कई बार यह देखा गया कि वे सीधे सीधे हिन्दू धर्म के शैक्षणिक आदर्शों को आगे बढ़ाने की बात कर रहे थे । हालांकि बार बार उनकी ओर से कहा जा रहा था कि वह किसी धर्म की ओर से बात नहीं कर रहे और एक दो उदाहरण दूसरे धर्मों से भी ले डालते थे । लेकिन वे बातें ज्यादातर इसी बात को साबित करने के लिए कही जाती थी कि अन्य धर्म में भी ऐसी बातें रही हैं । एक दो बार तो अपने प्रशिक्षक महोदय सीधे सीधे इस्लाम और ईसाई धर्म के खिलाफ बोले । चूंकि हममें से कोई अन्य धर्म का नहीं था इसलिए उन्हें यह आजादी मिल गयी थी । आगे उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि उनहोंने सीधे यह तक कह दिया कि “ब्राह्मणों ने किसी का शोषण नहीं किया और लोग अपने संस्कारों से जीते हैं” । एक बार जिन लोगों ने इस्लाम और ईसाई के खिलाफ बोलने की छूट दे दी उन्हीं लोगों के लिए जाति पर विरोध करने की सूरत नहीं रही ।

यहाँ दो बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं कि देश में बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो शिक्षण , प्रबंधन आदि में हिन्दू संस्कृति के मूल्यों को स्थापित करने की भावना ज़ोर पकड़ रही है । दूसरे ऐसा माना जाने लगा कि संस्कृत के बाद अब हिन्दी एक भाषा है जिसके माध्यम से इस भावना को संप्रेषित किया जा सकता है । उपरोक्त महोदय रामकृष्ण मिशन से जुड़े हुए हैं । उनका यह जुड़ाव बहुत सारी तय मान्यताओं , ढेर सारे सरलीकरणों और आत्मप्रवंचना के गुच्छ से है ।

अब जरा सी बात धर्म के भीतर की भी कर लेते हैं । उन विशेषज्ञ को बोलने के लिए जो विषय दिया गया था उसमें मूल्य के स्थापन की मांग थी । एक तो नए तरह की शिक्षा में मूल्य का कोई खास स्थान रह नहीं गया है । दूसरे यह जो सिखाता है वह हर बार छोटे बच्चों पर ही कार्य करता है । ज्यादा स्पष्ट रूप में ये मूल्य परिवार से लेकर विद्यालय और कार्यस्थलों तक में यह एक तरह से बुजुर्गों की श्रेष्ठता को जारी रखने की एक प्रक्रिया के रूप में कार्य करते हैं ।

यदि और गहरे जाएँ तो यह नितांत धार्मिक और पुरुषवाचक स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए बनी होते हैं । परिवार में मूल्य के नाम पर बच्चों को बड़ों पर उंगली उठाने से इस तरह रोका जाता है कि वे आगे बाहर आने पर और बड़े होने पर भी सवाल नहीं कर पाते । ऐसे डरे हुए छात्रों से हमारे विद्यालय और महाविद्यालय भरे पड़े हैं । तब हम रोना रोते हैं कि विद्यालय या महाविद्यालय अपेक्षित परिवर्तन नहीं कर पा रहे । संस्थाओं को जो बच्चे दिए जाते हैं वे इस कदर स्कूल्ड होते हैं कि उनकी डी-स्कूलिंग होते-होते लंबा वक्त गुजर जाता है और ज़्यादातर मामलों में यह हो भी नहीं पाता ।


पता नहीं यह क्यों मान कर चला जाता है कि बड़े सारे काम सही ही करते हैं और यह कितना रोचक है कि ऐसा वे खुद कहते हैं । तब यह कहना जरूरी हो जाता है यदि बड़े सब सही ही करते हैं तो देख कर सीखने वाले छोटे बच्चे सारे खटकरम कहाँ से सीखते हैं ? बहरहाल मूल्यों के नाम पर केवल बेवकूफ बनाया जा सकता है और कुछ नहीं । इसके माध्यम से एक ऐसा वातावरण बनाया जाता है जिसमें बुजुर्गों और प्रभावशालियों का धंधा चल सके । उपरोक्त सज्जन के लिए मूल्य तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ जाने की तरह था । वे मैकौले के निंदक थे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं पर उसके बदले यह कह देना कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति लायी जाए यह अति थी । वे माँ को बच्चों का प्रारम्भिक गुरु मानते हैं । यह भी ठीक है लेकिन इसके माध्यम से उनका यह कहना था कि माएँ परिवार में रहकर गुरु बनी रहें और बाहर न जाएँ । यहाँ कहना जरूरी हो जाता है कि जो जीवन-दर्शन बच्चों में इस तरह के चिंतन भरे उसके बदले किसी और ग्रह की ही जीवन-पद्धति का आयात कर लेने में कोई बुराई नहीं है । फिर भले ही ये कथित भारतीय दर्शन वाले कितनी ही चिलल-पों मचाए ।   

अक्टूबर 29, 2013

कंडीशनिंग कैंप




उस जगह से बहुत दूर नहीं हूँ जहां जाने का बार बार मन करता है लेकिन एक व्यवस्था में आकर जिस प्रकार घिर गया हूँ उसमें वहाँ जाना तो दूर , वहाँ की खबरों तक का आना भी दुर्लभ हो गया है । जिस संगठन में काम कर रहा हूँ उसके बारे में इतना नकारात्मक कभी नहीं हुआ था । यहाँ प्रशिक्षण पर आने से पहले विद्यालय में लगभग छह महीने तो हो ही गए थे लेकिन कभी ऐसे अनुभव नहीं हुए कि इस काम को इतनी शंका और अविश्वास से देखूँ । यहाँ हर दूसरे क्षण लगता है कि , वास्तविक स्थिति , आदर्श और अघट-घटनाएँ तीनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं लेकिन प्रशिक्षण इन तीनों को एक साथ करके ही चलता है । इस एक साथ चलने ने जिस मानसिक ब्लॉक का निर्माण कर दिया उसे खोलने में या खुलने में समय लगेगा । बाहर से यदि थोड़ा सा भी 
संपर्क बना रहता तो शायद यह स्थिति नहीं आती । यहाँ अखबार देखने तक का समय नहीं मिल पाता है । सब इस तरह से है कि यदि आ गए तो इसको झेलने के अलावा कुछ नहीं बचता ।

यह मानने में कोई शंका नहीं है कि शिक्षकों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी है लेकिन इत्न ई हाय – तौबा और मारा – मारी के बाद भी बच्चा तो अत्महत्या कर ही लेता है, संबन्धित शिक्षक दंडित भी हो जाता है । फिर इतनी जटिलता की आवश्यकता ही क्या है ?

प्रशिक्षण से इस तरह का साबका कभी नहीं पड़ा था इसलिए अंदाजा भी नहीं था कि कैसे लोग प्रशिक्षित होते हैं और कैसे उन्हें प्रशिक्षण के नाम पर एक तरह से संस्थानीकृत किया जाता है । कार्यक्रम इतना जटिल और समय से पीछे चलने वाला हो तो न तो इसमें किसी की रुचि बनी रह सकती है और न ही इसका कोई फायदा हो सकता है । यहाँ का मूल दर्शन यही है कि जिन स्थितियों में एक छात्र रहता है उसी तरह शिक्षकों को भी रहना चाहिए । जैसे किसी दिन छात्रावास में बिजली नहीं हो तो वे कैसे रहते होंगे इस स्थिति से रू-ब-रू कराने के लिए शिक्षकों को भी उसी तरह रखा जाए । यह तो एक बानगी है । यह बात समझ से परे हो जाती है कि संस्थान एक स्तर पर सुविधाओं को पक्का नहीं कर सकता तो जहां भी थोड़ी – बहुत सुविधाएं हैं वहाँ से हटा लिया जाए । प्रशिक्षण जब कर्मचारियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही प्रेरित हो तो यह कन्डीशनिंग कैंप जैसा ही बन जाता है ।

एक कमरे में आठ – दस लोग रखे गए हैं । इसका आदर्श और उद्देश्य यह नहीं कि लोग साथ रहेंगे और इस तरह से एक दूसरे के प्रति सहयोग का व्यवहार करेंगे बल्कि जिस तरह से छात्र रहते हैं उसी तरह से जीना सीखा जाए ।कोशिश न भी करूँ तो भी फोन का आता – जाता नेटवर्क सोचने के लिए बाध्य कर ही डालता है कि यहाँ इतनी दूर खेतों के बीचोबीच प्रशिक्षण देने की क्या जरूरत थी । यहाँ मुख्य सड़क से पैदल का ही सहारा है वह भी बड़े-बड़े रोड़ों से भरे रास्ते पर । वह रास्ता भी इतना सुनसान कि जाने से डर लग जाए । शुक्र है हम सारे पुरुष ही प्रशिक्षित होने आये हैं । एक भी स्त्री होती तो आज के हालात में उसका आना-जाना पुलिस की सुरक्षा में ही हो पाता । हममें से बहुत लोग शाम को दिन भर की थकान कम करने के लिए बाहर निकल जाते हैं , रास्ते पर मिलने वाले एक-दो बुजुर्ग हर वापस लौट जाने की सलाह दे देते हैं । बताते हैं कि हर दूसरी मोटरसाइकिल लुटेरों की होती है । कम से कम फोन और कुछ पैसे तो मिल जाएंगे ।

हमारे समय को बांटकर इतना व्यस्त कर दिया गया है कि दिन तो किसी भी तरीके से हमारा हो ही नहीं सकता । इस पर भी तुर्रा यह कि आप जिस उम्र में है उसमें आराम और इससे सहजात संबंध रखने वाली अवस्थाओं की कोई आवश्यकता नहीं है । बोलने वाला आदमी अधिकतम डेढ़ घंटे बोल के चला जाता है आराम करने वह भी बिना यह सोचे कि हम तो वहीं बैठे रह जाते हैं दूसरे बकने वाले को झेलने के लिए । एक से दूसरे को झेलते हुए , आराम और सामान्य सुविधाओं से दूर रहते हुए लगता है कि यह एक अंतहीन दौर है जो चलता रहेगा ।

इन सबने पिछले लगभग एक पखवाड़े से भी ज्यादा समय में हमारी नकारात्मकता को बढ़ाया ही है । यदि कोई शोध होता जिसमें प्री-टेस्ट, पोस्ट टेस्ट जैसी व्यवस्था होती तो इसे केवल अनुभव के आधार पर ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से साबित करने में देर नहीं लगेगी । यहाँ नकरत्मकता को इसलिए लेकर आया हूँ कि इसके बढ्ने से बहुत ज्यादा दिन विद्यालयी व्यवस्था में खासकर नवोदय जैसी संस्था में काम नहीं किया जा सकता । स्करात्मक होना यहाँ बहुत जरूरी होता है । इस दशा में यह प्रशिक्षण कुछ देने के बजाय कुछ ले ही रहा है । और इस तरह के काम शिक्षकों के उत्साह को बढ़ाने के बजाय उसकी जड़ों में मट्ठा डालने का ही काम करते हैं ।



यहाँ मेरे लिए मुद्दा नवोदय के प्रति बढ़ती उदासीनता नहीं है बल्कि भीतर हो रहा द्वंद्व है । यह द्वंद्व सकारात्मक होकर बच्चों के लिए काम करने और नियमों में बांधकर नकारात्मकता से काम के प्रति अरुचि हो जाने का है । हालांकि इससे बाहर आने के मेकैनिज़्म पर काम कर रहा हूँ पर वह भी इस प्रशिक्षण के तंत्र से बाहर निकल कर ही संभव हो पाएगा । 

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...