अक्टूबर 05, 2013

ईसाई लोगों से मिलना


अब तक के जीवन में कभी भी ऐसी जगह नहीं रहा था जहां ईसाइयों की संख्या किसी भी अन्य धर्म के लोगों से ज्यादा हो । हमारे शहर में एकमात्र चर्च है जो हमारे हाई स्कूल के पीछे है । आज यदि और बन गए हों तो अलग बात है । और वहाँ के चर्च अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिए कम और मुफ्त ईलाज के लिए ज्यादा जाने जाते हैं ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही है कि मेरे बचपन में या हाईस्कूल – इंटर तक आते हुए भी ईसाई धर्म से संबन्धित किसी कार्यक्रम की कोई छवि हो । ऐसा तो निश्चित ही है कि चर्च के भीतर जरूर धार्मिक गतिविधियां होती होंगी और लोग भी आते होंगे पर बाहर न तो वे कुछ करते थे और न ही मेरी स्मृति में है । दिल्ली में क्रिसमस के मौके पर इसाइयों को बाहर आते देखा । क्रिश्चियन कालोनी में रविवार को उनकी प्रार्थना होती थी जो जब भी अनूप भाई के यहाँ रुकता था तब सुनने को मिलती थी जिसे पटेल चेस्ट में रहने वाले सभी छात्र निश्चित रूप से शोर की संज्ञा ही देते होंगे ।

मैं जिस धर्म में पला-बढ़ा उसने बाकी धर्मों से दूर किया । ऐसा केवल यही धर्म करता हो ऐसा भी नहीं है लेकिन जब मैं अपनी बात करूंगा तो यह पक्के तौर पर कहूँगा कि अपने धर्म ने ही मुझे दूसरे धर्मों से दूर किया और ऐसा ही किसी और धर्म के व्यक्ति के लिए सही है । इस दूरी ने मुझे न सिर्फ दूसरे धर्मों को समझने से रोका बल्कि इसके माध्यम से मैं दूसरे धर्मों के लोगों को अपने और अपने धर्म के लोगों से बिलकुल अलग भी समझने लगा । शायद यही वजह है कि अपने सहरसा की समूची आबादी में से मुसलमान तो याद हैं पर ईसाई याद नहीं हैं । मुझे याद है जब मैं ओंकार मास्टर से ट्यूशन लेने जाता था तो अमित इंटरप्राइजेज़ के बाद मिशन स्कूल के आसपास एक छोटी से ईसाई बस्ती जरूर दिखती थी । मैं उन्हें दूसरे दर्जे के लोग मानता था । ईसाई स्त्रियाँ सहरसा की आम स्त्रियॉं की तरह घर के आसपास भी साड़ी में नहीं बल्कि नाइट गाउन में रहती थी । उनके घर सजे होते थे । कोई कंदील या तारे की आकृति का कुछ जरूर टंगा होता था । ठीक हमारे घरों के उलट । दिल्ली में साथ पढ़ते हुए दो-तीन ईसाई दोस्त मिले पर जबतक उनसे मिलना हुआ तब तक मेरी धर्म संबंधी बहुत सी मान्यताओं में परिवर्तन आ चुका था । तबतक सभी धर्म एक से लगने लग गए थे । और अपने से लेकर किसी अन्य धर्म के प्रति रुचि समाप्त हो गयी थी । लेकिन उन दोस्तों में जो मैंने महसूस किया वह यह था कि वे आने – बहाने अपने धर्म की बात करते थे और उनहोंने एक दो बार कोशिश भी की कि मैं उनके साथ उनके चर्च में चलूँ । एक बार ट्रीजा के आग्रह पर मैं मुखर्जी नगर के बत्रा सिनेमा हाल के तलघर में बने चर्च में मैं गया भी था । मुझे अपने बीएड के दिनों का एक किस्सा याद आ रहा है । एक दोस्त हुआ करती थी शीबा जो धर्म से ईसाई थी । उसने मुझसे केवल इसलिए दूरी बना ली क्योंकि मैं धर्म में विश्वास नहीं करता था और उसके क्या अपने धर्म को लेकर कोई ठीक विचार नहीं रखता था ।

बिहार और दिल्ली के किस्सों और यादों से निकल कर यहाँ केरल आ गया । यहाँ आते ही महसूस हुआ कि इसाइयों के जीवन, उनके रहन-सहन के बारे में मेरी जो मान्यताएं थी वह दो कौड़ी की भी नहीं हैं । अब तक ईसाई लोग मेरे लिए कौतूहल का विषय होते थे पर जहां हर कोई ईसाई हो वहाँ कौतूहल का समाप्त हो जाना निश्चित है । अपने सहकर्मी जिनके साथ मैं समय बिताता हूँ , मेरे छात्र , बाहर जो बाल बनाता है , मोबाइल रीचार्ज करने वाला साइमन सभी ईसाई हैं । चर्च जीवन के इतने करीब और इतने ज्यादा हैं कि वे चर्च से ज्यादा कोई संस्थान ही लगते हैं । इस तरह लगभग पहले ही दिन से इतने ज्यादा ईसाई लोगों से मिलना हुआ कि उनके प्रति मन में बैठी बहुत सी धारणाएँ बदली । पहली बार यहीं आकर मन ने इसाइयों को आम इन्सानों की तरह देखना शुरू किया ।

मैं इस तरह से धर्म को देखता था तो इसमें मैं अपना दोष कम और धर्म का ज्यादा मानता हूँ । समाजीकरण के किसी भी सिद्धान्त में धर्म के द्वारा किया जानेवाला समाजीकरण तो कहीं भी  बहुत तगड़ा होता है । भारत में अधिकतम हम इस्लाम के करीब आ जाते हैं क्योंकि उनकी एक ठीकठाक संख्या है । पर ऐसा दूसरे धर्मों के प्रति नहीं कह सकते खासकर ईसाई धर्म के लिए तो  बिलकुल नहीं । धीरे-धीरे यही प्राथमिक समाजीकरण पुख्ता होकर इतना गहरा हो जाता है कि अपने धर्म से इतर धर्म वाले के प्रति इन्तहाई नफरत भर जाती है । शुक्र है इस कदर कट्टर बनने से पहले ही मेरे दूसरे समाजीकरण ने काम करना शुरू कर दिया । बहरहाल यहाँ ईसाई बहुल इलाके में रहते हुए ऐसा लगता है कि सबकुछ तो समान ही है फिर बेकार ही इनके संबंध में मैं अपने पूर्वाग्रह लेकर बैठा था ।

इससे पहले ईसाई को इतने स्थानीय रूप से नहीं देखा था । इसलिए कभी नहीं लगा कि यह बाहर का धर्म नहीं है । लेकिन यहाँ पर आते ही लगने लगा कि यह तो यहीं का धर्म है । हाँ जनता हूँ कि यह सचमुच बाहर का धर्म है पर इसने जिस तरह स्थानीयता को अपनाया बल्कि स्थानीयता जिस तरह से इस पर हावी हुई उसने इसे बाहरी नहीं रहने दिया । एक दिन सड़क पर लोगों की  लंबी-लंबी कतारें देखीं और देखा सबके हाथों में ताड़ वृक्ष का एक पत्ता । फिर आगे आगे एक रथ पर ईसा मसीह का पुतला ले जाते हुए देखा । बाद में अपने परिचितों से ज्ञात हुआ कि यह मान्यता है कि हाथ में ताड़ का पत्ता लेकर गाँव या शहर की परिक्रमा की जाए तो उस ताड़ , नारियल , सुपाड़ी आदि की फसल ज्यादा होती है । आयोजन का इससे स्थानीय उदाहरण नहीं हो सकता । कई बार मैंने यहाँ पर ईसा मसीह के पुतले के साथ स्थानीय लोगों के पुतले भी लोगों को ढ़ोकर परिक्रमा करते देखा जो यहाँ के वर्तमान निवासियों के पूर्वज थे । हर नुक्कड़ पर कम से कम एक छोटा सा चर्च तो है ही जहां सुबह घंटा बजता है और शाम को मोमबत्तियाँ जलायी जाती हैं । यह सब ठीक उसी तरह लगता है जैसे हिन्दू बहुल इलाकों में नुक्कड़ पर हनुमान का मंदिर हो । 

इस धर्म को लेकर मुझे सहरसा और दिल्ली के सुखी लोगों का ही जीवन याद आता है और जेहन में वही सुखी लोगों की छवि बनती है । लेकिन यहाँ आकर जाना कि अनपढ़ टेरेसा मार्टिन जो विद्यालय के भोजनालय में काम करती है उसका और हमारी प्रधानाध्यापिका दोनों का धर्म ईसाई ही है जो कम से कम मेरे लिए तो नयी बात थी । हाँ यहाँ झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगलों के ईसाइयों के उदाहरण दे सकते हैं जो गरीब हैं पर चूंकि मेरी मान्यता मेरे आसपास के समाज को देखते हुए बनी है इसलिए वास्तविकताओं को देखने और मेरे पूर्वाग्रहों कर निर्माण मेरे उसी वातावरण से होगा । ऐसे में मुझे कई बार लगता है कि टेरेसा जो अब बूढ़ी हो चली है उसके इस नाम का क्या अर्थ है या इससे जुड़ी कोई कहानी है या फिर कोई व्यक्ति यह उसे पक्का नहीं पता होगा ।


यहाँ इस धर्म को जितना देखा उस आधार पर कहा जा सकता है कि धर्म का स्वरूप बहुत हद तक उसके मानने वालों की संख्या और उनके स्थानीय चरित्र पर निर्भर करता है । भारत में ईसाई धर्म ने भारतीय चरित्र ग्रहण कर लिया है । परंपरा से भारत में हिन्दू उपासना पद्धति रही है और इसके तौर तरीकों का प्रभाव ईसाई धर्म पर भी स्पष्ट दिखता है । सबसे पहले तो त्योहारों की अधिकता ही इसका प्रमाण देती है ऊपर से वही धार्मिक उन्माद इधर भी दिखता है । वही कट्टरता इस धर्म में भी है और सबसे बढ़कर यह कि यहाँ ईसाई धर्म का वह रूप देखा जो अपने तदर्थ चरित्र के बदले स्थायित्व पा चुका है । मुझे इस धर्म के इतने स्थायी होने की उम्मीद नहीं थी और शायद यही वजह है कि मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता था । 

अक्टूबर 03, 2013

ये शोर-ओ-गुल


सुबह जब तक मेरी नींद खुलती है तब तक सुबह का एक बड़ा हिस्सा बीत जाता है और थमने लगती है चिड़ियों की आपाधापी और उनका शोर-गुल । सुबह सात बजे का जागना मेरे जैसे नींद प्रिय आदमी के लिए किसी भी तरह से देर से जागना नहीं है बल्कि मेरे लिए यह तड़के जग जाने जैसा ही है । पर मैं जहां पर रहता हूँ वहाँ की प्रकृति के लिए सुबह के सात बजे बहुत कुछ ठहर कर सामान्य हो जाता है । इतना सामान्य कि बहुत स्पष्ट विशेषता न होने पर किसी भी अन्य स्थान से यहाँ की समानता स्थापित की जा सकती है ।

यहाँ अलार्म जागता है और हर दिन वह अस्वाभाविक सा होता है जो दिन भर असहज किए रहता है । कभी इतनी जल्दी जागना होता नहीं था । जबतक माता-पिता के साथ था या अभी भी रहने का मौका मिलता है तो रात में बहुत जल्दी सोना पड़ जाता है इसलिए सुबह जल्दी उठ जाने से असहजता वहाँ कभी कभी महसूस नहीं होती है । जहां – जहां अकेले रहा वहाँ – वहाँ मैंने रात अपनी है का सभी अर्थों में उपयोग किया है – हँसते बतियाते , पढ़ते-लिखते , कोई फिल्म देखते या कुछ और करते हुए । ऐसे में रात के एक बड़े हिस्से का बीत जाना स्वाभाविक ही है । अकेलेपन और स्वायत्तता के मद्देनजर किए जाने वाले कार्यों ने मेरी नींद के घंटे हमेशा कम किए हैं ।

नींद के घंटों के कम हो जाने का ग़म तो होता है पर उससे ज्यादा दुख इस बात का होता है कि , सुबह देर से जागने के कारण मुझसे कितनी चीजें छूट जाती हैं । दिल्ली में यह सब कभी महसूस नहीं हुआ क्योंकि वहाँ प्रकृति के नाम पर जो है वह रिहाइशों से इतनी दूर और इतना कम है कि सबके लिए उसका होना नहीं के बराबर ही है । यहाँ पर जागने से लेकर विद्यालय पहुँचने तक का कार्यक्रम पूर्ण रूप से मशीनीकृत हो गया है । सरकारी काम करने वाले व्यक्ति की जीवनचर्या जैसा । कभी – कभी मुझे लगता है कि मैं किसी कहानी या नहीं तो 80 के दशक के किसी धारावाहिक के सरकारी कर्मचारी का वर्गीय चरित्र निभा रहा हूँ । हर काम में उतने ही मिनट लगते हैं जीतने भर से काम चल सके । जब विद्यालय का बैंड बजना शुरू होता है तब मैं नहा रहा होता हूँ । बैंड के बजने और अपने बचे हुए कामों की स्थिति से अंदाजा लग जाता है कि मैं उस दिन विद्यालय समय पर पहुंचूँगा या विलंब से ।

मुझे यहाँ रहने को जो घर दिया गया है उसके पीछे दो बड़े-बड़े पेड़ हैं । उधर से कई बार गुजरने पर भी आपको नहीं लग पाएगा कि पेड़ अपनी कोई उपस्थिति दर्ज करा पा रहे हैं क्योंकि वहाँ नीचे तो बस उनके तने ही दिखते हैं । लेकिन जब कभी छत पर चले जाइए तब लगता है कि वे पेड़ हैं और घर के साथ साथ मशाल्लाह उनका भी एक रुतबा है । लगभग आधी छत पर उनका कब्जा है जहां वे इस तरह से छाए हैं कि छत पर खड़े किसी भी व्यक्ति से वे बीस रहकर ही बात करेंगे । वहीं पता चलता है कि यह उनका भी घर है । वे बेखौफ छत पर अपने पत्ते गिराते हैं और उतनी ही तसल्ली से अपने बीज भी । बारिश और पत्तों का सान्निध्य पाकर वे बीज छत पर एक छोटी सी नर्सरी का रूप ले चुके हैं । लेकिन इतना तय जय कि , इसके बाद जब बारिश बंद होगी तब संडे –संडे को छत पर धूप खोज-खोजकर कपड़े सुखाने वाले लोग उसकी ओर ध्यान नहीं देंगे । बिन पानी के ये नर्सरी थोड़े ही दिनों में सूखे कूड़े में बदल जाएगी जिसे किसी दिन, कोई बुहारकर छत से बेदखल कर देगा ।

इन्हीं पेड़ों में एक नायाब दुनिया बसती है । उस ओर पहले ध्यान नहीं गया था । पता नहीं क्यों आरंभ में मेरा ध्यान बारीकियों के बजाय स्थूल की ओर ही जाता है । मैं पहाड़ों पर फैली घनी हरियाली और उससे उठते बादलों की अठखेलियों , कहीं कहीं से गिरते झरनों को देखकर ही मुग्ध हो जाया करता था । (वे अभ भी अच्छे लगते हैं लेकिन उनसे एक तरह से मन भर गया है । चार महीने तक कोई बादलों , बारिश , पहाड़ और बरसाती झरनों पर ही कितना रीझता रहेगा । अब तो कैमरे की बैटरी चार्ज करने की भी इच्छा नहीं होती । )

पेड़ों की वह दुनिया समान्यतया दिन में नही दिखती है । वैसे सच कहा जाये तो ढंग से देखना तो कभी भी नहीं हो पाया । जब कभी पाँच बजे के आस पास नींद टूटती है या उसके टूटने जैसा महसूस होता है तब उस दुनिया से छोटी-छोटी चिड़ियों की इतनी तरह की आवाज़ें आती हैं कि , गिनने और पहचानने की बात तो रह ही नही जाती उनमें अंतर करना तक संभव नहीं हो पाता है ।

मैं जिस कमरे में सोता हूँ उसकी दोनों खिड़कियाँ बाहर पेड़ की ओर खुलती हैं । बाईं खिड़की के पास ही एक लैम्प पोस्ट है । सुबह मेरे जागने से पहले तक मेरी खिड़की के पल्लों , उस लैम्प पोस्ट , पेड़ की टहनियों और छत के कोरों पर उनकी उछल कूद सुनाई देती है । मैं बस आवाजें सुनता हूँ । लैम्प पोस्ट की लोहे की सतह पर उन पक्षियों के पैरों की खनकती घिसावट सिहरा देती है फिर भी आँख बंद किए नींद को जाने न देने की जिद को कम नहीं होने देता हूँ । कई बार लगता है कि जागने पर मैं उन पक्षियों को देखने की कोशिश करूंगा । संभव है उनकी तस्वीरें उतारने का भी मन कर जाए । जाहिर है मेरा ऐसा करना उनके नियमित कार्यक्रम में बढ़ा डालेगा । उनकी दुनिया में मेरा प्रवेश उन्हें मुझसे भयभीत न कर दे । इसलिए कभी जग भी जाता हूँ तो आँखों को हल्का सा खोलकर जिसे शैलेश मटियानी चिड़ियाँ के चोंच सा खुलना कहते हैं , गोरैयों और उससे भी छोटी एक हरी-सी चिड़ियाँ को खिड़की के पल्लों से लैम्प पोस्ट और उससे कहीं और फुदकते देखता हूँ ।

कई बार मन करता है कि खिड़की की जाली भी खोल दूँ ताकि धीरे-धीरे पक्षियों को मुझसे दोस्ती हो जाए और वे भीतर तक आ सकें । उन्हें पास में रखकर आनंद उठाने का सामंती आकर्षण कई बार हिलोरें मारता है पर खुली खिड़की से पक्षियों के पीछे साँपों के आने भय ऐसा करने से रोकता है ।

यहाँ चिड़ियों की ऐसी दुनिया लगभग चारों ओर बनी है । विद्यालय के बोटेनिकल गार्डन से लेकर घरों के पिछवाडों में लगे केले के झुंडों तक में पक्षियों का फुदकना दिन भर जारी रहता है । फुर्र से कोई बटेर कान के पास से गुजर जाए तो अचंभा नहीं होता । लेकिन चिड़ियों की कलरव का आनंद तो अंधेरे से छूटकर बाहर आती सुबह में ही मिल पाता है ।

पर पक्षियों की केवल सुबह नहीं होती ।

मेरे बाथरूम के रोशनदान में शाम को कबूतरों का एक जोड़ा आकार बैठ जाता है । वह जाली की वजह से भीतर नहीं आ सकता और उसका बाहर जाना बारिश की वजह से संभव नहीं हो पाता है । उनको देह सिकोडकर अपने सभी कार्यकलाप करते देखना अभाव में भी जीवन को आगे बढ़ते रहने वालों की याद दिलाता है । जाली पर उनके पंखों के टकराने की आवाज़ दिल्ली की झुग्गियों के एक कमरे में रहने वाले परिवार की मनःस्थिति से साक्षात्कार करा देती है । गर्मी के दिनों में शास्त्री पार्क की झुग्गियों से बाहर लोगों की नींद अकारण ही अलसुबह नहीं खुल जाती और सड़कें और पार्क मुंह अंधेरे यूं ही नहीं भर जाते ।

अभी – अभी ओणम का त्योहार गया है । बच्चों ने रंगोली बनाने के लिए सामने वाले पपीते के पेड़ से सारे फल तोड़ लिए । इससे वहाँ दिन भर पक्षियों की जो भीड़ लगी रहती थी और लगभग हर दूसरे दिन किसी न किसी फल का पेट फाड़ कर उसके पीले गूदे से पक्षियों के पेट भरने का जो क्रम चल रहा था वह टूट गया । एक-दो चिड़ियाँ अभी भी आकार पेड़ में आए नए फूल और बातियों की तो लेती रहती है । उन्हें उम्मीद है पपीते फिर से बड़े होंगे , फिर से उनका भोग लगेगा और फिर से हिस्सेदारी की मीठी झड़पें हुआ करेंगी । 

अक्टूबर 01, 2013

फिल्म बी ए पास की लटपट


एक फिल्म देखी बी ए पास । इस पर बात करने के लिए अब ज्यादा कुछ लोगों ने रहने नहीं दिया है और उस लिहाज से फिल्म पर बात करने का मुझे शऊर भी नहीं है पर हाँ फिल्म ने कुछ ऐसी बातों की ओर ध्यान दिलाया जिसे उठाना जरूरी सा लगता है ।

आजकल छोटे बजट , नए और अ-स्थापित कलाकारों को लेकर फिल्म बनाने का चलन है । कई बार तो यह इस तरह भी देखा जाता है- दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व वाले कलाकारों का एक साथ संयोजन । जहां इस तरह के लक्षण फिल्मों में दिखते हैं वहीं उसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती है । चर्चा मिलना बुरा नहीं है लेकिन उन चर्चाओं में सीधे तौर पर इस तरह की फिल्मों को जो स्थान दिया जाता है वह उनको फ़ायदा ही पहुंचाता है । बी ए पास पर बहुत बातें की गयी । इतनी कि लगा ऐसी फिल्म आई ही नहीं अब तक और अब इसके बाद आनेवाली  फिल्मों का एक खंड तो इसकी परंपरा जरूर ग्रहण करेगा । यकीन मानिए ये इस फिल्म पर की गयी बातें ही थी जिन्होंने इसे देखने को प्रेरित किया ।

फिल्म के बारे में यह कहना सबसे जरूरी है कि यह असहज करने वाली फिल्म नहीं बल्कि एक असहज फिल्म है । असामान्य सी स्थितियों को सामान्य बनाने की असहज कोशिश का नतीजा यह है कि फिल्म में बहुत कुछ कहना – समझाना छूट जाता है । कुछ दृश्य इतने अधूरे से गढ़े गए हैं कि फिल्म एक अधूरेपन को पैटर्न की तरह लेकर बढ़ती प्रतीत होती है । फिल्मों के बारे में मेरा मानना है कि यह जितनी ही सहज हो उतनी बेहतर । दर्शकों को आम सी फिल्म में भी दृश्यों के बीच में अंदाजे लगाने पड़ें तो फिल्म अपनी बात क्या रख पाएगी । इसका सबसे बड़ा कारण है साधारण सी स्थितियों में असाधारण सा घटाने की जिद करना । एक बार को यह मान  लेते हैं कि दिल्ली में कॉलबॉय और मिडिल एज़ सेक्सुअल क्राइसिस वाली गृहणियों का होना आम है तो यह इतना मासूम और नाटकीय रह ही नहीं जाता है जैसा साबित करने की कोशिश की गयी है । ऐसी दशा में यह किसी पॉर्न साईट से उठाई गयी एक साधारण कहानी भर रह जाती है जिसे फिल्मी जामा पहनाकर दर्शकों के सामने डाल दिया गया है ।

दिल्ली क्या देश भर ऐसे बहुत से लड़के या पुरुष हैं जो इस धंधे में हैं और ऐसी स्त्रियॉं की भी कमी नहीं ही है जो अपने जीवन के मध्य में हैं जहां पतियों का ध्यान उनकी ओर नहीं है और यहाँ दोनों ही तरह के लोग एक दूसरे के अभाव की पूर्ति करते हैं । ऐसा किसी भी समाज के लिए उतना ही सहज है जितना की सुबह का नाश्ता । पर फिल्म में यह उस सहजता को नहीं बल्कि एक आरोपित नाटकीय सहजता को व्यक्त कर रही है । और निर्देशक की बार बार की जा रही ऐसी कोशिश फिल्म को एकरस और प्रेडिक्टेबल बना डालती है ।

धंधे और शरीर की भूख के चालू से फ्रेम में थोड़ी सी भावना और एक-दो धोखेबाजियों को डालकर इस फिल्म की संरचना पूरी होती है । जिसमें सबसे प्रधान रह जाता है धंधा । धंधे का समाजशास्त्र जो इस फिल्म में है वह कई बार यह संकेत करता है कि करने वाला व्यक्ति धंधा कर के खुश नहीं है । फिल्म के दृश्य बताते हैं कि वह जिस मजबूरी में धंधा करना स्वीकार करता है उसे पूरा करने की किसी जल्दी में वह नहीं है और अंत तक उस मजबूरी से भागने की कोशिश करता रहता है । यह तो उसकी पकड़ की बाहर की परिस्थितियाँ हैं जो उसे अपनी गिरफ्त में ले आती हैं । इस तरह से यह तो साफ माना जा सकता है कि भले ही निर्देशक ने उसे मजबूरी में यह धंधा अपनाते हुए दिखाया लेकिन बहुत जल्द मजबूरी का स्थान मजा ले लेती है जिसे वह किसी हाल में नहीं छोडना चाहता है । जब यही दिखाना था तो उसे भारतीय फिल्मों में सहज उपलब्ध नायकत्व का घिसापिटा चोला देने की क्या जरूरत थी । अब यहाँ यह कह देना सही लगता है कि इस फिल्म की कहानी न तो सभी कॉलबॉय की है और न ही बहुत से कॉलबॉय की बल्कि यह किसी एक की कहानी है । यह किसी एक का होना  सामान्य तरीके से होता तो वह भी स्वीकार्य था लेकिन जिस तरह से परिस्थितियाँ बनाकर उसका सामान्यीकरण किया गया वह पचने वाला नहीं है । और इसे स्थापित करने में जो रुचि दिखायी वही फिर दबंग , सिंघम और चेन्नई एक्सप्रेस के मामले में भी होनी चाहिए क्योंकि ये फिल्में भी खास तरह के नायकों की ही कथा है । वे तो सामान्यीकरण का दावा भी नहीं करतीं ।

इस फिल्म में धंधा केवल नायक ही नहीं करता बल्कि नायक को धंधे में लाने वाली स्त्री भी करती है । उसका धंधा अलग है लेकिन ऐसा प्रत्यक्ष में कहीं भी पता नहीं चलता । दो एक संवादों से इसे समझाने की कोशिश की गयी है जो फिल्म के उसी अधूरेपन का एहसास देती है । ऐसी अवस्था में फिल्म के अंत से पहले का नायक का उस स्त्री पर क्रोध बड़ा ही खोखला और अविश्वसनीय सा लगता है ।

यह फिल्म एक सॉफ्ट पॉर्न है । निर्देशक बकायदा ऐसे तरीके निकालता है जिससे यह तो पता चले कि सेक्स किया जा रहा है या हो रहा है पर देह छिपी रहे । इस तरह यह हार्डकोर पॉर्न  बनने से रह जाती है । आजकल फिल्मों में दिखाये गए सेक्स के दृश्यों के खिलाफ कुछ कहना फैशन के खिलाफ है । इसके बाद भी यह कहने में कोई परेशानी नहीं है कि इस फिल्म में मसाले के चक्कर में बहुत से अनावश्यक अंतरंग दृश्य डाले गए और वह भी लगभग पॉर्न की शक्ल में । फिल्मों में इस तरह के दृश्यों को सहज मानने की मांग कई नए निर्देशक करते रहे हैं और बार बार इसके लिए बाहर की फिल्मों के उदाहरण भी लेते रहे हैं लेकिन अबतक इस तरह के दृश्य कहानी की मांग कम जबरन ठूँसे हुए ज्यादा लगे हैं । और कई बार ऐसा देखा गया कि इन दृश्यों का ग्लोरीफिकेशन केवल और केवल व्यापारिक प्रभाव पैदा करने के लिए किया गया है । आजकल का जो चलन है उसके हिसाब से फिल्मों में यदि अंतरंग दृश्य दिखाए गए हैं तो उसकी प्रासंगिकता खोजने के बजाए उसे स्थापित करने के प्रयास ज्यादा होते हैं । ऐसा लगता है कि सेक्स को स्वीकार करना इंटेलेक्चुअल होने की पहली शर्त हो । ऐसे में इन दृश्यों को ग्लोरीफ़ाई तो किया ही जाता है उन्हें इंटेलेक्चुअलि स्थापित करने की कोशिश की जाती है । यहाँ मैं यह कहना भी नहीं चाहता कि ऐसे काम स्त्रियॉं की तय छवि से बाहर नहीं जा पाते और स्त्रियॉं की छवि धूमिल की जा रही है वगैरह । क्योंकि फिल्में अपने बोल्ड होने को हिन्दी के स्त्री-विमर्श की तरह देह-मुक्ति से जोड़ कर देखने लगी हैं । इसे ही सिनेमा की नयी धारा स्थापित करने का प्रयास कर रही है ।

फिल्म बी ए पास के बहाने से एक और बात कहनी जरूरी सी लगती है कि ये फिल्में भाव के स्तर पर जुड़ नहीं पाती हैं । निर्देशक का पूरा ध्यान एक – एक दृश्य बनाने पर लगा था । दृश्य भले ही आकर्षक बन पड़े हों पर वह समग्र रूप में कोई भाव जगाने में पूरी तरह अक्षम थे । यदि वह नायक उलझन में था तो वह उलझन अंत के एक मिनट के अलावा कहीं नहीं दिखाई पड़ा तब तक ऐसा लगता रहा कि, जो – जो सोच रखा था वही हो रहा था जिसमें बांधकर रखने की कोई क्षमता नहीं थी । फिल्म के सारे चरित्र रूढ़िबद्ध ही थे कहीं कुछ भी अप्रत्याशित सा नहीं था । फिर केवल सेक्स के दृश्यों के नाम पर फिल्म को अलग कहा जा सकता है क्योंकि इसने सॉफ्ट पॉर्न जैसी चीज पेश करने की हिम्मत की ।


हिन्दी फिल्मों के निर्देशक कॉलेज को जिस तरह से बरतते हैं वह अपने आप में बहुत रोचक तो है कि बल्कि कभी कभी यह भी समझाने से चूकता कि निर्देशक की कॉलेज संबंधी समझ बड़े दिवालियेपन की शिकार है । एकाध फिल्मों को छोडकर कोई भी फिल्म कॉलेज को फिल्म में सब्स्टेंशिएट नहीं कर पायी हैं । फिल्म और कॉलेज किन अलग अलग धरातलों पर चलते हैं यह तय करना कठिन हो जाता है । मसलन इसी फिल्म को लेते हैं । लड़का कॉलेज में एक दिन दिखता है उसके बाद एक-दो बार कॉलेज की तस्वीर दिखाकर निर्देशक जबरन यह मनवाने की कोशिश करता है कि उसने कॉलेज दिखाया और उससे जुड़े द्वंद्व भी उसने समझा दिए । पूरी फिल्म में द्वंद्व अभिनेता-अभिनेत्रियों के चेहरे पर तो खैर कहीं था भी नहीं ऊपर से जिस नाम के साथ फिल्म बेची जा रही हो उसे सार्थक करने की चिंता कहीं नजर नहीं आई । यहाँ भी अंदाजे को महत्वपूर्ण मानते हुए यदि फिल्म को अच्छा – अच्छा कहा गया तो यह कहने वालों की खुशी थी । 

सितंबर 30, 2013

फिर से तेरी याद


दिल्ली छोडने के बाद सबसे बड़ा दूराव मेरा अपनी किताबों से रहा । लगभग जमाई सी गृहस्थी में समझ सकते हैं कितनी ही किताबें रही होंगी । यूं तो इसकी भूमिका बन रही थी पर अचानक से एक दिन जब वहाँ का डेरा-डन्टा ही नहीं बल्कि दिल्ली छोड़कर यहाँ सुदूर दक्षिण आना पड़ेगा ऐसा सोचा नहीं था । इसी न सोचने ने सबसे बुरा यदि कुछ किया तो वह था किताबों का मुझसे छूट जाना । कोशिश तो की थी कि किताबें आ जाएँ यहाँ भी पर केरल इतना भी नजदीक नहीं है कि सोचा और ले आए । मूवर्स एंड पैकर्स से भी बात की तो वे मोल-भाव करते करते पांचेक हजार तक तो आ ही गए थे लेकिन उस समय पाँच हजार बहुत बड़ी रकम थी । ये उस समय उतना भी पहले का नहीं है कि तरस न खाया जा सके । यह इसी साल के जनवरी महीने की बात है ।

जिन किताबों को किसी को छूने नहीं देता था और कोई उस जाये भी तो मेरी टोका-टाकी शुरू हो जाती थी ले जाने की बात तो जाने ही दीजिये उन्हीं किताबों को न जाने किस के भरोसे छोड़ के चला आया । सोचना यह था कि चलो जी धीरे धीरे कर के तीन-चार यात्राओं सारी किताबें अपने पास ले जाऊंगा । इसी सोच के साथ जरूरी से भी जरूरी किताबों की छटाई शुरू हो गयी । ऐसा करते हुए मुझे मिस्टर बीन याद आ रहा था । क्या रखने लायक है और क्या साथ ले जाने लायक ऐसा तय करना बहुत मुश्किल था और जब कुछ किताबें लेकर यहाँ आया तो लगा कि जो वहाँ छूट गए वे ज्यादा जरूरी थे । बीच में दो बार दिल्ली जाना हुआ वहाँ अपनी किताबों को देख कर दुख हुआ । लगा अपने बच्चे को किसी अनाथालय में छोड़ा हो और वहाँ उसकी दुर्दशा हो रही हो । उन किताबों को पढ़ने वाला तो कोई नहीं है ये मैं जानता था पर वे इस तरह बोरे में भरकर ऊपर फेंके हुए से रखे जाएंगे इसकी उम्मीद नहीं थी । इस संबंध में मुझे पिताजी की कई बार दुहराई गयी बात सहज ही प्रासंगिक लगी कि भाइयों में जब अलगाव हो जाए तो दोनों एक दूसरे के लिए पड़ोसी की तरह हो जाते हैं । मेरी किताबें भाई के यहाँ थी लेकिन भाई के यहाँ पड़े हुए किसी के किसी अवांछित सामान की तरह । वे वहाँ अभी भी उसी तरह से हैं और तब तक रहेंगी जबतक उनका कोई ठोस इंतजाम नहीं हो जाता और तब तक मुझे लगता रहेगा कि वे सब बहुत दुख में हैं ।

जब यहाँ आया तो लगा कि धीरे धीरे यहाँ भी उसी तरह से किताबें जुटायी जा सकती हैं और प्रतिदिन न सही तो कम से कम हफ्ते में एक बार तो हिन्दी की किताबों के लिए एर्णाकुलम तक जाया ही जा सकता है । पर हफ्तों की बात तो जाने दीजिये महीनों होने को आए और मैं वहाँ न जा सका । किताबें खरीदने की बात तो दूर रही ढंग का उत्तर भारतीय खाना खाने भी नहीं जा पाया । ये नवोदयी मशरुफियत है ही कुछ ऐसी कि दो घंटे सोकर गुजार देना ज्यादा प्यारा लगने लगा है । वह तो भला कहिए विद्यालय का कि आज किताबें खरीदने की ही ड्यूटी लगा दी और वह भी हिन्दी में । सो सुबह सुबह निकल पड़े जी किताबें खरीदने वह भी हिन्दी की । मुझे दुकानें तो दो तीन बताई गयी थी पर जिस पर सबसे पहले जाने का मन किया वह थी दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा केरल की दुकान । जो हिन्दी प्रचार सभा के कार्यालय में ही स्थित है ।

दुकान के अंदर घुसते ही लगा किसी पुराने से पुस्तकालय में पहुँच गया । हिन्दी में एक साथ इतनी किताबें देखे हुए एक अरसा हो गया था । महीनों से भूखे को यदि ढेर सारा खाना दिख जाए तो जैसा लगता है ठीक वैसी ही दशा थी । कुछ हो न हो पर इतना जरूर है कि हिन्दी की किताबें आज भी दिख जाएँ तो मन मचलने लगता है । वैसा सा ही कुछ आज भी हो रहा था । हिन्दी के सभी नामचीन लेखकों किताबें यहाँ तक कि कुछ नयें उगे हुए लेखकों की किताबें भी दिख गयी । सभी बड़े प्रकाशकों तक की किताबें । राजकमल की पुरानी पेपरबैक किताबें भी जिनके दाम आज भी कम हैं । मिथिलेश राय एक कवि हुए हैं वे अपने एमए के दिनों में जो किताबें पढ़ने के लिए ले गए वे उनके गाँव लालपुर वापस चले जाने के बाद भी नहीं मिली । वे सब वहाँ पर दिख गयी । राजकमल प्रकाशन ने पुरानी पेपरबैक किताबों की कीमतें बहुत बढ़ा दी । ऐसे हालत में बेरोजगारी के दिनों में राजकमल पेपरबैक्स की नयी किताबें खरीदना शाहखर्ची लगती थी इसलिए मिथिलेश द्वारा ले गईं किताबों के न मिलने की सूरत में मैं उन्हें दुबारा नहीं खरीद पाया । लेकिन आज हिन्दी प्रचार सभा की उस दुकान में घुसते ही लग गया कि अपने उस छोटे से पुस्तकालय के सभी खाली स्थान फिर से भर जाएंगे और कई तो भर भी गए । कीमतों में इस अंतर को समझना कोई बड़ा काम नही है । यहाँ लोग हिन्दी की किताबें नहीं के बराबर खरीदते हैं और खरीदते भी हैं तो काम भर की उपन्यास और कविता संग्रह तो कतई नहीं । ऐसे में किताबें पड़ी नहीं रहेंगी तो और क्या होगा उनका आचार तो डलना नहीं है जी । राजकमल या कि कोई और कमल ने किताबें भेजी पुराने दाम में फिर एक तो वे बिक नहीं रही है ऊपर से इक्का-दुक्का बिक भी गयी तो कीमत आज की नहीं बल्कि पुरानी ही मिलती है । इसके बाद भी राजकमल या कि कोई अन्य प्रकाशन का धंधा बंद करके दूसरा धंधा करने के बजाय इसी में जमे हुए हैं तो ताज्जुब के बजाय अपना सोचने का तरीका बदलता है ।

गया तो था विद्यालय की तरफ से किताबें खरीदने लेकिन वहाँ पहले अपने मतलब की किताबें खरीदने लगा और वहाँ यदि मेरी कक्षा का कोई छात्र होता तो उसे आए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास लोकोक्ति समझाने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती । खैर, इस टुच्चे से मज़ाक से आगे बढ़ते हैं । विद्यालय में हिन्दी पखवाड़ा हुआ था । उस दौरान कई सारी प्रतियोगिताएं भी हुई थी जिनमें लोगों ने पहला , दूसरा और तीसरा स्थान भी पाया था । अब मामला भले ही हिन्दी का ही क्यों न हो विजेताओं का सम्मान तो करना ही पड़ता है । उन्हें ही पुरस्कार स्वरूप हिन्दी की किताबें दी जानी हैं जिसकी खरीद का जिम्मा मेरे ऊपर था । काम-धाम और दिखने- सुनने में आप जीतने भी नाकारे लगें पर सरकार की नजर में यदि आप विभागाध्यक्ष हैं तो हैं । फिर सरकार आपको आपकी गरिमा भले ही न दे पर काम तो करवाएगी ही । मैं भी ऐसा सा फर्जी विभागाध्यक्ष हूँ जो अपने पहली ही नियुक्ति के साथ इस स्थान पर काबिज हो गया । उसी एवज़ में हिन्दी 
पखवाड़े का उदघाटन करना , एक संक्षिप्त सा वक्तव्य देना, प्रतियोगिताओं का निर्णायक बनना और ये किताबों को खरीद कर रख देना आदि करना पड़ा ।

हिन्दी प्रचार सभा की दुकान में तीन लोग काम करते हैं उन्हें जब पता चला कि मैं सौ के आसपास किताबें खरीदने वाला हूँ तो उन्होने सीधे भीतर बुला लिया । इसके बाद न जाने कहाँ से केंद्र के सचिव और उनके पीछे केरल की विशिष्ट फिल्टर कॉफी भी आ गयी । तब जाकर लगा कि यार हाँ थोड़ी तो गाहक की भी रौब होती ही है , फिर पोपुलर कल्चर के कई जुमले भी भी याद आए । सबसे ज्यादा याद आया निजी कंपनियों में चलने वाला टार्गेट सिस्टम जिसके नहीं पूरा होने की स्थिति में कंपनी अपने कर्मचारियों की छंटनी करती है ।

बच्चों के लिहाज से ढेर सारी किताबें देखी - तमस , विकलांग श्रद्धा का दौर , स्वदेश दीपक का कोर्ट मार्शल , सर्वेश्वर की बकरी , आपका बंटी , व्याकरण , शब्दकोश आदि । पर जिस स्थिति में अपने छात्रों को मैंने देखा है उसमें उनके लिए किसी भी श्रेष्ठ रचना के बदले भाषायी संरचना विकसित करने वाली पुस्तकें होनी जरूरी लगी । तमाम श्रेष्ठ रचनाओं को परे करते हुए ये व्याकरण , शब्दकोश और बोलचाल की हिन्दी जैसी किताबें एक अच्छा निवेश लगी । एक साथ पच्चीस पच्चीस व्याकरण या शब्दकोश न तो छात्रों के पास हैं और न ही विद्यालय के पुस्तकालय में । इसलिए तमाम कालजयी रचनाओं का मोह त्यागते हुए भाषा की बात सोचना ठीक लगी ।
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के कर्मचारियों ने बताया कि केरल में छह-सात हजार रूपय के किताबों की बिक्री बहुत कम ही होती है और एक तरह से देखा जाए तो यह उनकी महीने भर की बिक्री के बराबर है । यह समझना भी उतना ही सरल था क्योंकि संस्थान के सचिव ने बाद में मुझे बस अड्डे तक अपनी गाड़ी में छुड़वाया ।


काम जो भी किया हो या कि वहाँ पर जितनी भी आवभगत मिली हो लेकिन अरसे बाद एक ऐसा दिन गुजरा जो हिन्दी की किताबों को समर्पित रहा । यही वजह है कि अभी भी नाक में पुरानी पड़ती किताबों की गंध उसी तरह बरकरार है जो अच्छी लग रही है । 

सितंबर 26, 2013

चयन में आभाव की भूमिका ...


ज्यों-ज्यों देश आगे के चुनावों की ओर बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विशाल लोकतन्त्र का नेतृत्व किन संभावित हाथों में होगा । उम्र कम है फिर भी कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के अनुभव तो हैं ही । उन अनुभवों के आधार पर यदि एक ट्रेंड पहचानने की कोशिश करूँ तो यह कहने में गुरेज नहीं कि चुनाव के दो-तीन साल पहले तो ऐसा लगता है कि चुनाव आते-आते चयन के लिए बहुत से नाम होंगे और नेतृत्व के लिए एक सुयोग्य महानुभाव का चयन बहुत सरल होगा । इससे और आगे बढ़कर यह कह सकते हैं कि बहुत से सुयोग्य में से एक चुनना कठिन हो जाएगा । लेकिन , जब चुनाव सर पर आ जाते हैं तो स्पष्ट तौर पर एक दो कद्दावर नाम ही रह जाते हैं फिर कई बार उनमें जरा-जरा सी योग्यता ढूँढने में भी मशक्कत करनी पड़ती है । ऐसा छोटे से वार्ड सदस्य लेकर प्रधानमंत्री तक के चुनाव में देखा है । शुरू-शुरू में काफी अफवाहें उड़ती हैं और फिर वे अफवाहें ठोस होती जाती हैं और छोटी-छोटी अफवाहों को खा जाती हैं । कई बार देखने में आया है कि छोटी-छोटी अफवाहें खाये जाने के लिए ही उठती हैं । इसी खाये जाने की प्रक्रिया में कई बार संभावनाशील मगर छोटी शक्तियाँ भी लील ली जाती हैं या हालात ऐसे बना दिए जाते हैं कि उनका लील लिया जाना स्वाभाविक सा लगने लगता है । इस सब का समेकित प्रभाव अंतिम परिणाम में दिखता है । जब परिणाम आते हैं तो कुछ लोगों के चयन के साथ निबाह करना पड़ता है । इसे ही प्रतियोगी राजनीति कहते हैं ।

आगे बहुत सारे चुनाव हैं जिन्हें विधानसभा और लोकसभा चुनावों के खाँचे में रखने की परंपरा रही है । कम से कम आगामी लोकसभा चुनावों के लिए भी लगभग वही प्रक्रिया चल रही है और अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है जहां से तस्वीर साफ सी नजर आने लगी है कि नेतृत्व किन-किन हाथों में जा सकता है । लेकिन अब से ठीक डेढ़ साल पहले की स्थिति पर गौर करें तो लग रहा था कि आम चुनाव आते-आते कुछ निरा-परिवर्तनकामी लोगों का समूह सामने आएगा जो नेतृत्व भले ही न कर पाये पर नेतृत्व को दिशा देने की स्थिति में जरूर रहेगा । लेकिन शायद यही प्रतियोगी राजनीति की मांग है कि सबसे पहले परिवर्तनकामियों की लामबंदी को तोड़ा गया और उसे एक छितरी हुई और विश्वास न की जा सकने वाली शक्तियों की हैसियत तक पहुंचाया गया । इस पूरी प्रक्रिया में भूमिका तो देश के दोनों प्रमुख दलों ने निभाई लेकिन फायदे की माप में भाजपा ने कॉंग्रेस को पीछे छोड़ दिया । क्योंकि जब एक दबाव समूह जो कॉंग्रेस का पहले से विरोधी था वह टूटा तो उसका बहुत सारा हिस्सा भाजपा के खेमे में चला गया । उस समूह के भाजपा में जाने वाले लोग कॉंग्रेस की सरकार के विरोधी थे और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के प्रति आशंकित । इसलिए बहुत से लोग हाल तक यह दावा करते रहे हैं कि वह दबाव समूह भाजपा की तरफ से ही खेल रहा था । अब बचे हुए हिस्से में न तो दम है और न ही उसकी विश्वसनीयता रहने दी गयी है इसलिए एक संभावनाशील समूह अगले बहुत से सालों के लिए परिदृश्य से परे हो गया । अब फिर से भारतीय राजनीति उसी अवस्था में वापस लौट गयी है जहां मुख्य मुक़ाबला केवल दो ध्रुवों में ही होगा । बहुध्रुवीय अवस्था में चयन के लिए ज्यादा विकल्प होते तो उम्मीदवारों के लिए प्रतियोगिता भी ज्यादा होती लेकिन अब एक कि हार और दूसरे की जीत में ही इस मुक़ाबले का तर्जुमा हो सकता है । यदि स्पष्ट हार-जीत न भी हुई तो उसके बाद की राजनीति में नए - नए सौदेबाजी विशेषज्ञ उभरेंगे जो किसी भी हार को जीत में बदल देंगे ।

इस दो ध्रुवीय मुक़ाबले में फायदा भाजपा का है क्योंकि उसके पास वर्तमान सरकार की असफलताओं को जनता में ले जाने का अवसर है । ऐसी दशा में कॉंग्रेस के पास कुछ पैंतरेबाज किस्म के आइडिया बचे हैं जो गाहे-ब-गाहे सामने आ रहे हैं । हालांकि भाजपा के पास इससे पहले के आम चुनाव में यह अवसर था लेकिन वह उसका उपयोग नहीं कर पायी और शायद इसीलिए उसने इस बार मुद्दों के बजाय व्यक्ति को आगे किया है ताकि मुद्दे से मुद्दा लड़ा कर कोई जीत भी जाये तो व्यक्ति से व्यक्ति न लड़ा पाये । यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति आगे किया नहीं गया बल्कि वह आगे आ गए और अब जब आ गया है तो उसमें ही भाजपा को अपनी भलाई दिख रही है ।

इस तरह से भारतीय लोकतंत्र लोक-स्वीकृति के बदले व्यक्ति की महत्वाकांक्षा को पोषित करने लगा है । स्थानीय स्तर पर तो इसे कई बार और लगभग हर चुनाव में देखा गया लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा पहली बार दिख रहा है जहां स्वयं को देश का प्रधानमंत्री मनवाने की कवायद अब अंतिम रूप ले चुकी है । फिलहाल कॉंग्रेस को इस दोष से मुक्त रखा जा सकता है और बिना किसी लाग लपेट के सारी उँगलियाँ नरेंद्र मोदी की तरफ उठेंगी ।

नरेंद्र मोदी का इस तरह अपने को थोपना ऐसा लगता है जैसे बचपन की लड़ाई सी चल रही हो । किसी भी तरह से अपने को स्वीकार करवाने की उत्कटता लोकतान्त्रिक राजनीति में भी आ जाए तो उसे तानाशाही ही कह देना पड़ेगा । उसने स्वयं को खबर में रखने से लेकर अपनी छवि की मजबूती और उसके सबंध में प्रचार-प्रसार को लगातार बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास किए हैं और ऐसा कह देना कोई खुलासा नहीं है बल्कि यह एक तथ्य का रूप ले चुका है । वह कई बार निर्लज्जता की हदें भी पार करता दिखाई देता है । मोदी के उत्तराखंड के रेम्बो एक्ट को देख कर तो यही कहा जा सकता है और उसके अनुयाइयों का अंधविश्वास इस कदर था कि वे इस झूठ को सच मानकर फैलाते रहे । फिर अमिताभ बच्चन से मोदी को सबसे योग्य कहलवाना , उसके भाषणों में आंकड़ों की बाजीगरी आदि उसकी इसी अधीरता को साबित करते हैं ।

भारत में वाचिक परंपरा खत्म नहीं हुई है । यूं तो इसके चिह्न हर जगह मिल जाएंगे लेकिन राजनीति अभी भी इस ऋग्वैदिक परंपरा को न सिर्फ जीवित रखी हुई है बल्कि इससे अपना उल्लू भी सीधा कर रही है । ज़ोर से और प्रवाहमय भाषा में बात करने वाला व्यक्ति जन्मजात नेता माना जाता है और जो राजनेता लच्छेदार भाषण दे सकता हो वह तो जनता के दिलों पर राज करता है । भीड़ के आत्मविश्वास की समूहिक कमी और उसकी सामूहिक  हीनभावना का बोध उसे स्वतः ही आकर्षक वक्ता की ओर आकर्षित होने के लिए विवश कर देता है । भीड़ के इसी मनोविज्ञान से बहुत से नेताओं ने फायदा उठाया और भीड़ को भीड़ ही रहने दिया क्योंकि भीड़ ने यदि बोलना सीख लिया तो उनकी अबाध सत्ता खतरे में पड़ जाती । अटल बिहारी वाजपेयी के परिदृश्य से बाहर हो जाने के बाद लगा कि अब शायद यह लच्छेदार भाषणों का युग समाप्त हो गया लेकिन मोदी ने उस दौर को पुनर्जीवित किया है । उसके समर्थक उसी भीड़ का हिस्सा हैं जिसे अपनी अभिव्यक्ति करने में हजार डर दिखाई देता है । उनका मनोविज्ञान यह स्वीकार कर चुका है कि मोदी की अभिव्यक्ति उन सबकी सामूहिक अभिव्यक्ति है । यह अवस्था चिंतन से नहीं बल्कि भावुक उद्वेगों से आई है । मोदी ने जिस तरह से इस रणनीति की परिणति चाही होगी यह उससे भी बढ़कर है । आज उसके समर्थकों की संख्या केवल इसलिए बढ़ रही है कि वह प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रख रहा है । भारत में आज भी वही दौर जारी है जिसमें ऊंची आवाज़ में कहे गए अतार्किक और बहुधा निरर्थक बातों को धीमी या मंद तार्किकता के बदले स्वीकार किया जाता है ।
सामंतवादी मूल्यों के कई स्तरों में दबे नागरिकों के लिए यह ज्यादा आसान दिखता है कि उसके बदले कोई और बात करे और वह बात करने वाला धीरे-धीरे उसके मनोविज्ञान पर कब हावी होकर उससे अपनी अतार्किक बातें भी मनवाने लगता है यह पता ही नहीं चल पाता है । यही वजह है कि अपने आस पास आजकल लोगों का मोदिमय होते जाना अस्वाभाविक नहीं लगता । फेसबुक पर जो दोस्त पहले मोदी का विरोध करते थे वे आज समर्थन में सामने आ रहे हैं । जो फेसबुक के ग्रुप पहले तमाम राजनीति पर चुहल करते थे वे अब प्रो-मोदी चुहल ही करते हैं । इन्हें उनका असली रंग दिखाने जैसे तय मुहावरे में बांधना गलत होगा । यह सामंतवाद के साये में विकसित हुई हीनता ग्रंथि है जिस पर बांसुरी बजाने वाले का कब्जा है जिसकी धुन इतनी मोहक है कि चूहों को नदी नही दिख रही । इसने न केवल मोदी को अबाध भावनात्मक समर्थन दिया बल्कि एक ऐसी भावुक सेना दी है जो केवल अपनी बात रखना जानती है , जिसके लिए उसके अपनी सोच के अलावा सारी सोच गलत है । स्थिति इतनी भयावह है कि उसके समर्थक अपने आप में विरोधाभासी और अतार्किक बातें करते हुए भी दूसरे विचारों के लिए कोई स्थान नहीं छोडना चाहते इसलिए उनके यहाँ बहस की गुंजाइश ही नहीं है ।

मोदी के समर्थक आजकल एक नए शिगूफ़े पर काम कर रहे हैं । पिछले स्वतन्त्रता दिवस के बाद से उनको लगता है कि भारत की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर गयी है जहां अमेरिका की तरह प्रधानमंत्री का फैसला दो लोगों में बहस करवा कर हो जाए । लेकिन मोदी के फर्जी करिश्मे से चौंधियाई आँखें अपने देश की वास्तविकता तक देख नहीं पा रही हैं जहां आम चुनाव केवल एक पद के लिए नहीं बल्कि लोकसभा की करीब साढ़े पाँच सौ सीट के लिए होता है । जिसमें हो सकता है एक-दो राष्ट्रीय मुद्दे हों पर बहुधा स्थानीयता ही विजेता तय करती हैं फिर राज्यवार जो विविधताएँ हैं सो अलग । उनकी इस मांग को देखकर लगता है कि उनके लिए चुनाव देश के एक–एक बूथ पर नहीं बल्कि फेसबुक पर होने वाला है जहां लच्छेदार और मज़ाकिया भाषा से ही बात बन जाएगी ।
एक व्यक्ति के इस अप्रत्याशित उत्थान ने भारतीय राजनीति में बहुत से धड़ों की अकर्मण्यता और शिथिलता को उजागर कर दिया है । विशेष रूप से वामदलों के संबंध में इस बात को पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है । आज की भारतीय राजनीति में जब बड़े परिणामों की आशा करने के बजाय जमीनी स्तर पर जड़ें जमाने का काम उन्हें करना चाहिए उस समय वे महज हवाई लफ़्फ़ाज़ी और शिथिलता से काम चला रहे हैं । ऐसी शिथिलता से तो क्रांति नहीं ही आएगी ऊपर से लोकतंत्र से भी बेदखल होने की नौबत आने वाली है । केरल के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनकी स्थिति कितनी गंभीर है । लोग कहते हैं कि उनहोंने तो यही देखा कि वामदलों के पास कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली नहीं है हाँ विचारधारा के नाम पर सच में वह सब आकर्षित करने वाला है लेकिन कई बार उनको सत्ता में लाकर देख लिया लेकिन विचारधारा पर कार्य में नहीं बदल सकी । इन दलों का लगभग यही हाल देश के स्तर पर है जो कई बार इनके आपसी सिर-फुटौव्वल से और गहरा जाता है । 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद से यदि किसी दल की लोकप्रियता घटी है तो वह कॉंग्रेस नहीं बल्कि वामदल हैं ।


लोकतान्त्रिक राजनीति में फिर से भीड़तंत्र का दौर आ गया है जिसे मोदी नेतृत्व दे रहा है । इस स्थिति में सबसे दुखद यह है कि भले ही हार जाने के लिए ही सही पर भीड़ को मोदी के सम्मोहन से जगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं । जिन राजनीतिक दलों पर इसकी ज़िम्मेदारी थी या है वे इसे पहले से ही एक हारी लड़ाई मानने की हीनभावना में लिपटते हुए दिखाई दे रहे हैं । 

सितंबर 25, 2013

साल दर साल वही प्रहसन : सन्दर्भ हिंदी पखवाड़ा


हिंदी पखवाड़ा चल रहा है । इस पखवाड़े के पंद्रह दिनों तक हिन्दी वहाँ वहाँ विराजमान होगी जहां जहां इसके होने की कल्पना भी न हो । इन्हीं पंद्रह दिनों में ही हम यह देख लेते हैं कि कितना दयनीय है इस तरह के कुछ दिन एक भाषा को दे देना । यह उस तरह लगता है जैसे इसका श्राद्ध-पक्ष चल रहा हो । जिसे लोग पिछले पक्ष की तरह ही किसी तरह काट कर फारिग होना चाहते हैं । यहाँ यह पढ़ने में बहुत बुरा लग सकता है कि हिन्दी पखवाड़ा हिन्दी का श्राद्ध-पक्ष है लेकिन बुरे लगने से वास्तविकता बदल तो नहीं जाती ।

हिन्दी दिवस यानि 14 सितंबर को केंद्र सरकार से जुड़े संस्थान हिन्दी के लिए अगले पंद्रह दिनों तक नाटक अपने हर छोटे बड़े कार्यालय में रखते हैं । फिर अगले पंद्रह दिन नाटक लगातार चलता रहता है । एक – दो दिन तो उत्साह दिख जाता है लेकिन उसके बाद यह एक मज़ाक से बढ़कर कुछ नहीं रह जाता है । फिर इस सरकारी नाटक को देख कर लगता है कि इससे बेहतर हो कि ये नाटक हो ही न ।
इस तरह की अवस्था का अंदाजा तो था कि हिन्दी पखवाड़ा कुछ ऐसा ही होता होगा । क्योंकि आज तक हिन्दी क्षेत्र से बाहर नहीं निकला था तो यह समझने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी कि हिन्दी को साल के पंद्रह दिन देखने पर कैसा लगता है ।  जिन संस्थाओं में पढ़ाई हुई थी वहाँ हिन्दी ही पढ़ी तो ये भाषायी स्यापा करने की कोई जरूरत ही नहीं थी । 

उस समय और आज भी यह लगता है कि हिन्दी का दिवस मनाना लेना ऐसा है जैसे  भाषा के समाप्त हो जाने , बेदखल हो जाने की पूर्व - घोषणा हो । उधर केवल किसी बैंक में ही पता चल पाता था या आज भी चलता होगा कि हिन्दी पखवाड़े जैसी कोई चीज होती है । लेकिन यहाँ आने पर ज्यों-ज्यों सितंबर नजदीक आया त्यों-त्यों कई बार यह सामने आया कि यहाँ हिन्दी पखवाड़ा होगा या कि होता है जो बहुत बड़ा आयोजन होगा या कि होता है ।

सितंबर का ग्यारहवाँ या बारहवाँ दिन रहा होगा यहाँ पास में नारियल विकास बोर्ड , भारत सरकार का कार्यालय है वहाँ से हिन्दी दिवस पर बोलने का न्योता आया था । पर वे अपना हिन्दी दिवस 14 सितंबर नहीं बल्कि 13 को ही माना रहे थे । मेरे दिन महत्वपूर्ण नहीं था इसलिए हाँ हो गयी । वहाँ जाने पर पता चला कि नारियल विकास बोर्ड में शनिवार को भी छुट्टी होती है और वहाँ के अफसर और कर्मचारी अपनी एक छुट्टी खराब नहीं करना चाहते इसलिए इसे तेरह को ही माना रहे थे और इस बार से उनहोंने हिन्दी पखवाड़ा भी मनाने का निश्चय किया है जो 27 सितंबर तक चलेगा । हिन्दी पखवाड़ा आम तौर पर तो चौदह से शुरू होकर अट्ठाईस सितंबर तक चलता है पर वहाँ यह एक दिन पहले शुरू होकर एक दिन पहले ही खत्म हो रहा था । एक तरह से देखें तो हिन्दी के लिए दिन तो पंद्रह मिल ही रहे हैं लेकिन ये दिन हिन्दी के लिए नहीं बल्कि अपनी सुविधा के लिए रखे गए कियोंकि उनकी एक दिन की छुट्टी बर्बाद न हो । यह स्थिति तब थी जब वहाँ के अधीक्षक मध्यप्रदेश के निवासी हैं । बहरहाल वह कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं था । बस बीसेक कर्मचारियों का एक झुंड था जिसे संबोधित करना था । 

उससे पहले अधीक्षक जी से बात हो रही थी तो पता चला कि वे मधेपुरा बिहार में काम कर चुके हैं और वहाँ से सीधे यहाँ आए । जब तक औपचारिक सम्बोधन नहीं शुरू हो गया तब तक वही शाश्वत टाइमपास चलता रहा राजनीति , भ्रष्टाचार आदि पर वही पुरानी चबाई, उगली व थूकी हुई बातें । दूसरी बात, जब बिहार को जानने वाला कोई गैर-बिहारी हो और उसे मौका मिल जाए तो बिहार की बुराई तो करता ही है यह तो कोई अनोखी बात नहीं है । हाँ उन्हें आश्चर्य तब होता है जब आप उनकी सभी बातों से सहमति जता दें फिर बंदे का सारा उत्साह छू-मंतर हो जाता है । इसके बाद जाकर अधीक्षक महोदय अपने काम पर आए थे । नारियल कितने प्रकार के होते हैं , देश के किस भाग में कौन सी किस्म अच्छा उत्पादन देती है , और सबसे जरूरी कि नारियल की जीन-संरचना ठीक मनुष्यों जैसी होती है इसलिए जब तक वह फल न देने लगे तब तक कहा नहीं जा सकता है कि उसकी कौन सी किस्म है । और यही कारण है कि नारियल का हर पेड़ दूसरे से भिन्न होता है और इसी के साथ उसके गुण भी । तभी तमाम नयी नयी विधियों के आविष्कार हो जाने के बाद भी बीज से पौधा उगाने की परंपरागत विधि को तरजीह दी जाती है । इस बीच मैं देख रहा था कि मझोले से एक बरामदे में नोटिस बोर्ड के आर-पार कपड़े का एक बैनर टांगा गया, वक्ता और अधीक्षक की कुर्सी जमाई गयी और उनके सामने एक टेबल रखा गया फिर सामने-सामने बीस-पाचीस लोगों के बैठने का इंतजाम ।

चूंकि ऑफिस उनका था इसलिए पहले अधीक्षक जी को ही बोलना था और वही बोले भी । उनके प्रधान कार्यालय को पिछले कई वर्षों से हिन्दी में ज्यादा काम करने के लिए भारत सरकार की ओर से प्रथम पुरस्कार मिल रहा है । इस बार भी द्वितीय पुरस्कार मिल रहा है । फिर वह बताने लगे कि उनके ऑफिस में कितने लोग हिन्दी जानते हैं कितने नहीं । बोलते बोलते वे वह बोल गए जो इन हिन्दी के प्रति सरकारी कार्यालयों की प्रतिबद्धता की कलई उतारता है ।

हिन्दी में काम करना कई तरीके से गिना जाता है और ये कार्यालय बड़ी चालाकी से उनमें हेरा-फेरी कर अपने हिन्दी में काम करने के अंक बढ़ाते रहते हैं जबकि असलियत में काम हुआ ही नहीं रहता है । पत्र अमूमन अंग्रेजी में ही भेजे जाते हैं लेकिन उसके साथ हिन्दी में एक चिट जिसे कवरिंग लेटर कहते हैं, लगाकर हिन्दी का पत्र बना डालना किसी चमत्कार से कम नहीं है ! ऐसा करते हुए हिन्दी में किया गया पत्र-व्यवहार सौ प्रतिशत हो जाता है । आगे अधीक्षक ने यदि किसी दस्तावेज़ पर हिन्दी में हस्ताक्षर कर दिए हैं तो वह भी हिन्दी में किया गया काम गिना जाएगा । कंप्यूटर में हिन्दी में प्रारूप तय हैं उनमें बस नाम , दिनांक आदि डालकर बहुत से दस्तावेज़ और पत्र तैयार किए जाते हैं फिर वह हिन्दी में किए गए काम की श्रेणी में आता है । बीच बीच में राजभाषा विभाग को भेजी जाने वाली रपट की प्रति कंप्यूटर में तैयार रहती है बस संख्या आदि नए डालकर नयी रिपोर्ट तैयार कर ली जाती है ।
इसके बाद अपने वक्तव्य को लेकर मेरा अनुत्साहित हो जाना स्वाभाविक था । लेकिन तमाम राजनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं से बचते हुए उनको लताड़ लगा ही गया । केवल पुरस्कार के लिए काम करने की उनकी प्रवृत्ति इस पखवाड़े के मूल आदर्शों का तो गला ही घोंट रही हैं न ।  इसके साथ ही कार्यालय में वास्तविक रूप से हिन्दी में काम करने की सलाह भी दे डाली जो जनता हूँ उन लोगों को अच्छी नहीं लगी । पर उनका बुरा लगना बहुत देर तक रहा नहीं क्योंकि भाषण के बाद खाना बहुत बढ़िया खिलाया था ।
विद्यालय में ,
विद्यालय में भी हिन्दी दिवस की औपचारिकता पूरी की गयी । उस दिन मंच पर एक बड़ा सा दीप रखा गया पीछे कपड़े का वही बैनर जिस हिन्दी पखवाड़ा समारोह लिखा रहता है । एक दिन पहले ही राजभाषा के साथ की जा रही बाजीगरी पर क्षुब्ध होकर लौटा था इसलिए अपने विद्यालय में बोलते समय पहले तो सारी भड़ास निकाली फिर इस पर ज़ोर दिया कि काम करना हो तो पूरी तरह किया जाये अन्यथा नाटक बंद करने का समय आ गया है ।
ओणम की छुट्टी के सिलसिले में विद्यालय उसी दिन बंद होना था इसलिए हिन्दी पखवाड़े की बस औपचारिक शुरुआत हो पायी उससे जुड़े कार्यक्रमों की नहीं । ये कार्यक्रम नहीं बल्कि छात्र-छात्राओं के लिए प्रतियोगिताएं थे  जिनके माध्यम से उनमें हिन्दी के प्रति रुचि जगाने का काम होता । छुट्टियों के बाद विद्यालय जब पुनः शुरू हुआ तब से हर दोपहर कोई न कोई प्रतियोगिता हो रही है । व्याकरण, विभिन्न प्रकार के भाषण , रचनात्मक लेखन , कविता गायन , सुलेख आदि की प्रतियोगिताएँ चल रही हैं ।
छात्र कविता प्रतियोगिता के लिए कवितायें ले गए और किस धुन में गाना है वह भी लेकिन जब मंच पर चढ़े तो कविता कहीं थी ही नहीं । जो छात्र कविता लेने के लिए नहीं आए वे या तो बच्चन की अग्निपथ कविता सुना रहे थे या महादेवी की मधुर मधुर मेरे दीपक जल । अग्निपथ कविता जितनी आसान है उतनी ही आकर्षक भी क्योंकि इसे हाल ही रितिक रोशन ने अपनी फिल्म में पढ़ा है । बच्चे उसी अंदाज में पढ़कर जैसा फिल्म में है । महादेवी की वह कविता भी यहाँ बहुत लोकप्रिय है ।
भाषण प्रतियोगिता और निबंध प्रतियोगिता के विषय पहले ही तय कर दिए गए थे । इसका परिणाम यह हुआ कि परीक्षा कक्ष से बाहर और मंच पर जाने से पहले छात्र निबंध की विभिन्न किताबों को लेकर अपनी बारी आने तक  तैयारी करते रहे । जब निबंध को जांच रहा था तब लगा कि हिन्दी के लिए इस नाटक की आवश्यकता नहीं है । वरिष्ठ समूह के बीस बच्चों में से बारह ने मानो एक ही किताब से निबंध रटा था एक एक शब्द मिल रहे थे । और यही हाल भाषण प्रतियोगिता का भी रहा था । मित्रता विषय पर कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण सब के पास था क्योंकि उनहोंने जिस किताब से तैयारी की थी उसमें यही उदाहरण था ।
हिन्दी पखवाड़ा एक नाटक सा लगता है जो चल तो रहा है पर इसके भीतर बस इसे किसी तरह खींच कर अंत तक ले जाने तक की ही ताकत है । एक बात यह आती है कि यहाँ केरल जैसे राज्य में हिन्दी इस तरह भी आए तो कम बात नहीं है लेकिन यहाँ यह बताना जरूरी है कि यह पखवाड़ा हिन्दी के लिए नहीं बल्कि राजभाषा के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए आयोजित किया जाता है । विद्यालय में इस पखवाड़े से जुड़े कार्यक्रम दोपहर को हो रहे हैं इसलिए सारे शिक्षक खुश हैं क्योंकि उनकी ड्यूटी के समय यह काम किया जा रहा है जिससे वे अपनी ड्यूटी से बच जा रहे हैं ।  
यह खयाल आजकल कई बार आ रहा है कि हिन्दी दिवस या कि पखवाड़ा सब मिलकर हिन्दी पर किए गए समूहिक एहसान या दया का भाव निर्मित करते हैं । साथ में अपने लिए यह स्पेस भी रख ले जाते हैं कि हिन्दी को जो महत्व दिया है वह किसी अन्य भाषा को नहीं । जबकि एक बार भी इन आयोजनों और उनके कार्यक्रमों को देख लें तो लग जाएगा कि यह सब महज रस्म हैं जो अपना अर्थ खो चुके हैं बल्कि इनमें से यदि अति-आशावादी होकर भी रस तलाशने की कोशिश की जाए तो भी यह हिन्दी के विकास को नहीं दर्शाते हैं बल्कि उसके प्रति और उदासीन ही करते हैं । इन कार्यक्रमों को एक झंझट से अधिक मानने वाले कम ही हैं और जो हैं वे इसलिए इसकी बात करते हैं क्योंकि इनके माध्यम से उनका कुछ फायदा हो जाता है ।
राष्ट्रभाषा और सरकारी भाषा हिन्दी के अलावा हिंदीभाषियों की मातृभाषा भी है, यह सच्चाई कई बार हमारे जेहन से बाहर चली जाती है क्योंकि आज जिस प्रकार का वातावरण बन रहा है उसमें हिन्दी की बात करना बहुलता को अस्वीकार करने जैसा बना दिया गया है । हिन्दी के नाम पर जो भी काम होते हैं या बातें होती हैं उसमें राष्ट्रभाषा हिन्दी के नाम पर जो इसकी कमियाँ (यह कितना सच है इस यह चर्चा का विषय है ) हैं उसकी गाज़ मातृभाषा हिन्दी पर आकार गिरती है ।

हर साल होने वाला यह रस्मी आयोजन हिन्दी के प्रति कोई विश्वास नहीं जागता है । इसके अतिरिक्त दूसरे सामाजिक और विशेषकर आर्थिक कारण हैं जो हिन्दी के प्रसार को बढ़ा रहे हैं । जरूरत इस स्थिति को समझने की है और फिर नए तरह की कार्यप्रणाली अपनाने की ।  केरल में हिन्दी का कोई समाचारपत्र नहीं आता है और यदि बहुत कोशिश कर के मंगवाया भी जाए तो वह दो दिन से पहले नही मिल पाता । इस स्थिति में भी हिन्दी पखवाड़ा मनाकर यह साबित करने का छद्म ओढ़ लिया जाता है कि हिन्दी के प्रचार – प्रसार के लिए काम हो रहा है । इस तरह की सोच पर हंसी आती है ।  

सितंबर 23, 2013

सर जी , फ़र्जी !


बात तो बीएड के दौर की है । उन दिनों हमारा शिक्षण अभ्यास चल रहा था जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के उस महाविद्यालय में सभी टीचिंग – प्रैक्टिस कहते थे । यह दरअसल वह काम था जिसमें प्रत्येक प्रशिक्षु को वास्तविक विद्यालयों में जाकर छात्रों को पढ़ाना होता था । बाहर से तो ऐसा लगता है कि यह एक अभ्यास हो लेकिन जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें गज़ब की वास्तविकता थी ।

उस समय हमें छात्र-अध्यापक कहा जाता था । अध्यापक शब्द जुड़ जाने से ही उसके जितना अधिकार मिल जाए ऐसा हम भले ही सोचते थे पर न तो हमें पढ़ाने वाले शिक्षक , न ही संबन्धित विद्यालयों के शिक्षक और तो और छात्र तक भी हमें अध्यापक समझने की गलती नहीं करते थे । ज़ाहिर है ऐसे में छात्र हमें बहुत गंभीरता से लें ये तो हो ही नहीं सकता । उनके व्यवहारों ने बहुत से ऐसे अनुभव दिए जो लंबे समय तक याद रहेंगे । छात्राएं तक हंसी मज़ाक से नहीं चूकती थी । जबतक हमारे सुपरवाइज़र कक्षा में होते तबतक तो वे यूं चुप रहते थे मानो उनसे आदर्श बच्चे मिल ही नहीं सकते । मैं दिल्ली सरकार के एक प्रतिभा विकास विद्यालय में पढाता था और बहुत से अपने दोस्त इसी तरह दिल्ली सरकार के विद्यालयों में पढ़ाते थे । हम सब के जो अनुभव हैं वे उन विद्यालयों को सभी अर्थों में सरकारी स्कूल साबित करते हैं ।

अब जब बात टीचिंग प्रैक्टिस की चल ही पड़ी है तो थोड़ी सी उसकी राजनीति से भी होते चलते हैं । जो शायद इस क्षेत्र को समझने में सहायता करे । दिल्ली विश्वविद्यालय के बीएड महाविद्यालय में जब टीचिंग प्रैक्टिस का समय आता है तब वहाँ आपको एक  बहुत स्पष्ट बात नजर आएगी । जो लड़कियां कार से आती हैं, ठीकठाक कपड़े पहनती हैं और अँग्रेजी बोलती हैं उनके लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लग जाता है कि उन्हें उजड्ड सरकारी विद्यालयों के छात्रों के बदले पब्लिक  स्कूल के पालतू बच्चे मिलें । दूसरी ओर अन्य लड़कियां जिनके लिए बीएड करना परिवार के लिए रोटी जुटाने का साधन बनेगा उन्हें खराब से खराब हालात वाले सरकारी विद्यालयों में भी भेजने से लोग नहीं हिचकते हैं । उनके अनुभव बहुत कटु होते हैं । स्वयं हमारे साथ की कुछ लड़कियों के अनुभव ऐसे रहे कि वे किसी भी सरकारी विद्यालय में नौकरी का आवेदन तक करने से डरती हैं । लेकिन इतना करने से वे बच नहीं सकती क्योंकि पब्लिक स्कूल के दरवाजे उनके शाश्वत रूप से बंद होते हैं । शायद ही किसी ने देखा हो कि कोई पब्लिक स्कूल उन सुंदर लड़कियों के अलावा किसी को नौकरी देता हो । यहाँ लड़कों का तो प्रश्न ही नहीं उठता है ।

हालांकि यह यहीं पर नहीं रुकता है । लड़कियों और सौंदर्य को लेकर शिक्षा-संस्थाएं जितनी भी उदार हो जाएँ लेकिन वहाँ के लोग बार बार वही कार्य करते रहते हैं जो पुराने सामंत करते थे । हमारे उस महाविद्यालय की प्रधानाचार्य ने अपने स्तर से एक कार्यक्रम करवाया विशुद्ध अपने अकादमिक लाभ के लिए । उसमें उन्होने अपने करीब की छात्राओं को स्वयंसेवक के रूप में इस्तेमाल किया । ध्यान नहीं पड़ता कि किसी लड़के को बोला हो । और जब कार्यक्रम का समापन हुआ तो उनहोने नाम ले-लेकर केवल उन्हीं लड़कियों को धन्यवाद दिया जो खूबसूरत थी और जिनके पास कार थी । उन मोहतरमा की सौंदर्योपासना किसी कामुक पुरुष से भी आगे जाकर ठहरती है । उनसे मिलने की दिल से इच्छा नही होती थी लेकिन किसी वजह से जाना ही पड़ा तो उनकी व्यर्थ की नफ़ासत गुस्सा ही दिलाती थी ।

खैर इस भड़ास के चक्कर में मूल किस्सा छूटा जा रहा है । मूल किस्से की याद अभी इसलिए आई क्योंकि परसों पुरानी डायरी पलट रहा था तो उसमें उन दिनों के एक दो किस्से दर्ज मिले । लिखने के तरीके में बदलाव भले ही आया हो पर बातें आज भी सच हैं । इसलिए उन्हें डायरी से निकाल कर ब्लॉग पर चेप देने का मन कर गया । इसी मन करने ने वैसे बहुत सा कूड़ा-कबाड़ा करवाया है और फिर एक बार मन कर गया है !

शिक्षण – अभ्यास (अरे महाराज वही टीचिंग-प्रैक्टिस) के दौरान हमें न सिर्फ स्वयं कक्षा लेकर वास्तविक अध्यापन सीखना था बल्कि आसपास के दूसरे विद्यालयों में पढ़ा रहे अपने सहपाठियों की भी कक्षाएं देखनी थी , उसने सीखना था । सीखे न सीखे लेकिन रिपोर्ट बनानी थी कि इससे यह सीखा और उससे वह ! वह एक वास्तविक खानापूर्ति सी थी । पर हमारे सुपरवाइज़र ने इस प्रचलन में थोड़ा सा बदलाव कर दिया ।  उनके हिसाब से हमें अपने सहपाठी नहीं बल्कि जिस विद्यालय में हम वह बहु-प्रचारित अभ्यास करते थे उसी के स्थायी शिक्षकों की कक्षाओं को देखना था , सीखना था और रिपोर्ट बनानी थी । उसी के तहत मैंने कई अध्यापकों की कक्षाएं देखि और कुछ अपनी कक्षाओं के अनुभव भी रहे । यहाँ पर हिन्दी विषय से संबन्धित दो टुकड़े डाल रहा हूँ । ये टुकड़े सरकारी टुकड़े हैं । कैसे ? जरा देखिये !

एक , राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, शंकरचार्य मार्ग, दिल्ली ।  कक्षा दसवीं ब, पाठ लिंग निर्धारण ।
अध्यापक की आवाज़ सुस्पष्ट है , छात्र पाठ में रुचि ले रहे हैं और यह रुचि शायद इसलिए है कि अध्यापक यहाँ के स्थायी शिक्षक हैं जो कक्षा से बाहर भी देख लेने की बात अभी-अभी कर रहे थे । एक लड़के को बोर्ड पर दो वर्ग बनाने को कहा गया – स्त्रीलिंग और पुर्लिंग । मुझे लगा शायद श्रीमान की जबान लड़खड़ा गयी होगी हो सकता है ऐसा ही उस बच्चे को भी लगा हो । उसने जो दो वर्ग बनाए वे थे स्त्रीलिंग और पुर्लिंग । उसके लिखने की देरी थी कि कक्षा में अध्यापक का गुस्सा और गंभीर स्वर गूंजने लगा ! उस गुस्से का शब्दांतरण कुछ यूं था – ओए, बेवकूफ ! ये क्या लिखा ? ... दसवीं में आ गया है पर तुम्हारा अशुद्ध लिखना नहीं छूटा । तुमलोग कभी नहीं सीख सकते ... अबे पुल्लिंग नहीं पुर्लिंग होता है । लड़का खुले मुंह से माट्साब की ओर देख रहा था और मैं भी इस प्रश्न के साथ कि ये कौन सी हिन्दी है भई ?’ माट्साब का गुस्सा फिर से चनका – ओय देख क्या रहा है , पुल्लिंग वाले आधे को मिटा और लि के ऊपर रेफ़ लगा रेफ़ । उनहोंने दो बार रेफ़ बोला था और दूसरे पर ज़ोर ज्यादा डाला था । अब उनके कहे अनुसार बोर्ड पर दो सफ़ेद वर्ग चमक रहे थे – स्त्रीलिंग और पुर्लिंग !
शिक्षक महाराज एक – एक शब्द कह रहे थे और बच्चे बारी - बारी से आकर उन्हें उनके लिंग के अनुसार इधर या  उधर डाल रहे थे । पुरुष वाचक शब्द एक एक बाद ऐसे खाने में गिर रहे थे जिसका हिन्दी भाषा में कोई अस्तित्व ही नहीं था । इसके बावजूद मैंने उस अध्यापक की कक्षा के बारे यही लिखा कि वह बहुत अच्छी थी और मैंने उससे बहुत कुछ सीखा । क्योंकि मैं जनता हूँ उस रिपोर्ट को कोई पढ़ने नहीं जा रहा था । एक खानापूर्ति दूसरे तरह की खानापूर्ति के लिए रास्ता तो बनाती ही है । इसलिए उस रिपोर्ट में वास्तविकता भरी हो या कल्पना क्या फर्क पड़ता है !

दो ! उसी राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, शंकराचार्य मार्ग, दिल्ली में एक दिन मैं ग्यारहवीं 
कक्षा को महदेवी वर्मा की कविता जाग तुझको दूर जाना पढ़ा रहा था । मैं कविता पर बात करते करते उसके भाव के साथ वर्तमान तक चला आया और मेरी यह उम्मीद थी छात्र अपने समकालीन संदर्भों में कविता को ज्यादा बेहतर समझेंगे । पर छात्रों ने फट से टोक दिया 
– सर जी यह कविता तो आजादी से पहले की है इसे आप आज से क्यों जोड़ रहे हैं ?

मैंने कहा - वह इसलिए कि यह कविता आज के संदर्भों में भी लागू होती है ।

इस पर एक ने कहा – गाइड में आजादी से पहले के बारे में लिखा है आप भी वही पढ़ाओ ।

इसके बाद मैंने गाइड पढ़ने के नुकसान विषय पर उस कक्षा में एक संक्षिप्त भाषण दिया जिसके समाप्त होते ही एक दनदनाती टिप्पणी मेरे कानों में पड़ी – मैडम भी तो गाइड से ही पढ़ाती हैं ।

अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था । भई मैडम जो वहाँ की स्थायी शिक्षिका थी वह भी गाइड से पढ़ाती होंगी इसका मुझे अंदाजा नही था । बल्कि यह एक सदमा था मेरे लिए ।


मैं इन सब को इस तरह भी प्रस्तुत कर सकता हूँ कि ये प्रक्रियाएं भाषा का नुकसान कर रही हैं लेकिन ऐसा करूंगा नहीं । क्योंकि यह उससे कहीं आगे बढ़कर वर्तमान सरकारी स्कूल की शिक्षा-प्रक्रिया के स्वरूप का निर्धारण करता है जहां पर रचनात्मक होने के बदले यथास्थितिवादी होना पसंद किया जाता है । ऐसा माना जाता है कि यूं ही हर साल नए नामांकन होते हैं और होते रहेंगे इसलिए ज्यादा माथा-पच्ची के बजाय छात्रों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए ।
( भले ही मुखर होकर शिक्षक ऐसा न कहें पर कर तो वही रहे हैं और भीतर भी वे यही मानते हैं)!

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...