जनवरी 27, 2016

अपने तरीके




केरल में रहते हुए मैंने कई बार देखा है कि जो बुराइयाँ हैं उन्हें या तो यहाँ के लोग सिरे से खारिज कर देते हैं अन्यथा उसे बहुत कम करके आँकते हैं । ताज़ा उदाहरण रोहित वेमुला की मौत का है ।

यह तो ज़ाहिर सी बात है कि इस मौत ने पूरे देश में जातीय भेदभाव की बहस को नए सिरे से उठाया है । कल यहाँ भी चर्चा हो रही थी । कई शिक्षकों ने इसे मानने से इंकार कर दिया कि ऐसा कुछ भी केरल में हो सकता है । जबकि यहाँ के नंबूदरी और नायर आदि यहाँ की दूसरी जातियों के साथ कैसा सलूक करते हैं ये इन सबको पता है पर ये स्वीकार नहीं करते । ऊपर से कह दिया कि ये केवल उत्तर भारत में होता है । यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि जब ये उत्तर भारत कहते हैं तो इसका मतलब बिहार और उत्तर प्रदेश होता है । बाकी राज्य इन्हें नहीं मालूम हों जैसे ।

यहाँ एक प्रकार का नृत्य होता है ' तैयम' । उस नृत्य का किस्सा ही शंकरचार्य के ब्राह्मण वाद के खिलाफ दलितों के विद्रोह का है । हालाँकि वह किस्सा और विद्रोह भी धार्मिक है लेकिन विद्रोह महत्वपूर्ण है । आज के समय में तैयम की वह परंपरा कायम है लेकिन जो नृत्य है वह दलित समुदाय के नर्तकों द्वारा ही किया जाता है । इसके प्रमाण के लिए दो बातें की जा सकती हैं - या तो यहाँ आकर तैयम देखा जाये या नहीं तो विलियम डेरलिमपल की किताबNine Lives: in Search of the Sacred in Modern India उसके पहले ही अध्याय में तैयम पर पूरी कहानी है उसे पढ़ा जाये ।

अगली बात यह कि यहीं केरल में ही एक निम्न जाति Ezhva की स्त्रियों के लिए कमर से ऊपर के वस्त्र पहनना प्रतिबंधित था ।

आज हमारे एक सहकर्मी हैं उनसे इसी विषय पर बात हो रही थी तो उन्होने सीधे सीधे कहा कि केरल जैसे 'एडवांस' राज्य के प्रोफेशनल कॉलेजेस की हालत भी HCU जैसी ही है । उन्होने त्रिशूर के एक मेडिकल और दो तीन इंजीनियरिंग महाविद्यालयों का जिक्र किया । उन्होने कहा कि उन महाविद्यालायों में जो छात्र SC - ST कोटे के तहत नामांकन कराते हैं उनकी हालत बहुत खराब ही रहती है । उनका एक तरह से अघोषित बहिष्कार हुआ रहता है । ऊँची जाति के छात्र उनसे दोस्ती नहीं करते और घुलते मिलते भी नहीं हैं ।

यहाँ के दिन प्रतिदिन के मेरे अपने अनुभव बताते हैं कि यह राज्य भी उसी तरह जातिवादी है जिस तरह कि मेरा बिहार । यहाँ सोमवार और शुक्रवार को मुर्गे का माँस मिलता है मैस में तो हमारे सहकर्मी व्यंग्य मे ही सही पर बार बार कटाक्ष जरूर करते हैं कि ब्राह्मण होकर भी माँस खाते हो ... कैसे ब्राह्मण हो ? ( यहाँ सबको पता है कि झा ब्राह्मण होते हैं ) ।

फिर छात्रों से समय समय की बातचीत में यह पता चलता रहा है कि जो छात्र इस जाति आधारित अराक्षण का विरोध करते हैं वे अक्सर सवर्ण ही होते हैं और वही छात्र स्त्रियॉं के काम करने का भी विरोध करते हैं ।

ये ऐसे अनुभव हैं जिन्हें सीधे तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता इसके बावजूद केरल के लोग अपने को जातिवादी खांचे में रखने के लिए तैयार नहीं होते । उनके लिए यह बिहार और उत्तर प्रदेश की चीज है । जबकि जैसा ब्राह्मणवाद यहाँ फैला है वह किसी भी स्तर से उत्तर भारत में व्याप्त जातिवाद से अलग नहीं है । हाँ यहाँ उसे छिपाने के अलग अलग मुखौटे जरूर मौजूद हैं ।

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