मई 07, 2016

पंचायत चुनाव के रंग


अभी बिहार में यदि आप निकलते हैं तो पाएंगे कि चुनाव की ही खबर है । दरअसल पिछले तीन सालों से बस चुनाव और चुनाव का ही शोर है । पहले लोकसभा चुनाव फिर विधानसभा चुनाव और पंचायतों के चुनाव जिसमें स्थानीय प्रतिनिधि चुनने की बात है । चुनाव ही चुनाव देख रहे हैं लोग । पहले बड़ा फिर मझोला और अंत में छोटा चुनाव ।

चुनाव दर चुनाव लोग सफर करते जा रहे हैं । कुछ लोकसभा चुनाव में 5 साल के लिए अपना वारा न्यारा करवा चुके , उससे ज्यादा लोग विधान सभा चुनाव में और सबसे ज्यादा लोग इस पंचायत चुनाव में करवा रहे हैं । सैद्धान्तिक रूप से इन चुनावों का मुख्य उद्देश्य प्रतिनिधि चुनना रहा है और रहेगा लेकिन असली जमीन तो वह आधार प्राप्त करने की है जो पाँच साल तक निर्बाध और निरापद आमदनी और प्रतिष्ठा प्रदान करता रहे । यह सब जानते हैं ।

बिहार में अभी विधान सभा चुनाव जिस चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत हो रहे हैं उसमें यह मजा है कि अलग अलग इलाकों के चुनावों का जायज़ा बड़े आराम से लिया जा सकता है । जायज़ा लेने की बात कहना कुछ ऐसी बात हो जाती है कि मैं कोई पर्यवेक्षक बन गया हूँ । वास्तविकता यह नहीं है । मेरे नानी के यहाँ चुनाव हो चुके हैं , शहर के पास वाले इलाके में दो तीन दिनों में होना है और जहां मेरा गाँव है वहाँ उसके कुछ दिनों के बाद चुनाव होने हैं । एक एक घंटा भी उन जगहों पर दिया जाए तो बहुत कुछ समझ में आने लगता है ।

चुनाव के समय में बाहर निकलने का कभी मौका नहीं मिला था स्थानीय चुनावों में तो और नहीं । इसका सबसे बड़ा कारण था कि मेरे घरवाले चुनाव जैसी प्रक्रिया को अच्छा नहीं मानते थे । वे वोट देते थे और देते हैं लेकिन चुनाव के संबंध में उनकी राय कोई अच्छी नहीं है । वैसे यह पूरे भारत की समस्या है कि चुनाव , राजनीति आदि पर बोलने के लिए बहुत लोग हो जाते हैं लेकिन यदि उसे करने या कम से कम महसूस करने की बात भी हो तो माँ – बाप अपने बच्चों को जो पहली सलाह देते हैं वह चुनावों या राजनीति से दूर रहने की ही होती है । मैं भी इसीलिए लगातार दूर रहा । परिणाम यह रहा कि इसने राजनीति की स्थानीयता को समझने वाली दृष्टि नहीं प्राप्त होने दी  न ही, इसने स्थानीय पकड़ ही बनाने दी ।

मैंने अब तक केवल सुना था कि चुनावों में पैसे बाँटे जाते हैं , चुनाव से पहले की रात को माँस और शराब परोसी जाती है लेकिन मैंने कभी ऐसा देखा नहीं था और शामिल हो पाने की तो बात ही नहीं है । लेकिन इस बार का मामला थोड़ा अलग है । नानी के यहाँ जाना हुआ । जब वहाँ पहुँचा तब चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका था और चुनाव से पहले वाले दिन की तमाम विशेषताएँ वहाँ पसरी हुई थी । बाहर से शांत दिख रहा गाँव केवल तेज़ पुरबा हवा के शोर को ही सुना रहा था । लेकिन यह स्थिति ज्यादा देर नहीं बनी रही । थोड़ी ही देर में अलग अलग प्रत्याशी आने लगे । कोई वार्ड सदस्य के लिए खड़ा है तो कोई पंच के लिए कोई सरपंच के लिए कोई पंचायत समिति के लिए लेकिन सबसे बड़ा जलवा था मुखिया प्रत्याशियों का । यह चुनाव प्रचार ही था लेकिन इसे चुनाव आयोग देख ही नहीं सकता । चुनाव आयोग वाले जब पटना में बैठे अपनी दोपहरी बिता रहे होंगे तब उनकी नजरों से बहुत दूर एक गाँव में घर घर जाकर प्रचार का यह काम हो रहा था ।

एक एक पद के कई कई प्रत्याशी खड़े थे । समीकरणों के इतने रूप कि बीजगणित के सारे सिद्धान्त भरभराकर गिर जाएँ । हर कोई जीत रहा था । हर कोई अपने को होड में मान रहा था । कुछ प्रत्याशी केवल इसलिए खड़े थे कि किसी खास व्यक्ति को हराना है । पूर्व की लड़ाइयों का बदला निकालने का इतना बढ़िया समय । मुखिया और सरपंच आदि के लिए तो दायरा बड़ा होता है लेकिन वार्ड सदस्य के लिए बहुत छोटा । मैं जिस वार्ड में बैठा था उसकी जनसंख्या करीब 300 लोगों की होगी और उनमें से मतदाता होंगे करीब डेढ़ सौ । उतने छोटे हिस्से में 6 प्रत्याशी । सबने एक एक परिवार के एक एक मतदाता को टटोल रखा है कि उसका मत किसको जाना है । और जिसने मत नहीं दिया उससे दुश्मनी का एक नया अध्याय शुरू हो जाये तो कोई नयी बात नहीं होगी । उसी समय एक बात उठी कि एक स्त्री किसी काम से शहर चली गयी है । वार्ड सदस्य प्रत्याशियों की ऐसी हालत हो गयी कि कुछ नहीं कह सकते । अफरा तफरी में एक प्रत्याशी ने बाजी मार ली उसने उस स्त्री को शहर से बुला लाने और वापस भेज देने का प्रस्ताव दे दिया । परिवार ने यह प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया । एक एक मत इतना महत्वपूर्ण हो तो उसे प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जाने का मामला तो बन ही जाता है ।

बाजार पूरा गरम था कि मुखिया प्रत्याशी गाँव में पैसे बाँट रहे हैं । मैंने सुना तो मुझे लगा कि फर्जी बात है यह लोग बस अफवाहें उड़ा रहे हैं । चुनावों के समय अफवाह उड़ते भी खूब हैं । लेकिन उस समय मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी जब मेरे एक भाई ने अपनी जेब से पाँच पाँच सौ रूपय के कुछ नोट निकाल कर दिखा दिए । किसी ने कहा अभी तो कुछ नहीं हुआ है आज तो रात भर खेल होगा । वहीं किसी ने बताया कि कल चुनाव प्रचार का आखिरी दिन था और कल ही देखने लायक था मुखिया प्रत्याशियों का रंग । रैली नहीं रैला की शक्ल में घूम रहे थे सारे प्रत्याशी । कई कारें थी काफिले में । मुखिया के चुनाव में कारों का काफिला एक ऐसी बात है जो शायद ही पच पाये और यह ऐसा नवाचार है जो आगे और देखने को मिलेगा । उस बीच किसी ने कहा कि इस बार जितने भी मुखिया प्रत्याशी हैं उनमें से कोई भी दस लाख से कम खर्च नहीं कर रहा है ।

रात का खाना खाने का वक्त आया तो मेरी थाली में मांस परोसा गया और कहा गया कि यह वहीं से आया है । अब मैं इस वहींको देखने के लिए उत्सुक हो उठा कि भाई ऐसी कौन सी जगह से यह आया है । खाना खाने के बाद जब मैं उस जगह गया तो वहाँ का नज़ारा धार्मिक धारावाहिकों में दिखाये जाने वाले दृश्यों जैसा था - आनंद से सराबोर ! हंसी ठट्ठे से भरी हुई उस जगह पर एक बड़े बर्तन में पका हुआ मांस रखा था और बिहार की इस शराबबंदी के समय में शराब भी थी । यह सारा खर्च किसी खास प्रत्याशी द्वारा किया गया था । उस पंचयत में ऐसे आयोजन और प्रत्याशियों ने किए थे ।


रात भर होते रहे आयोजन का असर मत देते समय या मतों की दिशा बदलने में जरूर ही कारगर हुआ होगा और इस बात की भी संभावना है कि बहुतों इसके बावजूद किसी और को मत दिया होगा । चुनाव लगातार हो रहे हैं और सुनने में आ रहा है कि अगले साल शहरी निकायों के चुनाव हैं ! 

अप्रैल 23, 2016

विकास का बिहार मॉडल


किसी भी स्थान पर सरकार की आलोचना करने वाले लोग सरकार की प्रशंसा करने वालों के मुक़ाबले ज्यादा संख्या में होते हैं । होने भी चाहिए अन्यथा सरकारी कामकाज पर उंगली नहीं उठेगी । उंगली नहीं उठी तो सरकारें निरंकुश हो जया करेंगी । लेकिन इसका आज के समय में सीधा अर्थ यह लिया जाता है कि सरकारों की आलोचना ही की जाए । 

यह एक तरह से स्वाभाविक भी हो जाता है । क्योंकि बिहार जैसे राज्य में जहां सुविधाओं की इतनी कमी है वहाँ जब सुविधाओं को लेकर जागरूकता ज्यादा तेज़ी से अपना विस्तार करने लगे तो उपलब्ध सुविधाओं पर दबाव बढ़ता है और यह दबाव सीधे सरकारी कामकाज पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है ।

यह तो मानी हुई बात है कि बिहार विकास के तय मानकों पर वहाँ नहीं ठहरता जहां देश के बहुत से अन्य राज्य आते हैं । शहरीकरण , शहरों के रखरखाव , औद्योगीकरण और उसके आधार पर यदि रोजगार सृजन की बात करें तो राज्य में इसका बड़ा अभाव दिखता है । उद्योग धंधों की राज्य से कई अपेक्षाएँ हैं और राज्य उन्हें पूरा करने की स्थिति में नहीं है । फिर राज्य का अतीत उसका पीछा नहीं छोडता ।

बिहार के नागरिक के तौर पर एक व्यक्ति अपने राज्य से बाहर जो महसूस करता है वह शायद ही किसी और राज्य के लोग करते हों । बिहार को दूसरे राज्यों के लोग एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं वह भी इसलिए कि वे अपने वर्तमान को ढँक सकें या अपने अतीत या वर्तमान के लिए एक मिसाल दे सकें । बिहार की यह तस्वीर बाहर ज्यादा घूमती फिरती है । आलोचना होनी ही चाहिए और उसे स्वीकार करने की हिम्मत होनी ही चाहिए । क्योंकि आलोचनाएँ ही वास्तविक कमियाँ दिखाती हैं । उन्हीं के आधार पर यदि कमियों को दूर करने के लिए कोई कृत संकल्प है तो वह काम कर सकता है । लेकिन यह आलोचना होनी कैसी चाहिए यह एक बड़ा प्रश्न है । यदि आलोचना पूर्वाग्रह से निर्दिष्ट हों तो उस आलोचना का कोई मूल्य नहीं है । क्योंकि वह वास्तविक आलोचना के बदले कुछ सतही और गैर-जरूरी सवाल उठा कर ही समाप्त हो जाती है । उस तरह की आलोचनाओं का उद्देश्य केवल क्षणिक लक्ष्यों को प्राप्त करने तक ही सीमित रहता है । बहरहाल यहाँ आलोचना किस तरह की हो यह समझाना उद्देश्य नहीं है बल्कि बात को उस ओर ले जाना है जहां से यह समझ सकना आसान हो जाये कि बिहार सरकार की प्रशंसा भी की जानी चाहिए ।


कोसी नदी बिहार का शोक थी और है । इस नदी पर बांध बनाकर और दूर दूर तक नदी को बांध देने के बाद भी इसकी विभीषिका पर नियंत्रण लगा पाना पूर्णतः संभव नहीं हुआ है । नदी ने अपना मार्ग बदलकर पिछले दिनों भयंकर तबाही मचाई और नई पीढ़ी के जेहन में भी अपने नाम की छाप छोड़ी । अब नयी पीढ़ी के लोग भी अपनी आने वाली पुश्तों को यह बताते रहेंगे कि कोसी बिहार का शोक है और वे खुद झेल चुके हैं ।

ऐसी कोसी नदी के तटबंध की बात करते हैं । नेपाल से बिहार में प्रवेश करती हुई कोसी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों के बीच सहरसा और सुपौल जिले के सैकड़ों गाँव बसे हैं । उन तटबन्धों के उस पार भी सैकड़ों गाँव होंगे । जो दरभंगा जिले में आते हैं । कोसी तटबंध के तुरंत बाद कमला नदी का तटबंध शुरू हो जाता है । इस तरह से देखा जाये तो एक बड़े दायरे में ये तटबंध फैले हैं और इनके भीतर व इनके पार लाखों की आबादी बसती है । आबादी का यह विस्तार नदियों के फ़्लड प्लेन में आता है । जिसका अर्थ है कि वहाँ हर साल पानी भर जाना एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया है । विकास के सभी मानकों पर देखा जाए तो ये गाँव काफी पिछड़े लगते हैं । लेकिन जब बाढ़ का पानी हटता है तब उपज बड़ी शानदार होती है । समय और पानी की अवस्था व उपलब्धता के आधार पर लोगों ने अपना ही फसल चक्र विकसित कर लिया है । इससे एक बड़ी उपज मिल जाती है । ऊपरी तौर पर देखें तो यह इलाका काफी समृद्ध माना जा सकता है । लेकिन दूसरे समाजर्थिक पहलू इसे उतने समृद्ध नहीं ठहराते थे । इसकी सबसे बड़ी वजह थी इन गाँवों का मुख्य भूमि से कटा हुआ होना ।

सहरसा और दरभंगा नामक दो शहरों के बीच यदि सीधी रेखा खींची जाये तो यह दूरी दो घंटे में पूरी की जा सकती है । साथ में यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि यह सीधी रेखा कोसी और कमला के तटबंधों के बीच से ही गुज़रेगी और इस बीच नदियों की पचास से ऊपर धाराएँ हैं जो ऐसी किसी भी सीधी रेखा को सफल न होने देने के लिए पर्याप्त हैं । नदियों की इन्हीं धाराओं के आसपास की ऊंची जमीन बस्तियों के काबिल हो गयी और बाढ़ के पानी से निथरी जमीन उपजाऊ खेत में बदल गए ।

अब थोड़ा विचार तटबंध के भीतर के जीवन पर । सहरसा, सुपौल आदि जिले जहां कोसी का कहर बना रहता है वहाँ बांध के भित्तरमुहावरे का प्रचलन  उन गाँवों के लिए किया जाता है जो तटबंध के भीतर हैं । अब इस मुहावरे की व्यंजना देखिए । बांध के भित्तर माने ऐसा इलाका जो स्थानीय शहर तक से केवल नाव और पैदल संपर्क के जरिये ही जुड़ा हुआ हो । नाव भी इस तरह नहीं कि एक नाव पर चढ़े और नदी पार कर के शहर आ गए । ऐसे भी गाँव हैं लेकिन बात उन सुदूरवर्ती गाँवों की जरूरी है जहां से शहर आने के लिए कम से कम बीस बार नाव की सवारी करनी पड़े । उन गाँवों के बारे में कहा जाता है कि वहाँ यदि साँप काट ले तो लोग प्रभावित व्यक्ति को आँगन में लिटा कर उसके चारों तरफ अगरबत्ती जला देते हैं और उसके मरने की प्रतीक्षा करते हैं । क्योंकि वैसे भी मुख्य अस्पताल जहां सर्पदंश का इलाज़ है वहाँ तक पहुँचते पहुँचते उसकी मृत्यु निश्चित है । इसलिए कोई फायदा नहीं है इतने कष्ट उठाने का । हो सकता है यह अतिशयोक्ति हो लेकिन उन गाँवों से शहर तक इलाज़ के लिए आना टेढ़ी खीर तो है ही । ऐसे ही इलाकों में यदि लोग बाहर से चले जाएँ तो अपने को अवश्य ही फंसा हुआ महसूस करेंगे ।

लेकिन यह स्थिति बड़ी तेज़ी से बदल रही है । जिसका श्रेय सौ फीसदी सरकार को जाता है । राज्य की सरकार ने पिछले 7-8 सालों में इस इलाके को बदल कर रख दिया है । हालांकि यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन अपने 80 प्रतिशत के बल पर ही इसने तटबंध के भीतर की स्थिति को बदल कर रख दिया है । ऊपर सहरसा से दरभंगा के बीच जिस काल्पनिक सीधी रेखा की बात की गयी है वह काल्पनिक नहीं है बल्कि वही रेखा यह तस्वीर बदल रही है ।

सरकार ने इस सड़क को बनाने का काम युद्ध स्तर पर चला रखा है और काम दोनों ही तरफ से हो रहा है । थोड़े से हिस्से को छोड़ दें तो काम पूरा हो चुका है । जो बचा है उसके भी 2017 तक खत्म हो जाने की उम्मीद है । यह एक ऐसी सड़क है जिस पर पुल ही पुल दिखते हैं जो कोसी और उसकी सायहक धाराओं पर बनाए गए हैं । उस सड़क पर इतने तो पुल ही बन गए हैं कि साधारण लोग भी पुल और सड़क बनने की सामान्य प्रक्रिया बता सकते हैं । जब भी कोई यह अजूबा देखने उस ओर जाता है स्थानीय लोग उसे अपने ही तरीके से सड़क बनाने और पुल बनाने की प्रक्रिया समझाते हैं । यह सुनने में हास्यास्पद लग सकता है लेकिन सच यही है ।

अब देखते हैं इसके प्रभाव को । जिन नदियों को केवल नाव और तैर कर ही पार किया जा सकता था उनके ऊपर पुल बन जाने से जीवन कितना सरल हो सकता है इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है । सड़क के किनारे फूस के लंबे से झोंपड़े में कोई पब्लिक स्कूल सह कोचिंग सेंटर चलता है उसमें खरामा खरामा चलती बैलगाड़ी से बच्चे पढ़ने आने लगे हैं । यह शिक्षा का कोई आदर्श रूप नहीं है लेकिन शिक्षा की पहुँच को इस सड़क ने जिस तरह से सुनिश्चित किया है वह कबील ए तारीफ है । सरकारी विद्यालय भी अपने नवीन रूपों में खड़े नजर आते हैं जिसकी कल्पना दस साल पहले नहीं की जा सकती थी ।


सड़क के दोनों ओर मक्के की फसल और कहीं कहीं गरमा धान की खेती , सड़क पर कहीं कहीं  नदियों से निकाली हुई ताज़ा मछलियाँ , कहीं पानी के बड़े गड्ढे में लहलहाते कमल के फूल यह रौनक है अब वहाँ । मुख्य सड़क से  नीचे छोटी छोटी सड़कें निकाल दी गयी हैं जो गाँवों को उस सीधी रेखा से जोड़ती है जो अब दोनों शहरों तक जाती है । जहां से छोटी सड़कें शुरू होती हैं वे छोटे और नए लेकिन भविष्य के बड़े व्यापारिक केन्द्रों के रूप में उभर रहे हैं । वहाँ अभी छोटा ही सही लेकिन एक बाज़ार जरूर विकसित हो रहा है । यह ऐसी स्थिति है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी । तटबंध के भीतर बस्ने वाले लोग सोच भी नहीं सकते थे कि उनके दिन इस तरह फिरेंगे । अब  लोग अपनी फसल को शहर तक ले जा सकते हैं । अपने लिए बेहतर स्वस्थ्य सेवाओं को प्राप्त कर सकते हैं ।

इसके साथ साथ दूसरी जरूरी बात करनी है विकास के मॉडल की । जिस तरह से इस सड़क ने अपना स्वरूप लिया और तटबंध के भीतर बसे गाँवों की दशा को बदलना शुरू किया वह विकास के किसी भी मानक में फिट बैठता है । इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि आसपास के गाँवों ने विकास की कीमत चुकाई है । हालाँकि ऐसा कहने के लिए यह सही वक्त नहीं है क्योंकि इसके प्रभावों पर विचार करने के लिए एक लंबे अध्ययन की आवश्यकता है लेकिन फौरी तौर पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि इसने गाँवों के मूल रूप से छेड़छाड़ नहीं की है । इसका सबसे बड़ा कारण है गाँवों का सड़क से दूर होना । सड़क से दूर बसे गाँव सड़क से जुड़े जरूर हैं लेकिन सड़क पर नहीं हैं । विकास का यह स्वरूप ज्यादा प्रिय लगता है जहां गाँव गाँव रहते हैं लेकिन उन तक सुविधाएं सभी पहुँच जाती हैं ।  एक संरचना को तोड़ कर किया जाने वाला विकास जड़ें खोदने वाला विकास होता है । 

सरकार ने जिस तरह ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी है वह महत्वपूर्ण है । विकास का साधारण अर्थ लिया जाता है शहरों का विकास , वहाँ की चमक दमक लेकिन बिहार के शहर आपको इस बात पर निराश ही करेंगे । वहाँ देखें तो विकास की गति काफी धीमी नजर आती है या न के बराबर विकास भी दिखाया जा सकता है लेकिन उसकी कीमत पर जहां विकास दिखता है वह संतोष प्रदान करने वाला है । शहरों को तो ठीक ठाक सुविधाएँ मिल ही जाती हैं लेकिन बहुत सी सुवधाओं से जो गाँव वंचित थे उन्हें सुविधा प्रदान करा देना बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है । 


सरकार को वहाँ अभी बहुत से काम करने हैं । अगली जरूरी बात है सुदूर गाँवों को बिजली उपलब्ध करवाना । इसके साथ ही छोटी सड़कों के नेटवर्क में विस्तार करना और बिहार  सरकार की एजेंसियां इसमें लगी भी हुई हैं । इसके बाद ये ऐसे गाँव होंगे जो अपने नदियों के जाल से पर्यटन की एक नयी राह खोल सकते हैं । हालाँकि यह दूर की कौड़ी लगती है लेकिन आज से पंद्रह साल पहले वह सीधी रेखा भी ऐसी ही लगती थी । 

अप्रैल 18, 2016

बचा खुचा मनुष्य



दिल्ली से बिहार की ट्रेन पकड़ी थी घर आने के लिए और आ भी गया । यह कोई बड़ी बात नहीं । बड़ी बात तो यह भी नहीं की ट्रेन में बहुत भीड़ थी । साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि भयंकर गर्मी और भीड़ ने ट्रेन यात्रा को दुरूह और कष्टकर बना दिया तो यह भी कोई नयी बात नहीं होगी । क्योंकि ऐसी बातें नयी नहीं होती आजकल । इनमें से यदि कुछ नहीं हुआ होता तो शायद कह सकते थे कि नयी बात हुई है ।

जब मैं आनंद विहार स्टेशन पर ट्रेन में दाखिल हो रहा था तभी मुझे लग गया कि यह यात्रा यादगार रहने वाली है । क्योंकि सीमांचल एक्स्प्रेस के कुछ घंटे की देरी से चलने की घोषणा हो रही थी । इस घोषणा का अर्थ हुआ कि जो वेटिंग टिकट वाले हैं वे नॉर्थ ईस्ट एक्स्प्रेस की ओर ही रुख करेंगे । जो भीड़ बंटी हुई थी दो ट्रेन के बीच वह अब एक ही ट्रेन की हो गयी । वेटिंग जिनका हो उनके लिए ट्रेन से ज्यादा जल्दी से जल्दी अपने गंतव्य या उसके करीब पहुँचना जरूरी हो जाता है । सो जब तक मैं अपनी सीट पर पहुंचा वहाँ एक परिवार ने कब्जा जमा रखा था । केवल सीट ही नहीं बल्कि सीट के नीचे का स्थान भी उनके सामानों से अट गया । यही हाल दूसरी तरफ भी था । और एक बार नजर दौड़ाई तो मालूम चला ऐसा हर कम्पार्टमेंट में है । हर कहीं से उठो यहाँ से’’हटाओ अपना समान अरे भैया बैठने दीजिए , हम भी तो पैसे दिए हैं न यही शोर उभर रहा था । कहीं धमकी दी जा रही थी तो कहीं लेडीस को बैठा लेने की गुहार लगाई जा रही थी । इस बीच मेरे वाले हिस्से में जिनकी सीट पहले से ही आरक्षित थी वे सब आ गए । अब ऐसी स्थिति आ गयी कि लगा वह कम्पार्टमेंट ही युद्ध का स्थान बन जाएगा । वेटिंग टिकट वालों ने जो सामान सेट कर रखा था वह निकाला जाने लगा और सीट वालों के समान लगाए जाने लगे । एक परिवार जिसने दो तीन सीटों पर कब्जा जमा रखा था उन्हे उठ जाना पड़ा । उन्होने उठकर दो में से एक शौचालय को अपने कब्जे में ले लिया । देसी ढर्रे के शौचलाय  पर कुछ समान रखकर उसे बैठने लायक बना लेना हम भारतीयों के  जीवट का ही परिचयक है ।


ट्रेन ने जब स्टेशन छोड़ा तब पूरी बोगी की दशा देखने लायक नहीं थी । जहां देखिए बस लोग ही लोग । बहत्तर लोगों के लिए बनाए गए डब्बे में दो सौ से ऊपर लोग भर जाएँ तो आंतरिक दशा सोचनीय ही हो जाती है । खासकर तब जब लोग शौचालयों में भी शरण ले लें । त्योहारों के मौसम में यह आम दृश्य है लेकिन शादी विवाह के मौसम में भी यही दृश्य दिखता है । मतलब भीड़ बहुत थी । ट्रेन चली तो हवा ने थोड़ी राहत पहुंचाई । लगा खोयी हुई ऊर्जा वापस आ रही है । सुबह की ट्रेन के लिए आपको और सवेरे जागना पड़ता है इसलिए नींद के न पूरा होने का डर तो रहता ही है साथ ही वास्तव में भी नींद आने लगती है । मैंने अपनी सीट पर जाम चुके कुछ लोगों को हिला – डुला कर अपने पैरों के लिए जगह बनाई ।  जगह बनते ही नींद ने घेर लिया । उस बोगी में हर पल कुछ न कुछ हो रहा था । लोग अपनी जगह बनाने के लिए हर दूसरे व्यक्ति से झगड़ रहे थे ।


रेलगाड़ी अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी और बढ़ रही थी गरमी और लोगों में प्यास । प्यास के साथ मैंने देखा है कि जब पता चल जाये कि पानी नहीं मिलने वाला है तब यह और बढ़ जाती है । वेंडर पानी भर कर लाते होंगे और वह हमारी बोगी से पहले ही  खत्म हो जाता होगा । कभी एक – दो बोतलें मिलती तो वे लोग उठा लेते रास्ते करीब थे । एक परिवार अपने साथ एक बड़ा सा जग लेकर चढ़ा थे । वे बार बार उसे मयूर जग कह रहे थे । उस परिवार को अंदाजा था कि यात्रा में पानी कि किल्लत होने वाली है । उन्हें पानी पीते हुए जब और लोग देखते तो उन आँखों में उनकी प्यास उतरी हुई दिखती । मैंने नींद और उससे बाहर के शोर में ऐसे ही गोते लगा रहा था । कभी नींद में होना और उससे बाहर सबकुछ वैसा ही सामान्य दिखना मेरे नींद में होने को झुठला रहा था ।


इस बार मेरी नींद खुली एक बड़े शोर से । शोर में एक स्त्री स्वर प्रमुख था जो बार बार यह बता रहा था कि उस शोर में बस गाली है । वह स्त्री किसी को गाली दे रही थी । गालियां बहुत बुरी बुरी निकल रही थी । इतनी बुरी कि बड़े से बड़े गाली देने वाले शरमा जाएँ । माजरा समझ में ही नहीं आ रहा था । लेकिन थोड़ी ही देर बाद पता चला कि उनके मयूर जग की टोंटी किसी ने खोल दी और जबतक लोगों ने समझा सारा पानी बह चुका था । मैंने देखा बहा हुआ पानी कंपार्ट्मेंट की फर्श पर फैला हुआ था । लोग अपना समान खिसका रहे थे , और जो फर्श पर ही पसरे थे वे पुराने कपड़ों से पानी को निपटाने में लगे हुए थे । गाली देते देते उस स्त्री का मन रोआँसा हो गया था । बेचारी थक के चुप हो गयी होगी ।


दोपहर होते होते पानी की किल्लत शुरू हो गयी हमारी बोगी में । ट्रेन जहां रुकती लोग पानी भरने को दौड़ते । मैंने एक बोतल खरीदी थी उसी से ही काम चला रहा था । उस परिवार में 3 बच्चे थे , तीनों ही पानी मांग रहे थे । वह स्त्री अकेले सफर कर रही थी और उसका सारा पानी बहा दिया गया था । अब जो हालात उस कम्पार्टमेंट में थे उसमें शोर तो था ही नहीं । लोग एक दूसरे से नज़रें भी नहीं मिला पा रहे थे । सबको लगता था कि सब एक साथ अपराधी हैं ।


शाम तक आते आते मैंने देखा कि पानी की एक एक बोतल 40 रूपय में बिक रही थी । गरमी के दिनों में भरी हुई ट्रेन की प्यास के आगे चालीस रूपय कोई मोल भले ही नहीं रखते हों लेकिन मनुष्य के बीच से बचा खुचा मनुष्य भी निकाल देने के लिए काफी होता है यह । 

मार्च 15, 2016

कठिन होते जा रहे प्रश्न ...


परीक्षाओं के इस मौसम में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है । अध्यापक , माता-पिता , प्राचार्य और मीडिया के लोग परीक्षा भवन से बाहर आ रहे छात्रों की मुस्कान की चौड़ाई से , उनके आँखों की लाली और  उनमें बसी पानी की मात्रा से छात्र के प्रदर्शन को जाँचने लगे हैं । यदि बच्चा हँस नहीं रहा है तो परीक्षा कठिन हुई होगी , आँखें लाल हैं तो भी वही हुआ होगा और बाहर आते ही रोने वाले छात्रों के बारे में तो कहना ही  क्या ! पहली ही मार्च को अंग्रेजी की परीक्षा थी प्रश्नपत्र सामान्य ही था लेकिन एक प्राचार्य ने संबन्धित अध्यापक से कहा कि छात्र बाहर आते हुए मुस्कुरा नहीं रहे थे ...लगता है प्रश्न कठिन थे और छात्रों ने ठीक से उत्तर नहीं दिए ! माता पिता तो पहले से ही मानकर चलते हैं कि उनके बच्चे शत- प्रतिशत अंक पाने वाले हैं । सो एक अंक का प्रश्न छूट जाने से भी बच्चों से ज्यादा उनका ब्लड - प्रेशर बढ़ जाता है । एक अध्यापक को संबन्धित विषय की परीक्षा के दौरान ऐसी कुछ स्थितियों से दो चार होना पड़ता है ! उस दिन जिसकी चमड़ी जितनी मोटी होती है उसके लिए उतने ही फायदे की बात है ! हाल के दिनों में जब से छात्र परीक्षा परिणाम के डर से अत्महत्या करने लगे हैं तब से परीक्षा के प्रश्नपत्र भी खबर की हैसियत रखने लगे हैं ।

ऊपर की स्थितियाँ देखकर खुशी होती है कि अध्ययन अध्यापन के जीतने भी सहभागी हैं वे और मीडिया सब सचेत हो रहे हैं । वे कम से कम परीक्षा को तवज्जो जरूर देने लगे हैं । खुशी की बात यह भी है कि अब परीक्षा के दिनों में छात्र अकेला नहीं होता है  । शिक्षा के लिए यह यह एक खुशखबरी है । बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है जब परीक्षाओं के दिन केवल छात्रों से संबन्धित होते हैं । छात्रों को प्रवेश पत्र मिल गया , उन्होने तैयारी कर ही ली होगी फिर वे अब पढ़ें और परीक्षा दें । माता –पिता या अभिभावक अखबार से परीक्षा की समय सारिणी काट कर देने और थोड़े से जेबखर्च देने को ही अपना सबसे मूल कर्तव्य मानते थे और उसका निर्वाह कर उन्हें गर्व भी होता था । उस लिहाज से आज की स्थिति वाक़ई खुश करने वाली है कि छात्र की भावनाओं को समझने के लिए उसके आसपास  लोगों से लेकर संस्थान तक मौजूद रहने लगे हैं । लेकिन क्या यह सच में खुश होने का क्षण है ?

बात बारहवीं की गणित की परीक्षा से करते हैं । गणित के प्रश्न  कठिन थे । छात्र बाहर आकर रोये , रोष व्यक्त किया । माता – पिता व अभिभावकों ने बहुत से लोगों को इसके लिए जिम्मेदार माना , प्राचार्यों ने संबन्धित विषय के अध्यापकों को आड़े हाथों लिया, ऑनलाइन शिकायतें हुईं , सोशल मीडिया पर सीबीएसई का मज़ाक उड़ाया गया और  अखबारों ने इन सब पर खबरें बनायीं । सबने अपना अपना काम किया । ऊपर से देखने पर लगता है कि सबकुछ कितना सही हुआ । भारत ऐसा देश बन गया जहाँ प्रश्न पत्र में जरा सी दिक्कत आई और सब हरकत में आ गए । सबने रोष व्यक्त किया और अब सभी सगर्व सीबीएसई पर दबाव बनाएँगे कि गणित के प्रश्नपत्रों की जाँच में ढिलाइ बरती जाये । जिस तरह से सभी स्तरों पर दबाव बनाए जा रहे हैं उसे देखते हुए यह भी तय है कि सीबीएसई या तो कुछ अंक मुफ्त के दे देगी या जाँच में ढिलाइ करने के निर्देश छिपे तौर पर जारी कर देगी । छात्रों के अंक बढ़िया आ जाएँगे । वे खुश , सब खुश ! सबको अपने काम का इनाम छात्रों की मुस्कान में मिल जाएगा ! लेकिन अगले साल भी यही हालत रहेगी । तब गणित की जगह रसायन विज्ञान आ जाएगा या गणित ही आ जाये । फिर से वही सब दोहराया जाएगा । पिछले सालों में यही देखने को मिल भी रहा है । सबका ध्यान फौरी हल निकालने पर है जबकि मूल समस्या अलग है जिसके जूझने की जरूरत कोई महसूस नहीं करता है ।

बारहवीं कक्षा विद्यालयी शिक्षा का अंतिम पड़ाव है जिसे उसका चरम कह सकते हैं । उस पर छात्र के आगे का भविष्य निर्भर करता है । इसलिए यह कक्षा एक गंभीर तैयारी और गंभीर समझ की मांग करती है । छात्र इस कक्षा में आकर वाक़ई अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर हो भी जाते हैं । लेकिन जो तैयारी इस कक्षा के लिए चाहिए वह नहीं हो पाती है । लिहाजा छात्रों पर पूरे साल जबर्दस्त दबाव रहता है । उन्हें इसी कक्षा के अंकों के आधार पर बढ़िया कॉलेज में बढ़िया विषय मिलेंगे । यही कक्षा उन्हें रोजगार के बेहतर  और ज्यादा आमदनी वाले अवसर वाले कोर्स के लिए आधार बनेगी । यह चौतरफा दबाव इसी कक्षा पर होता है । इसलिए इस कक्षा की तैयारी बहुत जरूरी हो जाती है ।  तैयारी की हालत बहुत खराब है और तमाम तरह के शोर में इस ओर ध्यान भी नहीं जाता है ।

\सीबीएसई ने सतत एवं समग्र मूल्यांकन की व्यवस्था की है दसवीं कक्षा तक । इसके तहत छात्रों का समग्र मूल्यांकन लगातार होना है । छात्रों के अंक केवल लिखित परीक्षा पर ही निर्भर नहीं हैं बल्कि उनके आचार व्यवहार से लेकर उनके कला- कौशल तक को भी मूल्यांकन के दायरे में लाया गया ताकि उनसे लिखित परीक्षा का दबाव कम हो सके । इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य से किसी को कोई दिक्कत नहीं है । समस्या इसके तरीके को लेकर भी नहीं है । न ही इसके मूल्यांकन बिन्दु कोई समस्या खड़ी करते हैं । केवल दसवीं तक की शिक्षा तक ही यदि किसी को पढ़ाना हो तो यह बहुत अच्छी मूल्यांकन व्यवस्था होगी । लेकिन समस्या की जड़ है इस मूल्यांकन व्यवस्था का आगे की कक्षाओं पर पड़ने वाला प्रभाव ।

दसवीं कक्षा में मार्च के महीने में सीबीएसई द्वारा ली जाने वाली अंतिम परीक्षा ही एक मात्र परीक्षा है जो बाहर की एजेंसी आयोजित करती है बाकी सब विद्यालय स्तर पर ही हो जाता है । छात्रों के कुल अंक में इस परीक्षा का मूल्य 30 प्रतिशत है शेष 70 प्रतिशत उन्हें विद्यालय स्तर पर ही मिल जाते हैं । आंतरिक मूल्यांकन के 70 प्रतिशत अंक कई भागों में बंटे होते हैं लेकिन उसमें लिखित परीक्षा की भूमिका कम है । बाकी असाइनमेंट और प्रोजेक्ट आदि के अंक हैं । इस तरह छात्रों के ऊपर से वाक़ई परीक्षा का बोझ कम हो जाता है । उन्हें स्थानीय स्तर पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अच्छे खासे अंक मिल जाते हैं । इसका सीधा प्रभाव उनके पढ़ने की आदत पर पड़ा है जिससे  उनकी किसी भी विषय को तैयार करने की क्षमता घटी है ।

इस स्थिति के साथ छात्र ग्यारहवीं में आता है जहाँ पाठ्यक्रम में अभूतपूर्व विस्तार है । नीचे की कक्षाओं के समग्र मूल्यांकन ने उनमें पढ़ने की क्षमता को प्रभावित किया होता है ऊपर से ग्यारहवीं के अंकों का कोई खास महत्व भी नहीं होता सो ग्यारहवीं के छात्र समान्यतया अध्ययन से अरुचि दिखाते पाये जाते हैं । अब जरा समस्या की भयावहता का की कल्पना कीजिये । सबसे पहले विशाल पाठ्यक्रम जो विज्ञान  और सामाजिक विज्ञान पहले एक साथ थे वे अलग अलग हो जाते हैं , भाषा साहित्य का भी विस्तार हो जाता है , अकेले गणित की कई शाखाएँ आ जाती हैं । इसके बाद पिछली कक्षाओं में विकसित हुई कम पढ़ने की आदत और अंत में ग्यारहवीं कक्षा के अंकों का महत्वहीन होना । ये तीनों चीजें छात्रों को बरहवीं कक्षा के लिए तैयार नहीं कर पाती । जिसका दबाव बारहवीं में आते ही दिखने लगता है । छात्रों का खेलना रुक जाता है , वे खाना कम कर देते हैं ताकि नींद न आए ज्यादा और लगातार किताबों में घुसे रहने से आँखों पर भी बुरा असर पड़ता है । छात्रों की यह स्थिति पीछे के सतत एवं समग्र मूल्यांकन से उपजी दबावहीनता की खाट खड़ी कर देती है ।

सबसे दुखद यह है कि यह पूरी प्रक्रिया परिदृश्य से ही बाहर है । इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता । क्योंकि इस ओर ध्यान देना समय की मांग करता है । माता –पिता या अखबार के लिए एक दिन के कठिन प्रश्न पर जिरह कर लेना आसान है । बहुत हुआ तो कोई अभिभावक एक दिन अपने बच्चे के किसी यूनिट टेस्ट में कम अंक आने पर शोर मचा लेता है । फिर उस दिन अध्यापक पर प्राचार्य बरस पड़ते हैं । इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अध्यापक छात्रों की पीछे की तैयारी का रोना रोते रह जाते हैं लेकिन कोई उस ओर ध्यान नहीं देता ।

एक अध्यापक के रूप में मुझे ग्यारहवीं में आने वाले छात्रों को पुराने तौर तरीकों से निकालने में ही काफी समय लग जाता है । उन्हें यह विश्वास ही नहीं होता कि ग्यारहवीं में पहले पाठ के आधार पर साल के अंत में भी प्रश्न आएंगे । नीचे की कक्षाओं में उनकी जो आदत लगी है उस हिसाब से पहला  एफए होते ही ज्ञान का वह भाग उनके लिए निरर्थक हो जाता है । अतः वे उसे अपने जेहन तक से निकाल देने में नहीं हिचकते । मैं दसवीं को भी पढ़ाता हूँ तो वहाँ एफए एक का  कोई संदर्भ यदि दूसरे एफ ए में आता है तो कई बार छात्रों को मुंह ताकते देखा है । कुछ तो खुल के कह देते हैं कि अमुक संदर्भ  बीते हुए एफ ए का था इसलिए हमें नहीं पता ।

अब थोड़ी सी बात प्रश्न पत्रों पर । बाहर तक से आने वाले दसवीं तक के प्रश्न पत्र आवश्यक रूप से बड़े ही सरल होते हैं । उदाहरण के तौर पर अपठित गद्यांश के प्रश्न को लेते हैं । गद्यांश में बताया जाता है कि महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर में हुआ था। नीचे प्रश्न होता है – महात्मा गांधी का जन्म कहाँ हुआ था । भाषा साहित्य के व्याकरण के प्रश्न छठी से लेकर दसवीं तक लगभग एक समान होते हैं । लेकिन बारहवीं के प्रश्न अचानक से काफी गहरे पूछ लिए जाते हैं । जिन छात्रों को आदत लगी है आसान प्रश्न करने की वे थोड़े से घुमावदार प्रश्न देखते ही चिंतित होने लगते हैं । एक दो घुमावदार प्रश्न उनके पूरे आत्मविश्वास को हिलाने के लिए काफी होते हैं । फिर वे परीक्षा भवन से रोते हुए आयें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।

ऊपर कही गयी बातें कोई नयी नहीं हैं । दसवीं से लेकर बारहवीं तक को पढ़ाने वाला कोई भी अध्यापक इस पर लंबी बात कर सकता है । हर वर्ष साँप के गुजर जाने पर ही लकीर पीटी जाती है । शिक्षा के मामले में तो यह लकीर पीटने जैसी बात भी नहीं है । मीडिया के लिए कठिन प्रश्न पत्र एक सनसनी है लेकिन पूरी प्रक्रिया कभी भी उसकी चिंता का विषय नहीं रही है । अध्यापक से ऊपर के लोग सबकुछ अध्यापकों पर छोडकर निश्चिंत हो जाते हैं । नीति बनाने वाले लोग विद्यालय का मुँह देखे बिना यहाँ वहाँ से लायी हुई बातें थोप कर अपने कर्मों की इतिश्री कर लेते हैं । माता – पिता भारत में कभी इतने जागरूक हुए ही नहीं कि वे शिक्षा की प्रक्रिया पर ध्यान दें । छात्र जहाँ तक संभव हो सके मेहनत करने से बचने की कोशिश करते हैं । ऐसे में गणित के कठिन प्रश्नों पर शोर मचा लेना और सीबीएसई द्वारा जाँच में ढिलाइ बरतना खुश करने के बजाय एक खतरनाक स्थिति की ओर संकेत करती है जहाँ हम छात्रों को तैयार करने के बजाय क्षणिक हल निकालने की कोशिश करते हैं ।


मार्च 13, 2016

रामक्कलमेड़ : किवंदन्तियों से बचपन के सपनों तक



पहाड़ की उस अंतिम ऊँचाई से मैं नीचे देख रहा था । नीचे दूर दूर तक फैले खेत थे । खेत यूं कटे हुए थे जैसे लगता था कुछ बच्चों ने खेल खेल में ढेर सारे ब्रेड के टुकड़े करीने से बिछा दिए हों फिर उस पर हरी हरी चटनी डाल रखी हो । खेतों में खड़े नारियल और केले के पेड़ ऊपर से ब्रेड पर बिछाई चटनी की परत जैसे लग रहे थे । वहीं खड़े खड़े यह भी महसूस हुआ कि मैं अपनी छत पर खड़ा पड़ोसी के आँगन में झाँक रहा हूँ । केरल में खड़े पहाड़ की न सिर्फ ऊँचाई की अंतिम सीमा पर मैं खड़ा था बल्कि पहाड़ के सूत भर आगे से तमिलनाडु फैला था । दो राज्यों को अलग करने वाले पहाड़ की चोटी का रोमांच अलग था और डर अलग । 

मैं वहाँ से गिरता तो यकीनन तमिलनाडू में ही लेकिन जीवित नहीं बचता । पश्चिमी घाट की चोटियों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि आसपास में सबसे ऊंची चोटी सबसे अलग थलग ही खड़ी होती है । इसलिए उस पर चढ़ते हुए जरा भी आभास नहीं हुआ कि दूसरी तरफ़ से पहाड़ थोड़ा थोड़ा ढलते हुए नहीं उतरता है बल्कि दीवार की तरह खड़ा ही रहता है । दूसरे कोण से देखने पर वह हिस्सा ऐसा लगता है जैसे उससे लगा कोई और पहाड़ हो जो कहीं चला गया हो ।

उस ऊँचाई पर हवा बहुत तेज़ थी लेकिन धूप उससे भी तेज़ । जितनी मशक्कत से मैं ऊपर चढ़ा उससे ज्यादा मशक्कत मुझे वहाँ बने रहने में करनी पड़ रही थी । इसके बावजूद वहाँ सबसे ऊँचे बिन्दु पर होने का एहसास अलग ही आनंद दे रहा था । चोटी अपेक्षाकृत चौरस थी और उसका विस्तार इतना था कि तीस चालीस लोग एक साथ सो सकते हैं । पर वहाँ सोने की हिम्मत कौन करे ! वहाँ मेरा होना मुझे इतना सुकून दे रहा था कि मैं वहाँ जितनी देर रहा उतनी देर पहुँचने में लगी मेहनत और वापसी की आनेवाली मुश्किलों से बिलकुल निश्चिंत ही रहा ! एक तरफ़ खुले खेत और दूसरी तरफ़ एक साथ लगी कई सारी पहाड़ी चोटियाँ । यह रामक्कलमेड़ था ।

रामक्कलमेड़ के बारे में कहा जाता है कि त्रेता युग में वहाँ रामचंद्र अपने भाई लक्षमण के साथ सीता को खोजते खोजते गए । किंवदंती यह भी है कि जिस सबसे ऊँची चोटी पर मैं चढ़ा था उसी पर चढ़ कर राम ने सीता को आवाज़ लगाई थी – सीता कहाँ हो तुम .... सीता ! चढ़ा मैं भी था और आवाज़ मैंने भी लगाई थी पर सीता को नहीं ! और मेरे साथ आज कोई लक्षमण भी तो नहीं था ! हालत यह थी कि वहाँ चोटी पर मेरी फोटो लेने तक के लिए भी कोई नहीं था । हालाँकि जहाँ जहाँ लोग मिले मैंने खुल के उनसे अपनी तस्वीर लेने में सहायता मांगी लेकिन चोटी पर देर तक कोई आया नहीं ।

सुबह जब स्कूल से निकला था तो यहाँ अंधेरे में उजाला तेज़ी से घुल रहा था । इसके बावजूद ऊपर जो पक्षी उड़ रहे थे वे एक काली छाया सी ही लग रहे थे और जो पेड़ों पर छिपकर आवाज़ें निकालते रहते हैं उनको तो भूल ही जाइए । इतनी सुबह इसलिए निकला था कि वह बस पकड़ में आ जाये जो सीधी रामक्कलमेड़  तक जाती है । बस आयी मैं चढ़ भी गया लेकिन टिकट लेते वक़्त पता चला कि यहाँ से कोई सीधी बस सेवा अब नहीं है । आधे रास्ते तक की बस थी उसके बाद मुझे अगली बस मिलती जो मंजिल से करीब पंद्रह किलोमीटर पहले छोडती ।
अनजान जगह पर जा रहे हों , सबकुछ तय कर के चले हों और रास्ते में आपको पता चले कि वहाँ जाने के साधन के बारे में आपके पास कोई खबर नहीं है । हालाँकि उस रास्ते पर एक ही बस के होने से यह अंदेशा तो था कि वह न आए तो क्या । लेकिन मैंने कभी इस बारे में सोचा नहीं । ऊपर से सुबह का पहाड़ी रास्ता ।

मुझे इन रस्तों पर सुबह सुबह की यात्रा बहुत अच्छी लगती है । रास्ते पर आवश्यक रूप से धुंध होती है ।  कहीं यदि आपका वाहन रुक गया तो आप बाँस के पेड़ों से गिरती बूंदों की आवाज़ भी सुन सकते हैं । जरा और आगे बढ़ गए तो कभी सामने तो कभी दायें और कभी बाएँ से सूरज दिखाई देगा क्रमशः लाल से पीला होते हुए । लाल पीला होना एक मुहावरा भी है न !

दिन कितना भी गरम हो लेकिन सुबह हल्की ठंड जरूर लगती है । उस समय आप बस में या आसपास नजर दौड़ाएँ और कोई दिख जाये तो आप पाएंगे कि उसने कैसे बस की खिड़की बंद कर रखी , कैसे कान को ढँकने के लिए कनझप्पा लगा रखा है । आपको उस आदमी को देखकर तो बहुत हँसी आएगी जिसने स्वेटर , मंकी कैप आदि डाल के केरल को बाक़ायदा कश्मीर बनाने की कोशिश की हो । क्या करेंगे पर ऐसे लोग होते हैं जो सुबह की जरा सी ख़ुशनुमा हवा भी झेल नहीं पाते ।

ऐसी यात्राओं में मैं बहुत कम बस के भीतर देखता हूँ । मेरी आँखें बस लगातार पीछे जाते दृश्यों को समेटने में लगी रहती हैं । बस जब इलायची के खेतों के बीच से गुजरी तो जरा सी महक नहीं आयी । और उसी रास्ते में आज मैंने भारतीय इलायची अनुसंधान संस्थान भी देखा । किस किस तरह के अनुसंधान संस्थान होते हैं ! यहाँ इलायची है तो कहीं बैंगन अनुसंधान संस्थान भी होगा कानपुर और नागपूर की तरह !  चलिए अब यह संस्थान है तो इसे इस बात का अनुसंधान जरूर करना चाहिए कि कई किलोमीटर तक दोनों ओर फैले इलायची के खेतों के बीच से गुजर जाने पर भी जरा सी महक क्यों  नहीं आयी । आइए हमारे हमारे धान के खेतों के बीच से गुजरकर, महसूस होगा कि कहीं से आए हैं । मन महमह कर उठेगा !

हाँ इस बीच यह बताना भूल गए कि पहली बस ने जहाँ उतारा था वहीं थोड़ी बहुत पूछताछ करके आगे के रास्ते का खाका बन गया । थोड़े से इंतज़ार के बाद एक बस भी मिल गयी । उस थोड़ी देर के इंतजार में मैंने एक कंघी खरीदी , थोड़े से संतरे खरीदे और सबसे बड़ी बात कल का पका हुआ दालवडा खाया जिसे दुकानदार ने आज बस तेल में डालकर गरम किया था । यह मुझे पता नहीं चलता लेकिन मैंने देख लिया ।  दुकानदार मेरी उपस्थिती से बेपरवाह पुरानी चीजें बारी बारी से कड़ाही में डाल कर निकाल रहा था । यह कोई नयी बात नहीं है सहरसा , पटना दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक में मैंने दूकानदारों को ऐसा करते देखा है !

ऐसे कहने के लिए तो रामक्कल में तीन ही चीजें हैं ।  उन तीन प्रसिद्ध स्थानों के अलावा पूरा का पूरा लैंडस्केप आपका मन मोह लेने के लिए तैयार बैठा है । जिन्हें ट्रेकिंग का शौक न हो वे वहाँ न जाएँ क्योंकि वहाँ जो भी आनंद है चोटियों पर ही है । तीन में एक से तो परिचय करवा ही चुका हूँ , अरे वही ऊँची चोटी जहाँ से राम ने अपनी पत्नी को उसकी गुशुदगी के दौरान आवाज़ लगाई थी । वहाँ का दूसरा आकर्षण है ‘कुरुती – कुरुवन’ की प्रतिमा। 

कुरुती कुरुवन स्थानीय युगल थे जिन्होंने इडकी डैम की नींव रखी थी । दूसरी ओर की पहाड़ी की चोटी पर यह प्रतिमा बनी है और यहाँ तक जाने के लिए 10 रूपय भी चुकाने पड़ते हैं  लेकिन अपनी विरासत को जिंदा रखने की यह अदा है बहुत प्यारी ! कुरुती –कुरवन की प्रतिमा वाली पहाड़ी पर मैं सबसे पहले गया । वहाँ से राम द्वारा आवाज़ लगाने के लिए इस्तेमाल की गयी पहाड़ी ठीक सामने थी लेकिन काफी दूर थी । दोपहर की उस धूप में जब मैंने वहाँ जाने का निश्चय किया तो पहले ही एक पहाड़ी पर चढ़ने से थक गयी टांगों का खयाल आया । वहीं एक पेड़ के नीचे बैठकर मैंने दो – तीन संतरे निपटा दिए और उसके छिलके डाल दिए पेड़ की जड़ में ताकि जब वे छिलके खाद बनकर पेड़ की तह में पहुंचेगा तो पेड़ को मैं याद आऊँगा । राम आया हो या न आया हो पर मेरे आने का एहसास पेड़ को जरूर रहेगा !

ढलान पर उतरना मुझे हमेशा से खतरनाक लगता रहा है । चढ़ते वक़्त तो केवल फिसलने का डर रहता है लेकिन उतरते हुए पहाड़ भी धकेल रहा होता है । मेरे आगे आगे एक प्रेमी युगल चल रहा था । वे तो थोड़ी दूर जाकर दौड़ने ही लगे । बाद में मैंने देखा वे एक पेड़ के नीचे रुककर लड़की की टूटी चप्पल को बांधने की कोशिश कर रहे थे । पहाड़ी से उतरते हुए यदि आपने जूते पहन रखे हैं तो आपका अपना भार , पहाड़ द्वारा धकेले जाने से पैदा गति आदि सब लगता है पैर की अंगुलियों के नाखूनों पर ही टिक जाते हैं । उँगलियों का ऊपरी पोर अभी थोड़े दिन दर्द में रहेगा ।

बचपन में मुझे दो चीजें बहुत रोमांचित करती थी एक किसी गाँव के सामने से गुजरती रेलगाड़ी और दूसरी किताबों में छपी पवनचक्कियों की तस्वीरें । मैं जहां जहां भी रहा रेलगाड़ी उन स्थानों के सामने क्या पीछे से भी नही गुजरी । धीरे धीरे रेलगाड़ी वाले रोमांच ने दम तोड़ दिया लेकिन पवनचक्कियों वाला रोमांच अभी भी जिंदा है । पिछले साल रामेश्वरम जाते हुए तमिलनाडु के तेनी नमक स्थान से गुजर रहा था । तेनी में सड़क के दोनों ही ओर दूर दूर तक सैकड़ों पावन चक्कियाँ थी । मैं बस में था और बस बहुत तेज़ी से मदुरै की ओर बढ़ रही थी सो जरा देर के लिए भी नहीं रुक पाया । आज ऊपर की दोनों ही पहाड़ियों से पवन चक्कियाँ नज़र आ रही थी । इतना ही नहीं नीचे तमिलनाडू का जो हिस्सा नजर आ रहा था उसमें भी वे सैकड़ों की तादाद में खड़े थे कुछ घूम रहे थे कुछ खड़े होकर दूसरे को घूमते हुए देख रहे थे ।

मुझे हमेशा से लगता था कि पवनचक्कियाँ बहुत छोटी होती हैं और बहुत तेज़ी से घूमती हैं । उनके बारे में मैं इतना सोचता था कि एक रात सपने में मैंने कई सारी चक्कियाँ एक साथ घूमते देखा था । आज इन पहाड़ियों की ट्रेकिंग से फारिग होकर मैंने एक और ट्रेकिंग की । लगभग पाँच किलोमीटर चलकर ऐसी जगह पहुंचा जहां हवा की खेती होती है – विंड फार्म ! वहाँ पहुँचने पर एहसास हुआ कि एक एक पवन चक्की कितनी बड़ी होती है । विशाल और आकाश को छूती हुई । वह स्थान सच में रोमांचक लगा । उस सबसे ऊंची चोटी के बाद दूसरा ऐसा स्थान लगा जहां घंटों बिना काम के बैठ कर चुप रहा जा सकता है या बतियाया जा सकता है । अगली बार वहाँ सही साथी लेकर जाऊंगा ।

इसके बाद वापसी का रास्ता शुरू हुआ । वापसी जल्दी ही इसलिए करनी पड़ी क्योंकि वहाँ से बाहर निकलने की अंतिम बस 4 बजे ही थी । यदि वह बस छूट जाती तो वहीं पहाड़ी पर कहीं ठंडी हवा खाता रहता । वह उतना बुरा भी नहीं होता बल्कि रोचक ही होता लेकिन मुफ्त का एक आकस्मिक अवकाश चला जाता । काम धंधे पर लगा आदमी कितनी आवारागर्दी करेगा ?


वापसी की यात्रा में कोई खास रोचकता मुझे भी महसूस नहीं हुई । एक जगह दो डोसे एक साथ खा लिए थे तो नींद भी आ रही थी । हल्का हल्का ही याद है कि कुछ कुछ वही स्थान गुजरे थे जो सुबह देखे थे । 

मार्च 11, 2016

एक कक्षा और उसका बोझ


आज  लगता है सर से एक बड़ा बोझ उतर गया । आज बारहवीं के छात्रों की हिंदी विषय की परीक्षा थी । उन्हें मैं हिंदी पढ़ाता  हूँ लिहाज़ा मेरे ऊपर भी दबाव रहता है । हिंदी विषय की परीक्षा और दबाव ये दोनों एक साथ हास्यास्पद लगते हैं । इतने हास्यास्पद कि कोई विश्वास तक करने को राजी नहीं हो सकता क्योंकि हिंदी अन्य विषयों की तरह उपयोगी नहीं मानी जाती । इसका नौकरी और तकनीक के बाजार में कोई खास महत्व नहीं है । इसके बावजूद यह एक विषय के रूप में विद्यालयों में पढ़ाया जाता है और इसे साधारणतया आसान मान लिया जाता है । यह उत्तर भारत के लिए तो आसान विषय है लेकिन दक्षिण भारत के लिए हिंदी गणित से भी ज्यादा कठिन विषय है । इसलिए इसके अध्यापक यदि दबाव की बात करते हैं तो वह सच है ।   

मैं एक आवासीय विद्यालय में काम करता हूँ । यहाँ छात्र घर से परीक्षा भवन नहीं जाते बल्कि विद्यालय में ही बने परीक्षा भवन में परीक्षा देते हैं । उनकी  परीक्षा पूर्व की तैयारी का हर क्षण अध्यापक की निगरानी में होता है । यहाँ अध्यापक की इच्छा वाक़ई कोई अर्थ नहीं रखती । जिसके फलस्वरूप परीक्षा के दिनों में विद्यालय किसी कोचिंग संस्थान में तब्दील हो जाता है जहाँ अध्यापक छात्रों के पीछे भाग रहा होता है । इसके लिए विद्यालय के अधिकारी पूरा दबाव बनाए रखते हैं ।

विद्यालय प्रशासन और उसके अधिकारियों के लिए छात्र का बहुत अच्छे अंक लाना किसी भी अन्य बात से ज्यादा महत्वपूर्ण है । इसलिए वे समय समय पर अपने आदेश निकालते हैं जिनमें अध्यापकों से अपेक्षा होती है कि वे छात्रों की तैयारी इस तरह से करवाएँ कि छात्र अच्छे अंक लाएँ । इतना ही नहीं ऊपर से ही प्रतिवर्ष विभिन्न कक्षाओं और विषयों के लिए न्यूनतम प्राप्तांक तय कर दिए जाते हैं । अभी थोड़े दिनों मुझसे और मेरे जैसे अन्य अध्यापकों से लिखवाया गया कि इस बार की बारहवीं की परीक्षा में हम अपने विषय में न्यूनतम कितने प्रतिशत अंकों की उम्मीद करते हैं । मतलब पढ़ने – पढ़ाने का एकमात्र उद्देश्य है अच्छे अंक आना !

तीसरी बात है केरल में हिंदी पढ़ाना । कहने को तो मेरे विद्यालय में हिंदी द्वितीय भाषा है लेकिन इसकी हालत छात्रों की पाँचवीं छठवीं भाषा की है । हर वर्ष गायरहवीं में ऐसे छात्र हिंदी में भेजे जाते हैं जिन्होंने दसवीं में सबसे कम अंक प्राप्त किए हों । उनसे ज्यादा अंक प्राप्त करने वाले गणित और इन्फोर्मेशन प्रैक्टिस में डाले जाते हैं । तीन सालों में मैंने देखा है कि दसवीं में सबसे कम अंक लाने वाले छात्र वे होते हैं जो किसी भी विषय और भाषा में ठीकठाक समझ या क्षमता नहीं रखते , वे समस्याग्रस्त छात्र होते हैं और उनका ध्यान पढ़ाई लिखाई के बजाय खेलकूद व अन्य कार्यों में ज्यादा होता है ।

इन कारणों के साथ हम आगे बढ़ेंगे । ग्यारहवीं में जब छात्र हिंदी की कक्षा  में आते हैं तो उनकी हिंदी भाषा की समझ ऐसी होती है कि अध्यापक अपने बाल नोंचने लगे तो पहली ही कक्षा में गंजा हो जाये । लिंग , वचन और हिंदी में एक पूरा वाक्य न बोल पाने की समस्या तो तब आएगी न जब छात्र शुद्ध रूप से वर्णमाला लिखना , पढ़ना जनता हो । हर साल पहला महीना उनके साथ वर्णमाला और अक्षरों को जोड़ जोड़कर शब्द बनाने में गुजरता है । मेरे सहकर्मी झट से कह देते हैं कि तुम्हारे पास तो कम छात्र होते हैं इसलिए तुम्हारा काम कम है । इन सबसे ऊपर उस कक्षा में 80 प्रतिशत छात्र ऐसे होते हैं जिनकी हिंदी में कोई रुचि नहीं होती है और शुरुआती महीनों में दूसरे विषय में जाने की जुगत में लगे रहते हैं । इस तरह के छात्रों के साथ काम करना अपने आप में एक चुनौती होती है ।

हालांकि मैंने इस विद्यालय में केवल तीन साल ही पढ़ाया है लेकिन इन तीन सालों में वर्तमान बैच सबसे कमजोर बैच रहा । हमें सिखाया गया है कि छात्रों को कमजोर न कहें और यदि कोई है तो यह अध्यापक के लिए चुनौती है । यही बात हमारे ऊपर के अधिकारी भी बीच बीच में आकर कह जाते हैं । लेकिन आदर्श बातों के परे वास्तविकता नामक भी कोई बात होती है । और वास्तविकता कम से कम हिंदी के मामले में दुखद है । पिछले वर्षों में जो छात्र मिले उनमें कुछ तेज तर्रार छात्र भी थे जो या तो मेहनत के बल पर या समझने की शक्ति के बल पर आगे बढ़ गए । पिछले ही वर्ष की बात है मेरे विद्यालय में बारहवीं के परिणाम के आधार पर चार मेरिट सर्टिफिकेट मिले जिनमें से दो हिंदी में और एक - एक अंग्रेजी व  जीवविज्ञान के थे । लेकिन ऐसी कोई उम्मीद इस बैच से मैं नहीं कर रहा हूँ ।

जब दस छात्र-छात्राओं  यह बैच ग्यारहवीं में मुझे मिला था उस समय इनमें से किसी को भी वर्णमाला नहीं आती थी । किसी तरह से दसवीं पास कर आए हुए लोगों को हिंदी सीखाना शुरू किया । लेकिन जिनकी रुचि ही हिंदी में न हो वे इसे सीखने में सहज ही असहयोग करेंगे । किसी तरह ये छात्र एक – एक कदम ऊपर आने लगे । इसके बावजूद वे इस स्थिति में नहीं थे कि पाश , कबीर और मीरा की कवितायें समझ सकें या कि कृष्ण सोबती के मियां नसीरुद्दीन के नखरे परख पाएँ । जैसे तैसे वह साल बीता था । पिछले साल गर्मी की छुट्टियों के दौरान मैंने यह अनुभव किया कि ये छात्र जब बारहवीं में आएंगे तो उनकी कक्षा में जाने के लिए मेरे मन में कोई उत्साह ही नहीं है । और हुआ भी ऐसा ही । बारहवीं की शुरुआत के कुछ दिन निश्चित तौर पर उत्साहहीन थे । मेरा मन ही नहीं करता था उनकी कक्षा में जाने का । थोड़ी बहुत हिंदी जो उन्होने सीखी थी वह दो महीने की छुट्टियों में स्वाहा हो गयी । ऊपर से पाठ्यक्रम नवंबर तक में ही पूरा कर देने का दबाव । उन दिनों भाषा के बजाय उसके साहित्य ने मेरी मदद की और मैंने भाषा सिखाना छोड़ दिया ।

पाठ्यक्रम पूरा हो गया लेकिन सीखने के नाम पर दस में से दो या तीन छात्र ऐसे थे जो कुछ प्रश्नों के उत्तर दे सकने की स्थिति में थे । इन छात्रों के बारे में दूसरे विषयों के अध्यापक भी कमोबेश यही राय रखते थे । अंग्रेजी की अध्यापिका ने एक छात्र को डिस्लेक्सिक घोषित कर दिया था । ऊपर से अधिकारी आते रहे और इन छात्रों को हमारे लिए चुनौती बताते रहे । एक ने तो यह तर्क भी दे डाला कि यदि ये छात्र यहाँ तक आ गए हैं तो इसका मतलब है कि इनमें कुछ है बस अध्यापक वे तरीके नहीं पहचान रहा है । खैर !

फिर परीक्षाओं का दौर आया । दिसंबर जनवरी से बारहवीं बोर्ड देने वाले छात्रों की लगातार परीक्षाएँ होती हैं और उन्हें अलग से पढ़ाने की पूरी व्यवस्था करना हमारी समिति के चलन में है । समिति यह कार्य अध्यापकों के ऊपर दबाव डाल कर करती है । तरह तरह के टाइम टेबल बनते हैं जिनमें सुबह 6 बजे से रात के 10.30 बजे तक कार्यक्रम शामिल रहता है और सब अध्यापकों के भरोसे और जिम्मे । मुझे याद है जब दिसंबर के अंत में इनकी पहली परीक्षा हुई थी तो हिंदी के दस में से सात छात्रों ने तीस से ज्यादा अंक के सवाल छोड़ दिए थे । वे उन्हें हल ही नहीं कर पाये । यही हालत अगली दो परीक्षाओं तक रही थी ।

इस बीच जब मार्च आ गया तो हिंदी की परीक्षा से पहले करीब नौ दिन मुझे मिल गए । इन नौ दिनों में मैंने चार बार उनकी परीक्षा ली । कई बार पाठों को दोहराया । एक एक परीक्षा पर विस्तार से बात की । उनकी गलतियों पर टोका । एक प्रश्न पर दिए जाने वाले मिनट तय किए । यह सब करने में जान निकल जाती थी । हालत ऐसी हो गयी कि कोई छात्र छोटी सी गलती भी करता तो मैं चिल्ला उठता था । तनाव का असर चरम पर रहा इन दिनों । लेकिन इसके सकरत्मक परिणाम आए । जिस छात्र ने पहली परीक्षा में पचास से ज्यादा अंक के प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिए थे उसने अंतिम परीक्षा में एक भी प्रश्न नहीं छोड़ा । यह वही छात्र है जिसे अंग्रेजी वाली अध्यापिका पठन विकृति की शिकार बताती हैं ।

ये छात्र सबसे कमजोर थे । अभी भी हैं । इनकी हिंदी भाषा का स्तर कोई बहुत ऊंचा नहीं चला गया है लेकिन जिस तरह ज्यादा  अंक प्राप्त करना या करवाना एक मजबूरी बन गयी है उसमें इन छात्रों का नौ दिनों में इतने ऊपर आ जाना मैं एक उपलब्धि ही मानता हूँ । आज परीक्षा हो गयी है और मुझे नहीं पता कि इनके कितने अंक आएंगे । लेकिन परीक्षा भवन के बाहर आते हुए  जैसा संतोष उनके चेहरे पर था उसकी कल्पना मैंने दो सप्ताह पहले तक नहीं की थी ।


यह ऐसे छात्रों का समूह था जिनके साथ ग्यारहवीं कक्षा से मैंने ज्यादा काम किया । ये देर से सीखते थे इसलिए इनके साथ ज्यादा समय देना पड़ा । देर से समझते थे इसलिए अलग अलग तरीकों से समझाता रहा । इसलिए इस बैच के एक एक छात्र को नापसंद करते हुए भी मैंने इन्हें अपने करीब ज्यादा पाया । 

मार्च 02, 2016

फूल और परवाह


सोने से पहले मैं इन फूलों को चूमुंगा जो बेले की नाजुक डालियों पर लगी हैं । बहुत देर  से मैं सफ़ेद बूंदों सी उन कलियों को देख रहा हूँ   उन्हें  देखते हुए काफी समय बीत गया लेकिन मैं यह नहीं जान पाया कि कब उस बूंद ने अपने सभी हाथ खोल दिए ! सभी हाथों की बारी तो बाद में आती पहले एक हाथ कब उस बूंद से अलग हुआ यह तक पता नहीं चल पाया ।

पेड़ या कि पौधा होना एक प्रक्रिया है न तो फूल ही इस प्रक्रिया का परिणाम है न ही फल । भाषाओं नेफलको अंतिम जरूर माना है लेकिन क्या यह अंतिम है ? नए बीजों का संकुल तो फलों में ही आकार लेता है ! गमले की मिट्टी जो मेरे सोने के कमरे में ही नहीं बल्कि पूरे घर में  धरती की पहली और आखिरी पहचान है उस जमीन का ही अंग है जो बाहर फैला है । बाहर की धरती से कटकर भी इस जमीन में से कुछ लगातार गमले में खड़े बेला के पौधे में चढ़ रहा है – भीतर ही भीतर और बहुत तेजी से । जो भी पौधे में है उसकी पहचान नहीं हो पा रही है । पहचान तो बस उन हरे पत्तों की या दूध की मोटी बूंद सी कलियों की । पत्ते हरे और पौधे का हर अंतिम छोर या तो सफ़ेद या सफ़ेद होने की प्रक्रिया में !

फूल का खिलना न देख पाना नज़रों को दिया गया धोखा सा लगता है । मुझे लगता है कि फूलों की दुनिया में बहुत इतमीनान है । हमारी दुनिया से तो बहुत ज्यादा । मतलब हम यदि अपनी गति धीमी कर लें तो शायद उस प्रक्रिया को देख सकते हैं जो हमारे सामने होती है लेकिन हमें उसका पता नहीं चलता है । पर ऐसी कौन सी गति है जो धीमी कर लें ?

विज्ञान ने ऐसे कैमरे बनाए या ऐसा तरीका विकसित किया जिससे फूलों के खिलने की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर के दिखाया जाता है जिससे पता चलता है कि पहले क्या हुआ था या बाद में क्या हुआ । इसका अर्थ हुआ कि हमारे देखने का तरीका ऐसा है कि हमें तेज़ी से बदलती हुई चीजें ही दिख पाती हैं ।

तकनीक में आ रहे हर छोटे से छोटे से बदलाव को हम पकड़ ले रहे हैं लेकिन बहुत सारे कला रूप धीमी मौत मर गए । जो धीमी मौत मर रहे हैं हमें वे भी नहीं दिख रहे हैं । गिद्ध, गौरैये  आदि एकाएक नहीं चल दिए होंगे हमारा पड़ोस छोडकर । वैसे ही गाँव में काम की कमी देखकर पहले कुछ ही लोग शहर खटने गए होंगे । मुझे तो ऐसा भी लगता है कि बच्चों ने अचानक नहीं छोड़ा होगा  किताबें पढ़ना । धीरे धीरे हुआ होगा यह सब –बहुत धीरे !

धीरे धीरे हो रही ये सारी प्रक्रियाएँ हमारी नज़रों के सामने से गुजरी और हम ही थे जो उसे महसूस तक  नहीं कर पाये । उनका धीमा होना ही उनकी गलती थी । हमारी ज़िम्मेदारी में तो उतना ही है जो हम समझ पाएँ फिर चाहे कोई चीज लुप्त हो जाये या रहे हम उसकी परवाह नहीं करते । है न !

किसी स्थिति की या किसी की परवाह करना कई बार हमारी बेबसी को हमसे खींचकर हमारे सामने रख देता है । क्योंकि हम परवाह कर सकते हैं और कुछ नहीं । फिर इस परवाह के नुकसान भी बहुत हैं । मैं जेएनयू की परवाह करता हूँ । उसके लिए तथा उसके माध्यम से हर उस बात के लिए कई बार लोगों से बहस की है जो अंतिम आदमी के लोकतान्त्रिक अधिकार को खत्म करती हो । ऐसी बातें आजकल आम है सो बहस भी आए दिन ही होती है ।

एक सहकर्मी ने मेरे लिए सीधे सीधे टेररिस्ट शब्द का प्रयोग किया । यूं तो यह हंसने वाली बात ही है और कोई और स्थिति होती तो मैं भी हँसता लेकिन आज के संदर्भ में यह एक विशेषण है जो हर कोई अपने से भिन्न विचार रखने वालों पर चिपकाता चल रहा है । एक दिन भारत के प्रधानमंत्री ने कहा था कि कुछ लोगों का काम हो गया है सुबह से शाम तक मेरी बुराई करना । अगले दिन उनका यह बयान द हिन्दू के बॉक्स में छपा । एक अन्य सहकर्मी दिन भर मेरे सामने या मुझे लक्ष्य करके दूसरों के सामने दोहराता रहा कि दिस इज फॉर आलोक । उसके बाद लंबे और ऊंचे ठहाके लगते रहे ।

जेएनयू वाला ही मसला है लेकिन संदर्भ आईआईएमसी में पढ़ने वाली मेरी एक दोस्त का है । घर में उसके पिताजी ज़ी न्यूज़ देखते हैं । जे एन यू के पास पढ़ने वाली लड़की को उसकी हवा न लगे ऐसा होना कठिन है । यदि ऐसा होता है तो इससे बुरा कुछ नहीं है । लड़की जिस वातावरण से घर आती थी वहाँ ठीक उसके उलट वातावरण रहता था । पत्रकारिता पढ़ने वाली बेटी की राय पिता जानना चाहते । बहुत कुरेदने पर ही वह अपनी राय रखती । भारतीय परिवार में , पिता के सामने , लड़की पिता से ठीक विपरीत राय रखे तो बाद की स्थिति की कल्पना करना कठिन नहीं है । घर में चर्चा की जगह कोहराम भर जाता था । शायद खिड़कियों और आँखों से भी कुछ निकलता हो !

आह फिर से जे एन यू और फिर से वही सब । मैं कह सकता हूँ कि उस विश्वविद्यालय पर की गयी अनर्गल टिप्पणियाँ मेरे खून का दबाव बढ़ा देती थी । कई बार सोचा कि अब बस दूर हो जाऊँ हर उस माध्यम से जो मुझ तक जेएनयू की खबर लाती है । लेकिन क्या हुआ से जब क्या हो रहा है महत्वपूर्ण हो जाता है तो कहाँ सब्र है ! फिर एक से दूसरे पर और दूसरे से तीसरे पर होते होते फिर से नए तरह का गुस्सा , नया तनाव भर जाता था !  पर अब नहीं ! अब तो जे एन यू के समर्थन में बहुत से लोग आ गए हैं , सरकार की भी किरकिरी हो रही है ।


मैं वापस फूलों पर नहीं आ रहा हूँ ।  मैं तो फूलों पर ही था कमरे में भरे हुए इनके सम्मिलित सुगंध पर । और यह सुगंध भी कब निकला दूध की उन मोटी बूंदों से मैं जान नहीं पाया ! 
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