जनवरी 27, 2016

उम्मीद




यह कबूतर के बच्चे के साथ मेरी सेल्फ़ी है ... सेल्फ़ी शब्द इतना चल पड़ा है कि इसे लिखते या बोलते हुए मन उसी तरह झिझकने लगता है जैसे व्हाइ दिस कोलावेरी , कोलावेरी , कोलावेरी डी सुन कर होता था / है ।

कुछ दिनों पहले की बात है , मैं घर से लौट रहा था काम पर । उसी सिलसिले में कुछ समय के लिए दिल्ली रुकना हुआ । जब समय कम हो तो आप अपने पुराने ठीहों पर अपने दोस्तों से शायद ही मिल पाते हैं ! मैंने भी दोस्तों को दिल्ली विश्वविद्यालय या उसके आसपास के बजाय कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क बुला लिया ।

अभी अभी सुबह ही हुई थी वातावरण पर खास सुबह का रंग और असर था जो दिल्ली में अमूमन दिखने को नहीं मिलता । बरहखंभा रोड मेट्रो स्टेशन वाली सड़क के ऊपर कहीं पर सूरज टिका हुआ था जो पार्क में बने झरने के ऊपर के पुल के बीचोबीच खड़े होकर देखने से ठीक नाक की सीध में लग रहा था । इतना ही नहीं सूरज ने अपने नीचे के पूरे वातावरण को अपने अंदाज में इस कदर बदल दिया था कि किसी भी मकान / दुकान की कोई ख़ास छवि नहीं बन रही थी सब सूरज के रंग में ही रंगे थे ।

पार्क के भीतर एक दो लोग कसरत कर रहे थे , कुछेक दिल्ली की भागदौड़ में स्कूल , कॉलेज या काम पर जाने से पहले प्यार के हसीन लम्हों को जी रहे थे । और कुछ उन्हें ही देखे जा रहे थे जो सबकी नज़र बचा कर भी एक छोटे से किस के लिए तमाम मेहनत कर रहे हों ।

मैं जहाँ खड़ा था उसके ठीक नीचे कृत्रिम झरना था । उसके बंद होने के बावजूद मुझे वहाँ खड़ा होने में मजा आ रहा था । वहाँ ढेर सारे कबूतर थे और कुछ कौव्वे भी । कबूतर इधर उधर से कुछ कुछ चुनकर खाते फिर उनका पूरा झुंड एक साथ फर्र की आवाज करते हुए एक गोल चक्कर लगाने उड़ जाता । इसी दौरान मैंने देखा कि एक कबूतर पानी में तैर रहा है । मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । मुझे लगा कि यह तो जीव विज्ञान और उसके अनुकूलन की दिशा में एक नया आयाम है । पर अगले ही पल मेरा आश्चर्य उड़ गया । वह कबूतर पानी में गिर गया था और डूबने से बचने की जुगत में था ।

उस कबूतर के ऊपर कव्वे मंडराने लगे और एक चील तो बिलकुल उसके पास तक गोता लगाते हुए चली आई । मैं उस कबूतर को बचाना चाह रहा था पर वह जहाँ था वहाँ से उसे किनारे तक लाना एक बड़ी मुसीबत थी । इधर उधर नज़र दौड़ाई तो एक लंबा डंडा मिल गया । जब मैंने नीचे जाकर डंडे से उस कबूतर को अपनी ओर खींचना शुरू किया उस समय कई कव्वे पता नहीं कहाँ से मेरे आसपास आ धमके । बहरहाल किसी तरह मैंने उस कबूतर के बच्चे को पानी से निकाल लिया । उसका बदन पूरा भींगा हुआ था और ज़ोरों की कंपकंपी थी उसमें ।

उस झरने के पानी से बाहर ढेर सारे कबूतर दना चुग रहे थे मैंने उसे उनके बीच ही रख दिया । पर मेरे हटते ही कबूतर उड़ गए और उनका स्थान कौव्वों ने ले लिया जो उसे नोच डालना चाहते थे । वह बच्चा कबूतर उड़ भी न पाये । अंत में मैंने उसे सेंट्रल पार्क के गेट पर खड़े गार्ड के पास रखने का निश्चय किया । मैं जब उसे ले जा रहा था तो एक चील ने झपट्टा मारा । सही समय पर यदि मैंने हाथ न हटाया होता तो कबूतर उस चील के पंजे में होता । इतने नजदीकी हमले से कबूतर बहुत घबरा गया और मेरे हाथ में फंसा उसका शरीर ज़ोरों से काँपने लगा ।

अच्छी बात यह रही कि गार्ड उसकी देखभाल के लिए राजी हो गए । आज मैं यहाँ केरल में हूँ । मुझे नहीं मालूम कि उस कबूतर के बच्चे के साथ क्या हुआ होगा । पर मैं यह नहीं सोचता हूँ । मुझे मालूम है कि उसके साथ बहुत सी मुश्किलें पेश आयीं होंगी । नीचे कुत्ते और बिल्लियों का खतरा तो ऊपर कव्वे और चील का । पर उम्मीद करता हूँ कि वह बच गया होगा ।

अपने हिस्से का काम कर तो दिया है बाकी तो बस उम्मीद ही है ।

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