जून 26, 2021

अधिकार चेतस समाज और दहेज़ आधारित अपराध


 

               

       

       समूचा केरल आजकल दहेज़ से जुड़ी हत्या , अत्महत्या और प्रताड़नाओं की खबरों से ओतप्रोत है । जिधर देखो इसी बात की चर्चा है और सरकार से लेकर आम जन के बीच समझदारी का ऐसा ज्वार उठा है कि लगता है दहेज़ सदा के लिए इसमें बहकर हिन्द महासागर में समा जाएगा । मीडिया ने इन मुद्दों को मजबूती से उठा रखा है, सरकार पर दबाव बन रहा है और उस दबाव में से वह अदर्श निर्णय ले रही है । सरकारी आदेश देखकर कोई भी व्यक्ति प्रशंसा कर उठेगा । बल्कि केरल और इस सरकार के प्रशंसक देश भर में इन आदेशों को आदर्श सरकार के तौर – तरीके की तरह पेश कर रहे हैं । सरकार के निर्णयों में कुछ भी बुरा नहीं है न ही उसकी प्रशंसा बुरी है । लेकिन एक प्रगतिशीलसरकार तब जागती है जब उत्पीड़न की कई खबरें आ जाती हैं । वह उस समय नहीं चेतती जब एक पति अपनी पत्नी को साँप से कटवा देता है और दुल्हन ऊपर से नीचे तक सोने में लदकर मंडप में पहुँचती है और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो महिलाओं के प्रति हिंसा में केरल को काफी ऊपर रखता है ।

 

            आम तौर पर देखा जाये तो केरल एक आदर्श राज्य प्रतीत होता है । निकट इतिहास में हुई सामाजिक क्रांतियों, आधारभूत संरचना और शिक्षा – स्वास्थ्य आदि की दिशा में किए गए सरकारी प्रयासों के मद्देनज़र जो केरल उभरता है वह वाक़ई किसी भी राज्य को ईर्ष्या से भर देने में सक्षम है । हाल में आयी नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस बात पर मुहर लगाती है । केरल एक आदर्श राज्य है जहाँ साक्षरता दर उच्च है , चमचमाती सड़कें और सक्षम परिवहन व्यवस्था है । फिर दहेज़ हत्या जैसी प्रतिगामी चीज क्यों होती हैं ?

 

        केरल को बाहर से देखने वाले या फिर पर्यटन की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए इस राज्य की आम छवि से निकल पाना कठिन है साथ में सरकारी प्रचार और यहाँ के आम नागरिकों का श्रेष्ठता बोध आदि मिलकर जो मुखौटा निर्मित करते हैं उसके भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो छिपकर रह जाता है । लैंगिक भेदभाव ऐसा ही पक्ष है । ऊपर से देखा जाये तो केरल में वह नहीं दिखेगा । इस न दिखने कारण भेदभाव को देखने वाले मानकों में निहित है । केरल में महिला साक्षरता दर काफी ज्यादा है , बड़ी संख्या में स्त्रियाँ घर के बाहर काम करने जाती हैं, स्त्री – पुरुष लिंगानुपात बहुत बुरा नहीं है । आँकड़ों के आधार पर राय बनाने वालों के लिए केरल में लैंगिक भेदभाव जैसी किसी चीज का होना एक अपवाद की तरह होगा । केरल में स्त्री की दशा का आकलन आँकड़ों की बजाय सामान्य पारिवारिक निर्णयों में उनकी भूमिका , सड़कों पर उनकी आम उपस्थिती , अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को हतोत्साहित के तरीकों, उनके पहनावे संबंधी दृष्टिकोण और कपड़ों पर पड़ते परंपरा के दबाव व उनके प्रति होते अपराध के आधार पर हो तो स्थिति बेहतर तरीके से साफ होगी । फिर उस मुखौटे के भीतर की असल छवि बाहर आएगी ।

 

    केरल के मालाबार इलाके में बाल-विवाह होता है । इस राज्य के बाहर के लोगों के लिए यह एक चौंकाने वाली खबर हो सकती है लेकिन स्थानीय लोगों के लिए नहीं । वे इतना कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह केवल मुसलमानों में प्रचलित है । एक झटके में साढ़े छब्बीस प्रतिशत आबादी को अपने से अलग कर दिया जाता है जैसे वे इस राज्य के निवासी ही न हों । जबकि धार्मिक आधार पर देखें तो हिंदुओं के बाद इस्लाम मतावलंबियों की ही संख्या आती है । स्त्रियों पर नियंत्रण को यहाँ बिना किसी धार्मिक भेदभाव के देखा जा सकता है, पहनावे में ख़ासकर । बहुत साल नहीं हुए जब प्रसिद्ध गायक येसुदास ने लड़कियों के जींस पहनने पर टिप्पणी की थी । इस तरह की बातें उत्तर भारत में ख़ासकर बीमारू प्रदेशों में सुनी और देखी जाती हैं । ऐसे में केरल के नागरिकों और इसके बाहरी प्रशंसकों के तर्क इस बात की ओर जाते हैं कि अन्य राज्यों की अपेक्षा यहाँ ये बातें कम हैं । अव्वल तो यह कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े इस अपेक्षाकृत कम वाली बात को ख़ारिज़ करते हैं दूसरे स्त्री के प्रति कम और ज्यादा अपराध वाली बात यदि मान भी ली जाये तो यह केवल मात्रा का फर्क बताता है , अपराध तो हो ही रहे हैं । जब यही हाल रहना है तो जिस उच्च साक्षरता दर के कसीदे पढे जाते हैं और उसकी कसमें खायी जाती है वह किसी काम की नहीं मालूम पड़ती ।

 

    इसी राज्य में एक गांव है निलांबुर । उसके प्रवेश द्वार पर ही यह बता दिया जाता है कि आप दहेज़ मुक्त गाँव में प्रवेश कर रहे हैं। देश भर में इस बात का खूब प्रचार – प्रसार होता है । अच्छी बातों का प्रचार होना चाहिए साथ ही दहेज़ से जुड़ी प्रताड़ना और मौतों को भी स्थानीय समाज को स्वीकार करना होगा । कम और ज्यादा का द्वैत खड़ा करके मुँह मोड़ लेने से बचना होगा ।   

 

जून 25, 2021

बारिश और हाथी


 

 

         पिछली गर्मी की बात है । पास की एक बस्ती एक स्त्री रात में किसी काम से अपनी रसोई में गयी । वहाँ का नज़ारा देखकर उसके होश उड़ गए । सामने खड़ा हाथी बड़े ही डरावने अंदाज़ में दीवार तोड़ने की कोशिश कर रहा था । वह डरकर भागी और फिसल गयी , उसका हाथ टूट गया ।  

     जब पानी खूब बरसने लगता है पशु – पक्षी अपनी तृप्ति के स्रोत अपने आसपास ही पाने लगते हैं । रुक जाता है उनका असंख्य कथा कहानियों में आना । गर्मी में जब हाथी बाहर निकलते हैं तो खबर बनती है , भय का एक वातावरण घिर आता है , रोमांच की चाह वाले लोग सूखे पत्तों की एक खड़क पर भागने का अभ्यास करने लगते हैं ।

       

       मुझे हाथी बड़े प्रिय लगते हैं । बहुत से लोग हाथियों के प्रिय होने से इत्तिफाक़ नहीं रखते । क्या कहा हाथी प्रिय नहीं लगते ? हाथी किसे प्रिय नहीं लगते ? कितने तो प्यारे होते हैं , कभी चाल देखी है उनकी ? जंगल से सटे गाँव के किसी दालान पर बैठे - बैठे लोग हाथी की चाल के बारे में नहीं सोचते । वे हाथियों द्वारा अपनी फसल को नष्ट होते देखते हैं । अपनी आजीविका के आधार को नष्ट करने वाले के प्रति स्नेह और प्यार कैसे पनप सकता है ! हाथी को प्यारा वही कहते हैं जिनका कुछ भी दाँव पर न लगा हो ।  

 

         इस बारिश के पहले वाली गर्मी में कई बार हाथी देखने को मिल गए । मेरे लिए यह रोमांच और आनंद की बात थी । अबतक के केरल प्रवास में ऐसा पहली बार हुआ था । कोविड के कारण इंसानी गतिविधियों के सीमित हो जाने से हाथी सहित अन्य जंगली जीव जैसे कि हिरण और भेड़ियों के लिए बाहर आना आसान हो गया । नितांत शहरी और अपनी दुनिया में मस्त इंसान की तरह देखें तो इससे बढ़िया बात नहीं हो सकती । ये जीव अपना क्षेत्र विस्तार कर रहे हैं बाहर रहे हैं । मनुष्यों ने बहुत नुकसान किया इनका वगैरह । लेकिन ये भरे पेट वालों की बातें हैं । 

 

                जब ये जीव बस्ती में घुसते हैं, बिना नुकसान किए नहीं जाते । झुंड से निकाल दिया गया नर तो सुरक्षित स्थान पाने तक हफ्तों रुक सकता है । हाथियों को केला , गन्ना , ऑयल पाम के पेड़ बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और ये सब लोग आम तौर पर लगाते हैं इधर ! थोड़ी बहुत फेंसिंग सरकार ने कर रखी है लेकिन वह हाथियों के लिए कम ही पड़ती है । जिनके पास थोड़ा बहुत पैसा है वे अपनी ओर से फेंसिंग करवा लेते हैं । बाकी बचे लोगों के लिए खतरा लगातार बना रहता है । तभी कोई पटाखे का इस्तेमाल करता है तो कोई बारूद के गोले का ।

 

जून 23, 2021

टेल ऑफ फॉक्स टेल

 

 


 
 
ऐसी ही बारिशों के दिन थे जब थोड़ी सी दूर निकलने का अर्थ था भीगना और न भीगना हो तो कहीं किसी टपरी में बैठे बूंदों की तेज़ी को कम होते हुए देखते रहना । हम एक छिपे हुए झरने को देखने गए थे । सड़क पर चलने वालों को उसकी आवाज़ तो आती लेकिन ग्रेट हॉर्नबिल की तरह आम नज़र से छिपा रहना वह सीख गया था । पर लोग कहाँ जंगल की बात मानते हैं उन्हें तो सब देखना ठहरा । बारिश कम हुई तो हम संभल संभालकर गीली पहाड़ी के तलुए से उँगलियों की ओर बढ़ने लगे । हमारा इरादा उसके पैर के आसपास ही रहने का था । निश्चित रूप से हममें से कोई भी उतना हिम्मती नहीं रह जाता कि गीली पहाड़ी पर चढ़ने का साहस कर ले । पहाड़ सूखा हो तो पैरों को पकड़ता है , एक पकड़ बनती है फिर सारा काम संतुलन बनाने का ही रहता है । लेकिन, गीला पहाड़ अपने ऊपर कुछ भी नहीं रखता । पानी के साथ सबकुछ लुढ़कता हुआ नीचे आ सकता है । पता नहीं काई कैसे जमी रह जाती है ! वह शायद सबकुछ नीचे गिराने में पहाड़ की मदद करती है इसलिए पहाड़ उसे छोड़ देता है ।

 

हमने आवाज़ का सहारा लेकर झरना खोज लिया । फिर वहाँ तस्वीरें न लेते तो उस चढ़ाई का क्या अर्थ । उस क्षण हममें में से हरेक एक पर्वतारोही था जिसने एवरेस्ट फ़तह कर ली हो । छोटे छोटे लक्ष्य पाते रहने से जीवन में विश्वास बना रहता है । वहीं हमें वह फूल दिखा । किसी गिलहरी की पूँछ सा फूल । यही फूल मैंने असम में भी देखा था । असम का राजकीय पुष्प – कोपू फूल ! वहाँ इसे उर्वरता का प्रतीक माना जाता है इसलिए शादी – ब्याह के अवसर पर इसका उपयोग होता है । उर्वरता को मनुष्य अपनी वंश-वृद्धि और धनधान्य की वृद्धि से जोड़कर अपने अधीन कर लेना चाहता है । यदि ये फूल जंगल में खिलते तो सार्वजनिक उर्वरता की ही बढ़त होती न ! सार्वजनिक को व्यक्तिगत बनाने की कवायद में ही जंगल , नदी, तालाब सब खो रहे हैं । जंगलों पर निर्भर लोग बेबस होकर रह जा रहे हैं ।

 


 

 

साधारणतया फॉक्सटेल ऑर्किड के नाम से जाना जाने वाला यह फूल वेणी में लगे गुलाबी गजरे जैसा था जिसे बस लगाना बाकी था । इधर उधर नज़र बचाकर हम कुछ टहनियाँ ले आए । मेरे हिस्से जो टहनी आयी उसमें एक फूल खिला हुआ था । नारियल के छिलके के बीच रखकर पौधा लगा दिया गया । जंगल के इस पौधे को तेज़ धूप नहीं चाहिए लेकिन नम वातावरण अवश्य चाहिए । भीषण गर्मी में तो बहुत ज्यादा पानी भी । मैंने नारियल के खोल के नीचे एक प्लास्टिक का डब्बा रख दिया । जब भी पानी दिया जाता तो डब्बे के भर जाने के खयाल के साथ ताकि कहीं चले जाने की दशा में कुछ दिनों तक पानी रहे और पौधा मुरझाए नहीं । कुछ दिन रहकर वह फूल सूख गया । फिर मेरी उम्मीद अगले मौसम पर टिक गयी ।

 

अगला मौसम यानि घोर बारिश के शुरुआती दिन ! एक बात अजीब देखी – देश के दूसरे हिस्सों में जहां यह फूल ठंड में खिल जाता है वहीं केरल में इसका समय बारिश का है । इसकी जड़ों के बढ़ने , एक एक कोंपल के आने से अजीब खुशी होती मुझे । मैं इसे खिलते हुए देखना चाहता था । फिर एक शंका भी होती कि अपने वातावरण से कटकर क्या यह पौधा फूल खिला पाएगा ? मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन का नायक एक दिन अपनी जड़ों की ओर लौट आता है उसे अपने ग्राम समाज की प्रेरणा चाहिए । उसकी प्रतिभा नगर में एक समय के बाद प्रफुल्लित नही हो पा रही । अपने आसपास से सबकुछ सोख लेने की यह कौन सी ज़िद होती है हमारी ?


 

 

पिछले साल गर्मी की छुट्टियाँ लॉकडाउन की भेंट चढ़ गयी बाहर जाना भी हुआ तो इतने दिन के लिए नहीं कि पौधे को पानी भी न मिल पाये । लेकिन इस बार दो महीने यहाँ नहीं रहा । भला हो केरल की भौगोलिक स्थिति का कि हमारे निकलते न निकलते छोटी मोटी बारिशें शुरू हो गयी । छुट्टियाँ बिताकर लौटा तो  अलग ही नज़ारा था । कुछ पौधे बहुत ज्यादा पानी के कारण सूख चुके थे तो कुछ बाहर से की गयी पेंटिंग से नयी ढब में ढल गए थे । यह पौधा अपनी जगह पर यूँ ही पड़ा था उसके सिर से यह फूल लटक रहा था – कोपू फूल, उर्वरता का प्रतीक , असम का राजकीय फूल ! दूसरे पौधों के सूख जाने का दुख जाता रहा ।

 

हमारे साथ जिन साथियों ने यह पौधा लगाया उनमें किसी में फूल नहीं आए हैं । मैं अक्सर सतीश भाई को तस्वीरें भेजकर चिढ़ा देता हूँ । उनके कुछेक और मित्र हैं जिनके यहाँ फूल आ रहे हैं । कल शाम वे अपने पौधे  के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और कहने लगे – मेरी इज्ज़त का खयाल करो कम से कम एक फूल तो दे दो ।


 

एक फूल कितनी बातों से जुड़ता है , हमारे छिपे व्यवहार भी खोल देता है । उम्मीद है इस मौसम में और फूल खिलेंगे ।

जून 22, 2021

तस्वीरों में बारिश की यात्रा

बारिश बहुत खूबसूरत होती है बस उसका हुस्न देखने की फुर्सत हर रोज़ नहीं मिलती । इधर तो जब भी नींद खुलती है बारिश की आवाज़ ही सुनाई देती है लेकिन उसे महसूस करने के बजाय भाग भागकर धंधे पर जाने की तैयारी में लगे होने के कारण कुछ भी देखना और आत्मसात कर पाना मुश्किल हो जाता है ।
 
 
 
 
हाँ कभी कभी बारिश ने यूं भी दीवाना किया था कि मैं चलती कक्षा रोककर खिड़की से बाहर देखने लगता , कुछ बच्चे भी ऐसा करते , कुछ उस अंतराल का उपयोग कुछ सेकेंड की नींद के लिए करते ।  अब तो दौर ही बदल गया । 



  
         यहाँ की बारिश तो यूं है कि कोई लगातार पकौड़े तैयार रखे बस । कुछ भी गरम पीने या पकड़ने से अलग ही सुकून मिलता है । हाँ कपड़े देर से सूखते हैं । छाता अभिन्न अंग बन चुका होता है शरीर का । छाते की जरूरत ही इतनी पड़ती रहती है कि आप उसे कहीं छोड़ ही नहीं सकते । 

                  मैंने अपना बिस्तर जिस कमरे में लगा रखा है उससे सामने की पहाड़ी साफ दिखती है । दो बड़ी बड़ी खिड़कियाँ किसी बड़ी स्क्रीन की तरह एक भव्य नज़ारा सामने बनाए रखती है । 
 
 
बारिश जब भी आती है उसी पहाड़ी की ओर से आती है । बूंदों का संकुल पहाड़ी की हरीतिमा को अपने धुंधलके से ढँक लेता है ठीक उसी तरह जिस तरह कोई सुंदरी किसी शीशे वाले  बाथरूम में नहा रही हो और दीवारों पर जमी पानी की बारीक बूंदों में उसका झिलमिलाता सौन्दर्य खुलता हो ।
 

आती हुई बारिश को यूं महसूस कर सकते हैं यहाँ । ऐसे बचपन में देखा करता था जब नानी गाँव में पूरब की ओर बसे रामपुर गाँव से बारिश आती दिखती थी । रामपुर के ऊपर के क्षितिज पर काले होते बादलों को भी खूब देखा था । आती हुई आँधी भी दिख जाती थी । तब बहुत वक्त हुआ करता था और सामने उतना ही खाली स्थान भी कि दुनिया, प्रकृति को वेश बदलते हुए देख सके ।

जून 21, 2021

भूले - भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े

 

                        

               चाहते हुए भी उसे निकलना ही था छोड़नी ही थी वह दुनिया जिससे उसके निकल जाने की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी जाड़े के प्यारे से दिन थे और उसकी आँखें रोने और रोने के अंतर को मिटा चुकी थी पास बैठा लड़का, जिसे बाहर से देखने वाला कोई भी व्यक्ति प्रेमी ही समझता रह रहकर उसका हाथ अपने हाथों में ले रहा था , उस पर हल्की - हल्की चपत लगाकर ध्यान बंटाना चाह रहा था  

 

तीन घंटे की दूरी है बस ... सबसे बड़ी बात अब हमारे पास पैसे होंगे जब मन करेगा फ्लाइट पकड़ लेना लड़के ने कह तो दिया लेकिन उसके पास प्रेम के दूर चले जाने का अनुभव नहीं था उसे यह भी नहीं पता था कि किसी लड़की की नौकरी लगने पर उसके पैसों में प्रेमी का हक़ होता है या नहीं   यह सब लड़की को भी कहाँ पता था

 

फिर वह अनचाही स्थिति ही गयी विश्वविद्यालय की धूप में , पेड़ों की छांव में और वहाँ इधर - उधर फैले चाय के ठीहों मिलने वाले अब अलग - अलग थे कॉमन दोस्तों के लिए अकेले होकर भी वे दो थे जब भी बातें होती दोनों की एक साथ होती जोजग सूना सूना लागेजैसी बातें चरम भावुकता लगती थी, वे उनकी अपनी हो गयी

 

रिश्ते गरमाहट खोते ही हैं ऊपर से दूरी , तीन घंटे का सफर साल में एक बार भी पूरा नहीं हुआ ! पैसेहमारेनहीं हो पाये  

 

 

और अंत में वह दिन भी गया जब लड़की ने अपनी आरामदेह नौकरी छोड़कर उस जगह गयी जहां से तीन घंटे की यात्रा के लिए सोचना ही नहीं था यहाँ दिक्कतें थी , बंधन भी थे लेकिन सबसे बड़ी बात थी प्रेमी का पास होना ! कमबख़्त, स्कीम ऑफ थिंग्स से बाहर गया ही नहीं !

 

***

 


 

 

 

इंप्रेस करने की हजारवीं कोशिश करते हुए उसने कहा था – ‘इससे खूबसूरत बात तो किसी की स्माइल ही हो सकती है  सुनकर उसने ज़ोर का ठहाका लगाया था ! ठहाके के बाद उसका झेंप जाना स्वाभाविक ही था ... कोशिश यूँ हवा में उड़ गयी थी वह झेंपते हुए मुस्कुरा रहा था या इसके उलट पता नही बस इतना पता है  कि उसके मुँह से एक सवाल निकला था - क्यों क्या हुआ

 

उसे पता था कि जवाब आएगा - कुछ नहीं ऐसे मौकों पर वह इतना ही कह पाती है ! लेकिन उसकुछ नहींके बाद उसका चेहरा ठहर जाता है जैसे हवा में लहराता कोई फूल एकदम से रुक जाये आसपास के और फूल भी ठहर जाते होंगे   भीतर कुछ उमड़ता होगा शायद

 

मन हुआ, उसका चेहरा अपनी गोद में रखकर किसी चट्टान पर बैठ जाये ग्रीष्म की दुपहरी में चट्टान के ऊपर के पेड़ सूरज के तेज़ को रोकने में सफल होकर राहत की साँस लेने लगते हैं उस समय वह अपने गोद में खिले चेहरे को पुटूस और सरसों के नन्हें - नन्हें फूलों से सजाये वैसी सजावट जैसी बंगाली दुल्हनों के भौहों के ऊपर होती है !

 

वह पूछ बैठता हैऔर ?

जवाब फिर से वहीकुछ नहीं

 

कुछ नहींअसल में वह दायरा है जिसके पार कोई दायरा नहीं, बंधन नहीं और शायद इंप्रेस करने की अगली कोशिश भी नहीं! अगली बार मिलेंगे तो बातें पुनःअथसे शुरू होंगी अपूर्णता में नये की नमी बची रहती है

 

***

 

छाते में इतना दम नहीं था कि तेज़ बारिश को रोक ले उसने प्रयास भी छोड़ दिए थे लंबे बाल भीगने से भारी तो हो गए लेकिन तेज़ हवा में उड़ने लायक अब भी थे हवा जब उन्हें उड़ाती तो पानी की बूंदें बालों से भी छिटकती ! आकाश के छोर तक छाए तरंगित बादल जितना पानी बरसा रहे थे उसमें से कुछ उसके गालों पर भी रुक रहा था

 

वह बारिश में फँस गयी बस समय से ही आयी थी लेकिन  उस समय  वह उसकी बाइक पर थी ड्राइव  करते - करते उसने हाथ पकड़ कर अपने पेट पर रख लिया था - झूम गयी थी वह भीतर ही भीतर ! होंठ, उसकी पीठ से सट गए थे ! उन कुछ क्षणों में आनंद के कई युग ऐसे गुजरे जो वर्षों याद रहेंगे  

 

वह ऐसी शाम की कल्पना ही किया करती थी ! उसकी बाइक पर बैठने की साध जो थी उन दृश्यों को प्रत्यक्ष देखना था जिसे वह सबको दिखाता फिरता है ! बादल में लिपटे पहाड़ , तरह - तरह के पेड़ सब देखने थे   उसके छिपे हुए झरने का सौन्दर्य सचमुच अनोखा था ढलुआं नाले की शक्ल में आती धारा एकाएक कई फीट नीचे गिर रही थी जल का वह विस्तृत रूप पत्थरों से खेलते हुए पेड़ों, झाड़ियों को सहलाते नदी से समुद्र तक का सफर तय करेगा

 

बाइक चलाते हुए वह बार - बार पीछे मुड़ रहा था डर के बावजूद उसने अपने को उसकी बाईं बाँह से भी बाहर लटका रखा था कि वह जरा - सा भी मुड़े तो बड़ी - बड़ी काली आँखें देख ले वैसे देखना तो उसे अब चाहिए था इस बारिश में वह पूरी तरह भीग गयी थी

 

अपने जीवन भर की याद के लिए उसने बस छोड़ी और अब बारिश में भीग रही है वह , लड़के के जीवन की साध नहीं ! भरी बारिश में आँसू कौन देखता है !

 

***

 

मैं अश्वघोष को पढ़ रहा था बुद्धचरितऔरसौंदरानंदवाले अश्वघोष जिन्होने प्रेमिका के नहीं रहने पर भी प्रेम को जिया उसके सपने को जिया ! कैसी रही होगी प्रभा जिसने उस कवि को इतनी हिम्मत दी

 

सरयू नदी की उस तैराकी में दोनों अनावृत देह जिस तेज़ी से तैर रहे थे उसमें एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ थी , एक भी क्षण दाएँ या बाएँ देखने की फुर्सत नहीं पर प्रेम को पनपना ही था प्रतियोगिता में बराबर छूटने पर मंच से ही प्रभा को देखा था कवि ने ! फिर जो वियोग हुआ वहउर्वशी - वियोगबनकर आया ! कहते हैं, अश्वघोष खुद वीणा पर जब  उसे सुनाते तो मंच के नीचे बैठे दर्शकों में से किसी की आँखें भीगने से नहीं बचती थी

 

बाद में प्रभा ने एक दिन कहातुम्हें प्रभा के प्रेमी अश्वघोष और युग के महान कवि अश्वघोष को अलग अलग रखना होगा ! प्रभा के प्रेमी अश्वघोष को चाहे जो कुछ कहोकरो ; किंतु महान कवि को उससे ऊपर , सारी वसुंधरा का समझना होगा ” 

 

प्रभा ने इतना विशाल हृदय रखा था वह अपनी टेरीटरी मार्क करने नहीं आती थी उसका यही निःस्वार्थ प्रेम बाँध गया कवि को प्रेम में स्त्री इतनी ही कंसिडरेट हो जाती है जो मोहन राकेश की मल्लिका भी थी

 

जिस सरयू ने उन्हें मिलाया था उसी में डूब गयी थी प्रभा लेकिन शाश्वत प्रभा और उसका प्रेम रह गया कालीदास कुछ भी लिख लें लेकिन वे अश्वघोष नहीं हो सकते क्योंकि उन्होने प्रेम को बस किताबी रखा था और दरबारी भी

 

हम सबकी आदत है किसी महान चरित्र को देखते पढ़ते हुए उससे अपना साम्य देखने की (प्रकट में भले ही स्वीकार करें लेकिन यह नार्सिसिज़्म हो ऐसा हो नहीं सकता) कई बार हमारे तर्क साम्य से ज्यादा भी दिखा देते हैं  

 

तुम प्रभा हो पर मैं अश्वघोष नहीं !

 

***

 

सुबह का समय है , आज कितने ही दिनों के बाद गगन में मेघ घिरे और थोड़ी बारिश हुई हालाँकि इस ओर थोड़ी बारिश वाली बात जमती नहीं फिर भी ! सामने जो चाय बागान है वह बढ़ते बढ़ते चारों ओर की पहाड़ियों की ऊँचाई नाप रहा है चाय के पेड़ हरियाली की कलात्मक चादर ऊपर तक पसार रहे हैं ऊपर सफ़ेद बादल की मोटी रस्सी तनने लगी है शेष आसमान निरभ्र ! नीचे की सघन हरियाली और ऊपर का विरल नील बीच में बादलों की क्रमशः मोटी होती रेखा ! किसी कोने में धूप भी है  

 

देखो , चाय के पौधों की दो धारियों के बीच कितनी जगह है ! हम यहाँ छिप जाएँ तो किसी को कुछ पता चले !” कहते हुए लंटाना के रंग बिरंगे फूल तोड़कर तुम्हारे उन बालों के पीछे लगाता हूँ जिनके रूप में कल का असर है आलस से लटका जूड़ा उन पुष्पों को संभालकर कैसे मुस्कुरा रहा है काश तुम देख सकती

 

मैं ऐसी जगहों को देखकर अक्सर खुल जाता हूँ और तुम मुझे यह बता रही हो कि चाय के पेड़ बोन्साई के सबसे बड़े उदाहरण होते हैं, वर्षों पहले किसी ने इन्हें लगाया होगा इनकी जड़ों को देखो मैं तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ तो तुम चाय के सफ़ेद फूल तोड़ती हो ! मेरी अधीरता नहीं दिखती तुम्हें ! थिंग्स फॉल अपार्ट में चिनुआ ने एक अफ्रीकी लोकगीत डाला है – 

‘If I hold her hand 

She says, “Don’t touch!”

If I hold her foot 

She says, “Don’t touch!”

But when I hold her waist beads 

She pretends not to know.’

 

क्या इस रमणीय हरियाली में हमारे प्रेम के लिए जगह नहीं है ?

 

बात जगह की ही है...” 

 

***

 

एक तो ऐसे भी अंग्रेजी कम समझ में आती है ऊपर से बोर्दियु की बातों का फ्रेंच से अनुवाद ! एक - एक वाक्य में ही कितना तो समय लग जाता है फिर भी  मर्म तक पहुँचना मुश्किल !

 

 पीछे कुछ किताबें पढ़ी जिसके दस या अधिक से अधिक कहो तो बीस प्रतिशत अर्थ तक ही पहुँच पाया एक एक शब्द से जूझता हूँ तो तुम्हारी याद आती है तुम्हारी उपस्थिती से अंग्रेजी में पढ़ना कितना सरल था मेरे लिए ! बारबार लगता है कि वे दिन लौट आयें !

 

दिल्ली विश्वविद्यालय की न्यू बिल्डिंग का पिछवाड़ा और जनवरी से लेकर आखिरी मार्च तक वहाँ पड़ने वाली धूप में  पढ़ाई बाद में जब धूप बढ़ती तो हम उठकर निरूलाज में घुस जाते ! उन घोर कॉर्पोरेट लोगों से समय - समय पर कुछ कुछ खरीदना जरूरी रहता था , भले ही उनकी दुकान पूरी खाली हो वहाँ मिलने वाली हॉट चॉकलेट फ़ज !! हम लाइब्रेरी में भी पढ़ सकते थे लेकिन वहाँ चुप रहना पड़ता और सबसे बड़ी बात - तुम्हें देखते हुएतुमसे पढ़ने को नहीं मिलता

 

ज़िंदगी में शायद ही कभी ऐसा वक़्त रहा हो जब पढ़ने में किसी दूसरे की सहायता की जरूरत नहीं पड़ी और शायद ही कोई ऐसा मिला जिसने इतने प्यार से समझाया ! साइकोलोजी की बारीकियाँ अभी भी तुम्हारे कारण ही याद हैं ! कल शाम जब बोर्दियु पढ़ रहा था तो वही मंजर सामने गया वे दिन होते तो उनके विचार , चार्ट, स्टेप्स और नोट्स में बंट जाते फिर होती उनकी व्याख्या तुम्हें मेरा स्तर पता थामैं अब तक तुम जैसा अध्यापक नहीं बन पाया

 

इन बातों ने उस दिन तक पहुँचा दिया है जब हम उधर आखिरी बार पढ़ रहे थे कहाँ पता था कि वह उस पढ़ाई का अंतिम दिन होगा गलती मेरी ही थी ... मैंने तुम्हारे होठों तक पहुँचने की कोशिश की थी

 

***

 

 

आसमान बरस कर थक जाता है , पानी की बची खुची बूंदें भी इस पत्ते से उस पत्ते का सफ़र करते हुए एक धुन बनाती हैरात में यह नहीं दिखता ! दिन में इतना शोर रहता है कि बारिश के बाद की बारिश सुनाई नहीं देती बारिश की रात ख़्वाहिशों की रात होती है किसी भी डाली को हिलाकर भीग जाने की ख़्वाहिश बचपन में होती थी उससे बाहर निकला तो कल्पनाओं ने खूब तेज़ छलांग लगा ली

 

अंधेरी रात की बारिश के बाद भी हर पेड़ के पास हमें तर कर देने लायक पानी रहता है हम तब जंगल चलें तो क्या होउस ऊंचे सखुए के पेड़ के नीचे बाइक खड़ी होगी और उसकी सीट पर तुम ठीक उसी क्षण हमारी ऊँचाई एक दूसरे के बराबर होगी , हमारे होंठों की भी ! पेड़ की फुनगी पर काफी देर से टिकी बूँद भरकर गिर जाएगी हमारे होठों के बीच

 

 पास ही वह हिस्सा है जो दुनिया से छिपा है , मानो तो यह भी मान सकती हो कि वह मेरी खोज है चारों ओर से अनगढ़ पत्थरों से घिरा प्राकृतिक स्विमिंग पूल ! हम उसमें किसी बच्चे के फेंके हुए पत्थर से उतरें कि एक तेज़ आवाज़ उठेसारा जंगल जाग जाये , पक्षी युगल एक दूसरे को बाहों में भरकर शर्माते हुए नए सपनों में खो जाएँ

 

वह रात अलग ही होगी तुम आँखें तरेरते हुए मुझे खींच लाना पानी से बाहर मैं तुम्हें चट्टानों पर लगी काई से बचाते हुए बाइक तक ले आऊँगा ! चलने से पहले तुम फिर से बाइक की सीट पर उसी तरह बैठना कि हमारे होंठ एक ऊँचाई में जाएँ ! ... देखेंगे सखुए की फुनगी पर बूँद भरी या नहीं !

 

***

 

 

मैं जब भी तुम्हारी पढ़ने वाली छवि की कल्पना करता हूँ , तुम चश्में में होती हो किसी मोटी हार्ड बाउंड किताब में नज़रें गड़ाए हुए वहाँ से हमारी रसोई का एक बड़ा हिस्सा तुम्हें दिख सकता हैखुली खिड़की भी कितना धुआँ बाहर खींचेगी ! यूं तो तुम तक सिंकते पराठों की सुगंध पहुँचती ही होगी लेकिन बारबार देख लेती हो मुझे ! तुम्हारा पढ़ने में ध्यान क्यों नहीं रहता !! 

 

"You are distracting me."

 

कैसे ?

 

“You are in the kitchen … it shows that you care and that you treat me as an equal …Which is hell sexy!” 

 

तुम्हारा मुझे पीछे से जकड़ लेना बनते पराठों को रोक चुका था ... सोचा था, पराठों के साथ तीन तरह अचार खिलाऊंगा लेकिन अब कहाँ ! किताब कहाँ गयी तुम्हारी अरे स्लैब पर मत बैठो वह साफ नहीं है अभी मैंने वहाँ प्याज काटा था

कटा हुआ प्याज सुक्ष्मजीवों को बड़ी तेज़ी से अट्रेक्ट करता है...  उसे जहाँ काटो उस जगह को जल्दी से धो दिया करो, उसे खुले में मत रखो 

 

सिंकते पराठे पर जब घी पड़ता है तो धुआँ बड़ी तेज़ी से फैलता है उस जलती हुई गंध में , धुएँ में तुम उसी तरह हल्की मुस्कान के साथ बैठी हो जैसे कुछ हुआ ही हो ! धुआँ तुम्हारे बालों से होकर गुजरने लगता है मुझे अच्छा लगता है तुम्हारा यूं देखना

 

बाइक पर बैठकर हम दोनों के होंठ बराबर हो जाते हैं ... स्लैब बाइक से ऊँची नहीं है” 

अच्छा !! और फिर पराठा चाहे तो जल जाये ... !

 

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आइडिया ऑफ इंडिया और बकरीद

यात्राओं में अक्सर कुछ न कुछ ऐसा दिख जाता है जो याद रहने लायक हो , एक मुस्कान ले आये या फिर चारों ओर की कड़वाहट के  बीच कोई मधुर ...