जनवरी 27, 2016

अपना अपना काम



चेन्नई हवाई अड्डे के बाहर 13-14 बरस का एक लड़का मिला । चेहरे की हवाइयाँ उडी हुई और आँखों के आसपास रोने के निशान ! मैं उसकी ओर ध्यान भी नहीं देता यदि उसने अपने पिता को फोन करने के लिए मेरा फोन नहीं मांगा होता ।

उसके पिता किसी दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में थे , वह दवाई लेने चेन्नई आया था । ऑटो वाले ने उसे लूट लिया । उसके पास फोन, लैपटाप आदि सब थे पर सब छीन लिया गया । उसने हवाई अड्डे के पुलिस वालों से शिकायत भी की लेकिन हमारे अलग अलग प्रकार के पुलिस वाले तो अलग अलग देशों की तरह व्यवहार करते हैं न । सो उन्होने उससे कहा कि जहां घटना हुई वह तो राज्य पुलिस के दायरे में आता है ।

इस बीच उसने जो दो फोन नंबर दिए थे वे भी सेवा में नहीं बताए जा रहे थे । मतलब एक पूरी सेटिंग बन गयी थी जिसके बाद मैं ही पहल करता और मैंने किया भी - तुमने खाना खाया ? उसने खाना नहीं खाया था । खाने की बात पूछते ही उसे लगा कि मैं उसकी मदद कर सकता हूँ । उसने अपने पिता की दवाई के लिए कुछ पैसे माँग लिए । मैंने दे भी दिए ।

रूपय देते देते समय मेरे मन में दो भाव थे । पहला तो यही था कि यह बच्चा मुश्किल में है इसकी मदद होनी चाहिए । पर दूसरा साफ कहता था कि यह बच्चा झूठ बोल रहा है । इतनी सारी त्रासदी इसी इसी लड़के के साथ नहीं हो सकती , और इसके बाद वह यहाँ हवाईअड्डे पर क्या कर रहा है आदि बातें दूसरे भाव का समर्थन भी कर रहे थे ।

मुझे दोनों ही स्थितियों में पैसे देने में कोई दिक्कत नहीं थी । मैं यह मानकर भी चलूँ कि उसने मुझे धोखा दिया तो भी मैं खुश हूँ । यदि मैं लोगों पर अविश्वास ही करता रहूँ तो किसी पर विश्वास कर ही नहीं पाऊँगा । उस हालत में तो मुझसे किसी जरूरतमन्द की भी मदद नहीं हो पाएगी । जान -बूझ कर भी यदि मैंने उसे पैसे दिए तो उसकी खुशी इसी लिए है ।

अंत में यह भी कि, सब अपना - अपना काम करते हैं । किसी के बुरा होने या करने के कारण मैं अपना काम तो नहीं छोड़ सकता न ।

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