नवंबर 16, 2014

कमरा नंबर नौ


जब बस गुंटूर से विजयवाड़ा की तरफ बढ़ रही थी तब जरा भी अंदाजा नही था कि ज़िंदगी के उस चेहरे से कुछ यूं मुठभेड़ हो जाएगी जो स्याह है । बाहर अंधेरा बहुत घना था लेकिन यह पता नहीं था कि वह बस अंधेरे से होकर अंधेरे में ही चल रही है । बस रोज चलती होगी । राह का अंधेरा यूं ही रहता होगा और बस जिस अंधेरे में जाती है वह भी यूं ही पसरा होगा ।

वह एक शाम थी । मैं बस से उतरकर स्टेशन की ओर जा रहा था । बस स्टेंड से स्टेशन का रास्ता पूछा और बढ़ गया । मैं आगे बढ़ता जा रहा था और पीछे कुछ ऑटो वाले भी आते जा रहे थे मैं सबको मना करता जा रहा था । कुछ कदम चलने के बाद उन्होने मेरा पीछा छोड़ दिया शायद उन्हें अंदाजा लग गया होगा कि मैं ऑटो नहीं करने वाला । ऑटो वालों से फारिग होकर मैं आगे बढ़ा तो एक पुल नजर आया । पुल छोटा था पर उसके दूसरे छोड़ से रास्ता दो भागों में बंट रहा था । इसलिए अब पुल पार करने से पहले स्टेशन का रास्ता पूछ लेना जरूरी था । पुल पर अंधेरा था । वही अंधेरा जो शहर के बाहर फैला था । उस अंधेरे में भी पुल पर भीड़ थी जैसे लोग शाम की हवाखोरी करने आए हों । या नहीं तो किसी खास बस के लिए खड़े हों जो ठीक पुल पर ही आकर रुकती है । वहाँ खड़े लोगों से रास्ता पूछ लेना जरूरी लगा । एक से पूछा और उसने बताया भी । लेकिन वहाँ खड़े लोगों के खड़े होने के अंदाज से एक बात तो साफ हो गयी कि वे किसी के बस के इंतजार में वहाँ खड़े नही थे । उनके खड़े होने से लेकर हंसी ठट्ठे तक में कहीं जाने की जल्दी या बस न मिलने की व्यग्रता नहीं थी ।

तो वहाँ हो क्या रहा था ? यह प्रश्न अपने से पूछने से बेहतर विकल्प यह था कि थोड़ी देर खड़े होकर देखा जाये कि वहाँ हो क्या रहा है और यह पता लगाया जाये कि लोगबाग खड़े क्यों हैं । वहाँ रुककर जब इधर उधर देखा तो वहाँ की संरचना समझ में आनी शुरू हुई ।

रात के आठ बजे घुप्प अंधेरे में वहाँ पुल की बांह के सहारे खड़े या उस पर बैठे लोगों में केवल पुरुष नहीं थे ठीक ठाक संख्या में स्त्रियाँ भी थी । शाम के ढलने की बाद भी उस अंधेरे में स्त्रियों की उपस्थिती से ज्यादा उनकी और उनके आसपास के लोगों की गतिविधियां मेरे कौतूहल का विषय बन गयी ।

स्त्रियाँ जगह जगह दो-दो , तीन-तीन की संख्या में खड़ी थी । कभी साथ मिलकर किसी पुरुष की तरफ बढ़ती तो कभी अकेले । पुरुष भी उनके आस पास मंडरा रहे थे । अब माजरा समझना मुश्किल नहीं था । जिनकी बात पक्की हो जा रही थी वे आगे बढ़कर ऑटो पकड़ रहे थे ।

मैं थोड़ी देर वहीं रुका रहा । अब मुझे पुल पर दो स्पष्ट विभाजन दिख रहे थे – स्त्री और पुरुष । लेकिन वे स्त्रियाँ उन स्त्रियों से बिलकुल अलग थी जो उन पुरुषों के घरों में रहती हैं । इसलिए वे उन पुरुषों के हंसी मज़ाक और छेड़छाड़ के केंद्र में थी । पुरुष जो सौदा कर रहे थे और पुरुष जो वहाँ खड़े मजे ले रहे थे वे एक सी मानसिक दशा में न भी हों लेकिन व्यवहार में एक से ही लग रहे थे । अधिकार भाव , आनंद उठाने से पहले आंतरिक हलचल और केवल इस सब को महसूस कर लेने से ही आनंदित पुरुष मन वहाँ अलग अलग चेहरों के साथ मौजूद था ।

वे स्त्रियाँ , स्त्रियाँ ही थी – उम्र और पहनावे दोनों से । उनके चेहरे के एक समान भाव और बिना किसी झिझक से एक से दूसरे संभावित ग्राहक से बात करने जाने की क्रिया यह बताने के लिए काफी थी कि वे इसे किसी आनंद के बजाय भूख मिटाने के एक माध्यम की तरह ले रही हैं ।

पुरुष के लिए आनंद और स्त्री के लिए काम । सेक्स का यह मतलब वहीं समझ में आया । यह बात कह देना कि वे यह काम पैसे के लिए झेल रही हैं कोई नयी बात नहीं होगी । लेकिन उनका व्यवहार भरे पेट वाले लोगों के शारीरिक आनंद से बिलकुल मेल नहीं खाता था । यदि किसी ने इसे महसूस किया होगा तो उसके जेहन से आनंद का खयाल ही मिट गया होगा । लेकिन पुरुषबोध जो लंबे समय से परत दर परत चढ़ते हुए निर्मित हुआ है यह बात सोचने तक के लिए तैयार नहीं होता कि जो उसके लिए पैसे देकर खरीदा गया आनंद है वह उसके साथ ही उस कार्य में शामिल विपरीत लिंगी के लिए एक काम भर है । आर्थिक काम । वह बोध इस क्रिया के आनंद पक्ष में ही उगता डूबता रहता है । इस काम के बदले उन स्त्रियों को जो कुछ भी मिलता है उसके साथ यह भी नत्थी रहता है कि वह इस काम को काम नही कह सकती । कोई भी इस काम को काम मानने के लिए तैयार नहीं है । बल्कि वे स्त्रियाँ नहीं रह जाती । 

मोहन राकेश ने अपने नाटक आषाढ़ का एक दिन में मल्लिका के मुंह से कहवाते हैं कि मैंने अपना नाम खोकर अपने लिए विशेषण अर्जित किया है । ये वही तमाम औरतें हैं जो हर छोटे बड़े शहर में किसी खास गली – चौराहों के स्याह हिस्सों में खड़ी रहती हैं । अपनी कमियों को ढँक छिपाकर रखने वाले निगाह फेर लेने में माहिर लोगों की उनपर नजर ही नहीं पड़ती ।  

अब मेरे लिए वह शाम बहुत भारी हो रही थी । ट्रेन रात के तीन बजे आने वाली थी । स्टेशन जाने की जल्दी नहीं थी लेकिन वहाँ से हट जाना ज्यादा जरूरी लगा । वहाँ मौजूद पुरुषों के हास्यास्पद क्रियाकलापों और हावभावों को भी झेल जाता लेकिन उन स्त्रियों में से यदि कोई मेरे सामने आ जाती स्वयं को साथ ले जाने की बात करती तो उनकी आँखों का सामना मैं नहीं कर पाता । इसलिए मैं तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ गया ।

पूछताछ वालों से पता चला कि ट्रेन सात घंटे की देरी से चल रही है दूसरे दिन दस बजे से पहले आने की संभावना नहीं है । पता किया तो स्टेशन पर ही रेलवे के रिटाइरिंग रूम की जानकारी मिली । दरें देखी कमरे सस्ते ही थे । एक कमरे की बुकिंग कर चाभी लेकर चल पड़ा । तीसरी मंजिल के गलियारे में कहीं कमरा नंबर नौ था । कमरा संख्या एक के बाद टिकट निरीक्षकों का विश्राम स्थल और उसके बाद एक के बाद एक कई कमरे । दूर वहाँ तक जहां तक प्लेटफॉर्म की रोशनी भी नहीं पहुँच रही थी । मुझे न तो रोशनी से कोई मतलब था न ही दूरी से । मेरे लिए रात का आराम जरूरी था ।

कमरा संख्या नौ से ऐन पहले सामने से दो लड़कियाँ आकर मेरे पास खड़ी हो गयी । उन्होने तेलुगू में कुछ कहा । मुझे समझ नहीं आया और यही बात मैंने उन्हें हिन्दी में बता दी । फिर उनमें से एक ने कहा फाइव हंड्रेड , फूल नाइट । मैं भागकर अपने कमरे के सामने आ गया , जल्दी से कमरा खोला और दरवाजा बंद कर लिया ।

उन लड़कियों का मैंने चेहरा नहीं देखा लेकिन वे उस समय उसी तरह लगी होंगी जैसी वहाँ बस स्टेंड के पुल पर खड़ी स्त्रियाँ लग रही थी ।

मेरा कमरा बंद था । बाहर ट्रेन के इंजनों की भयानक आवाज़ कभी कभी आने वाली उद्घोषणाओं के स्वर और कमरे में चल रहे बड़े डैने वाले पंखों की डरावनी आवाज़ से मिलकर अलग ही माहौल बना रहे थे । इसके बावजूद मेरा मन वहीं पुल पर अटका था । कई बार तो यह भी लगा कि लड़कियां दरवाजे पर ही खड़ी हैं ।


मेरी रात उन लड़कियों , पुल पर खड़ी औरतों और रेलवे में उद्घोषणा करने वाली स्त्री इन सबके बीच गड्ड-मड्ड हुई जा रही थी । 

अक्टूबर 29, 2014

छठ में घाट पर नहीं होना


वहाँ एक ऑफिस है जिसमें एक लड़का काम करता है ... सारे केबिन में काम करने वाले जा चुके हैं बस उसका ही केबिन रौशन है, बस उसी का कंप्यूटर चालू है...तभी घर से फोन आता है... परनाम-पाती से पता चलता है उसकी माँ का फोन है ... माताजी पूछती हैं इस बार छठ में घर आओगे न बेटा ? वह मना कर देता है ...माताजी एक बार फिर से आग्रह करती हैं कि छोटी बहन की आवाज आती है छोटी बहन यह नहीं पूछती है कि वह घर आएगा या नहीं बल्कि यह पूछती है कि इस बार वह उसके लिए क्या ला रहा है ... उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है ...फोन काटने का और इस बार छठ में घर न जा पाने का एक ही कारण है रोजगार जनित व्यस्तता ! वह कुछ सोच रहा होता है कि बहन का एस एम एस आ जाता है ...

यहाँ तक हम जो भी देखते हैं वह छठ के अवसर पर अपने घर गाँव-घर से बाहर रहने वाले हर किसी की बात है । जहां शारदा सिन्हा की आवाज़ में हौ दीनानाथ... या बहँगी लचकल जाय... सुनाई देता है कि मन मचलने लगता है । लगता है दौड़कर घाट पर पहुँच जाएँ । ऐसे में जब न पहुँच सकें तो मन विकल हो जाता है । यही विकलता एक महीने पहले से ही पूर्वांचल की ओर जानेवाली रेलों को भर देती है । फिर कोई यह परवाह नहीं करता कि कैसे जा रहा है ...उसे तो बस जाना है । उसे छठ का डाला उठने तक अपने घर पहुँचना है, संभव हो तो डाला उठाकर भी चलना है । ...और जो नहीं पहुँच पाये वे अभागे हैं । इतनी उदासी वह और कभी महसूस नहीं करता जितनी छठ के अवसर पर घर न जा पाने पर करता है ।

पूर्वांचल में वैसे ही बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं लेकिन शायद ही किसी को लबान (नवान्न) या तिल संक्रांति में अपने घर न होने का दुख हो । पर छठ की तो बात ही दूसरी है । इस पर्व की सहजता ही इसे इतना लोकप्रिय बनाती है । जितनी श्र्द्धा हो उतनी ही भक्ति , जितना जुट पाये वही प्रसाद । यहाँ तक कि अल्हुवा, सुथनी , गन्ना, हल्दी की गांठें और कोंहड़ा तक प्रसाद हैं । जरूरी नहीं कि पकवान ही चढ़ाया जाये साधारण रोटी भी प्रसाद ही है । शर्त बस एक कि साफ़-सफ़ाई बनी रहे । इतनी साधारण अपेक्षाओं वाला त्योहार क्यों न लोकप्रिय हो ।

यह छठ दो तरह से मनाया जाता है – एक तो वहाँ घाट पर सशरीर उपस्थित रहकर दूसरे घाट से अलग अपनी यादों में । दूसरे प्रकार का मनाना बड़ा कष्टकारक होता है । वहाँ सब होंगे और बस वही नहीं होगा यह भाव चैन से रहने नहीं देता । यही तो एक अवसर होता है जब लोग अपने सभी काम छोडकर , छुट्टियाँ लेकर घर पहुँचते हैं , एक दूसरे की खोजख़बर लेते हैं । समय कितना भी बदल गया हो लेकिन छठ ने आपस में मिलने-जुलने और लोगों को जोड़ने का काम नहीं छोड़ा है । इसलिए इस जुड़ाव में जहां भी एक कड़ी टूटती है बड़ी पीड़ा देती है । उस कड़ी की याद वहाँ घाट से लेकर सुदूर स्थान तक महसूस की जाती है जहां वह कड़ी है ।

सबसे ऊपर जिस दृश्य का वर्णन किया गया है वह बिहार टूरिज़्म द्वारा हाल में जारी तीन मिनट के चलचित्र का है । यह छठ के अवसर पर उपस्थित होने वाला सामान्य दृश्य है जो हर न जानेवाला महसूस करता है । हाँ माध्यम दूसरे हो सकते हैं ।
अब उस वीडियो के दूसरे हिस्से पर आते हैं । बहन के एस एम एस के बाद वह लड़का सोच में पड़ जाता है ...यादें हिलोर मारने लगती है ... वे हिलोरें इतनी तेज़ हैं कि फिर मत पूछिए क्या होता है ...उसके बाद उस लड़के के टैक्सी में चलने का दृश्य है ... शहर छोडने का दृश्य है और दृश्य है जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन पटना का ... से कैमरा घाट की ओर जाता है सुबह के अर्घ्य का समय है ... घाट सजा हुआ है ...व्रती भरे हुए हैं और नाटकीय रूप से अर्घ्य देने के समय वह लड़का अपनी माँ और छोटी बहन के सामने पहुँचकर अर्घ्य देने लगता है ।

उस लड़के का इस तरह घाट पर पहुँच जाना बाहर के लोगों को नाटकीय लग सकता है लेकिन जिन्होने भी छठ की रौनक देखी है उनके लिए यह सामान्य बात है । छठ की याद ऐसी ही होती है । एक माँ के लिए पुत्र का पर्व त्योहार में घर आ जाना (जिसके आने की कोई संभावना नहीं थी) एक चमत्कार से कम नहीं होता । मुमकिन है अगले साल से वह अपने कोनियां में हल्दी की एक और गांठ इसी निमित्त और रखने लगे क्योंकि उसे लगता है कि यह उसके आराधन का ही फल है ।

इस वीडियो में हवाई जहाज का इस्तेमाल है । हवाई जहाज किसी भी कीमत पर छठ में पहुँचने का मूर्त माध्यम है । बिहार क्या तमाम भारत में हवाई जहाज एक लगजरी है । उससे घर आना, घर आने महत्व विशेषकर छठ के महत्व को दिखाता है ।  दूसरे यह एक शिफ्ट है उस बिहारी अस्मिता से जो छठ के समय समान्यतया दिखती है – ठसाठस भरी हुई रेलगाड़ियां , लोहे के बक्सों और बोरों से लदे-फदे स्त्री-पुरुष । यहाँ हवाई जहाज एक सपना है । पर वह सपना भी क्या जो खाली सीट वाली किसी रेलगाड़ी का दिखाया जाये । बिहारी स्त्री-पुरुष बाहर जाकर मेहनत करते हैं । असुविधाओं में बड़ी सहजता से जी लेते हैं । लोगों को यह भी बुरा लगता है । इस जीवटता को सभ्य होने के नाम पर लगातार तिरस्कार मिलता रहा है ठीक अंग्रेजों के व्हाइट मेंस बर्डेन वाले अंदाज में । यही कारण है कि पूजा स्पेशल के नाम पर बिहार की ओर रेलवे जितनी गाडियाँ भेजता है उनमें से 90 प्रतिशत जनसाधारण एक्स्प्रेस होती हैं । ऐसे में बिहार टूरिज़्म के वीडियो में हवाई जहाज का आना एक मजबूत कदम है जो अपने साथ होते दोयम दर्जे के व्यवहार के खिलाफ खड़ा होता है ।

छठ पर्व की शुरुआत हो चुकी है साथ ही शुरू हो चुका है उससे जुड़ी यादों का सफर ! ... यहाँ उस नाटकीय स्थिति की दूर दूर तक संभावना नहीं है जिसमे मैं सुबह के अर्घ्य से पहले घाट तक पहुँच जाऊँ ! 
बिहार टूरिज़्म के वीडियो को इस लिंक पर देखा जा सकता है 

सितंबर 19, 2014

न बॉबी... न जासूस !


भारत की फिल्मों में लड़कियों को अपना कुछ भी चुनने में मुश्किलों का सामना करना या खुद को साबित करना आदि दर्शाने वाले कथानक बड़े आम से हैं । लंबे समय से इस तरह के विषय फिल्मों के आधार बनते रहे हैं ऐसे में जब उसे ठीक से बरता न जाये और सीधे शब्दों में कहा जाये तो उसमें छौंक न लगाई जाये तब तक मजा नहीं आता । फिल्म बॉबी जासूस में वह छौंक जासूसी के द्वारा लगाई गयी ।

बॉबी छोटी मोटी जासूसी करती है और इसी में अपना भविष्य देखती है । भारत की आम लड़कियों के किसी भी पेशे में जाने से पहले की मुश्किलें घर से ही शुरू होती हैं बॉबी के साथ भी वही होता है । घर के लोग उसके जासूस बनने के खिलाफ़ हैं । यही कारण है कि ज्यों ज्यों उसके रोजगार की शक्ल थोड़ी स्पष्ट होने लगती है त्यों त्यों घर में उसकी उपेक्षा बढ़ने लगती है । यह सब देख कर ऐसा नहीं लगता कि कोई फिल्म देख रहे हों बल्कि एक सामान्य सी चलने वाली प्रक्रिया की हद तक सामान्यीकृत हो गयी है यह बात । वस्तुतः यह एक सामाजिक यथार्थ के रूप में रूढ हो चुका है । यहीं पर यह इस फिल्म के लिए मुश्किल खड़ी करने वाली बात बन जाती है ।

जासूसी वाली फिल्मों को लेकर हम पहले से आश्वस्त होते हैं कि उनमें कुछ पीछा करने वाले दृश्य होंगे कुछ नाटकीयता होगी और चूंकि हिंदुस्तानी फिल्म है तो प्यार और उनसे जुड़े गीत तो होंगे ही । ऐसे सरलीकरण के साथ जब दर्शक हॉल में घुसता है तो ज़ाहिर है वह अपने मन में एक आड़ी-तिरछी और छितरी हुई सही मगर एक फिल्म तो लेकर घुसता है । अब यदि फिल्म उन छितरे हुए दृश्यों में से ही कुछ दृश्यों में सिमटकर रह जाये तो फिल्म से उसका निराश होना स्वाभाविक ही है । बॉबी जासूस नमक फिल्म की इसी तरह से निराश करती है ।

फिल्म के दृश्यों के संयोजन इस तरह से हैं कि रहस्य रोमांच उस सरलता के घेरे में ही घिर जाता है और वह लगातार उसी घेरे में बंद रहता है । यदि यह जासूस बनने के बजाय एक साधारण लड़की के सामान्य संघर्षों की बात होती तो इन प्रकार की दृश्य-छवि स्वीकार की जा सकती थी । इसका परिणाम यह होता है कि फिल्म जासूसी के बदले दो-चार तुक्कों, संयोगों के घटने का इंतजार करती रहती है । फिर कहानी के कहने के जब कई मोर्चे खोल दिए जाएँ और एक मोर्चा भी आश्वस्त नहीं करता हो तो फिल्म का अ-प्रभावशाली होना लाज़मी हो जाता है ।

फिल्म में एक बात लगातार बनी रही – बापों की उपस्थिती । एक बाप अपने बिछड़े बच्चों को ढूंढवाने के क्रम में सामान्य सूझ बूझ वाली लड़की को जासूस बना देता है और दूसरा बाप उस लड़की का है जो अपनी बेटी को जासूस नहीं बनने देना चाहता ।

जो बाप अपने बच्चों से बिछड़ा है वह स्वाभाविक है उन्हें खोज निकालने के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत रखेगा । और यदि वह बाप पैसे वाला हो तो बात ही क्या है । फिल्म यह चरित्र अमीर आदमी के मिथक से बाहर आकर कभी बाप जैसा नहीं दिखता । उल्टे फिल्म के एक बड़े भाग में उसका चरित्र अपराधी के शक्ल में खड़ा रहता है । अंत में चंद संवादों के जरिये दर्शकों को बता दिया जाता है कि वह एक बाप है जिसके बच्चे दंगों में बिछड़ गए, वह अमीर आदमी बन गया पर बच्चों को नहीं भुला । जासूसी फिल्में इस तरह के घुमावों के लिए जानी जाती है लेकिन वे घुमाव, घुमावों की तरह हो तब । सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उन घुमावों को वहीं दर्शकों के सामने गढ़ा गया है । म्यूट बातचीत होते हुए भी जिन प्रतीकों  का सहारा लिया गया है उनसे दर्शकों द्वारा रहस्य सूंघ लेना कठिन नहीं था और यह बात फिल्म को साधारण कर देने में कोई कसर नहीं छोडती । खैर फिल्म में एक और बाप है ।

यह बाप अपनी उपस्थिती दर्ज करवाता है एक वर्गीय चरित्र के रूप में जो कमोबेश हर घर में पाये जाने वाले बापों जैसा है । उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपना बाप होना और मर्द होना ज़ाहिर करता रहता है । फिल्म में तो दिखाया गया है कि उसे अपनी बेटी का जासूस बनना नहीं पसंद । लेकिन जो बात लगातार दिखती है वह इससे भी आगे जाती है । उसे अपनी बच्चियों का काम करना नहीं पसंद बल्कि उसे अपने घर की स्त्रियॉं का ही काम करना पसंद नहीं है । लेकिन यह फिल्म का साध्य नहीं है ।

फिल्म की स्त्रियाँ उतनी ही सशक्त हैं जितनी की साधारण भारतीय स्त्रियाँ । एक दायरे के भीतर वे खुशमिजाज़, ज़िंदादिल और खुश रहने की खुशफ़हमी पाली हुई हैं । लेकिन वह दायरा एक बड़े दायरे के भीतर ही समाता है जिसका नाम है – मर्दों का दायरा । वहाँ आते ही स्त्रियाँ न तो खुशमिजाज रह जाती हैं , न ही जिंदादिल और न ही किसी खुशफहमी में । उस समय वे फिल्म में एक भीड़ है । जिनके होने से भीड़ तो है पर न होने से कुछ बिगड़ जाये ऐसा नहीं लगता । कथानक जरा-सी देर के लिए भी उन स्त्रियों  के जीवन के माध्यम से दर्शकों पर तनाव रच पता है । वे स्त्रियाँ खाना पकाती हैं, खाने पर इंतजार करती हैं , सहती हैं और चुप रहती हैं । हिन्दी फिल्मों में यह कोई नयी बात हो ऐसा नहीं है लेकिन तब अटपटा लगता है जब फिल्म नायिका प्रधान हो । साधारणतया नायिका प्रधान फिल्मों को नारीवादी विचारधारा के उदाहरण और पोषक दोनों ही रूप में देखा जाता है । कई ऐसी फिल्मों को देखने के बाद अबतक यही लगा कि उन फिल्मों में मुख्य चरित्र का स्थान स्त्रियों को मिल जाता है पर उसके बाद फिल्म में सबकुछ वैसे ही बना रहता है जैसे नायक प्रधान फिल्मों में । नायिका के आसपास का वातावरण , लोग कथानक और फिल्म का समाजशास्त्र उसी पुरुष वर्चस्व वाले मॉडल पर कसा हुआ है । सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस नायिका प्रधान फिल्म में भी मुख्य किरदार का समाहार उसकी समाजस्वीकृत’,  स्त्रियोचित भूमिका में होता है । बॉबी के उस तथाकथित जद्दोजहद भरे सफर का , उसकी इच्छा का समर्पण पिता रक्षतु कौमारे के पैटर्न पर ही होता है । फालतू के संवाद और रूपक पुरानी दृश्यावली ही गढ़ते हैं ।

निर्देशक चरित्रों के पर कतर कर उन्हें पालतू बनाते हुए भी लीक से हटकर चलने वाले तमगा हासिल करने की ज़िद में है । हैदराबाद जैसे शहर में तमाम मनमुटावों के बाद यदि लड़की अलग रहने लगे तो पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा और लड़की भी वैसी जो जासूस बनना चाहती हो जहां कदम कदम पर खतरे हों । और रही बात अपवाद और नाक कटने की तो वह बॉबी के उस घर में रहते हुए भी हो ही रहा है । लेकिन निर्देशक उस लड़की में ऐसा द्वंद्व भी पैदा नहीं कर पाता ।


बॉबी जासूस एक ऐसी फिल्म बनकर निकली जो न तो रहस्य रोमांच ही भर पाती है, न ही किसी प्रकार का द्वंद्व ही पैदा कर पाती है । अलबत्ता दावा जरूर करती है । 

जुलाई 30, 2014

हिन्दी और सीधे सादे होने का नाटक


जैसा कि हमारे नवोदय विद्यालय में नियम है नवीं कक्षा के लगभग 25 बच्चों को अपने मूल विद्यालय को छोड़कर देश के किसी दूसरे राज्य के नवोदय विद्यालय में पढ़ने जाना होता है और इसी तरह की उल्टी प्रक्रिया भी दोहरायी जाती है । इसी नियम के तहत हमारे विद्यालय के छात्र उत्तर प्रदेश के गौरीगंज अमेठी नवोदय विद्यालय पढ़ने जाते हैं और वहाँ के छात्र यहाँ आते हैं । इस बार भी यह क्रिया दोहराई गयी । हमारे विद्यालय के एक अध्यापक जो अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उनके साथ पुस्तकालय इंचार्ज छात्र छात्राओं को लेकर गवापस आकर जो उन्होने बताया वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था ।

वे यहाँ से राप्ती सागर एक्स्प्रेस में गए थे । एर्णाकुलम से गौरीगंज तक की उबाऊ यात्रा तीन दिनों में पूरी होती है । जाने आने और खाने पीने का खर्चा सरकार वहन करती है । लेकिन ये वहाँ करने का जो तरीका है वह बहुत पुराना है । इसके परिणामस्वरूप सरकारी धन अधिकतम दो दिनों तक भी बमुश्किल चल पाता है । फिर छात्र अपने पैसे से खाएं या नहीं तो अध्यापक / अध्यापिका जो साथ गए हैं वे अपनी उदारता से कुछ दिला दें तो बड़ी बात है । इसमें एक काम और होता है । अध्यापक / अध्यापिका रेलवे के कैटरिंग कर्मचारियों से मोलभाव करते हैं ताकि उन्हीं पैसों में बच्चों को कम से कम ढाई दिनों का खाना मिल जाए और तीसरी शाम भूखे भी गौरीगंज पहुँच गए तो कोई बात नहीं वहाँ विद्यालय का खाना मिल जाएगा !

पिछली बार जब मैं गया तो मैंने दूसरा तरीका अपनाया था । लेकिन इस बार गए अध्यापकों के सामने दूसरा रास्ता था ही नहीं । क्योंकि वे मोलभाव नहीं कर सकते थे । कहाँ से मोलभाव करते उन्हें हिन्दी आती ही नहीं थी । राप्ती सागर में आईआरसीटीसी के कर्मचारी हिन्दी भाषी हैं । बात यहीं खत्म नहीं होती । उन कर्मचारियों ने हिन्दी नहीं बोलने के कारण इन दोनों अध्यापकों की बड़ी फ़ज़ीहत की । अंग्रेजी के उक्त अध्यापक ने बताया कि यह दुर्व्यवहार एक यात्रा के पहले दिन से शुरू होकर यात्रा अंतिम होने के समय तक जारी रहा और अंततः यह एक गतिरोध में बदल गया । इस गतिरोध का नतीजा यह था कि वेंडरों ने मनमाने दामों पर सामान बेचा । सरकारी पैसा तो जल्दी ही चुक गया साथ में अपनी जेबें भी ढीली करनी पड़ी । यात्रा के खर्चे का हिसाब वापस आने पर विद्यालय के कार्यालय में देना होता है जिसके लिए विद्यालय के क्लर्क पक्की रसीद की मांग करते हैं । इसलिए  इन अध्यापकों ने रेलवे वेंडरों से रसीद मांगी । इस पर टका सा जवाब मिला कि जबतक हिन्दी नहीं बोलोगे रसीद नहीं देंगे । जबकि मैं जब पिछली जनवरी में छत्रों को ले गया था तब तीनों दिन की रसीद तो मिली ही थी साथ में बहुत तरह की छूट भी । लेकिन इनके साथ यह बर्ताव किया गया । वह भी हिन्दी न बोलने के नाम पर ।

वापस आने पर बड़ी मुश्किल से तरह तरह के फ़र्जी रसीदों का इंतजाम कर के कार्यालय में खर्चे का ब्यौरा जमा करवाया गया है अब यदि मार्च में यदि कैग वाले यदि उन रसीदों को नहीं मानते हैं तो इन दोनों अध्यापकों को भरी नुकसान उठाना पड़ सकता है । आर्थिक नुकसान तो चलिये बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन हिन्दी न बोलने के नाम पर जो अपमान रास्ते भर वो वेंडर करते रहे उसकी भरपाई कहाँ से हो पाएगी ?

सारी घटना का का जिक्र जब वे कर रहे थे तो स्टाफ-रूम में जो भी लोग थे वे रोष से भर गए । उस समय मैं हिन्दी और उससे ज्यादा उत्तर भारत के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मौजूद था । मेरी स्थिति अपराधियों वाली थी । हिन्दी के नाम पर यह दुत्कार तो अहिंदी वालों को निश्चय ही इस भाषा से दूर करेगा ।

इसी विद्यालय में तदर्थ(एडहॉक) सेवा के अधीन टीजीटी हिन्दी के रूप में कर्तिका नाम की एक लड़की काम करती है । केरल में रहते हुए भी उसने हिन्दी से एमए किया और उसकी हिन्दी वाकई अच्छी है । वह स्थायी अध्यापिका बनने के लिए प्रयासरत है । दो बार उसने केंद्रीय विद्यालय में पीजीटी हिन्दी की नौकरी के लिए परीक्षा दी और दो ही बार नवोदय विद्यालय के लिए भी । एक बार भी वह लिखित परीक्षा पास नहीं कर पायी है । हर बार वह दो- चार अंकों से पीछे रह जाती है । अभी ताजा उदाहरण केंद्रीय विद्यालय के पीजीटी भर्ती का है जिसका अभी हाल ही में साक्षात्कार सम्पन्न हुआ है । उस परीक्षा में भी वह चार अंकों से पीछे रह गयी ।

परीक्षा में पास नहीं होने को हम सभी छात्र की असफलता मानते हैं । यही मानते हुए मैंने भी उसका मज़ाक उड़ाया और जैसा कि स्थायी नौकरी वाले करते हैं मैंने उसे पास होने और पढ़ने के प्रति समर्पित होने पर एक लेक्चर दे दिया । लेकिन उसने मेरे सामने वह सच्चाई सामने रखी जो आज तक हमारी नजरों से ओझल होती रही है । केंद्रीय विद्यालय के पीजीटी हिन्दी पड़ के साक्षात्कार के लिए बुलाये गए अभ्यर्थियों में एक भी दक्षिण भारतीय नहीं था । जबकि इधर के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में हिन्दी विषय के रूप में शामिल है । इतने सारे दक्षिण भारतीय हिन्दी डिग्रीधारी लोगों में से एक का भी नहीं होना खलता जरूर है ।

कर्तिका कहती है कि दक्षिण के हिन्दी वालों के लिए या तो प्रश्न उनके अनुसार होने चाहिए अन्यथा उनका कट ऑफ थोड़ा नीचे होना चाहिए । बात अटपटी जरूर लगती है पर व्यावहारिक तो यही है । क्योंकि हिन्दी के प्रश्न हिन्दीभाषी क्षेत्र के अभ्यर्थियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं । वे प्रश्न इलाहाबाद , पटना का व्यक्ति हँसते खेलते कर लेता है । वह हिन्दी की तो तैयारी भी नहीं करता । सारा ध्यान परीक्षा के अन्य अंगों पर लगाता है इसलिए उसकी सफलता की संभावना ज्यादा रहती है । पर कर्तिका जैसों के लिए यह सुविधा नहीं है  ।


हिन्दी का स्तर वैसे भी देश में कोई बहुत ऊंचा नहीं है उसमें भी इस तरह के भेदभाव आने वाली पीढ़ी को हिन्दी से और इसके माध्यम से हिन्दी प्रदेश से दूर करने में बड़ी भूमिका अवश्य निभाएंगे ! जरूरत व्यवहारों के प्रति सजग होने और उसे दूर करने की है । 

जुलाई 02, 2014

दृष्टिहीन की कलम


अमेरिकी राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति भले ही बदलते रहे हों पर पिछले साठेक सालों से वहाँ के कार्यालय की एक चीज नहीं बदली है । वह है कार्यालय द्वारा प्रयोग की जाने वाली कलम की कंपनी । राष्ट्रपति जिस कलम का इस्तेमाल करते हैं वह स्किलक्राफ्ट यू एस गवर्नमेंट नामक कंपनी तैयार करती है । अमेरिका में प्रतिवर्ष पाँच मिलियन डॉलर मूल्य की ये कलमें बेची जाती हैं जिनमें से लगभग 60 फीसदी सेना के द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं । 

इन कलमों की एक विशेषता है । ये दृष्टिबाधित लोगों द्वारा तैयार की जाती हैं । 1938 ई में ग्रेट डिप्रेसन’# के दौरान वहाँ की सरकार ने दृष्टि बाधित लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट ने एक ऐसे कानून पर दस्तख़त किए जिसके अंतर्गत अमेरिकी सरकार को अपने दृष्टिहीन नागरिकों द्वारा उत्पादित सामान खरीदना था । यह कानून वेंगर – ओ डे के नाम से जाना जाता है । जल्दी ही इसमें कलमों को भी शामिल कर लिया गया । स्किल क्राफ़्ट कलमें वही कलमें हैं ।

एक ब्रांड के रूप में इस कलम को स्थापित होने में एक दशक से ज्यादा लग गए । लेकिन आज अमेरिका के 37 राज्यों के 5500 से अधिक दृष्टि बाधित लोग इस कंपनी के विस्कॉन्सिन और नॉर्थ कैरोलिना इकाइयों में भारी मात्रा में इन कलमों का उत्पादन कर रहे हैं । इसके साथ साथ और भी लगभग 3000 प्रकार के उत्पादों का निर्माण कर रहे हैं । 

ये कलमें आज भी उन्हीं विशेषताओं के लिए जानी जाती है जो आधी सदी पहले के एक 16 पृष्ठों वाले दस्तावेज़ में निश्चित की गयी थी । इनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ये शून्य से 40 डिग्री नीचे और 70 डिग्री ऊपर के तापमान पर कम से कम 1500 मीटर की लिखाई सम्पन्न करे वह भी बिना रुके हुए ।

यह तो हुई अमेरिका की बात जहां कलम तो बस एक बहाना था बड़ी संख्या में दृष्टि बाधित लोगों को जीवन की मुख्यधारा में शामिल करने का । कलम निर्माण के साथ ही बहुत से अन्य उत्पाद भी वहाँ दृष्टिहीन लोग बनाते हैं और उनसे सरकार वे उत्पाद खरीदती है ।

अमेरिकी जनसंख्या के मुक़ाबले हमारे देश की जनसंख्या में दृष्टिबाधित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा होगी । पर कहीं भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं जो इन्हें मुख्यधारा तो दूर अपना आत्मविश्वास और आत्मसम्मान ही लौटा सके । हमने अपने इन साथी नागरिकों के लिए ऐसा माहौल बनाया है जिसके अंतर्गत खाते पीते घरों के लोगों को छोड़ दें तो ये बस भीख ही मांग सकते हैं और जो नहीं मांग सकते वे और बुरी हालत में जीते हैं ।

अपने देश में एक सूरदास हुए कवि और गायक । उनकी आँखें नहीं थी । तब से आजतक पूरी हिन्दी पट्टी में सूरदास दृष्टिहीन लोगों के लिए कभी संज्ञा तो कभी विशेषण बनकर सामने आता है । शायद ही कुछ लोग ऐसे मिलें जिनको लोग उनके नाम से पुकारते हैं वरना सब सूरदास हैं । इसका दुखद पहलू यह है कि उनसे अपेक्षा रहती है कि वे कुछ न कुछ गाएँ । दृष्टिहीन होना , सूरदास कहाना और गानगीर होना एक दूसरे के लिए अनिवार्य हो । तभी रेलवे स्टेशन , ट्रेन , बस अड्डे , गाँव- आँगन जहां जहां देखिये दृश्य हीनता के शिकार लोग बेसुरे होने पर भी गीत गाने के लिए बाध्य हैं । उनकी फटी हुई आवाज इसकी पूरी सूचना देता है कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लगातार ऐसा करते आ रहे हैं ।

बचपन की एक घटना याद है । हमारी नानी के यहाँ एक व्यक्ति आए । उनको देखती ही किसी ने कहा – 'सूरदास , गीत सुनेबइ त न भीख मिलत' । उस व्यक्ति का जवाब मुझे अभी तक याद है – 'सब सूरदास गानगीरे नै होई छै' । यकीन मानिए उस व्यक्ति को जरा सी भीख भी नहीं दी गयी और दुत्कार कर आँगन से बाहर कर दिया गया ।

शैलेश मटियानी की कहानी है दो दुखों का एक सुख उसमें भी स्टेशन की पटरी पर बैठा सूरदास गाना ही गाता रहता है ।
निश्चित तौर पर भारत के सभी सूरदास भीख नहीं मांगते हैं । पैसे वाले घरों के लोग बाहर ही नहीं निकलते हैं लेकिन जिनके परिवार की माली हालत औसत दर्जे की भी है उन्हें बाहर आना ही पड़ता है । बाहर जो दुनिया है उसमें भूख मिटाने के लिए कोई रोजगार नहीं है ।


हम अमेरिका को बहुत भला बुरा कहते रहते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सम्मान और पहचान दिलाने में जितनी मदद वहाँ की सरकार करती है उतना हम सोच भी नहीं सकते । उदाहरण हमारे सामने है । वहाँ 1938 ई में ही सरकारी तौर पर दृष्टिबाधित लोगों को रोजगार देने के लिए राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम बनाए गए और हम अभी तक विचार करने की हैसियत में भी नहीं आ पाये हैं । 

# ग्रेट डिप्रेसन के बारे में इस लिंक पर पढ़ें ---
http://history1900s.about.com/od/1930s/p/greatdepression.htm#


जून 06, 2014

गैर बराबरी की मातृभाषा में शपथ-ग्रहण


मेरे पिताजी संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ाते हैं । उनका महाविद्यालय जिस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है वह विश्वविद्यालय भी संस्कृत विश्वविद्यालय ही है । यहीं से कह सकता हूँ कि आज जब वे अपने कार्यस्थल पर गए होंगे तो वे और उनके सहकर्मी मिले होंगे तो बहुत खुश हुए होंगे । बहुत चर्चा हुई होगी और आशा-उम्मीदें भी बंधी होगी । इस खुशी का कारण पक्के तौर पर यह होगा कि कल बहुत से सांसदों ने संस्कृत में शपथग्रहण किया है । समय तो अब पहले जैसा नहीं रहा कि समाचार पहुँचने में दो तीन दिन अलग जाये और जब तक पहुंचे तब तक यह एक अफवाह की शक्ल ले ले । लेकिन संस्कृत महाविद्यालय में जश्न का सा माहौल तो आज ही रहा होगा ।   

संस्कृत भाषा मेरे पिताजी और उनके जैसे बहुतों को रोटी दे रही है । हमारे घर की एक एक ईंट मे उसी भाषा का योगदान है । इतना स्वीकार करते हुए भी मुझे कई बार यह लगा कि मेरे पिताजी जिस स्थान पर काम करते हैं वह किसी और ही दुनिया में है । यहाँ यह कह देना कि वह महाविद्यालय एक पिछड़ी हुई दुनिया की चीज है बड़ी हल्की बात होगी । ऐसी बात उस संस्थान के बारे में लोग कहते भी हैं । उस महाविद्यालय में छात्रों की न्यूनता को देखकर बिना कुछ कहे इसे समझा जा सकता है । लेकिन मेरा मानना है कि अपने पिछड़ेपन को लेकर नहीं बल्कि दुनिया की ओर पीठ करके खड़े होने की प्रवृत्ति उस संस्थान को बाकी दुनिया से काट देती है ।

यह बात मेरे पिताजी और उन जैसों की खुशी से अलग है । निश्चित तौर पर इस तरह से बात करना उन सबके प्रति द्रोह की तरह देखा जाएगा इसके बावजूद मुझे उस संस्थान की अगतिशीलता से चिढ़ के स्तर तक परेशानी है । कई बार मुझे लगता है कि संस्कृत कैसी भी उपयोगी भाषा रही हो लेकिन इसके भीतर अहंकार, दंभ, गैर बराबरी, उत्पीड़न आदि के तत्वों को आश्रय देने के सारे खाने मौजूद हैं । उन खानों में घुसे बैठे ये तत्व भाषा के मूल कार्य को खत्म कर उसे भय और गैर बराबरी की भाषा के दर्जे तक ले आए हैं । भाषा के द्वारा यह सब कैसे संभव हो पाया और कब इसकी शुरुआत हुई यह अलग चर्चा का विषय है तथा बहुत सी विशेषज्ञता की मांग करता है लेकिन इन सबने मिलकर संस्कृत भाषा का जो स्वरूप बनाया है वह मूल रूप से घृणा का ही ठहरता है । और आश्चर्य तो तब होता है जब उसी भाषा से धन अर्जित करने वाले लोग उस भाषा के सिमट जाने के मूल कारण को ठीक करने के बजाय उसे ही दुहराने में लगे रहते हैं ।

संस्कृत भाषा ने जो भी साहित्य दिया हो लेकिन उसके सेवकों के लिए उनका कोई महत्व नहीं है । संस्कृत आज भी अपने सेवकों में लोकप्रिय है तो बस अपने भीतर से उपजे कर्मकांड की वजह से । यही कर्मकांड उन सेवकों को रोटी देता है और तमाम प्रयासों के बावजूद भी लगातार बनी हुई जाति व्यवस्था में उन्हें स्व-निर्मित और स्वनिर्धारित श्रेष्ठता का भ्रम देता है ।

यहाँ यह कह देना भी ठीक ही रहेगा कि ऐसा केवल सहरसा जिले के उस महाविद्यालय तक ही सीमित नहीं है बल्कि बड़े शहरों के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में चलने वाले संस्कृत विभागों की भी यही हक़ीक़त है । इन विभागों में संस्कृत की जातीय संरचना उसी तरह अटूट चल रही है । दिल्ली में बहुत दिन रहा तो दिल्ली विश्वविद्यालय की दशा से पूरी तरह वाकिफ हूँ । मुश्किल से एक दो नाम होते हैं गिनाने को जो संस्कृत की सेवक जातियों से अलग हों । बीएचयू तो खैर बहुत सारे विषयों में वह जातीय रचना बनाए हुए है ।

अब फिर से बात करते हैं उस खबर की जिसे सुनकर मेरे पिताजी और उनके सहकर्मी बहुत खुश हुए होंगे । वही संस्कृत में शपथ लेने वाली बात ।संस्कृत में शपथ लेना एक दुराग्रह है । दुराग्रह इसलिए कि उस समाप्त हो चुकी भाषा को बस शपथ ले लेने से जीवित नहीं किया जा सकता । एक चुकी हुई भाषा के प्रति सम्मान होना चाहिए । उसे सुरक्षित भी रखने की आवश्यकता है ।  लेकिन ऐसी वह अकेली भाषा नहीं है जो अस्तित्वहीन हो रही हो, इस देश की हो और प्राचीन हो ।

संस्कृत में शपथ लेने का सारा मामला ही दूसरा है । यह भाषा शपथ लेने को प्राचीन राजसी ठाठ देती है । जिस भाषा में राजा महाराजा राज्यारोहण करते रहे हैं और जो भाषा अपने उत्स से लेकर आजतक राजा और प्रजा में अंतर करवाती आ रही है उस भाषा में शपथ लेना राजत्व को पुनर्जीवित करने का भ्रम देता है । इतना तो सब जानते हैं कि संस्कृत अपने चरम काल में भी केवल शासकों की भाषा ही थी जो इस शपथग्रहण से प्रमाणित हो गयी । इस भाषा में शपथग्रहण को अंग्रेजी में कसम लेने के बरक्स देखा जा रहा है । कहा जा रहा है कि अंग्रेजी जो शासकों की भाषा थी उसके मुक़ाबले संस्कृत को रखा गया । जबकि संस्कृत शासकों की ही भाषा थी । जिन लोगों ने ऐसा किया वह निश्चित तौर पर यह दिखाना चाहते थे कि राजा और प्रजा में अंतर है । राजा राज के अनुकूल बोली बोलता है ।

फिर आती है भाषा की रक्षा और उसके सम्मान की बात तो संस्कृत अकेली भाषा नहीं है । और बहुत सी भाषाएँ हैं जिनको बोलने वाले दो चार ही बचे हैं । जब बचाना ही था तो उन्हें बचाते । किसी भाषा की रक्षा और उसका सम्मान इस तरह से नहीं होता है कि चार लोग शपथ के दस वाक्य उस भाषा में बोल लेंगे और वह भाषा बढ़ गयी । किसी भी भाषा की रक्षा के लिए खास सोच की जरुरत है जो रोजगार से ज्यादा जुडती है । यह कहना बहुत कठिन नहीं है कि आगे संस्कृत या इस तरह की अन्य किसी भाषा में रोजगार का सृजन हो सकेगा । शायद ही सरकारी पैसे और संरक्षण में चल रहे महाविद्यालयों से कहा जाएगा कि आप अपने यहाँ संस्कृत भाषा से गैर बराबरी बढ़ाने वाले तत्व निकालिए और इसे एक भाषा और साहित्य के रूप में आगे बढ़ाइए न कि आपसी नफरत की संचारक भाषा के रूप में ।


मई 15, 2014

हमें साथ रहना नहीं आता !


आज मेट्रो में चलते हुए मेरे भाई राजीव ने पूछा कि उत्तर पूर्व के लोग फिल्मों में क्यों नहीं आ पाते ... सवाल बड़ा सही था पर उसका सबसे चलताऊ उत्तर ये हो सकता है जो कि मैंने दिया भी कि चूँकि फिल्मों से हमारा मतलब ज्यादातर हिंदी फिल्मों से होता है और उन्हें हिंदी नहीं आती और आती भी है तो उनके उच्चारण की हिंदी इसीलिए वो इधर स्वीकार्य नहीं है ... पर क्या सच बात यही है ? 

सोचिये तो लगता है कि हम उत्तर भारतीय अपना स्थान और सम्मान तो चाहते हैं पर पूर्वोत्तर और दक्षिण के लोगों के लिए जरा सी स्पेस छोड़ने के लिए राजी नहीं हैं . 
दक्षिण को तो भूल भी जाइये क्योंकि वहां विकास अपने तरीके से ही हुआ पर उत्तर से बढ़िया हुआ है लेकिन पूर्वोत्तर ? 

पूर्वोत्तर के लिए हमारे पास कोई प्लान नहीं है ... जो थोड़े बहुत हैं भी वे वहां के लोगों पर  दोषारोपण के अलावा कुछ नहीं करते ! वहां की ख़बरें मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आती , और आ गयी तो पूरी नहीं आती . इसका एक उदाहरण हमारी दोस्त गायत्री ने दिया कि मनोरमा इयर बुक में असम की राजधानी गुआहाटी दी हुई है ! इस बाबत मैंने अपने एक दोस्त से यूँ ही पूछ लिया कि असम की राजधानी कहाँ हैं तो उसका जवाब था गुआहाटी ! मनोरमा इयर बुक से बहुत से प्रश्न सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूछे जाते हैं ! जहाँ राजधानी के नाम में इतनी बड़ी गड़बड़ी हो सकती हो वहां दूसरे आंकड़ों को संदेह से देखना स्वाभाविक है . इस तरह की जानकारी वाले लोग यदि सरकारी सेवा में जाते हैं तो उत्तरपूर्व के प्रति क्या नजरिया रखेंगे या रखते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है ! 

सरकारी सेवा में, खेल में, मनोरंजन में पूर्वोत्तर की भागीदारी नगण्य है . एक दो नाम गिनाये जा सकते हैं . पर क्या यह उसी तरह है जिस तरह कि उत्तर भारतीय इन क्षेत्रों में भरे पड़े हैं ... ? 
पूर्वोत्तर का सिनेमा हमारे भोजपुरी सिनेमा से उत्कृष्ट फिल्में दे चुका है और उधर का रंगमंच भी यहाँ से कहीं बेहतर है फिर भी उनकी भागीदारी मुख्यधारा में बहुत कम है . बिहार-यू पी के लोगों का मजाक उड़ाकर बहुत सारी फिल्में बन जाएँगी पर पूर्वोत्तर का जिक्र हमारी फिल्मों में मजाक के रूप में भी नहीं आता है ! अभिनेता-अभिनेत्री बनाने की बात तो बहुत दूर है ! 

एक खेल है हमारे यहाँ क्रिकेट ! सारा भारत उसके साथ उगता डूबता है पर प्रतिनिधित्व के नाम पर यहाँ भी उत्तरपूर्व खाली हाथ है . जबकि निजी स्वामित्व वाले विद्यालयों को छोड़ भी दें तो नवोदय और केन्द्रीय विद्यालयों जैसे सरकारी पैसे से चलने वाले विद्यालयों से हर बार ख़बरें मिलती हैं कि उत्तर पूर्व रीजन के फलां ने इतनी बढ़िया बैटिंग या बोलिंग की है कि उसका चयन कम से कम अंडर -19  में होना ही चाहिए ! पर न तो वहां होता है और न ही उससे आगे ! यहाँ यह कहा जा सकता है कि पूर्वोत्तर के लोग फ़ुटबाल के मुरीद हैं पर यह आधा सच है . बंगाल से सौरव गांगुली के चयन के बाद पूर्वोत्तर में क्रिकेट खूब लोकप्रिय हुआ था लेकिन उचित प्रोत्साहन के आभाव में बात आगे नहीं बढ़ पायी . क्रिकेट की बीसीसीआई की टीम को छोड़ भी दें तो आई पी एल तक में बेंच पर बैठा उत्तरपूर्व कोई नहीं दीखता है . 

अब बात क्रिकेट की चल पड़ी है तो दक्षिण अफ्रीका का  उदाहरण याद आया है . वहां अश्वेत लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए क्रिकेट से लेकर बहुत से खेलों में उनके लिए स्थान आरक्षित कर दिया है . यह उदाहरण भारत में भी अपनाया जा सकता था . तब शायद उत्तरपूर्व हमसे जुड़ा हुआ महसूस करता ! 

हम चुनावी फायदे के लिए आरक्षण की बात तो करते हैं पर देश के सुदूरवर्ती लोगों को जोड़ने के लिए आरक्षण की बात नहीं करते हैं . हाँ घुमा-फिरा कर वही नौकरियों वाले आरक्षण की बात लोग जरुर करते हैं . पर यहाँ यह सोचना जरुरी है कि सरकारी नौकरियां इतनी नहीं हैं कि बहुत बड़ा आकर्षण पैदा कर सके . पर फ़िल्मों और क्रिकेट में उनकी भागीदारी को यदि पक्का किया जाये तो बात बदल भी सकती है . 

पर मुझे नहीं लगता है कि कभी ऐसा हो पायेगा ... होगा बस यही कि चीन दोनों ओर से एक दूसरे के प्रति अविश्वास होगा आरोप प्रत्यारोप होंगे और लगातार तनाव बना रहेगा ! 

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...