मार्च 29, 2014

स्टाफ रूम के बहाने


एक दोस्त ने कहा कि तुमने फोन नहीं उठाया तो मुझे लगा कि तुम ऑफिस में होगे इसलिए मैंने फोन काट दिया । बात सही थी उसका जब फोन आया तब मैं सच में अपने काम पर था पर कुछ था जो अटपटा था । हाँ ऑफिस अटपटा था । मैं जहां काम करता हूँ वह एक स्कूल है और उसके लिए हममें से कोई भी ऑफिस शब्द का प्रयोग नहीं करता है । इसलिए बात अटपटी लगी । दोस्त का भी दोष नहीं है उसके लिए तो काम करने की जगह केवल ऑफिस ही है । उसके लिए क्या लगभग सभी के लिए कार्यस्थल ऑफिस के रूप में रूढ हो चुका है और हमारे लिए यह स्टाफ़ रूम और कक्षा के रूप में ।

एक शिक्षक के रूप में मैं कभी नहीं सोचता हूँ कि मैं ऑफिस जा रहा हूँ । मेरे लिए तो यह विद्यालय है कार्यालय नहीं । जबकि मैं यहाँ काम ही तो करता हूँ । फिर ये कार्यालय क्यों नहीं है ? तो क्या पढ़ना – पढ़ाना कार्य नहीं है ? या फिर कार्य और पढ़ाने में क्या अंतर है ?

इन प्रश्नों पर अपने छात्रों की प्रतिक्रिया जानने के लिए मैंने अपनी कक्षाओं में इस पर एक बातचीत कारवाई । यह मेरे लिए दुतरफा फ़ायदे का सौदा था । पहला तो यह कि मुझे अपने प्रश्नों पर हम शिक्षकों को झेलने वालों की सीधी प्रतिक्रिया मिल जाएगी दूसरे , इसी बहाने उनका दस अंक का आंतरिक मूल्यांकन भी हो जाएगा । छात्रों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । केवल  इसलिए नहीं कि इसके माध्यम से उनका मूल्यांकन होता बल्कि इसलिए भी कि इस तरह उन्हें अपनी भड़ास निकालने का मौका मिल गया था ।
हमारा ठिकाना कार्यालय न होने के पीछे उनके तर्कों को इस प्रकार समेटा जा सकता है - कार्यालयों में गंभीर काम होते हैं , वहाँ रूपाय पैसे का हिसाब रखा जाता है , कागजी काम होते हैं दूसरे कार्यालयों से पत्र – व्यवहार होता है , वहाँ जरा-सी त्रुटि का भी अवकाश नहीं है , वहाँ आर टी आई का डर है । एक अध्यापक के ठिकाने में यह सब नहीं है । जैसा कि बड़ी सरलता से देखा जा सकता है कि छात्रों के लिए अध्यापन एक गंभीर काम नहीं है ।

उनकी इस प्रतिक्रिया पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ । इसके पीछे के कारण पर यदि हम जाएँ तो बात स्पष्ट हो जाएगी । बच्चे दरअसल वही कह रहे हैं जो वे अपने आसपास से सीख रहे हैं खासकर बड़ों से । बड़ों की बच्चों के संबंध में सामान्य राय कुछ इन वाक्यांशों में प्रकट होती है- वह तो अभी बच्चा , तुम बच्चे हो , पहले बड़े तो हो जाओ आदि । ऐसा केवल उनके घर और आस – पड़ोस के लोग ही नहीं करते बल्कि हम शिक्षक भी यही करते हैं ।

कई बार मैंने सुना कि जीवविज्ञान में प्रजनन संबंधी अध्याय पढ़ाते हुए शिक्षक या शिक्षिका असहज हो जाते हैं । मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान न सिर्फ जीव विज्ञान बल्कि हिन्दी में भी ऐसा महसूस किया था । हाईस्कूल में हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक ने गुस्से से कहा था कि यह अध्याय छोटे बच्चों के लिए हाई ही नहीं । जबकि हम हाईस्कूल में आते ही शारीरिक और मानसिक रूप से अपने बड़ों की श्रेणी में रखने की बेताबी वाली उम्र में पहुँच चुके थे ।

हरिमोहन शर्मा जो शायद अभी दिल्ली विश्वविदयालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं हमें विद्यापति पढ़ाते थे । धार्मिक पद जो बहुत थोड़े थे उनका अर्थ तो उनहोंने कर दिया लेकिन उससे इतर पद जिनमे शारीरिक सौन्दर्य और अंगों के वर्णन थे उनका कुछ नहीं किया । जब हमने इस बाबत बात की तो उनका सीधा कहना था कि बाद में समझ जाओगे । वह बाद तो अशोक प्रकाशन की गाइड मिलने के बाद ही आ पाया । मैं स्वयं बरहवीं कक्षा को हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध शिरीष के फूल पढ़ा रहा था । उसमें एक स्थान पर वात्स्यायन और उसके कामसूत्र का जिक्र है । एक छात्र ने पाठ से उसका संबंध पूछ लिया तो मेरी स्थिति बड़ी ही असहज हो गयी और उसे थोड़ा और बड़ा हो जाने के लिए बोलकर आगे बढ़ गया ।

हम बड़े बच्चों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखना चाहते हैं । इसी कारण हम उनकी समझ से भी दूरी बनाना चाहते हैं क्योंकि उसकी समझ हमारे और उनके बीच की दूरी को कायम नहीं रहने देगी । इसके लिए हम उनकी और अपनी समझ के बीच एक उंच नीच का भेद रखते हैं जो वास्तविक से ज्यादा भ्रम है । इसके बाद हम इस भ्रम को लगातार तरह तरह से मजबूत करते रहते हैं । इसके अंतर्गत बच्चों से जुड़ी लगभग हर गतिविधि आ जाती है और इसी के तहत उनकी पढ़ाई से जुड़े लोग भी आते हैं  । इसके अतिरिक्त कुछ और बातें हैं जो इस प्रकार के संप्रत्यय का निर्माण करने में सहायक हैं ।

शिक्षण को समान्यतया आधे दिन का काम माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि हर तरफ से असफल होकर व्यक्ति अपने अंतिम विकल्प के रूप में इसे चुनता है । इसमें से अंतिम बात का तो ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी है । अंग्रेजों ने जब अपनी तरह की शिक्षा प्रणाली की शुरुआत बंगाल में की तो उन्हें शिक्षकों की आवश्यकता थी । उन्होने उनके लिए वेतन की व्यवस्था की । उससे पहले तक इसके लिए शनिचरा और सीधा देने के अतिरिक्त कोई व्यवस्था नहीं थी । अब अंग्रेजों के लिए मुश्किल की स्थिति यह बन गयी कि उन्हें शिक्षक मिल ही नहीं रहे थे क्योंकि जो मेहनतना रखा गया वह बहुत कम होने के कारण अनाकर्षक था । फिर इस बात के प्रमाण भी हैं कि शिक्षकों की मांग और उनके नहीं आने के मद्देनजर अंग्रेजों ने न्यूनतम अर्हताओं में भी भारी कमी की । हालांकि इस बात से पूरे देश की शैक्षिक दशा को नहीं समझा जा सकता क्योंकि यह केवल बंगाल से संबन्धित है और अन्य स्थलों के प्रमाण हमारे पास नहीं हैं । इसके बावजूद अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि पहले शनिचरा या सीधा फिर अंग्रेजों के द्वारा निर्धारित अनाकर्षक वेतन ने शिक्षकों की किस प्रकार की छवि गढ़नी शुरू कर दी थी । शिक्षक स्वयं इस काम को अपनी आय के लिए पूर्ण न मानकर ट्यूशन , एजेंटी , खेती या कोई अन्य संगत काम करते आ रहे हैं । याद कीजिये पाथेर पांचाली का वह दृश्य जिसमें बच्चे बाहर पढ़ाई कर रहे हैं और उन्हें घेरकर बिठाने वाला तथाकथित अध्यापक भीतर अपनी दुकान चला रहा होता है और जब बच्चे शोर करने लगते हैं तो वह आकार छड़ी से उनकी खबर लेता है ।

ये सारी बातें बच्चे के मन में अध्यापकों की कोई बहुत अच्छी छवि नहीं बनाती हैं । अपने छात्रों के द्वारा अध्यापन को कार्य की श्रेणी में न रख पाने का मलाल तो था लेकिन इस बात की खुशी थी कि उनहोंने इतनी आलोचनात्मक दृष्टि हिन्दी में तो विकसित कर ही ली जो केरल में दुर्लभ होने के कारण निश्चित रूप से उल्लेखनीय है ।
आखिर में हमारा स्टाफ रूम ! एक ऐसी दुनिया जहां छात्रों का प्रवेश समान्यतया वर्जित है । उनके लिए वर्जित होने में ही इसके डायनामिक्स की समझ निहित है । यह वस्तुतः ऐसी दुनिया है जहां अध्यापक वही व्यक्ति नहीं है जो वह थोड़ी पहले कक्षा में था या थोड़ी देर बाद होगा । यहाँ वह उन नजरों से दूर है जिनको वह गंभीर रहना , अच्छे आचरण करना और पता नहीं कितने नैतिक आचरण सिखाता है । फिर महात्मा गांधी का वह चीनी छोड़ देने वाला किस्सा भी वही शिक्षक कक्षा में बताता है । इसलिए उससे सहज अपेक्षा रहती है कि वह उन नैतिक आचरणों को प्रैक्टिस में लाये । लेकिन स्टाफ रूम में वह सब होता है जो एक मनुष्य सहज रूप में कर सकता है मसलन हंसी ठट्ठा , मोबाइल पर गाने , अश्लील चुट्कुले , चुहलबाजी , चुगलखोरी, लड़ाई आदि । बस इतना ध्यान रहे कि आवाज बाहर नहीं जानी चाहिए । यह तो रही हमारे स्टाफ रूम की बात । आगे दिल्ली के एक मित्र ने बताया था कि उसके स्टाफ रूम में तो अध्यापक मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखते हैं । ठीक विधानसभा में ऐसा करने वालों की तरह ।


फिर भी मैं मानता हूँ कि स्टाफ रूम में हम एक तरह से मर्यादित ही रहते हैं हाँ उसका स्तर भले ही कम हो । ऊपर ज़ाहिर ही हो गया है कि कक्षा में हम वो नहीं होते जो हम स्टाफ रूम में होते हैं और जो हम स्टाफ रूम में होते हैं वह अपने घर में नहीं होते । शुक्र है कि ये तीनों जिंदगी अध्यापक एक ही साथ नहीं जीता है । दिन के अलग अलग हिस्से न हो तो वह तो एक्सपोज़ ही हो जाये । 

फ़रवरी 23, 2014

भटका हुआ हाइवे


फिल्म हाइवे । नाम से ही लगता था कि इसके भीतर कुछ होगा जो सड़क पर घटित होगा । एक आशंका यह भी थी कि यह सड़क जैसा पल पल बदलने वाला भी न हो जाए । हालांकि वर्तमान हिन्दी फिल्मों के चलन को देखते हुए इस आशंका को खारिज करने में देर नहीं लगी । बहरहाल फिल्म शुरू हुई घर से सड़क तक जाने में और फिर चलने लगी सड़क – दर - सड़क । और जब फिल्म खत्म हुई तो लगा कि चलो एक यात्रा-वृतांत खत्म हुआ ।

इसे यात्रा-वृतांत कहना ज्यादा सही लग रहा है मुझे । इसलिए नहीं कि इसका नाम हाइवे था और इसमें पात्र एक से दूसरे सीन में यात्रा ही कर रहे थे बल्कि इसलिए कि इसके अलावा फिल्म में कहने का कोई दूसरा तरीका निर्देशक ने नहीं लिया ।

तो सबसे पहला प्रश्न उठता है कि यह यात्रा-वृतांत किसका है ? तो इसका उत्तर यदि एक वाक्य में दिया जाए तो वह होगा – यह फिल्म की नायिका का यात्रा-वृतांत है । लेकिन यदि ठहर कर देखें तो यह सोचना जरूरी हो जाता है कि भई जब फिल्म हाइवे ही थी और उसी पर चली तो उसके अकेले का यह वृतांत क्यों है । क्यों न यह उसके साथ चलने वालों का भी है या यह यात्रा ही क्यों है ?
फिल्म में क्या क्या होने वाला है इसका अंदाजा हो जाता है । होने वाला पति फ्रेम से बाहर है और न ही लड़की का घर या उसके घरवाले फ्रेम में है । अब बस वही वही है जो जो लड़की के आसपास है । दर्शकों के सामने वही दृश्य आते हैं जो लड़की और आसपास के हैं । दरअसल कैमरा अब लड़की के साथ ही चलता है । और अंत तक उसी के साथ रहता है ।

हिंदुस्तानी फिल्मों में निर्देशक , दर्शकों को कहानी के बारे में पहले ही अंदाजा लगा लेने की छूट दे देता है । फिर भी दर्शक है कि तीन घंटे बैठा रहता है ।

लड़की बड़े बाप की बेटी है । उसे उसके होने वाले पति के सामने से अगवा कर लिया गया है इसके बाद भी निर्देशक कैमरा लेकर लड़की के साथ ही चल रहा है । भई वाह ! जबरन अपनी बात थोपना इसे कहते हैं ।

अपेक्षा यह थी कि यदि फिल्म हाइवे है तो नजारे और नजारों की बारीकियाँ भी उसी की होंगी पर यहाँ निराशा ही हाथ लगती है । हाइवे और फिल्म का संबंध हाइवे पर होकर भी टूटता है क्योंकि फिल्म उससे कोई संवाद नहीं करती बल्कि उस पर चलती भर है । इस चलने की दिशा , उद्देश्य और आसपास के वातावरण से इसका सह-संबंध बड़ा रूखा रूखा सा है । ऐसा लगता है कि फिल्मकार ने जो सोच रखा है वह उतना ही दिखाएगा और वैसे ही दिखाएगा । और अकारण नहीं है कि फिल्म सहज राह पर नहीं चलती । बस अपने आपको तब तक खींचती रहती है जबतक कि निर्देशक जिस रूमान के पीछे भाग रहा था उसका कारण न मिल जाए । दरअसल फिल्म के आरंभ में जिस तरह से भूमिका बांधी गयी थी उसके बाद निर्देशक से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं थी ।

हम सभी जानते हैं कि हमारी फिल्मों में यदि नायिका का अपहरण हो जाए और वह अपने अपहरणकर्ता के साथ ही रहे तो उनमें आपसी सहचर्य जनित आकर्षण तो उत्पन्न हो ही जाता है । इसलिए यह एक बड़ी प्रेडिक्टेबल सी फिल्म थी । लेकिन फिल्म में अपने ही घरों में रिशतेदारों द्वारा छोटी लड़की के शारीरिक शोषण पर बात की गयी । हालांकि इस पर बहुत बेहतर तरीके से बात नहीं हो पायी और यह अपने आप में एक फिल्म की मांग करता हुआ-सा विषय है इसके बावजूद इस बात की खुशी तो होनी ही चाहिए कि किसी मुख्यधारा की फिल्म की नायिका को इसका शिकार दिखाया गया और उसे उसका प्रतिरोध करते हुए दिखाया गया । यहाँ फिर से कहना पड़ेगा कि निर्देशक का यह प्रयास केवल फिल्म को एक नया मोड देने के लिए था । यह उसका केंद्रीय मुद्दा नहीं था और इस विषय को बखूबी डील भी नहीं किया गया ।

यह फिल्म हाइवे कहीं नहीं जाती है । पूरी फिल्म किसी शृंखला की बिछड़ी हुई कड़ियों सी यहाँ वहाँ छितराई सी चलती है जिसे बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता ।


रणदीप आरंभ में अच्छे लगे हैं पर धीरे धीरे वे उसी छोले में घुस जाते हैं जो सामान्यतया हमारे नायक ओढ़े रखते हैं । उसी तरह फिल्म शुरू में ठीकठाक चल रही होती है पर बाद के हिस्से में वह खींचती जाती है किसी अज्ञात दिशा में वह भी सतही तरीके से ।

फ़रवरी 21, 2014

पटनियाँ बाबू सब के लिए मुफ्तीया वाई-फ़ाई !


हमारे नीतीश भैया ने विश्व का सबसे लंबा मुफ़तिया 'वाई-फ़ाई ज़ोन' बना के नाम तो कमा लिया गुरुजी ! कम से कम अहिए बहाने उनका नाम तो चमकेगा और राजनीति का दू–एक दिन भी भटकेगा । बीस किलोमीटर का मुफ्तीया वाई-फ़ाई ! मन तो करता है उठाएँ अपना झोरा-झपाटी आ जा के बैठ जाएँ ऊ सड़क पर जहां ई बेबस्था है । आजकल तो अपने पास वाई-फ़ाई को पकड़ने का बहुत जोगाड़ है, ऊपर से मुफ्तीया ! पर हम त यहाँ केरल में झक मार रहे हैं हम कहाँ जाएंगे ? हमरे पूज्य पिताजी कहते हैं बन के गीद्दर जइहें किद्धर ! बन मने जंगल , गिद्दर मने गीदड़ आ किद्धर मने किधर ! एहेन बिहारी बन के गिद्दर सब भरल है देश में । त सवाल ई है कि जब सब लैपटॉप वला बिहारी बाहरे है त किसके लिए किया है ई नितीश भाय ने ?

काम–धंधा के बिना छौरा सब एन्ने–उन्ने ढ़नकल फिरता है । बेसी से बेसी दिनभर में चार ठो गुटखा खा लिया , मांग – मूंग के अधका सिकरेट मार लिया आ छौरी सबका इसकुल – कौलेज होते हुए दु-चार ठो छौरा सब से मार करते हुए घर आ के बड़की चाहे छोटकी कोई भी बहीन हो उसको डांट के अपना खीस निकाल लिया ! अब एहेन में ई वाई-फ़ाई का कोनो  काम है ? नितीश का पैसा डाँड़ गया !

बिहार में सबसे बेसी नोकरी देने वला बेबस्था है ठीकेदारी पर प्राइमरी से लेकर +2 तक में मास्टरी । उसमें केतना पईसा मिलता है सबको पता है । जेतना मिलता है ओतना में मिठुआ जैसा ठीकठाक पीने वला रहे तो महिना भर का चखना नहीं आएगा दारू की बात करते हैं ! आ जो ऊ लेडीज सब मस्टरनी बनीं हैं उनका तो सब पैसबा जान-आन में ही चला जाता है । दू चार सौ बच गया तो परिबार के हाथ में भी देना है । बेचारा सब एगो लेपेस्टिक तक नहीं खरीद सकता है । तब ई नितीश बाऊ जो किए हैं ऊ मजाके न है जी !

एगो ठीका वला मास्टर मान लीजिये आज से गुठका का दाना तक मुंह में न ले तब भी तीन -चार मैहना का 'मानदेय' जाएगा तब आएगा एक ठो सैमसंग ! नहीं तो फिरी वाई-फ़ाई का इस्तेमाल करने के लिए छौरा सब अपने बाप के गला पे चक्कू न रखेगा ! छौरी सब का कोई गिनतिए नै है ! ऊ लोग घर से सड़क पर नै निकल सकता है त एतना दूर पटना दानपूर जाएगा वाई-फ़ाई चलाने !

आगू बात ई है कि भैया ने बिहार को हाइटेक बनाने का बात किया है लेकिन उ सब पटनिया बाबू लोग के लिए ही है ! जहां चार-छ गो नेता-भगता, हाकिम-पेशकार-ठीकेदार सबके पास आकाशी पईसा आया है । वही लोग का बेटा-पुतौह आजकल पटना में पेरिस का मज़ा मार रहा है । नै ते चल जाइए तनि देहात में सब बुझा जाएगा । आ बिहार का देहात मने ई नै है जो आप शहर आ देहात मने समझते हैं । पटना के बाहर जो है सब देहाते है जी !


देखिये ने जो भी बड़का बड़का चीज है सब पटने में हैं । पटना त मान लीजिये एगो बड़ा शहर बनिए गया । लेकिन शेष बिहार ठीक उसी तरह का जैसा गणित में भागफल निकालते हुए शेष रह जाता है ! एकदम निरीह ! राज का बिकास हो रहा है लेकिन ई राज मने पटना है केवल पटना ! उससे बाहर जाइए त कुछ कत्तो नै ! उसी तरह जैसा पहले था ! पटना चमकता जा रहा है और ऊ सहरसा – तहरसा , किशनगंज- फिसनगंज सब ऐसेहिए रहेगा । 

फिर भी दाद देना पड़ेगा नितीश भाय का कि आब टाका-पईसा वाला छौरा सबके लिए एगो बढ़िया बेबस्था कर दिया है । आब ऊ लोग वहाँ से फेसबुक करेगा !

दिसंबर 30, 2013

प्रदर्शन से जरूरी संबंध


और ये महान धोनी की महान टीम भी दक्षिण अफ्रीका में सीरीज नहीं जीत पायी बल्कि हार गयी ! उम्मीदें तो बहुत लेकर गए थे ये लोग लेकिन उन पर खतरे के बादल बिलकुल शुरुआती दिनों में ही मंडराने लगे थे जब 'धोनी और साथी' एक भी एकदिवसीय नहीं जीत पाये और जो हारे वह ऐसे वैसे नहीं बल्कि भरी अंतर से हारे ! उन दिनों में आंध्र प्रदेश में था । वहाँ धोनी की फैन फोलोइंग देख कर दंग रह गया । हारते हुए मैच में भी एक चौका लगते ही लोगों का उत्साह हिलोरें लेने लगता था । और वे सोचते कि आगे और ये चौके पड़ते ही रहेंगे । पर अफसोस अगली ही गेंद किसी महान को ले उड़ती थी और मेरे साथियों के चेहरे बुझ जाते जैसे कि वो एक दीया !
               
शिखर धवन इधर हाल में भारत की टीम में धोनी का नया पत्ता है जो एक बार भारत में चलते ही उसके हाथों का ट्रम्प कार्ड बन गया था । कप्तान के हाथों का पत्ता बनना शिखर के लिए इतने गर्व की बात रही कि जिस भी दिन कैच छूटा और उसने शतक बनाया तो अपनी मूछों पर ताव देता । तब वह इतना भद्दा लगता कि पूछो मत । पर धोनी और उसके ख़ैरख्वाहों के लिए वह इस सामंती खेल का नया सामंती चेहरा था । इस बीच उसे एक बार बच्चों के साथ अफ्रीका भेजा भी गया था और वहाँ उसने पता नहीं कहाँ के बच्चों की धुलाई कर दी थी और घोषणा कर दी कि एकदिवसीय क्रिकेट में अब तीन सौ रन भी बन सकते हैं । यह तो नहीं कहा कि वह तीन सौ रन बनाएगा पर उसके भाव यही थे । लेकिन इस दौरे ने उसकी मूछों पर ताव भी नहीं पड़ने दी ।  बिचारा  पूरे दौरे पर एक अर्धशतक के लिए तरस गया !

जय हो रोहित शर्मा आपको तो उघाड़ दिया अफ्रीका दौरे ने ! रोहित को बंबई की ओर से खेलने का फ़ायदा बहुत मिला जैसे कि किसी भी बंबईय्ये को भारत की क्रिकेट में मिलता है । हाँ वसीम जाफ़र और मुरली कार्तिक  को नहीं मिलता है जो ओवरस्मार्ट बनते हैं । बीसीसीआई वैसे भी ओवरस्मार्ट लोगों को नहीं पसंद करती उदाहरण के लिए मोहिंदर अमरनाथ , वीरेंद्र सहवाग , गंभीर , युसुफ पठन आदि (एक दौर में गांगुली और द्रविड़ भी स्मार्ट बने और गए बूट लादने ) । बाहर हाल रोहित शर्मा ! उसने औस्ट्रेलिया की दोयम दर्जे की टीम को पीट के दोहरा शतक बना दिया था यहाँ भारत में जो धोनी उसके आक़ा और उनके चमचों -बेलचों की नजर में उसकी प्रतिभा को साबित करने वाला सिद्ध हुआ । नहीं तो जीतने मौके उसे मिले थे उतने किसी को नहीं मिलते । लोग उसकी कम उम्र और प्रतिभा का हवाला देते हैं उनके लिए यह कि उसी उम्र में उससे ज्यादा मैच खेलने और रन बनाने वाले मुहम्मद कैफ को सीनियर मान कर और बहुत मौके दिए ऐसा कह कर टीम से निकाल दिया गया । उन्हीं रोहित शर्मा को अफ्रीका दौरे ने फिर से उस हालत में ला दिया जहां वह पहले थे । उनकी प्रतिभा उनके भीतर रह गयी और उघड गया उनका खेलने का कौशल ! पर फिर भी उनकी उम्र अभी कम है और उन्हें अभी बहुत से मौके मिलने हैं !

बची इज्जत तो थोड़ी सी विराट कोहली , पुजारा और रहाणे की जो धोनी की जिद से नहीं बल्कि अपनी प्रतिभा से टीम में हैं । धोनी के चाहने और न चाहने से जिनके चयन पर कोई फरक नहीं पड़ता । इन खिलाड़ियों के दम पर ही भारत के खेल प्रशंसक और समीक्षक कह रहे हैं कि भारत के लिए  दक्षिण अफ्रीका में कुछ  सकारत्मक रहा !  

और रही बात धोनी की तो भाई साहब ने एक बार एंग्लैंड के एक दोहरा शतक बना लिया और उनके दायित्वों की इतिश्री हो गयी । यह उनका वही दोहरा शतक था जिसका धोनी से लेकर श्रीनि तक इंतजार कर रहे थे । उससे पहले धोनी , गंभीर, सहवाग और यहाँ तक कि तेंदुलकर सब खराब फॉर्म में चल रहे थे । और जैसे ही धोनी का दोहरा शतक बना बाकी सब पीछे हो गए और उन्हें नकारा साबित करने में चयनकर्ताओं ने कहाँ देर लगाई ! उसके बाद से धोनी फिर वही धोनी हैं जो बस श्रीलंका जैसी गेंदबाजी या वेस्ट इंडीज जैसी गेंदबाजी वाली टीम के साथ रन बनाएँगे । 

भारतीय  गेंदबाज तो भाई हमेशा से निराश करते आ रहे हैं इसलिए उनपर कोई विशेष बात करना बेकार सा ही है । उनके  टुकड़ों में एक दो प्रदर्शन को छोड़ दें तो वही हालत रही जो पूर्व के दौरों पर रहती थी ।
पर इतने पर भी यह देख के हैरानी होती है कि ये रवि शास्त्री और गावस्कर जैसे लोग अपनी कमेंटरी में इन नॉन-पेरफोरमर्स पर जरा भी तल्ख़ नहीं हो पा रहे हैं । अरे भाई डरते काहे हो श्रीनिवासन हमेशा के लिए रहने नहीं आया है । कहने के लिए डरना कह दिया लेकिन यह डरने से ज्यादा पैसे का मामला है । अभी बहुत दिन नहीं हुए जब यह टीम इंग्लैंड में खेल रही थी तो कमेंटरी करते हुए नासिर हुसैन ने कहा था कि गावस्कर और रवि शास्त्री बी सी सी आई से पैसे लेकर श्रीनि के विचारों को प्रमाणित करते हैं ।
फिर रही बात कपिलदेव जैसे धोनी के परम प्रशंसकों की जो किसी न किसी टीवी पर बैठकर फर्जी प्रवचन देते मिल जाएंगे तो मामला अब ऐसा बन गया है कि उन्हें यदि जीना है और खाना कमाना है तो धोनी की प्रशंसा करनी पड़ेगी क्योंकि धोनी ठहरा श्रीनि का पिद्दी । पिद्दी की प्रशंसा न करोगे तो कैसे टिकोगे यार जल में रहकर मगर के कानून की ही बात करो !

यहाँ मैं मैच के ताजा स्कोर को टीवी नहीं बल्कि क्रीकबज़ नामक एक वेबसाइट के माध्यम से जनता हूँ । वहाँ लाइव कमेंटरी भी लिखी जाती है । पूरे अफ्रीका दौरे के दौरान एक बार भी ऐसा नहीं देखा कि इस पर लिखने वालों ने किसी अफ्रीकी खिलाड़ी की प्रशंसा की हो । दो लगातार चौके मार कर आउट हो जाने वाले शिखर धवन को  शतक बनाने वाले कैलिस से ज्यादा प्रशंसा मिलती थी । और धोनी के हर निर्णय की जम कर प्रशंसा । भारत के पिछले अफ्रीकी दौरे के दौरान वहाँ के कमेंटेटर भी ठीक इसी तरह अपने खिलाड़ियों की ही प्रशंसा करते थे ।

बहरहाल मुझे दक्षिण अफ्रीका दौरे का इंतजार था क्योंकि धोनी की टीम से संबंध में मेरी जो समझ बनी है उसे एक बार और साबित होते देखना चाहता था । धोनी ने जो टीम बनाई उसमें प्रतिभा से ज्यादा संबंध चल रहे हैं और क्रिकेट ऐसा  खेल है कि घिसते घिसते कोई भी एक शतक बना ही देता है और डेढ़ दो सौ रन खा कर रवीद्र जडेजा की तरह एक बार पाँच विकेट ले सकता है लेकिन न तो एक बार भी यह टीम पाँच सौ रन बना पायी है और नहीं किसी मजबूत टीम को पारी से हरा  पायी है । फिर भी पैसे लेकर विशेषज्ञ धोनी को महान साबित करने में लगे हैं क्योंकि खिलाड़ियों ने उसे दो दो विश्वकप उठाने का मौका जो दे दिया !


दिसंबर 25, 2013

ग्लोरीफिकेशन ऑफ ए फेज़ : भाग दो


दिल्ली में कितने ही लोगों से मिलने के वादे कर रखे थे वे किए गए वादों की तरह ही रह गए और मैं किसी से नहीं मिल सका । न मिल सकने का उतना अफसोस नही है जितना लोगों के न समझ पाने का है कि मैं सचमुच बीमार था । खैर मैं बीमार रहूँ या ठीक काम पर लौटना ही था । दवाओं ने असर करना शुरू किया था लेकिन  जैसा कि मेरे परिवार में होता है ठंड और बुखार जाते जाते भयंकर खांसी दे के जाती है । मेरी माँ खाँसते खाँसते बेदम हो जाती है । और प्राप्त सूचना के अनुसार वह अभी भी इसी खांसी की शिकार है । मैं भी खाँसने लगा और कई बार खाँसना इस तरह ज़ोर पकड़ता कि कक्षा में एक पंक्ति भी बोलना दूभर हो जाता ।

शुक्र है मैं अभी अपने घर पर नहीं हूँ या कि यहाँ लोग एक दूसरे की जिंदगी में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं । अन्यथा इस खांसी को छुड़ाने के लिए क्या क्या न खाने-पीने को कहा जाता ! मैं यहीं से अंदाज़ा लगा सकता हूँ माँ ने अपनी खांसी छुड़ाने के लिए कितनी बार तुलसी, हर-शृंगार के के पत्तों का काढ़ा पिया होगा, काली मिर्च या लौंग मुंह में रखा होगा , मछली का शोरबा पिया होगा होगा । और जब वह रात को उठकर खाँसती होगी तो पिताजी दबे हुए गुस्से से कहते होंगे कि कितनी बार कहा है दिन भर गले में गरम कपड़ा लपेटकर रहा करो । कई बार मैंने माँ को दिन भर गले में गरम कपड़ा लपेटे देखा है लेकिन इन तमाम उपायों का कोई फायदा नहीं होता देखा । हाँ एक बात और हमारे यहाँ यदि पड़ोस में यदि किसी कि खांसी ठीक हो जाय या कि उसके कहीं के किसी रिश्तेदार की खांसी ठीक हो जाए तो उसकी स्थिति लगभग खांसी के डॉक्टर की हो जाती है । लेकिन हास्यास्पद स्थिति तब हो जाती है जब इस मौसम में खांसी की दवाई बताने वाला अगले मौसम में महीने भर खों खों करता रहता है । अभी बहुत दिन नहीं हुए । हमारे सामने एक चाची (सहरसा में रहती हैं इसलिए चाची और दिल्ली में होती तो आंटी या आंटी जी ) जब भी मेरी माँ को खाँसते देखती तो अपनी गैलरी से आधा धड़ लटकाकर माँ को कई सलाह दिया करती । अगली बार खुद उनकी ही खांसी दो-तीन महीने तक चली थी ।

इसलिए मैं इस बार घरेलू उपायों और दादी माँ के नुसख़ों को मानने वाला नहीं था । एक नए डॉक्टर के बारे में पता चला जिससे हमारे विद्यालय के ही एक अध्यापक ने अपनी खांसी का इलाज़ करवाया था । भारत में तो डॉक्टर से लेकर नीम हक़ीम तक के बारे में ऐसे ही पता चलता है । डॉक्टर ने कुछ महंगी दवाइयाँ दी और एक अजीब से स्वाद वाला कफ का शर्बत । जब मैंने उपचार लेना शुरू किया तो गज़ब ! दिन भर आलस रहने लगा । पलकें ऐसी कि हमेशा नींद में हो । कक्षा में मैं क्या पढ़ा रहा था मुझे खुद पता नहीं चल पाता । जहां दो कक्षाओं के बीच समय मिलता स्टाफ़रूम में अपनी टेबल पल ही सिर टिका के सो जाता । मैं जनता था कि ऐसा उन दवाओं के कारण हो रहा है लेकिन एक तो खांसी लगभग ठीक हो गयी थी दूसरे डॉक्टर के पास जाने का समय नहीं मिल पाता कि जाकर उससे अपनी दशा कह सकूँ । इसलिए जबतक दवाएं चलती रहीं नींद का जोरदार असर भी तबतक रहा ।

आगे दवा तो खत्म हो गयी  उसके साथ खांसी और हमेशा नींद में ही रहने का एहसास ही लेकिन आलस अभी तक तारी है । लिखने पढ़ने और कहीं हिलने डुलने का मन नहीं करता है । जो लिखना पढ़ना यात्राओं और बीमार होने की वजह से लगभग महीने भर से छूटा था उसमें इस नए इलाज़ ने और वृद्धि कर दी । लिखना पढ़ना तो दूर की बात है साधारण दैनिक काम जैसे कि नहाना और दाढ़ी बनाना तक रुका हुआ था । दिन भर लेटे रहना और नहीं तो सो जाना । किसी तरह कक्षाएं खत्म कर के आना और फिर सो जाना । वो तो भला हो दिसंबर महीने का कि इसमे कुछ परीक्षाएँ पड़ गयी और उन कक्षाओं को पढ़ाना नहीं पड़ा ! इस बीच क्रिसमस की छुट्टियाँ और पड़ गयी सो आलस को बढने का पूरा अवसर भी मिल गया ।


इस बीच एजुकेशन विषय से नेट देने की सोच रहा था । जब फार्म डाल दिया तब सोचना कैसा ! पर हालात ये हैं कि तैयारी करना और समझना तो दूर ध्यान तक एकाग्र नहीं कर पा रहा हूँ । अभी परसों मैंने सोचा किसी को बता दूँ कि मैं किस हालत में हूँ ताकि यदि परीक्षा में पास न हो पाऊँ तो वह व्यक्ति मेरी हालत का गवाह रहे । बात हुई और उधर से गवाह रहने के बजाय किसी तरह मुझे सही हालत में लाने के प्रयास के तौर पर ब्लैकमेल किया जाने लगा । खैर जो हो रहा था वह मैं तो समझ ही रहा था पर शरीर और मन अब तक इस हालत में नहीं आ पाया है कि कुछ करने या पढ़ने का प्रयास कर सके । डरता हूँ कि कल से जब स्कूल शुरू हो जाएगा कक्षाओं में जाना पड़ेगा तब क्या होगा । वैसे हिन्दी के अध्यापक के पास बिना तैयारी के ही कक्षा में जाने का अवसर रहता है लेकिन अपनी आदत वैसी रही नहीं । लगता है कुछ दिनों के लिए वही हिन्दी का मास्टर बन जाऊँ जो कक्षा में जाकर पूछता है कि हाँ तो कल मैं कहाँ पढ़ा रहा था

ग्लोरीफिकेशन ऑफ ए फेज़ : भाग एक


इस स्थिति की शुरुआत तो आंध्र प्रदेश में ही हो गयी थी । हल्के बुखार का एहसास तो वहीं मिल गया था । लेकिन जिद थी कि सबकुछ को दाब के चलने वाले अंदाज़ में चलना ही जैसे सब कुछ हो । सो वापसी की यात्रा में न तो कोल्डड्रिंक को बख़्शा और न ही सर्दी पानी को । सब को निराले अंदाज़ से बरतता गया । वापस जब ठीहे पर पहुंचा तो देह हल्की गरम थी और चेहरे से रंग उड़ा हुआ । मुझे न भी पता चले पर छात्र जिनसे प्रतिदिन कुछ घंटों के लिए रू ब रू होता हूँ उन्होने झट से पकड़ लिया । इसका पता मुझे तब चला जब दसवीं ,ग्यारहवीं और बरहवीं तीनों कक्षाओं के छात्रों ने वहाँ के पंखे को बंद करना शुरू कर दिया जहां मैं खड़ा होता हूँ ।

मैं केरल वालों को बहुत कमजोर मानता हूँ जो मौसम की जरा सी शीतलता बर्दाश्त नहीं कर सकते । यहाँ तक कि पीने के लिए भी गरम पानी का प्रयोग करते हैं और पंखे-वंखे की बात तो जाने ही दीजिये । इनका वश चले तो स्टाफ़रूम से क्लासरूम तक के पंखों को निकलवा दें । कक्षाओं में तो अध्यापक से बड़ा शेर कोई नही होता ! इस दम पर कम से कम अपने ऊपर लगे पंखों को कभी बंद नहीं होने दिया लेकिन स्टाफ़रूम में मजाल कि कोई पंखा चला लूँ ! जहां बटन दबाया नहीं कि शिकायतें शुरू – किसी का गला खराब , किसी कि कमर में दर्द तो किसी को बुखार निकल आता है ! मतलब ये कि यहाँ ठंड को लेकर बहुत डर बैठा है । कोल्डड्रिंक तक फ्रिज़ में रखे नहीं मिलेंगे ! अब जब इनको कमजोर मानता हूँ तो जब तब अपने शक्तिशाली होने का परिचय देना पड़ता है । उसी परिचय देने में अगले दिन बुखार में भी पूरी असेंबली पंखे के सामने रहा और एक दो कक्षाओं में भी । पर छात्रों ने स्वयं ही अपने बहाने पंखे बंद कर दिए ।

दवाएं ली गयी और उन दवाओं के ज़ोर से बुखार भी कभी कभी उतर जाता देखा पर न तो पूर्णतः ठीक ही हुआ और न ही मेरा बीमार लगना खत्म हुआ । दो दिन बाद दिल्ली जाना था । जहां सर्दी लहकनी शुरू हो गयी थी । दिन में भले ही पता न चले पर सुबह शाम और रात को तो लग ही रही थी । लोगों ने जो अंदाज़ा दिया था उसे मैं यूं उड़ाता चल रहा था जैसे कि धुआँ हो या नहीं तो फलां के बात , घोड़ा के पाद ! अपने घमंड का कारण ये था साहब कि खुद दिल्ली में दस साल रहा और अभी पिछले साल तक उसी दिल्ली में ठंडे पानी से नहाता था । ऊपर से एक बात यह भी कि सारे गरम कपड़े दिल्ली में छोड़ आया था जैसे मैने तय कर लिया हो कि सर्दी में कभी दिल्ली वापस आना ही नहीं हो । वैसे भी केरल में जितनी सर्दी पड़ती है वैसी तो दिल्ली में अक्तूबर के दिन हुआ करते हैं !
मैं जब दिल्ली के लिए चला तो शरीर बुखार से तप रहा था और मैं आधी बाजू की टी-शर्ट और जीन में मैडम बना हुआ ! मैडम बनना मेरी एक दोस्त की माँ का मुहावरा है जो वह अपनी बेटी के लिए तब इस्तेमाल करती हैं जब वह सर्दी में भी टिम-टॉम बनकर बाहर निकलती है । बुखार की वजह से डर तो मैं भी रहा था लेकिन वह डर एक ऊनी चादर रखकर ही भगा देना चाहता था । कोचीन हवाईअड्डे से लेकर जहाज़ के दिल्ली पहुँचने तक मैं कितना भी मैडम बन जाता कुछ भी फर्क नही पड़ने वाला था क्योंकि ये सभी लगभग गरम स्थान ही थे । लेकिन जहाज से उतर कर समान मिलने तक के पाँच-सात मिनट में जब तक मैं चादर ओढ़ नहीं पाया लगता है सारा काम उतनी ही देर में हो गया । हवाईअड्डे पर लंबी ऊनी चादर ओढ़ कर चलना अलग ही लुक दे रहा था और मैं उसका मजा भी ले रहा था । उस समय जरा भी शुबहा नहीं था कि सुबह मेरी क्या हालत होने वाली है !


यूं तो अपनी बीमारी के बढ़ जाने का अहसास रात में ही कभी हो गया था लेकिन सुबह उठते ही आईने में चेहरा देखा तो चेहरा अपनी औकात से डेढ़ गुना बड़ा दिख रहा था और तभी से लगने लगा कि बाहरी त्वचा लुढ़क सी रही हो ! बचपन का एक साथी याद याद आ गया वह और उसका भाई हमारी ही कक्षा में पढ़ते थे । दोनों जुड़वा ! एक दिन इसी तरह सर्दी के किसी दिन उसका चेहरा सूजा हुआ था फिर धीरे धीरे उसने स्कूल आना बंद कर दिया और एक दिन हमने सुना कि उसकी मृत्यु हो गयी । उसका जुड़वा भाई अब भी मिल जाता है । वह किराने की दुकान चलाता है और उसके चेहरे में उसके मरे हुए भाई को देखा जा सकता है लेकिन अब वह अकेले है । अपने चेहरे की सूजन देख कर मुझे वही मरा हुआ लड़का याद आ रहा था । और उन दो दिनों में जबतक मेरा चेहरा सामान्य अवस्था की ओर लौटने नहीं लगा तबतक मुझे वह लड़का याद आता रहा । 

दिसंबर 07, 2013

गुंटूर और आसपास !

इधर दक्षिण भारत में भाषा का मामला बड़ा तगड़ा है । जरा सा हिलना हुआ नहीं कि एक नई भाषा सामने आ गयी । और जब से इस नवोदय की नौकरी में आया हूँ तब से घूमना फिरना कुछ ज्यादा ही हो रखा है । बल्कि ये इधर उधर जाना इसी नौकरी में आने के बाद संभव हुआ है । स्कूल में लोग कहीं जाना नहीं चाहते पर अपने को यह देश देखने का अवसर ही नजर आता है । इसलिए जब भी मेरा नाम आता है ख़ुशी ही होती है कि चलो जी एक और जगह देख लेंगे । यह ख़ुशी गुंटूर आने के नाम पर भी हुई पर जो यहाँ आ चुके थे उन्होंने कहा था कि बहुत बेकार सी जगह है । उस समय यह पता नहीं था कि गुंटूर ऐसा भी हो सकता है इसलिए ख़ुशी बहुत देर टिक नहीं पाई थी ।

जहाँ हमें ठहराया गया है वह स्टेशन के करीब ही है बीच शहर में । नवोदय में रहते हुए कुछ भी बीच शहर सा मिल जाये तो बड़ी बात होती है । स्टेशन से जब यहाँ पहुंचे उस समय कोई नही था सिवाय एक कुत्ते के जिसने हमें देखते ही भौंकना शुरू कर दिया । कुत्ते की आवाज सुनकर एक सज्जन ऊपर छत पर आये । हम तीन थे और सभी उत्तर भारतीय जिनका मुंह खुलता ही हिंदी में है और ऊपर वाले सज्जन पता नहीं कौन सी भाषा बोल रहे थे । फिर उनकी टूटी हुई हिंदी और हमारी टूटी-फूटी अंग्रेजी में जो संवाद बन पाया उसके अनुसार यही जगह थी जहाँ हमें ठहरना था और जहाँ हमारी ट्रेनिंग होनी थी ।

छिः ऐसी जगह में रहेंगे हम । मेरे साथ साथ सबके यही भाव थे । बहुत पुराना घर उसी में दीवारें डालकर छोटे छोटे कमरे बना रखी हैऔर सबसे ऊपर लकड़ी की सीढ़ी जिसका प्लेटफोर्म भी लकड़ी का ही है ।  भीतर दीवारों पर पुरानी पड़ती श्वेत श्याम तस्वीरें जो यह बताती थी कि यह घर कुछ ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । बाद में पता चला कि यह घर आजादी के आन्दोलन में खासकर आंध्र प्रदेश का केंद्र था जहाँ बड़े बड़े लोग आकर ठहरते थे और आन्दोलन को आगे बढ़ने पर विचार विमर्श करते थे । बाद में यह संपत्ति इसके मालिक ने देश को दे दी और देश ने  नवोदय को अपना ट्रेनिंग सेंटर चलाने के लिए ।

हम पहले आनेवालों में से थे और कमरे खुलवाकर अपने लिए बढ़िया जगह तलाश कर सकने वालों में से भी । कमरों का छोटापन और उनमें तैर रही घटिया सी गंध और मच्छरों की भरमार ने सबसे पहले यही सोचने को विवश किया कि ठीक है यह एक ऐतिहासिक स्थान है पर यहाँ इस सडी सी जगह में हमें ठहराने का क्या अर्थ है । यह सही बात है कि हम इस जगह को पाकर दुखी थे पर देश के इतिहास का हिस्सा बनने का भाव तो था ही । जिस कमरे में हमने अपना सामान लगाया बताया जाता है कि उसमें महात्मा गाँधी सोये थे । यह और कुछ दे न दे एक रोमांच तो देता ही है । उसी रोमांच पर टंग कर हमने संतोष करना चाहा कि मच्छरों ने बता दिया कि इस घर पर उनका अधिकार वर्षों से है । तभी एक मित्र ने चुटकी ली कि ये मच्छर महात्मा गाँधी को काटने वाले मच्छरों के वंशज हैं । हंसी छूट गयी और इसके साथ ही भूखे होने का एहसास भी होने लगा ।

नहा -धोकर निकले तो किस दिशा में खाना ढूंढने जाएँ यही तय करने में समय लग गया । वो कहते हैं न ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वही वाली मिसाल सामने आ गयी थी । खैर किसी तरह एक सड़क पकड़ी तो पता ही न चले कि खाने की दुकानें कौन सी हैं । और पता करने जाएँ तो हमारी भाषा आड़े आ जाये । हमने बहुत कुछ ट्राई कर लिया था यहाँ तक कि जो थोड़ी बहुत मलयालम सीखी वो भी लगा दिया । फिर भी वह भाषा न बना पाए जो हम किसी को सामझा सकें और कोई समझ सके । बड़ी मशक्कत के बाद एक ने एक दुकान का रास्ता बताया और जब वहां गए तो वह भी बंद थी । आंध्र प्रदेश जबसे बंटने के रस्ते पर चढ़ा है तब सइ यहाँ दुकानों का बंद होना सहज सा लगता है । खैर पैदल चलकर भूख और अगले स्तर पर चली गयी थी आगे एक दुकान दिखी और हम घुस गए । उस दुकान में हम क्या खाते यह समझाने में बहुत समय लग गया और आगे हम जब भी बाहर गए यह हमारी मुख्य समस्या बनी रही ।

किसी तरह खा कर बाहर आये और पेट भरते ही हमारी इच्छाओं ने हिलोरें मारनी शुरू कर दी कि दिन भर के फ्री टाइम का उपयोग करने के लिए यहाँ कोई देखने योग्य जगह है तो देख लिया जाये । यह पता करने में भी भाषा आड़े आ गयी । पर भाषा इस बार हमसे ज्यादा देर तक खेल न सकी । अपने एक साथी को जनकारी थी कि यह समुद्र से ज्यादा दूर नहीं है सो उन्होंने वही पूछा और जवाब भी सकारात्मक मिला । 50 किलोमीटर के बाद समुद्र । वही जो बांछें होती हैं खिल गयी । हम वापस उस ऐतिहासिक भवन की और न गए और न ही उन मच्छरों के वंशजों के पास जिन्होंने गांधीजी को काटा था ।

बस वाले ने हमें जहाँ उतारा वहां से समुद्र पांचेक किलोमीटर रहा होगा जो दूरी निश्चित रूप से तिपहिये से की जानी थी । उससे पहले हमने बहुत से संतरे बिकते देखे । एक अम्मा के खोमचे के पास पहुंचे और उनसे संतरे का रेट पूछा । उन्होंने अपनी भाषा में पता नही क्या समझा । कुछ बोली और कुछ इशारा किया जो हमें समझ नहीं आया । उन्होंने फिर कोशिश की हमें फिर समझ नही आया । फिर उन्हें ही एक युक्ति सूझी । अपनी अंटी से एक पचास का नोट निकाला और छह संतरे सामने रख दिए । हमें भक से समझ आ गया । अब एक बार समझ में आ गया तो मेरी मोलभाव की आदत जाग गयी । सोच लीजिये कितना कठिन रहा होगा पर साहब किसी तरह उँगलियों को बारह से घटाकर दस तक लाया और वो छह से बढ़कर दस तक आयीं उन्होंने भी ऊँगली का ही सहारा लिया । और जब संतरे चुनने की बारी आई तो 'बिग' और 'टाईट' हमने कई बार बोला । वहां कुछ और स्त्रियाँ थी ।
तिपहिये वाले ने जहाँ उतारा वहां से समुद्र दिख रहा था । धूप में उठती लहरें और उनकी आवाज और उन आवाजों में भीगते खेलते लोग-लुगाईयां । हम बिना किसी तयारी के आ गए थे । अब इस धूप में तैयारी करने लगे । वहां हमलोग सबसे अलग लगते होंगे । हाथों  में अपने कपडे जूतों के थैले लेकर यहाँ वहां फिरने वालों में केवल हम ही थे ।
यूँ फिरते फिरते भूख लग आई थी । पर बहुत तलाश करने पर खाने में तली हुई मछलियों के अलावा कुछ भी नहीं था । हम जब वहां पहुंचे तो वहां भी हमारी भाषा हमें पहुँचने से रोकने लगी । उस जगह कई स्त्रियाँ थी और पहली बार हमने यह देखा कि वे हम पर तरस खा रही थी ।

उस दिन के बाद से आजतक चार पांच दिन हो गए । यहाँ कई बार बाहर जाना हुआ और कई बार ये महसूस हुआ कि हम यहाँ भाषा के मामले में कितने अज्ञानी से हो गए हैं । खाने पीने से लेकर जरूरत के सामानों तक के लिए यदि बाहर गए तो भी भाषा नहीं समझ पाने का और दूसरों को न समझा पाने का दुःख बना रहता है ।

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...