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जुलाई 01, 2021

भुतहा फूल

 


 

जंगल आपको चकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते ऊपर से जब मानसून हो तो कहना ही क्या । केरल का मानसून जंगल से लेकर रिहायशी इलाकों में भी वनस्पतियों की अबाध वृद्धि में भारी योगदान करता है । जो पहाड़ियाँ गर्मियों में सूखकर भूरी हो जाती हैं उन पर हरे रंग की अलग-अलग छटा देखने को मिल जाती है । तरह तरह एक फूल और जड़ी – बूटियाँ जो आम दिनों में देखने को नहीं मिलते उन्हें हर सौ मीटर पर बहते झरनों के साथ किसी ऊँचे पेड़ से टपकती बूंद के झटके से झूलती – झूमती मिल जाती हैं ।

 

कल की शाम जंगल के उस हिस्से की ओर जाना हुआ जिधर अक्सर कम जाना होता है । वह जंगल की बजाय उसकी शुरुआत है । वहाँ कभी कभी खाने की तलाश करते हिरण दिख जाते हैं । वहाँ एक सोता बहता है । उस ओर पहाड़ी की ऊंचाई बहुत नहीं है तो ढाल के सहारे बहते पानी को झरना नहीं कहा जा सकता । बेशक, कहीं कहीं पानी एक झटके में नीचे आ जाता है और उसकी चाल के साथ साथ आवाज़ भी बदल जाती है पर वह सोता ही है ।

 

मैं उस सोते के किनारे एक पत्थर पर बैठा था । मानसून के दिनों में पानी के सोतों के पास बड़ी ही सावधानी बरतने की आवश्यकता है । वहाँ मलाबार वाइपर किसी मेंढक या मछली की ताक में घात लगाए हो सकते हैं । अपनी सावधानी के मद्देनज़र बहते पानी की मधुर आवाज़ के साथ मैं इधर उधर भी देखता जा रहा था । वहीं एक फूल दिखा । फूल अकेला नहीं था बल्कि वे झुंड में खिले थे । फूलों के खिलने में क्या चौंकना ! फूल तो खिलते ही हैं !

 

उस फूल का शरीर अपनी ओर देखने के लिए विवश कर रहा था । एक लंबी तीली जैसे शरीर के ठीक छोर  पर खिला फूल । न पत्ते, न डाली, न अन्य कलियाँ ! आधे बित्ते का यह पौधा एक अजूबा ही था । मैंने अपने देखे हुए पौधों में इस तरह का पौधा नहीं देखा था जिस पर केवल फूल ही खिला हो पत्ती – वत्ति कुछ नहीं । और फूल बेहद सुंदर । गुलाब की ऐसी कली के समान जो बस अब खुलने ही वाली हो । रंग भी आकर्षक । मैंने तस्वीरें ले ली । 


 

 

लौटने पर फूल के बारे में पता करने के लिए हाथ पाँव मारने की बारी आयी । पता चला कि इसे भुतहा फूल माना जाता है । विज्ञान के अध्यापक ने इसका वैज्ञानिक नाम बताया – एजिनेशिया इंडिका । नाम से ही स्पष्ट है कि यह भारतीय मूल का पौधा है और केवल मानसून में ही दिखता है । नमी वाले स्थान में सड़े गले पत्तों में यह पौधा पनपता है ।

 

फूल किसी खूबसूरत ऑर्किड की तरह और उगना किसी मशरूम की तरह ! असल में यह पौधा एक परजीवी है । स्थानीय लोग आयुर्वेद में इसका प्रयोग करते हैं । माना जाता है कि दाह और शरीर के भीतर जमा विषैले पदार्थों के उत्सर्जन में इसके सेवन से लाभ होता है । चूँकि यह फूल उष्णकटिबंध के कई देशों में पाया जाता है इसलिए अलग अलग जगहों की स्थानीयता में इसका शामिल हो जाना स्वाभाविक ही है । इस फूल के रस को चावल के आटे के साथ मिलाकर ‘कनोम डोक डिन’ नमक एक थाई मीठा बनाया जाता है ।  

मेरे लिए पूरी तरह अनजान यह पौधा काफी रोचक निकला । इस परजीवी के कई उपयोग भी सामने आ गए लेकिन एक बात समझ नहीं आयी कि इसे भुतहा पौधा क्यों कहा जाता है ।

शायद इसके अचानक से निकल आने , बिना पत्ती और डालों का होने और केवल फूल भर होने से यह नाम पड़ा हो । कौन जाने ! पर कोई तो जानता होगा ! 

 


 

मार्च 28, 2013

चिनुआ एचबे और थिंग्स फॉल अपार्ट



     
ऐसा बहुत कम होता है जब एक लेखक अपनी एक ही कृति से इस प्रभाव छोड़े कि वह आपके साथ साथ चलता हुआ सा लगे ,उस कृति में आए संदर्भों जैसा कुछ भी दिखा नहीं कि उसको उद्धृत करने को मन मचलने लगे और देखते ही देखते कृति का परिवेश , लेखक और संदर्भ बहुत परिचित से हो जाएँ । चिनुआ एचबे की कृति ‘थिंग्स फॉल अपार्ट’ को पढ़कर ऐसा ही हुआ । उसके नितांत अफ्रीकी संदर्भ कब अपने हो गए इसका पता ही नहीं चला फिर ऐसा लगने लगा कि नाइजीरिया का यह लेखक सामने के घर में रहता हो । दोस्तों से बातचीत में उन दिनों ( कुछेक संदर्भों में अब भी ) आने बहाने एचबे और थिंग्स फॉल अपार्ट का नाम जरूर आता था ।
      चिनुआ ने थिंग्स फॉल अपार्ट में जिस समाज को सामने रखा वह और हमारा भारतीय समाज दोनों की बनावट कुछ मानों में बिलकुल समान है जिसने इस कृति से तत्काल जुड जाने में आधार का काम किया । साम्राज्यवाद तो ऐसा था जिसने दोनों ही समाजों को एक ही तरह से प्रभावित किया । यहाँ यह बात कहनी जरूरी है कि भारतीय उपमहाद्वीप और अफ्रीका महादेश की अपनी अपनी विशेषताएँ साम्राज्यवाद में भी अलग- अलग थी और यही हाल अलग-अलग साम्राज्यवादी देशों का भी था जो अपने-अपने तरीके से अपने उपनिवेशों का शोषण कर रहे थे । लेकिन मूल रूप में साम्राज्यवाद एक ही तरह से काम कर रहा था जिसका प्रधान कार्य था साम्राज्यवादियों का लाभ । अपनी गति से चल रहे समाज की बनावट में बाह्य तत्व के शामिल होते ही उसकी बनावट के बिखरे के इतिहास को दोनों ही दुनिया साझा करती हैं । यही स्थिति व्यापार और वाणिज्य और सामाजिक संतुलन के सिलसिले में भी है जिसके बिगड़ने की प्रक्रिया लगभग समान ही रही है । चिनुआ की इस कृति को पढ़ते हुए कभी नहीं लगता कि यह हमारे भूगोल के इतिहास का हिस्सा न हो ।
इस पुस्तक में चिनुआ जिन संदर्भों को उठाते हैं और उनका जिस तरह का प्रस्तुतीकरण है वह कभी भी इस ख्याल से बाहर आने ही नहीं देता कि हम भारत के किसी हिस्से के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं । उदाहरण के लिए इगबो लोगों के विश्वासों को देखा जा सकता है जिसकी भाषा और भौगोलिक विशेषताओं को छोड़ दिया जाए तो वह भारतीय ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के विश्वासों के समान ही लगता है । भारत की भाषाओं में से बहुत सारी भारोपीय परिवार की भाषाएँ हों पर हमारा सांस्कृतिक इतिहास निश्चितरुपेण यूरोपीय तौर तरीकों का नहीं है । चिनुआ , थिंग्स फॉल अपार्ट में एक मुद्रा कौरी का जिक्र करते हैं आगे वे आपसी मोल भाव के लिए कपड़े के भीतर हाथ डालकर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे की अंगुलियाँ पकड़ने के तरीके का भी जिक्र करते हैं । कहना न होगा कि ये सब भारत में भी होता था और कौरी अब भले ही मुद्रा के स्तर से अपदस्थ हो गयी हो पर कपड़े के भीतर हाथ डाल कर मोल भाव का तरीका अब भी अपने यहाँ प्रचलित हैं ।
इन तौर तरीकों और विश्वासों को समान्यतया पिछड़ेपन और अंधविश्वासों से जोड़कर देखा जाता है । उस उपन्यास में भी स्थानीयता पर श्वेतों का हमला इसी परिप्रेक्ष्य में हुआ । स्थानीयता बचाने के प्रयास में नायक और अन्य तरह के लोगों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी । इन सबके बावजूद यदि स्थानीयता बच पाती तो बड़ी बात थी । भारत के इतिहास में ढाका के बुनकरों द्वारा अपना अंगूठा काटे जाने , ढाका और उस जैसे मुख्य केन्द्रों से उनका पलायन कर जाने से ढाका का भुतहा शहर में तब्दील हो जाने आदि की कहनियों में पूरी सच्चाई न भी हो तो तो भी इतना है ही कि अंग्रेजी शासन के अधीन बुनकरों और दस्तकारों को बहुत बड़ा आघात लगा जिससे , बंगाल का सूत उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गया । दोनों ही महाद्वीपों के स्तर पर देखें तो हम कह सकते हैं कि इससे न केवल स्थानीयता बल्कि स्थानीय ज्ञान भी आहत हुआ ।
पिछले वर्ष एक प्रस्तुतीकरण (पता नहीं प्रेजेंटेशन के लिए यह उपयुक्त शब्द है या नहीं) के दौरान अध्यापक ने पूछ लिया कि स्थानीय ज्ञान को बचाने की क्या जरूरत है जब सबका काम मुख्यधारा में आने से हो रहा है और बेहतर तरीके से हो रहा है । वह प्रश्न थिंग्स फॉल अपार्ट के सिलसिले में भी याद आता है । स्थानीय ज्ञान , स्थानीय आवश्यकताओं के अनूरूप होते हैं जो वहाँ उपलब्ध प्रकृतिक संसाधनों पर आधारित होते हैं । उस भौगोलिक क्षेत्र में हम नवीन से नवीन तकनीक पहुंचा दें पर सबके लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवा पाना निश्चित तौर पर टेढ़ी खीर है । ऐसी दशा में स्थानीय ज्ञान ही स्थानीय निवासियों के काम आता है । इस पर आक्रमण एक बड़ी आबादी को चकाचौंध में लाकर खड़ी तो करती है पर उनके लिए वहाँ बिखराव के अलावा कुछ रह नहीं जाता है । चिनुआ इस स्थानीयता पर पड़ते दबाव को और उसके विरोध को रेंखांकित करते हैं । यह दबाव स्थानीय संसाधनों का अपने स्वार्थ में उपयोग करने के लिए बाह्य तत्वों द्वारा डाला जा रहा है और इसका औज़ार वही है अपने को श्रेष्ठ साबित करते हुए सभी आपराधिक और गैर आपराधिक हथकंडे अपनाना । इतना सब तो भारत में भी हुआ और कहने को हम अपने साहित्य पर गर्व भी बहुत करते हैं पर साम्राज्यवादी कब्जे और उसकी विभीषिका पर थिंग्स फॉल अपार्ट जैसा सशक्त तो छोड़िए इससे हल्की कृति भी नहीं मिलती –दो चार व्यंग्य नाटिकाओं और निबंधों को छोड़ दें तो ।
ऐतिहासिक तथ्यों के बीच समवेदनाओं का खाली स्थान निरंतर बना रहता है जो घटनकरमों को एक नीरस व एकनिष्ठ रूप देती है । जबकि इतिहास का जीवन भी एक जीवन रहा होगा जिसकी तमाम जटिलताएँ रही होंगी और यदि वे सामने आती हैं तो स्वाभाविक रूप से इतिहास की बहुस्वीकृत मान्यताओं को आघात लगेगा । थिंग्स फॉल अपार्ट का प्रकशन नाइजीरिया की आजादी के तीन साल पहले हुआ था । और इसने इतिहास के तथ्यों के बीच के खाली स्थान को जब समवेदनाओं से भरा तो अफ्रीकी देशों के संबंध में पूरी दुनिया का नजरिया बदला विशेषकर यूरोप का जो पूरे विश्व को अपनी ही संपत्ति समझ कर उसका खून चूसते रहे । सहज रूप से चल रहा कबीलाई जीवन जिसकी अपनी मान्यताएं हैं और उन मान्यताओं का अपना आधार है उसको प्रभावित कर उसे छिन्न-भिन्न करने व उसके संसाधनों पर आधिपत्य जमाकर कबीलाई जीवन को केवल इस लिए बर्बाद कर देना कि वह सभ्यता की यूरोपीय साम्राज्यवादी परिभाषा से बाहर है इसका जबर्दस्त चित्रण किया है चिनुआ ने । यही वजह है कि उन्हें अपनी इस पहली ही किताब से जबर्दस्त लोकप्रियता मिली ।
चिनुआ ने लेखन की एक सर्वथा नवीन पद्धति विकसित की जब मौखिक महावृत्तांतों को साहित्य में उसी रूप में पेश कर दिया । थिंग्स फाल अपार्ट में भी यह कई बार दृष्टिगत हुआ है । उनहोंने अपने लेखन के लिए अंग्रेजी चुनी जिसने उनकी बातों को दूर दूर तक पहुंचाया और इस पुस्तक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह 50 से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हुई।
थिंग्स फॉल अपार्ट को केवल इसलिए नहीं पढ़ा जा सकता कि उसमें साम्राज्यवादी खटकरम का चित्रण है और वह कबीलाई जीवन के बाह्य तत्वों के प्रभाव में आकर टूटने का उपन्यास है बल्कि इसलिए भी कि इसमें चिनुआ ने किस बारीकी से स्थानीय संदर्भों को बरता है और उन्हें साहित्य का स्तर दिया है । वे तमाम लोक बिम्ब और लोकगीत भाषा नहीं समझ आने के बावजूद उपन्यास को गति देते और लेखकीय कुशलता पर मुग्ध कराते प्रतीत होते हैं ।

चिनुआ आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका थिंग्स फॉल अपार्ट इस कदर हावी है कि उनके नहीं होने का विश्वास नहीं हो रहा और मन ये सोचना भी नहीं चाहता कि वह नहीं हैं ।     

मार्च 01, 2013

तो आप जीत नहीं सकते


आपको डर नहीं लगता ?
ये उन बहुत से सवालों में से एक है जो मुझसे कई बार पूछा गया । बचपन का समय होता तो शायद क्या पक्के तौर पर कह देता हाँ मुझे डर लगता है । डरपोक बच्चे के के तमाम गुण थे उस समय । मैं रात को एक कमरे से दूसरे कमरे में नहीं जा सकता था , अंधेरा होते ही न पता नहीं क्या हो जाता था ऐसा लगता था कि कोई पीछा कर रहा हो और मौका मिलते ही वह मुझ पर हावी हो जाएगा और न जाने क्या क्या । उन्हीं दिनों रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बचपन के बारे में पढ़ा यह उन्होने खुद ही लिखा था और कोर्स में लगे होने की वजह से पढ़ना ही था अन्यथा न तो मैं स्वयं इतना ज़हीन था कि कोर्स के अलावा भी  किताबें पढ़ने की कोशिश करता और न ही हमारे माता – पिता का इस ओर ध्यान था कि वो ये देखें कि हमारा बच्चा क्या पढ़ रहा है । अपने देश में सामान्य तौर पर माँ-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति उदासीन ही होते हैं और मेरे माँ-बाप अनोखे हों ऐसा भी नहीं है । खैर , विश्वकवि का किस्सा बीच में ही छुट गया ... उन्होने जो लिखा था उसे आज लगभग बीस साल बाद उसी तरह बताना तो संभव नहीं पर मजमून याद है ... शाम होने के बाद जब अपने कवि एक बड़े कमरे के पास से गुजरते हो उन्हें लगता कि उनके पीछे कोई है और इसी खयाल से उनकी पीठ सनसन करने लगती । पढ़ते ही मुझे लगा कि चलो मैं अकेला नहीं हूँ डर तो टैगोर को भी होता था । आगे जब कोई बड़ा मेरे डर का मज़ाक उड़ाता तो मैं कह देता कि टैगोर को भी डर होता था पर पता नहीं क्यों लोग इस पर और हंस पड़ते थे । एक बार गाँव से मेरे चाचा आए रात के खाने के बाद ऐसे ही बातें हो रही थी और कहीं से मेरे डर की बात छिड़ गयी । चाचा ने मेरे लिए एक रख दी , यदि मैं अपने घर से एक कीलोमीटर दूर स्टेट हाइवे पर चला जाऊन तो वो मुझे एक जींस की दो पैंट देंगे ... । पैंट का लोभ तो बहुत हुआ पर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं हिला तक नहीं और ऊपर से डर पर इतनी बातें हो चुकी थी कि और डर लगने लगा ।
ऐसे ही एक दूर के रिश्तेदार हमारे घर आए वे अपने को ओझा कहते फिरते थे । घर में जगह कम होने की वजह से उन्हे मेरे बिस्तर पर ही जगह दी गयी । उस रात उन्होने जो अजीबोगरीब किस्से भूतों के, डायनों के सुनाये कि मत पूछिए । अगले कई महीनों तक वो विभिन्न चरित्र कहीं किसी अकेली जगह में , रात के अंधेरे में मेरे मन में आ जाते और ऐसा लगता कि ये अभी बाहर आ जाएंगे । हालात ये हो गए थे कि मैं रात को बिस्तर ने नही हिलने के कारण बिस्तर गीला करने लगा था ।
फिर पता नहीं कब वो दौर आया जब ये समझ में आ गया कि ये सब हमारे वहम हैं , हमारी कल्पनाएं हैं । फिर मैं अंधेरे में कहीं भी जाने लगा था । मुझे नहीं पता कि सबके साथ इसी तरह होता है या नहीं । ऐसा होता होगा नहीं तो मान लीजिये किसी व्यक्ति के बच्चे को भय हो रहा हो और वह व्यक्ति उसका डर भागने के बजाय खुद ही भयभीत होकर खड़ा रहे तो कितनी हास्यास्पद दशा हो जाएगी । ऐसा होता भी है पर उस समय कारण दूसरे होते हैं । मुझे लगता है कि ये भूत , डायन आदि के भय उम्र बढ्ने के साथ धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं ।
अभी तीन साल पहले मध्य प्रदेश के भीमबेटका गया हुआ था । बिना किसी तैयारी और सुविधाओं के गया था और वहाँ सुविधाएं हैं भी नहीं । गुफाओं तक जाने के लिए के लिए यदि आपकी अपनी सवारी है तो ठीक नहीं तो ऊपर के 3 – 4 किलोमीटर पैदल ही जाने पड़ते हैं । मई महीने की चिलचिलाती धूप में पहाड़ी पर पैदल ! आज सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ! दूर दूर तक कोई नहीं था पत्ते इस कदर सूख गए थे कि जरा सी हवा के चलने से वो खड़खड़ाने लगते , यहाँ तक कि मक्खी की भिनभिनाहट भी बहुत तेज सुनाई देती थी ! पर पता नहीं मन ने ऐसा क्यों ठान रखा था कि आज तो उन पाषाण युगीन गुफा चित्रों को देखना ही है । मैं चलता रहा । तभी मोबाइल पर एक दोस्त का फोन आया । उसके बजने की आवाज़ उस वीराने में इतनी तेज़ थी कि मैं डर के मारे चौंक पड़ा । पर उन एक दो मिनटों के बाद सारा भय जाता रहा । आज सोचता हूँ तो एक अलग सी अनुभूति होती है कि एक दिन मैंने उन पाषाण युग के चित्रों को अकेले देखा दूर – दूर तक कोई नहीं था । उस दोपहरी के एक एक क्षण याद हैं । वहाँ से भोपाल तक आने के लिए भी ठीकठाक जद्दोजहद करनी पड़ी थी ।
अभी उस दिन फिर एक छात्र  ने पूछ दिया कि मुझे डर लगता है या नहीं । मुझे पता भी चला कब बड़ी सहजता से उत्तर निकल गया – नहीं । तो उसने कहा कि ‘ फिर आप जीत नहीं सकते’ । मैंने पूछा मैं क्यों नहीं जीत सकता तो जवाब मिला कि ‘डर के आगे जीत है’ और चूंकि आप डरते नहीं इसलिए आपके जीतने पर संदेह है । उसके हिसाब से यदि जीतना है तो डर होना जरूरी है । ड्यू के विज्ञापन की इस पंक्ति ने उसकी बिक्री पर क्या प्रभाव डाला नहीं पता पर छोटी उम्र के लोगों को एक मुहावरा तो दे ही दिया । जहां कहीं डर की बात आई कि चिपका मारा – डर के आगे जीत है ! यहाँ तक तो फिर भी ठीक है लेकिन ये छात्र तो उससे भी एक कदम आगे पहुँच गया है । अब यदि डर नहीं है तो जीतना कठिन है । यदि डर के आगे जीत है वाले मुहावरे को सही माना जाए तो ये तर्क भी पूरी तरह वैध नजर आता है । पर क्या डर इतनी सहज अन्विति है भी ?
मेरे अपने अनुभव जो हैं उस आधार पर मैं यदि देखूँ तो डर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं । वे तमाम किस्से – कहानियाँ हमें आज भी वहीं के वहीं जमे हुए हैं । यदि भूत –प्रेत शाश्वत होते हैं तो आज कल के तकनीक-दक्ष भूतों के किस्से क्यों नहीं मिलते ? जबकि अकालमृत्यु की मात्रा और प्रतिशत दोनों बीते हुए समय की तुलना में आजकल काफी ज्यादा हैं । इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये उस समय की संकल्पना है और किस्से हैं जब आबादी बहुत कम थी या लोगों के बीच उतना संपर्क नहीं था । फिर एक किस्सा अपनी आगे वाली पीढ़ी में निविष्ट कर पिछली पीढ़ी चली गयी और ये क्रम बहुत हाल तक बना रहा । जब संयुक्त परिवार टूटे तो किस्से कहानियों की परंपरा को भी झटका लगा और वर्तमान समय में देखें तो यह बिलकुल गौण ही मालूम पड़ती है ।
जब मैं अपने नानी के यहाँ रहता था उस दौरान उस गाँव के एक बुजुर्ग थे गुणानंद । उनका अपना आम का बगीचा था और इत्तिफाक़ से हमारे नाना के आम के पेड़ भी वहीं पास में थे । गर्मियों में जब आम बड़े होने लगते तो उनकी रखवाली जरूरी हो जाती फिर घर के बुजुर्ग और बच्चे ही उनकी रखवाली करते थे । गरम होकर पिघलते हुए उन दिनों में गुणानंद हम बच्चों को बहुत से किस्से सुनाते । उसी तरह डोमि ठाकुर जिन्हें हम ठाकुर बाबा कहते थे फिर मेरे नाना की माँ वो बुढ़िया भी गज़ब किस्सागो थी । इनलोगों ने जो किस्से सुनाये उनमें भूत –प्रेत भी थे और डायन भी । निश्चित तौर पर मेरे मन में दर ने उन्हीं दिनों आकार लिया होगा । आज ये तीनों नहीं हैं और उस गाँव में बुजुर्ग आज भी हैं साथ ही बच्चे भी पर किस्से कहानियों का सिलसिला जाता रहा । अलबत्ता हर साल गर्मियों में आम जरूर आते हैं । अब बच्चों के माँ – बाप के मन में भूत-प्रेत की जो छवि बनी है वे उसी से काम चलाते हैं । हाँ निकट के समय में किसी की मृत्यु हुई हो तो उसका डर बच्चों पर स्वाभाविक रूप से हावी हो जाता है ।
परंपरा से चले आ रहे किस्सों को सहारा बना कर और उसमें अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन कर माँ – बाप और आस पास के लोग ही बच्चों में डर भरते हैं । अपने देश में पालन-पोषण का सबसे सामान्य अर्थ लिया जाता है – किसी तरह बच्चे का पेट भरना चाहिए और किसी तरह बच्चा सामान्य कार्यकलाप में व्यवधान न उत्पन्न करे , यह भी कि कोई जिद भी न करे । इन सभी स्थितियों से निबटने के लिए माता-पिता भय का ही सहारा लेते हैं । बचपन की शुरुआत में ही भय कभी कभी इतना गहरे से मन में जम जाता है कि बड़ी उम्र तक नहीं निकलता । मैं अपनी एक रिश्ते की नानी को जनता हूँ जिनका पुलिस का डर आज तक नहीं गया ।
माता पिता किसी तरह से बच्चे को बड़ा तो कर देते हैं पर वह बहुत दिनों भय से नहीं निकल पाता । फिर वह बड़ों से भी डरने लगता है , बहुत से ऐसे लोग देखे जो तरह तरह की डर के शिकार हो जाते हैं यहाँ तक कि डर के मारे कक्षा में प्रश्न तक नहीं पूछ पाते ।
मैं अपनी बात करूँ तो कभी कभी आज भी डर जाता हूँ ... पर यह डर निश्चित रूप से भूत प्रेत या डायन का नहीं होता है ।     

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...