जनवरी 27, 2016

सतह पर तैरती हिन्दी आलोचना



समय मिलने पर कुछ न कुछ पढ़ लेना एक बड़ी उपलब्धि की शक्ल लेता जा रहा है । राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) से अजय तिवारी के संपादन में निकली किताब 'रामविलास शर्मा संकलित निबंध' पढ़ना शुरू किया है । उसकी भूमिका पढ़ रहा तो बरबस डॉ. कृष्ण कुमार की लिखी भूमिका याद आ गयी जो उन्होंने रघुवीर सहाय की संचयिता बनाते हुए लिखी थी । वह किताब राजकमल प्रकाशन द्वारा महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रकाशित हुई है ।

कृष्ण कुमार और अजय तिवारी दोनों ही मेरे अध्यापक रहे हैं । कक्षाओं के मामले में दोनों का ही अपने अपने विभागों में कोई मुकाबला नहीं है ।

कृष्ण कुमार ने हिंदी में बहुत कम लिखा है लेकिन हिंदी को बरतने का तरीका उनका हिंदी के स्थापित लेखकों से बीस ठहरता है । यह बात अजय तिवारी की भूमिका को भी साथ में रखकर पढ़ने से और स्पष्ट होती है ।

दोनों ही भूमिकाओं में कोई न कोई साहित्यकार केंद्र में है इसलिए तुलना का स्पष्ट आधार निर्मित हो जाता है । एक तरफ कृष्ण कुमार रघुवीर सहाय की रचना प्रक्रिया और रचनाओं की पृष्ठभूमि के गहन विश्लेषण को पकड़ते वहीं तिवारी जी का नजरिया मूल्यांकन परक ही रह पाता है । तिवारी जी के मूल्यांकन का रास्ता पाठकों को रामविलास शर्मा और उनकी रचनाओं को लेकर वही दृष्टिकोण दे पाता है जो वे देना चाहते हैं । पाठक निरपेक्ष नहीं रह पाता । हिंदी के आलोचनात्मक लेखन में ज्यादातर यही प्रवृत्ति रही है ।

शब्दजाल का आतंक विषय को खोलने के बजाए उसे उलझा कर रख देता है यह प्रवृत्ति दो विरोधी विचारधारा के आलोचकों , कृष्णदत्त पालीवाल और अजय तिवारी दोनों में देखी जा सकती है । इससे यह स्पष्ट है कि यह किसी विचारधारा का गुण होने के बजाय हिंदी आलोचना की आम विशेषता की शक्ल ले चुका है ।

कृष्ण कुमार के संपादकीय भूमिका की एक और विशेषता यह है उसका अंतरानुशासनिक होना । हिंदी में यह बहुत कम देखने को मिलता है । उपर से हिंदी वाले अपनी इस कमी को ढँकने के लिए कहते मिलते हैं कि 'वह ज्ञान का आडंबर' पैदा करता है । जबकि होता इससे ठीक अलग है । यह विषय को समझना बहुत आसान कर देता है इतना ही नहीं इससे विषय का जुड़ाव आम जनजीवन से देखने में सहायता मिलती है । इस मामले में प्रणय कृष्ण का काम हिंदी में महत्वपूर्ण है ।

एक बार फिर से - अपने दोनों ही पूर्व अध्यापकों के प्रति पूर्ण सम्मान प्रदर्शित करते हुए कह रहा हूँ कि मेरा उद्देश्य दोनों व्यक्तियों की तुलना के बदले उनके तरीकों की तुलना करना है ।

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