जनवरी 27, 2016

चंद लोगों में से वो



चाहे कितने ही दिनों पहले से तय करने बैठ जाएँ कि अगले रविवार को कहाँ जाना है लेकिन बात तय होती है खास उसी रविवार की सुबह जब नींद टूटने में आनाकानी करती है । कल अपने साथ भी यही हुआ । आखिर सो कर उठते समय ही तय हो पाया कि ज़्यादा दूर नहीं बस Mattanchery, Fort Kochi के इलाके की ख़ाक छानी जाये । आम तौर पर जो हम कर नहीं पाते वह किया जाये ।
यह इलाका यहूदियों का है और उसी नाम से जाना जाता है Jew Town । वहाँ आजादी से पहले के भी कुछेक घर हैं और कुछ नए भी हैं । मुझे उम्मीद थी कि वहाँ हर घर में यहूदी मिलेंगे मकान , दूकान हर जगह ! पर स्थानीय केरलवासी और धुर उत्तर के कश्मीरियों के अलावा कोई दिखा ही नहीं ।

यहूदियों का पूजा स्थल 'सिनेगोग' कहलाता है यह बचपन से रट रखा था (हालांकि किसी परीक्षा में यह पूछा नहीं गया ) । मैं इस उम्मीद में उधर निकल गया कि वहाँ पूजा स्थल पर तो यहूदी होंगे ही होंगे । वहाँ पहुँचने पर घोर निराशा हाथ लगी वह बंद था और वापस तीन बजे खुलता ।

अब अपने मन में जिद बैठ गयी कि आज तो किसी न किसी यहूदी को जरूर देखना है । वजह यह थी कि मैंने किसी यहूदी को देखा नहीं था । यूं तो मार्क जकरबर्ग भी यहूदी है ।

वहाँ पास ही में केरल पुलिस का एक इंटेरनेशल टूरिज़म पुलिस थाना है । वहाँ गया तो कुछ बड़ी जानकारियाँ हाथ लगी । पहली तो निराश करने वाली थी कि कोचीन में अब केवल 5 ही यहूदी बच गए हैं उनमें भी एक ही की उम्र 40 के आसपास है बाकी सब बूढ़े हो चुके हैं । दूसरी कि उनमे से ही एक उस सिनेगोग की देखभाल करती हैं । तीसरी जानकारी यह थी कि थाने के बगल वाली दुकान पर एक बर्तन रखा है जिसका नाम सबसे बड़े बर्तन के रूप में लिमका बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड में दर्ज़ है ।

तीन बजने में समय था सो बर्तन देखने चला गया । बर्तन सच में बड़ा था । फिर उस पुलिस वाले के बताए घर की ओर चला गया । वहाँ एक दुकान थी हैंड मेड कढ़ाई के समान की । मैं उसके भीतर गुस गया । वहाँ एक लड़का दुकान पर था उससे मैंने बात की कि मुझे साराह से मिलना है । लड़का उखड़ ही गया उसने कहा जाओ । वह अब किसी से नहीं मिलती । मैं बहुत उदास हो गया । फिर जब मैं निकलने लगा तो खिड़की पर नज़र पड़ी एक पोपले मुंह वाली स्त्री बैठी थी खिड़की के पास ।

तब तक तीन बज गए थे । सिनेगोग के खुलने का समय हो रहा था । मुझे विश्वास था कि वहाँ तो पाँच में से कोई न कोई जरूर आएगा । वहाँ तो फोटो लेना मना था ही ऊपर कोई भी यहूदी नहीं आया/आयी । काफी देर बैठने के बाद और देसी गाइडों द्वारा विदेशी तो विदेशी देसी को भी ठगते हुए देखने के बाद मैं उदास होकर चल दिया ।

मैं फिर से उस उम्मीद में उस दुकान के पास जाकर खड़ा हो गया जो साराह के घर में थी । इस बार दुकान पर काम करने वाला लड़का बाहर आया और मुझे भीतर ले गया । यह वैसी बात थी जिसकी मैंने उम्मीद भी नहीं की थी । मैंने साराह की तस्वीर ली ।

साराह काफी बूढ़ी हो गयी हैं पर मलयालम , अङ्ग्रेज़ी , हिब्रू और हिन्दी बोल लेती हैं । हिब्रू के अलावा सभी भाषाओं में मैंने भी थोड़ा बहुत जवाब दिया । मैं बस उनको सुनना चाहता था । मैं बस इसका अंदाजा लगाना चाहता था कि उनके मन में इस उम्र में क्या चल रहा है । उनसे हुई बातचीत पर विस्तार से लिखुंगा अलग से । फिलहाल इतना ही !

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