जनवरी 27, 2016

अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले



निदा फ़ाजली ने एक गद्य लिखा है जो 'अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले' नाम से हमारे यहाँ दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में लगा है । यह गद्य क्रमशः कम होती मानवता के बारे में है । हम अपने समान दूसरे मनुष्यों के प्रति असंवेदनशील तो हुए ही हैं साथ ही पशु - पक्षियों , पेड़ - पौधों के लिए अपने मन में सहानुभूति की कोई गुंजाइश नहीं रहने दी है ।

जब भी मैं यह गद्य पढ़ाना शुरू करता हूँ तो निदा का ही एक दोहा जरूर कहता हूँ , जो अपने एम ए के दिनों में उर्दू विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित मुशायरे में उनसे ही सुना था । तब सेलफ़ी का जमाना नहीं था अन्यथा इस बात के प्रमाण स्वरूप उनके साथ अपनी तस्वीर जरूर डाल देता । बहरहाल दोहा कुछ इस तरह है -
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान 
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान


पहली बात तो यह कि इस दोहे को यहाँ पर समझाना बड़ा कठिन है लेकिन जब एक बार वे समझ लेते हैं तो बात बहुत तेजी से आगे बढ़ जाती है । क्योंकि जिस प्रकार की धार्मिक जिद यहाँ है वह शायद ही कहीं और देखने को मिले सो धर्म किसी बात को समझने समझाने का बड़ा ज़रिया बन जाता है ।

मैं आगे कहता हूँ कि बस अंदाजा लगाएँ कि आपके यहाँ हर गली - नुक्कड़ पर खड़े मंदिर , मस्जिद और चर्च कितनी बड़ी संख्या में हैं और इस बात का भी अंदाजा लगाएँ कि देश या आपके ही राज्य में कितने लोग बेघर हैं । यदि उन बेघरों को उनमें रहने दिया जाये तो देश की कितनी बड़ी समस्या हल हो जायेगी ।

इस स्थिति तक आते आते मैंने हर साल देखा है कि कक्षा बहुत शांत हो जाती है लगभग निस्तब्द्ध ! फिर एक बात उठती है हम ऐसा करते क्यों नहीं । तो हमारे छात्र लगभग एक से उत्तर देते हैं चाहे किसी भी धर्म के हों । उनके उत्तरों के हिसाब से बेघर लोगों के रहने से मंदिर , मस्जिद और चर्च अपवित्र हो जाएंगे ।

इसके बाद मेरा अगला प्रश्न होता है - मान लो यदि सच में ईश्वर उन जगहों पर रह रहे होते तो क्या वे उन बेघरों को मना करते ?
वे कहते हैं - नहीं ।
मैं फिर पूछता हूँ - क्यों ?
लगभग समवेत उत्तर आता है - क्योंकि ईश्वर सबसे दयावान है वह कभी नहीं चहेगा कि कोई बेघर रहे ।

फिर ईश्वर के नाम पर ही , हम बेघरों को उन स्थानों में रहने से मंदिरों , मस्जिदों और चर्च के अपवित्र हो जाने की चिंता किए बगैर रहने क्यों नहीं देते ? हिन्दू धर्म में तो दलितों के मंदिरों में प्रवेश तक को रोकते हैं , रहना तो दूर की बात है । यहाँ तक आते आते छात्र निरुत्तर हो जाते हैं और मुझे भी लगने लगता है कि यह उनके साथ ज्यादती है ।

मैं निदा के लिखे प्रसंगों की ओर चला जाता हूँ । लेकिन मन में इतना निश्चिंत जरूर हो जाता हूँ कि जो प्रश्न उनके भीतर छोड़ चुका हूँ वे उनसे जरूर लड़ेंगे । शायद उत्तर खोजने की कोशिश करें और न खोज पाये तो भी एक बेघर को उस अपवित्रता वाले चश्मे से नहीं देखेंगे ।

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