जनवरी 27, 2016

हिन्दी किताबों का छोटा संसार



आज किताबें खरीदने गया था - पुस्तकालय के लिए भी और विद्यालय के वार्षिकोत्सव पर दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए भी । हिन्दी में हालाँकि यहाँ बहुत कम किताबें मिलती हैं पर दो खास तरह की किताबें जरूर दिख जाती हैं । एक तो हिन्दी की कालजयी किताबें , दूसरी बिलकुल ताज़ा ताज़ा आई किताबें । उस समय निर्णय करना बड़ा जरूरी हो जाता है कि कौन सी किताब ली जाये ।

वैसे यह तो देखते ही तय हो जाता है कि अजय नवरिया की पटकथा और अन्य कहानियाँ से कई हजार गुना बेहतर जूठन के दोनों खंड हैं । रेणु , राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी की किताबें । कमलेश्वर की कोई भी किताब मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानी की किताब के आगे नहीं टिकती । मंटो आते हैं , अमृता प्रीतम आती हैं । ज्ञान रंजन , काशीनाथ सिंह भी मिल जाते हैं राग दरबारी वाले भाई साहब के साथ ।

कमी खलती है कुछ लेखकों / कवियों की किताबों की जो यहाँ नहीं आ पाती - उनमे सबसे पहले Jitendra भाई की किताबें , फिर पंकज मित्र की किताबें । सोचा राकेश मिश्र की कहानियाँ भी मिल जाती उनकी तक्षशिला में आग बहुत दिनों तक छाई रही थी ।

एक बात समझ नहीं आती है कि जो उम्दा और स्थापित लेखक व कवि हैं उनकी किताबें यहाँ तक आ ही नहीं पाती पर हाल की दो बकवास किताबें - इश्क़ में शहर होना और इश्क़ में माटी सोना भारी मात्रा में पहुंचा दी जाती हैं कोचीन की दुकानों में । रविश की किताब पहले ही खरीदकर पढ़ ली थी सो उस संत्रास से फिर नहीं गुजरना चाहता था इसलिए उनके शिष्य गिरीन्द्र की किताब का एक बड़ा हिस्सा वहीं दुकान में ही खड़े खड़े पढ़ने की कोशिश की । मने लपरेक कह देने से बकवास भी साहित्य नहीं न हो जाता है महात्मन । एक बात है कि शिष्य ने गुरु से कम बकवास की है पर पैटर्न तो बकवास का ही है । सो जो भी बंधु इस पुस्तक मेले में लपरेक पर विश्वास दिखाने वाले हैं वे अपने पैसे बचा लें । और यदि गिरीन्द्र या रविश आपके करीबी हैं तो वहीं खड़े खड़े पढ़ लें । यकीन मानिए उन बकवासों से गुजरने में आपको समय नहीं लगेगा ।

किताबों की खरीद बड़ा जटिल काम है । कई निर्णय करने होते हैं और किताबों से गुजरते हुए मानसिक और शारीरिक तौर पर खटना पड़ता है । जिससे थकान होनी स्वाभाविक है । सो थक तो गया ही हूँ । इसके बावजूद एक बात कहूँगा कि अच्छी और गम्भीर किताबें आज भी पढ़ी जाती हैं । लपरेक - फपरेक तो बस ऐसे ही नए लोगों का बुढ़भस है ! ये अफसोस के साथ बुढ़ायेंगे !

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