सितंबर 16, 2013

शिक्षक दिवस पर इधर-उधर की


(इस पोस्ट को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगेगा जैसे पहला शिक्षक दिवस न हो गया पहला करवा चौथ हो गया ! अब जहां व्यक्तिगत होने की गुंजाइश होती है वहाँ ऐसा तो लग ही जाता है )

इस पेशे में आने के बाद यह पहला शिक्षक दिवस था । पहले को लेकर मन उत्साहित रहता है और कभी कभी हल्की घबराहट भी होती है । यह घबराहट तब दिखने भी लगती है जब अपने स्तर से ही किसी कार्य का निष्पादन करना पड़े मसलन, कोई कार्यक्रम संचालित करना या फिर भाषण ही देना । वैसे कई बार ऐसा हुआ कि घबराहट के बावजूद अंत में लोगों की सराहना मिली हैं पर भीतर किस तेजी से मन और मस्तिष्क काम करते हैं वह मैं ही जानता हूँ ।

बहरहाल , इस बार के शिक्षक दिवस पर मेरे लिए छात्रों और सहकर्मियों की कुछ योजनाएँ तो थी पर इसे मेरे और उनके लिए दुखद ही कहना उचित होगा कि, मैं अपने विद्यालय से बाहर था । इतना बाहर कि , चाहकर भी न आया जा सके । कई बार ऐसा लगा कि घर में कोई बहुत बड़ा आयोजन हो और मुझे किसी काम से बाहर भेज दिया गया हो । आंध्र प्रदेश के जिस विद्यालय में मैं ठहरा हुआ था वहीं मेरे साथ एक और व्यक्ति थे अमिताभ । उनका भी पहला ही शिक्षक दिवस था । उनका फोन सुबह से ही बजने लगा । गज़ब की मुस्कुराहट और घमंड के साथ उन्होने दो – तीन बार बताया कि , उनके छात्रों के फोन आ रहे हैं जो उन्हें शिक्षक दिवस की शुभकमनाएं दे रहे हैं । तब तो मुझे और बुरा लागने लगा । उतना ही बुरा, जितना बचपन में किसी त्योहार पर आस पास के बच्चों को नए कपड़े मिल जाते थे और मुझे तथा मेरे छोटे भाई को नहीं मिलते थे , जितना हमारी नानी द्वारा हमें बरफ़ खरीदने के लिए बेच नहीं देते और दूसरे बच्चों का हमारे सामने बरफ़ खाते समय लगता था । जब नानी बेच नहीं देती तब यह समझ में आने लगा था कि , नाना-नानी हमें कितना ही प्यार करें पर हमारा उन पर खासकर उनकी संपत्ति पर वह अधिकार नहीं है जो उनके पोते-पोतियों ने भोगा । इसलिए हमारे हठ का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था फिर जमीन पर लोटकर देह पटकना तो दूर की बात है । लगभग वही स्थिति मैं वहाँ वेट्टम के नवोदय विद्यालय में महसूस कर रहा था ।

मैं जानता हूँ कि मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए था । हालांकि जो महसूस कर रहा था वह किसी पर ज़ाहिर भी नहीं होने दिया लेकिन मन तो तमाम आदर्शों और सिद्धांतों से परे है । यह आध्यात्म नहीं बल्कि वास्तविकता है । बाहर पाँच सितंबर एक सामान्य सा दिन था और मुझे भी इसे ऐसे ही लेना चाहिए था लेकिन मन के बंधन तो होते ही नहीं न ! तभी तो दोपहर बाद जब मेरी बारहवीं की छात्राओं ने फोन किया तो मन संयत नहीं रह पाया । धन्यवादों के अलावा मैंने क्या बोला यह मुझे न तब पता चल पाया और न ही अब याद आ रहा है । पर उसके बाद एक संतोष जैसा तो मिल ही गया था । मेरे भी छात्रों ने मुझे फोन कर के विश किया पर शायद मैं अब उस आत्मप्रशंसा वाली बिहारीयत को भूलता जा रहा हूँ । इसलिए न तो अमिताभ के सामने जाकर जताया और न ही ऐसा कुछ करने की इच्छा ही हुई ।

वेट्टम का शिक्षक दिवस
अमिताभ के छात्रों के फोन से हम दोनों की नींद टूट ही चुकी थी और फिर अपने चयनित खिलाड़ियों को तैयार कर सात बजे तक खेलों के लिए लाना भी था इसलिए चेहरे पर एक बूंद पानी डाले बिना ही लगभग भागकर छात्रावास की ओर जाना पड़ा । जब तक छात्रों को लाकर सबकुछ व्यवस्थित किया और सोचा कि कॉटेज पर जाया जाए तब तक नवोदय विद्यालय वेट्टम के छात्र अपनी प्रातः कालीन सभा ( मन में आ रहा है कि मॉर्निंग असेंबली लिख दूँ पर लिखुंगा नहीं ) की तैयारी करने लगे । बिना बोले ही हम दोनों में यह सहमति बन गयी कि अपने अपने विद्यालयों की प्रातः कालीन सभाएँ तो हमने देख ही राखी हैं अब मौका मिला है तो यहाँ भी खड़े हो लेते हैं और ऊपर से आज शिक्षक दिवस भी है । सभी नवोदय विद्यालय में एक सी प्रक्रिया ही प्रतिदिन दोहराई जाती है यही कारण था कि , सभा शुरू होने के कुछ मिनटों के भीतर धीमी आवाज़ में अपने अपने विद्यालयों की सभाओं पर बात करने लगे । उस समय न मैं बिहारी था और न ही अमिताभ । हम दोनों यह सब भूलकर आंध्र प्रदेश में सुदूर केरल के दो जिलों के नवोदय विद्यालयों की प्रशंसा कर रहे थे और वह भी एक दूसरे की बातों को काटते हुए !

सभा में स्थानीय प्रधानाध्यापक ने शिक्षक दिवस की औपचारिक सी शुभकामनाओं के साथ यह भी कहा कि उनका विद्यालय शिक्षक दिवस संबंधी कार्यक्रम और उसका विधिवत आयोजन बाद में करेगा । कम से कम दूसरे विद्यालय में ही सही शिक्षक दिवस की विद्यालयी व्स्ताविकता से वाकिफ़ होने का मौका मिलता पर वह भी बनते बनते रह गया । सभा समाप्त होने पर स्थानीय छात्रों ने डरते डरते ही सही विश करना शुरू किया । कुछ हाथ मिलाने तक आ गए पर लगा कि इसी बहाने हम जो उनके लिए अजनबियों से थे करीब आ सकते हैं । हमने भी झिझक तोड़कर उनकी शुभकामनायें स्वीकार की और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की । इसके बाद हम भागे थे कॉटेज की ओर क्योंकि जल्दी ही तैयार होकर नाश्ते के लिए आना था !

नाश्ते पर भी शुभकामनाओं का एक दौर चला । इस बार पिछले दो दिनों से हैदराबाद संभाग के जिन तीसेक शिक्षक-शिक्षिकाओं से जान-पहचान हो चली थी उन्हें हमने और हमें उन्होने विश किया । इसके साथ ही शिक्षक दिवस संबंधी औपचारिकता का समापन हो गया क्योंकि याद नहीं आ रहा कि उसके बाद किसी ने किसी को कुछ कहा हो ! अब तो वह आवश्यक रूप से एक सामान्य दिन था ।

खीज़-
यहाँ यह कहने का बड़ा मन कर रहा है कि , शिक्षकों की तरह उनके लिए निर्धारित दिन भी निरीह है । ऐसा इसलिए कहना पर रहा है कि , इसके आयोजन का भार भी शिक्षकों पर ही होता है इसलिए वे अपने लिए बहुत कुछ ऐसा जुटा पाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते जो थोड़ा सा तड़क – भड़क वाला हो , हल्की विलासिता वाला हो । वह किसी तरह एक कामचलाऊ दिन अपने लिए बनाने की कोशिश करता है जो आधे घंटे या फिर एक घंटे के औपचारिक से कार्यक्रम के बाद खत्म हो जाता है । दूसरे इस दिन को मनाने में आम लोगों की भागीदारी होती ही नहीं है और उनकी दिलचस्पी भी नहीं । यह शिक्षकों की सामाजिक स्वीकृति !
जिम्मेदारियाँ तो बहुत डाली गयी हैं शिक्षकों पर और उन्हें निभाते हुए भी देखा जा सकता है लेकिन जिस समाज ने उन्हें ज़िम्मेदारी दी है उसमें उनकी स्वीकृति उस स्तर पर है जहां से एक पायदान भी नीचे गिरे तो अस्वीकृति का दारा शुरू हो जाता है । यह कहना बहुत सरल है कि शिक्षकों ने अबतक अपना काम नहीं किया और यह कहना बहुत कठिन और कहने वाले की सोच से परे कि , शिक्षकों को करने कहाँ तक दिया जा रहा है ।

शिक्षक समस्याओं की पहचान सबसे पहले कर सकता है बल्कि करता है लेकिन अपनी व्यवस्था में सबसे नीचे होने के कारण उसके लिए एकमात्र विकल्प यही रह जाता है कि आगे-पीछे ध्यान दिये बगैर घिसे-पिटे पाठ्यक्रम को और घिसता रहे । यदि उसके पास नए विचार हैं और उस विचार में संभावनाएं भी हैं तो भी हर बार किसी न किसी बोर्ड , समिति या फिर संगठन के कार्य करने के तरीकों का हवाला देकर उन विचारों की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है । आगे नेतागिरि , माता-पिता , धार्मिक , सामाजिक और आर्थिक समूह शिक्षकों को किस तरह से पंगु करते रहते हैं उसे यदि समझाने की जरूरत रह गयी है तो इतना अनभिज्ञ और अज्ञानी समाज कहीं और नहीं मिल सकता !


सीख रहा हूँ  - 
शिक्षक दिवस बीता तो लगा कि , अपने एक शिक्षक के तौर पर बिताए गए समय पर तो गौर करना ही चाहिए । यह एक लेखा-जोखा नही , अनुभवों में हुआ परिवर्तन है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह अनुभवों के साधनों में हुआ बदलाव है । पिछले शिक्षक दिवस से पहले अपने को इस बाबत शुभकामनाएँ देने का तो न तो कोई औचित्य था और न लोग देते थे । जिन एक दो ने लीक से हट कर ऐसा किया वे भी बी एड के बाद के ही लोग हैं । यह भी की उनकी संख्या दो –तीन से ज्यादा नहीं थी ।

बचपन में शिक्षक दिवस का अर्थ हमने बस यही जाना था की उस दिन आधी छुट्टी के बाद एक अध्यापक सौ – पचास डाक टिकट लेकर एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाते थे और छात्रों से पाँच रूपय लेकर एक टिकट बेचते थे । उनका बेचना कम और हड़काना ज्यादा होता था । हड़काते हुए कहते थे कि इससे एकत्र किया हुआ पैसा शिक्षकों के कल्याण में लगाया जाएगा ! जो बच्चे पैसे बचाना चाहते थे वे तो दूसरी पाली में विद्यालय आते ही नहीं थे मतलब उन शिक्षकों के कल्याण का पैसा स्वयं हड़प कर जाते थे । इस तरह बहुत कम पैसा जमा हो पाता था । उन शिक्षकों के साथ ऐसा ही होना चाहिए था ! नानी गाँव का मिडिल स्कूल था इसलिए मैं चाह कर भी पाँच रूपय बचाने की कोशिश नहीं करता था क्योंकि शाम होने से पहले ही शिकायत पहुँच जाती और उसके बाद अगले कई दिनों तक कई स्तरों पर ताने सुनने को मिलते । इसलिए टिकट न खरीदने का मन होते हुए भी पैसा जेब से अपने आप निकल आता था । बाद के दिनों में शिक्षक दिवस कवल सूचना भर होती और थोड़ा और बाद में पता चला की उस दिन राष्ट्रपति उत्कृष्ट सेवा प्रदान करने वाले शिक्षकों को पुरस्कृत भी करते हैं ।

अब शिक्षक बन गया हूँ तो ज़ाहिर है शिक्षकीय दशा से दो-चार होना ही पड़ता है । इसे मैंने दो-चार होना इसलिए कहा क्योंकि यह अपने – आप में एक अनाकर्षक सा ही पेशा है जैसा बाहर से दिखता है । इस पेशे में होना अपने आप में एक स्तरहीन अवस्था है जहां काम के अनुसार परिश्रमिक नही है , असीमित गति से प्रोन्नति नही है और आगे बढ़कर कहें तो इसमें ऊपरी आमदनी की गुंजाइश नहीं है । इससे अनाकर्षक क्या हो सकता है ? हमारे एक सहकर्मी का चयन हाल ही में केरल राज्य पुलिस में सहायक उपनिरीक्षक पद के लिए हुआ है । उनहोंने बताया कि वे केवल घूस की संभावनाओं के चलते उधर जा रहे हैं ऊपर से पुलिस बनना अपने आप में बहुत सी स्वतंत्रताओं और छूटों की गारंटी है ।

हमारे कारयालय अधीक्षक बार बार मुझे कोसते हैं क्योंकि मैंने डीआरडीओ में एक ठीकठाक पद के बदले मैंने शिक्षक बनना स्वीकार किया । लेकिन मैं मानता हूँ कि यदि वहाँ होता तो प्रोन्नति मिलती , वेतन भी यहाँ से ज्यादा मिलता फिर रक्षा मंत्रालय का अपना रुतबा भी था लेकिन जो सीखते रहने और अपने में लगातार परिवर्तन करते रहने का अवसर यहाँ मिलता रहा है वह कभी नहीं मिलता ! ऐसा मैं किसी को नहीं समझा सकता । फिर किसी संकल्पना , बात या अर्थ को बच्चे को समझा देने की जो खुशी मिलती है उसे अन्यत्र पाना नामुमकिन है ।

मुझे यह स्वीकार करते हुए बहुत खुशी है कि यहाँ थोड़े समय में ही बहुत कुछ सीखने को मिला । सबसे पहले तो यह कि अबतक मेरे अकेले की ज़िम्मेदारी में भी कई बार उलझन होती थी पर अब अपने साथ साथ अपने छात्रों की भी ज़िम्मेदारी किसी न किसी बहाने आती ही रहती है । अभ्यास के इतने अवसर हैं कि सीखने में त्रुटियों का कम होते जाना स्वाभाविक है ।

वहाँ वेट्टम में शाम होते होते सनीश ने फिर से वही प्रसंग छेड़ा । सनीश से अभी हाल में परिचय हुआ है वह पास के एक नवोदय विद्यालय में कंप्यूटर का अस्थायी शिक्षक है । पालक्काड से आंध्र प्रदेश जाने , वहाँ रहने और वापस आने तक वह साथ रहा था । उसने कई बार बताया कि उसकी उप-प्रधानाचार्य ने जब देखा कि वह विज्ञान विषय से स्नातक है तो उसने अपनी कक्षाएं उसके नाम कर दी और अब खुद उस समय आराम फरमाती है । अब वह कंप्युटर के अतिरिक्त विज्ञान भी पढ़ाता है ! दूसरी बात यह कि दसवीं कक्षा की एक लड़की ने उसे बहुत तंग कर रखा है । वह आने बहाने कंप्यूटर लैब में आ जाती है , अकेले मिलने की कोशिश करती है वगैरह । और वह उसे थप्पड़ लगाने वाला है !

अस्थायी शिक्षकों के साथ तो खैर हर जगह शोषण का आलम है उस पर क्या कहें लेकिन दूसरी बात पर गौर करना जरूरी था । मैंने और अमिताभ ने उसे कई तरह से समझाया साथ में  अपने उदाहरण भी दिये इस वक्तव्य के साथ कि इस उम्र में उस लड़की का और उस जैसी और बहुत सारी लड़कियों का अपने शिक्षकों के प्रति आकर्षित हो जाना कोई असामान्य बात नहीं है । बल्कि स्वस्थ मानसिक विकास की पहचान है ऐसे में थप्पड़ लगाने के बदले उसे समझते हुए उसका उपयोग कक्षा को चलाने में किया जाना चाहिए ।

सनीश की सच्चाई अपनी और शायद अमिताभ की भी थी इसलिए मुद्दे को समझने – समझाने में आसानी हुई । जब अपने साथ ऐसी स्थिति आती है तो झूठ नहीं कहूँगा कि मैं गुस्सा हो जाता हूँ या कि दुखी लेकिन धीरे-धीरे उन से निपटना सीख लिया है क्योंकि हर अभी कुछ  साल तो यही होना है जबतक कि बुड्ढ़ा न लगने लगूँ !


इस जैसी कई बातें हैं जहां शिक्षक होना मतलब लगातार सीखते रहना है । कल की घटना आज का अनुभव बना रही है और यह क्रम जारी रहने की उम्मीद है ! 

सितंबर 15, 2013

असंतोष से आगे


पिछले कुछ दिनों की भाग-दौड़ अब थम चुकी थी । बाहर से बस कितनी भी तेज चलती हुई दिख रही हो लेकिन भीतर अब शांति गहरा चुकी थी । छात्र - छात्राओं के नृत्य का उत्साह भी कब का ठंढा पर चुका था और अंदर की हल्की रोशनी में नींद में उनकी गरदनों के इधर से उधर लुढ़कने 
पर ही पता चलता था कि बस के भीतर भी गति जैसी कोई चीज है ।

हम क्षेत्रीय खेलों के लिए छात्र-छात्राओं का दल लेकर जा रहे थे । उस दल में अलग अलग विद्यालयों से आए हुए छात्रों को शामिल किया गया था और लगभग इसी तरह शिक्षक भी जुटाये गए थे । पहले की तरह उस दिन भी लगा कि जड़त्व का नियम और न्यूटन के गति का पहला नियम वस्तुओं के साथ साथ मेरे जैसे मनुष्यों पर भी लगता है जो एक स्थान पर टिक जाने के बाद अपने स्थान से इंच भर भी हिलना नहीं चाहते जब तक कि उन पर बाहरी दबाव न हो । जीतने शिक्षक थे सभी इसी नियम के उदाहरण थे और एक तो ऐसी भी रहीं जिनको  बाहरी दबाव में आना तो पड़ा लेकिन उनका गुस्सा और नखरा देख कर किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें कोई ज़िम्मेदारी लेने के लिए कहने की हिम्मत करे ! और उनकी ही एक परिचित भी मिली लगातार सोने वाली ! कुल मिलाकर यदि देखा जाये तो जितनी देर बस चली उतनी देर उनकी नींद भी एक दूसरे को बराबर मात्र में संक्रमित करते हुए जारी रही ।

उन दोनों के अलावा तीन लोग और थे । इत्तिफाक़ से हम तीनों पुरुष थे और इस विद्यालयी व्यवस्था के रंगरूट भी सो कुछ उत्साह और कुछ ज़िम्मेदारी ने मिलकर हमें नींद जैसा महसूस नहीं करने दिया । बहुधा चार-पाँच झपकियों और एकाध घंटे की दो-एक झटकेदार नींद के सहारे उस रात में हम बढ़ रहे थे । कई बार न उठने का मन होने पर भी उठकर पीछे देखना पड़ता था कि पीछे बैठे लड़के लड़कियों के करीब तो नहीं आ गए । हमारा हाल नमक का दारोगा कहानी के पंडित अलोपीदीन जैसा हो रहा था जो अपनी टप्पर-गाड़ी में कुछ सोते, कुछ जागते चल रहे थे उस रात !
यूं तो हमें इसकी आशंका आंध्रप्रदेश जाने की सूचना मिलने के समय से ही थी पर ऊपर से बार – बार यह आश्वासन दिया गया था कि , जहां जाना है वह तेलंगाना है आंध्र नहीं ! तेलंगाना शांत है और आंध्र अशांत इसलिए इन खेलों को आंध्र से हटकर तेलंगाना के विद्यालयों में स्थानांतरित किया गया है । ऊपर वालों का तर्क एक बेफिक्री तो दे ही रहा था । लेकिन जब रात के दस बजे के करीब हम तमिलनाडु में खाने के लिए रुके तो वहाँ के लोगों और चालकों ने जो बताया उसने उस आशंका को डर में तब्दील कर दिया । उन्होने हमें रस्ता बदलकर कर्नाटक का लंबा चक्कर लगा कर सीधे तेलंगाना के उस क्षेत्र में जाने की सलाह दी । फिर हमारी असमर्थता और विवशता को भाँप कर सुबह होने से पहले ही आंध्रप्रदेश के अशांत क्षेत्र से निकल जाने की दूसरी सलाह दी । जल्दी जल्दी ठूंस-ठांस कर बस में बैठे और बस तेजी से चलने लगी । हालांकि बस की गति बहुत तेज थी लेकिन यात्रा के बचे हुए किलोमीटर को सुबह होने में बचे समय में नाप जाने की कोई सूरत बन ही नहीं रही थी और हम सभी जानते थे कि हमारा ड्राइवर हॉलीवुड बॉलीवुड तो जाने दीजिये स्थानीय मालीवुड का भी कोई सुपरमैन होता तभी यह संभव हो पाता ।

खाना खाते ही शिक्षिकाएँ सो गयी और हम तीन शिक्षक आगे की दशा और शायद आशंका की मन ही मन कल्पना करते हुए बैठ गए । और बच्चे सभी इन सबसे बेखबर गज़ब चहक रहे थे । किसी ने गाना बजाने का आग्रह किया । उसे हमने भी इसी लिए माना कि चलो इसी बहाने उस अशांत आंध्र से तो सबका ध्यान हटे । गाने बदलते रहे , बच्चों का नृत्य होता रहा गानों की लय के अनुरूप बदल-बदलकर ! उनका नृत्य शुरू होते ही शिक्षिकाएँ कुनमुना कर तो उठीं पर कुछ देर बाद फिर सो गयी । ठीक ठाक समय बीत जाने के बाद कई बार ऐसा लगा कि बच्चे थक गए अब नृत्य बंद कर देंगे पर हर बार वे उस लगने को धता बताते हुए अगले गीत पर अगले उत्साह से नाचने लगते । रात एक बजे आसपास हम चेन्नै से कुछ दूरी पर रहे होंगे लगभग तभी बच्चों का नाचता हुआ अंतिम समूह हमारे पास गाने बंद करा देने आया । बस में शिक्षिकाएँ सो रही थी , बच्चे भी । ड्राइवर से हैल्पर बात कर रहा था और हम तीन लोग लगभग जागते हुए तेजी से फोर लेन पर दौड़ती बस की गति पर मुग्ध हुए जा रहे थे । लेकिन अशांत आंध्र प्रदेश की आशंका उठते ही बस की गति की सीमा का अंदाजा आने लगता ।

करीब चार बज रहे होंगे । पता नहीं मेरी नींद कैसे टूटी लेकिन जब टूटी तब पता चला कि मैन बढ़िया नींद में था । नींद टूटी तो देखा सभी सो रहे थे । हम तीनों ने जो अलिखित सा नियम बनाया था कि जागते रहना है उसके टूटने पर आश्चर्य हुआ और उससे भी बड़ा आश्चर्य तो तब हुआ जब बस को रुका हुआ पाया । तमाम आशंकाओं के सर उठाने का यही समय था । एक बार तो लगा कि कोई टोल नाका हो पर बाहर देखा तो उस जैसा कुछ नहीं लग रहा था । घुप्प अंधेरा और इक्का-दुक्का ट्रक की रोशनी और आवाज़ ही थी वहाँ जो फोर लेन के वैभव और सौंदर्य से कोसों दूर थी ।  

बाहर निकला तो देखा अपने ड्राइवर साहब अपने कागज़ात की फाइल सम्हाले एक ओर बढ़ रहे थे । समझते देर नहीं लगी कि पुलिस की चेकिंग चल रही है । मन की आशंका इस बात से  थोड़ी शांत हुई कि चलो यहाँ पुलिस तो है । उधर जाने के बजाय वापस बस में आ गया । बस में मुतमयीनी भरी थी जिसे बेपरवाह सोते चेहरों पर पढ़ा जा सकता था ।

काफी देर बाद भी जब ड्राइवर नही आया तो हम तीनों नीचे उतरे और उस ओर बढ़ गए । उस अंधेरे में भी पुलिस वाले की छवि अलग ही दिख रही थी । छोटे से कद पर तोंद निकली हुई और सर पर पुलिसिया टोपी हज़रत किसी जोकर से कम नहीं लग रहे थे । इससे स्पष्टवादी पुलिस वाला नहीं देखा था । हो सकता है और भी पुलिस वाले ऐसे होते हों पर चूंकि अपना साबका पुलिस से लगभग नहीं ही पड़ा है इसलिए इस संबंध में जानकारी कम है ।

वह सीधे-सीधे कह रहा था कि आंध्र प्रदेश में जाना है तो यहाँ रूपय देने पड़ेंगे । ड्राइवर अपनी चिरौरी कर रहा था तरह – तरह की काल्पनिक और वास्तविक विवशताओं का हवाला देकर । उस समय हमें भी यही सबसे अच्छा विकल्प लगा । हमने भी चिरौरी की । केंद्र सरकार , समिति , बच्चे , सीमित धनराशि सबका हवाला हमने भी दिया । हमने मतलब हम तीनों ने । तो एक बार हज़रत बोले कि चूंकि आपलोग केंद्र सरकार से संबन्धित हैं इसलिए बस सौ रूपय दीजिये । हमने फिर अपने हवालों को देना जारी रखा । तब शायद उसे लगा होगा कि उसका पुलिस वाला होना खतरे में पड़ रहा है । वह गरजने लगा । ए पी बंद है , प्रदर्शन हो रहे हैं कोई सुरक्षा नहीं बस वापस ले जाओ । हमारे पास अब विकल्प साफ हो गया था कि बस सौ रूपय की तो बात है निपटाओ यार ! वैसे भी ज्यादा ईमानदारी पर रहते तो रात के चार बजे न तो कोई प्रिंसिपल फोन उठाता और न समिति के किसी बड़े अधिकारी से उसकी बात करने की हिम्मत होती । ले – दे कर सुबह होने के बाद ही मामला सुलझ पाता । तब तक तो बस आंध्र के कई किलोमीटर टाप देती । सौ रूपय मिलते ही वह जोकर पुलिसवाला अगली गाड़ी को रुकवाने चला गया और हम सब बस में । हमारे अगले कुछ मिनट पुलिस के व्यवहार , भ्रष्टाचार, देश की दुर्दशा आदि की व्याख्या में ज़ाया हुए । सबसे ज्यादा इस बात पर हमने समय दिया कि उस पुलिस वाले ने हमसे घूस लिया भी तो सौ रूपय । और जैसा कि हर बार होता बिना किसी समाधान और निष्कर्ष के एक एक कर चुप होते गए ।

लगभग दस-बारह दुकानों के बाद एक दुकान पर पढ़ने को मिला चित्तूर । मतलब हम आंध्र प्रदेश में पवेश कर गए थे । अचानक मध्य एशिया , ईरान , इराक़ और कुछ मानों में अफगानिस्तान के दृश्य उभरने लगे जेहन में । ये वे दृश्य थे जो युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में देखे थे । सबकुछ शांत था । दुकानों, घरों के दरवाजे बंद थे । सड़क की पीली रोशनी भी रहस्यमय लग रही थी । किसी चौराहे पर एक पंडाल लगा था , लाल - लाल रखी थी करीने से । वहीं चाय की गुमटियों पर दो – चार लोग हंस बोल रहे थे । बस आगे बढ़ी तो फिर वही शांति । शांति को पाकर कोई अच्छा महसूस नहीं हो रहा था क्योंकि युद्ध प्रभावित जिन देशों पर फिल्में बनी हैं उन फिल्मों में तो यही देखा कि सब कुछ शांत रहता है और अचानक से कोई मोर्टार किसी गाड़ी पर दाग दी जाती है । एक अफरातफरी तो मचती है लेकिन उसके बाद फिर शांति अगले हमले तक । नींद अपना दबाव बढ़ा रही थी लेकिन जब बस की गति हल्की भी धीमी होती तो लगता कि बस को रोका जा रहा है या नहीं तो पथराव आदि से बचने के लिए ड्राइवर रास्ता बदलना चाहता हो । आँख खुलती तो वही शांति दिखती । नींद का दबाव बढ़ता ही गया ।

सुबह जब नींद खुली तो दूर दूर तक खेत फैले हुए थे । दायीं तरफ की पहाड़ी से सूरज निकलने की तैयारी कर रहा था । मैंने जब तक कैमरा निकाला तब तक तो किसी चिड़ियाँ के अंडे से निकले चूजे की तरह बाहर आ गया था । बस अब आबादी के बीच चल रही थी । सड़क के दोनों ओर सुबह की शुरुआत के नजारे देखे जा सकते थे । इन सब के बीच कहीं भी यह नहीं लग रहा था कि आंध्रप्रदेश सुलग रहा है , राह चलती गाड़ियों पर पथराव किया जाता है । युद्धभूमि की वास्तविकता से ज्यादा उससे जुड़ी अफवाहें बाहर फैलती हैं ऐसा कई बार उन फिल्मों में मैंने महसूस किया था और ज्यों ज्यों हम आंध्र में प्रवेश करते जा रहे थे त्यों – त्यों वहाँ भी यह बात पूष्ट हो रही थी । आगे दिन भर हम आंध्रप्रदेश में ही तब तक चलते रहे जब तक कि आंध्र और कर्नाटक की सीमा न आ गयी । लेकिन जिन अफवाहों से सहमकर हम चिंतित थे उनका नामोनिशान भी नहीं था । बस सरपट दौड़ रही थी । उसमें फिल्म और नृत्य के दौर पे दौर चल रहे थे ।


ऐसा नहीं है कि आंध्र प्रदेश में असंतोष नहीं होगा पर असंतोष अब वास्तविकता को स्वीकार करने में बदल रहा है । दोनों तरफ के लोग यह मानने लगे हैं कि प्रदेश के बँटवारे को वापस लिए जाने की संभावना अब नहीं बची । ऐसे में चक्का-जाम, प्रदर्शन, हिंसा आदि को जारी रखना लोगों के लिए कठिन होना स्वाभाविक ही है । लोग अपनी दिनचर्या में मशरूफ़ हैं । और उनहोंने बटवारे और उसके प्रभावों स्वीकार कर लिया है । इसके बावजूद जैसा कि हर प्रभावित क्षेत्र में होता है पुलिसवालों , कालाबाजारियों की सक्रियता बढ़ जाती है । स्थिति का फायदा ये अपने हित उठाने लगते हैं । यही आंध्रप्रदेश में आंध्र प्रदेश के नाम पर हो रहा है । 

सितंबर 10, 2013

यात्रा जितनी ही बेतरतीब


यह एक ऐसे प्रदेश की यात्रा थी जो बहुत जल्द अस्तित्व हीन होने वाला है । उसके जिस हिस्से में जाना संभव हुआ उसमें तो अभी से ‘उस’ जुए को उतार फेंक दिए जाने के चिह्न पहचाने जा सकते हैं । लोग आपसी बातचीत में आवश्यक रूप से तेलंगाना को शामिल करते हैं और ठीक उसी तरह आंध्रप्रदेश को बाहर रख रहे हैं ! जब भी तेलंगाना का जिक्र आए बढ़िया मुस्कान खिल जाती है 'तेलंगानी' के चेहरे पर ! बाहर बैठे लोग बस अंदाजे की फसल काटते रहेंगे कि आंध्रप्रदेश में इतने प्रदर्शन और विरोध हो रहे हैं तो उसे दो भागों में बांटा न जाये पर तेलंगाना की ख़ुशी और शेष आंध्र-प्रदेश का रोष देखकर तो यह बस थोड़ी सी कागज़ी कार्रवाई भर लग रही है .

यात्रा थी ही ऐसी कि तेलंगाना क्या समूचे आंध्रप्रदेश को करीब से देखने का मौका मिल गया । दक्षिण के अन्य राज्यों से बिल्कुल अलग है यह राज्य ! दूर-दूर तक फैले धान के खेत , बीच में कहीं मक्के की गहरी हरियाली , लंबे से तने पर मुट्ठी की शक्ल में बैठे बाजरे और लगभग पूरे दक्षिण भारत के सांभर के लिए भिंडी की फसल देने वाले खेत ! इतना ही नही जब घर इंसान और जानवरों की शक्ल देखी जाए तब भी लगता था कि बस उत्तर भारत में ही कहीं चल रही हो ! हाँ इसमें उत्तर की स्पष्ट छवि भरने के लिए चमकदार बढ़िया सड़कें और खेतों में खड़ी पहाड़ियों को निकालना पड़ेगा इसके बावजूद इसकी तमाम दक्षिण भारतीय विशेषताओं के विपरीत यह प्रदेश उत्तर का गुमान देती है ! उत्तर को खोजते रहने की मेरी यह प्रवृत्ति सामान्य मानवीय प्रवृत्ति ही है जो अपने आसपास के प्रति आकर्षण महसूस करता है और न हो सके तो उस जैसा खोजने की कोशिश करता है . यहाँ दक्षिण में रहते हुए उत्तर की तलाश करना इसी प्रक्रिया के तहत है .

वह बस यात्रा थी . 35 घंटे से ऊपर की बस यात्रा जिसमें डेढ़ हजार किलोमीटर नापे गए . इतनी लम्बी यात्रा में मौसम का अपना मिजाज़ लगातार ज़ाहिर होता रहा . कुछ किलोमीटर यदि बारिश थी तो आगे के किलोमीटर बेख़ौफ़ धूप के नाम रहते . फिर कहीं बादल तो कहीं लगातार जंगल की हरियाली . पहाड़ी रस्ते पर जब बस चक्कर काटती तो पेट में अजीब सी हलचल होती और लगता कि वहां कोई मंथन सा चल रहा हो और उसके परिणामस्वरूप कुछ भी बहार आ जाये . और कईयों के तो बाहर ये भी ! पहाड़ी रास्ते के दोनों तरफ कहीं भी चले जाइये खूबसूरती तो रहती ही है . पहाड़ी के एक ओर झांकता सूरज तो दूसरी और उस सूरज की छाया . इसके बाद जब समतल पर बात होती तो राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा निर्मित लम्बी-चौड़ी , चिक्कन-चुनमुन ‘फोर-लेन’ सड़क .

भाषा के नाम पर अपने देश में बहुत बाते होती हैं खासकर दक्षिण भारत में . उत्तर में तो इसकी कोई जरुरत ही नहीं पड़ती पर दक्षिण भाषा को लेकर बड़ा सजग रहता है . वह बार बार यह जरुर जता देता है कि इधर हिंदी नही चलेगी . लेकिन यह जताना पूरी तरह राजनीतिक है ऐसा कह दिया जाना कोई बड़ी बात नहीं होगी . इस यात्रा में मैंने बहुत सी हिंदी देखी जो शायद किसी भी भाषा की किताब में तो न मिले लेकिन आम जीवन में इस तरह काम करती थी कि सोच के दांग रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता था . अपनी अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ की विशेषताओं से लबरेज हिंदी के एकाध क्रियाओं से जोड़ कर बोली जाने वाली ऐसी कम से कम दस भाषाएँ देखी . इन्हें भाषा कहना अपने आप में एक अलग प्रकार की जटिलता पैदा करता है पर वे सब भाषा का मुख्य काम तो कर ही रही थी . बाजार और रोजगार ने भाषा को राजनीति से बहार कर दिया है . अब व्यक्ति पर अर्जन का दबाव है जो सीखी गयी थोड़ी बहुत हिंदी में अपनी स्थानीयता डाल कर बोलने से कम हो रही है .
‘हल्लू हल्लू चल’ , ‘तू शोर नक्को कर रे’ जैसे दकनी हिंदी के प्रयोग तो खैर आम हैं पर तमिल और मलयालम में एक दो हिंदी की क्रियाएं मिलाकर बोली गयी भाषा तत्काल जन्म लेती है और तभी मर भी जाती है लेकिन इसके माध्यम से वह बड़ा काम करके चली जाती है .

केरल से ऊपर बढ़ते हुए राज्य और उसकी आय के साधनों में हो रहे परिवर्तन से राज्य की स्थिति में होने वाले परिवर्तन तो साफ़ ही दिख जाते हैं . केरल ज्यादातर पर्यटन , बागानी कृषि आदि पर निर्भर है तो ज़ाहिर है उसे खुबसूरत रहना पड़ेगा और यह खूबसूरती लगातार दिखती है लेकिन तमिलनाडु आते आते यह खूबसूरती पसरने लगती है फिर धीरे धीरे विलीन होकर आंध्र-प्रदेश आते-आते धुल उड़ाती हुई सडकों में तब्दील जाती है . तमिलनाडु का दक्षिणी हिस्सा फिर भी पर्यटन को समर्पित है इसलिए सड़कें और उसके आस-पास थोड़ी चिकनाई रहती है लेकिन आंध्र-प्रदेश में से तो यह सब निकाल ही दीजिये . दूर दूर तक फैले हुए खेत हैं , खेतों में पशु हैं और कहीं कहीं एक छोटी सी पहाड़ी सर उठाये खड़ी है पर लोगों को देखें तो वही परिचित से आत्मविश्वासहीन चेहरे नज़र आते हैं .

इस सफ़र का ज्यादातर हिस्सा आंध्र में कटा . मैं जिस नवोदय विद्यालय में शिक्षक हूँ वहां भी और केरल के कुछेक और विद्यालयों को यदि शामिल कर लूँ तो मैं मानता हूँ कि यहाँ तो ये विद्यालय होने ही नहीं चाहिए . क्योंकि जिनके लिए इन्हें बनाया गया है वे नहीं दीखते हैं इन विद्यालयों में . लेकिन आंध्र के जिस विद्यालय में मैं गया हुआ था उसमें जाते ही अहसास हो गया कि यहाँ तो सच में इस तरह के विद्यालय की जरुरत है जो पढाई लिखाई तो दूर की बात है कम से कम दो जून का भोजन दे सके . विद्यालय के शिक्षकों से बात हुई तो पता चला कि छात्र छुट्टियों में घर नहीं जाना चाहते क्योंकि वहां खाने का ठिकाना नहीं है और कई बार खाने के लिए मजदूरी करनी पड़ेगी . जहाँ हम ठहरे थे वहां दो ही महत्त्वपूर्ण चीज थी एक तो वह नवोदय विद्यालय और दूसरा एक मंदिर . मंदिर के ही अहाते में एक छोटी से दूकान थी . उस दस- पंद्रह किलोमीटर के दायरे में आबादी तो बहुत है पर विशेष चीजें यही दो . तब लगता है कि कुछ वर्ष पहले जब देश में भाजपा की सरकार थी और आंध्र में तेलेगुदेशम पार्टी की तो उन दोनों के द्वारा बहुप्रचारित सूचना-तकनीक से सज्जित गाँव का नारा क्यों पिट गया ! खाने के लिए अन्न न हों और रोजगार का अभाव हो तब यदि इ-चौपाल लगे और नुक्कड़ पर सरकारी साइबर कैफे कितना क्रूर लगेगा !

आन्ध्र का वह हिस्सा अब आंध्र में नहीं रहेगा बल्कि यह कहा जाये कि आन्ध्र ही नहीं रहेगा . राज्य से अलग होकर एक नया राज्य बनने का भाव ही अपने आप में मादक है . सन 2000 में मैंने इसे बिहार में महसूस किया था . झाड़खंड बन रहा था तो बिहार शोक मना रहा था कितने ही स्थानीय गाने दोनों ही स्थितियों को भुनाने के लिए बने थे . ठीक यही दशा आन्ध्र की देखी . एक हिस्सा अपनी जीत पर झूम रहा है तो दूसरा रोष से पूर्ण है और वह रोष भी अब धीरे धीरे दब रहा है क्योंकि लोगों को सरकारी निर्णय में बदलाव के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं . लेकिन दोनों ही तरफ फायदा उठाने वालों की अपनी ही तरकीब देखी . कुछ खास और चर्चित नेताओं की तस्वीरें और कटआउट दोनों ही तरफ देखी . मुझे तेलुगु नहीं आती और न ही बस में बैठे किसी अन्य को लेकिन उन तस्वीरों के भाव और पैटर्न यह बताने के लिए काफी थे कि अलग अलग हिस्सों में वे अलग अलग मंशा से लगायी गयी हैं .

राजनीती, समाज, भाषा और घुमक्कड़ी से भरी हुई यह यात्रा बहुत सस्ते में मुझे नहीं छोड़ने वाली . 
लिखने को बहुत कुछ और भी है बस समय मिलने की बात है ....

अगस्त 22, 2013

नापसंदगी के कारण


शाहरुख़ खान को पसंद करना लगातार ऐसा काम रहा है जिसमें किसी की भी आलोचना की गुंजाईश बनी ही रहती है . वह भी उसी तरह का एक अभिनेता जिस तरह के कि कई अन्य हैं लेकिन उसकी अस्वीकार्यता अन्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है . यही कारण है कि उसके प्रशंसकों से ज्यादा संख्यां उन लोगों की है जो उसे नापसंद करते हैं . यह पसंद – नापसंद का मामला यूँ तो बहुत व्यक्तिगत सा है परन्तु लोकप्रिय व्यक्ति से जुड़ता हो तो सहज ही व्यक्ति के दायरे से बहार आ जाता है . फिर उस पसंद और नापसंद की तहों में जाने का मौका मिल जाता है .

चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म आने के बाद जो पहला रविवार पड़ा था उस दिन द हिन्दू समाचार पत्र में चार ट्वीट छपे थे जो पता नहीं किन स्वनामधन्य ब्लागरों के थे ! उन ट्वीटस का विषय शाहरुख़ के चेन्नई एक्सप्रेस का घटियापन था . यहाँ तक कि अमूल के विज्ञापन चित्र श्रृंखला ने भी फिल्म को ‘बकवास’ मानते हुए अपने सामायिक ‘ज्ञान’ का परिचय दिया . पर जब फिल्म की कामयाबी को देखें तो वह या तो यह बताती है कि हम दर्शकों में फिल्म देखने का शऊर नहीं है या फिर फिल्म दर्शकों के लिए बनायीं गयी और उन्होंने उसको देखा बस ! अब जो स्थिति बन गयी है उसे देखते हुए क्या फिल्म समीक्षक फिर से विचार करना चाहेंगे कि समीक्षा के मानदंड क्या होने चाहिए ?

जब मैं एम.ए. कर रहा था तो सुधीश पचौरी हम मीडिया विकल्प वाले छात्रों को पढ़ाते थे . फिल्म और धारावाहिक की समीक्षा संबंधी कक्षा के नोट्स आज भी देखता हूँ तो लगता है कि उन मानदंडों के अनुरूप धारावाहिक तो खैर कोई बना ही नहीं और फिल्में ज्यादा से ज्यादा चार-छः बनी होंगी वह भी समानांतर सिनेमा के दौर में . फिर भी समीक्षा के मानदंड वही रखे जाते हैं ! वस्तुनिष्ठ समीक्षा के मीटर पर तो आज की कोई फिल्म नहीं ठहरती . ऐसी दशाओं में जितनी समीक्षाएं होती हैं वह फिल्मों की नितांत निजी व्याख्याएं ही हैं . तब इन व्याख्याओं के लिए यह जरुरी हो जाता है कि वह वह व्यक्ति के पसंद-नापसंद आदि बहुत से तत्वों और पूर्वाग्रहों से लिपट कर आये . शाहरुख़ के मामले में यह पूर्वाग्रह कई बार उभर कर आता है .

जब फिल्मों से क्रांति नहीं हो रही और जब आज की फ़िल्में और धारावाहिक विशुद्ध व्यवसाय बं गयी हैं तब तो जो मनोरंजन करा जाये और जिस भी तरह से मनोरंजन करा जाये उसी की जीत मानी जाएगी . यह भी एक सर्वसामान्य तथ्य है कि आमिर खान का वह तथाकथित ‘सामाजिक सरोकारों से जुड़ा’ धारावाहिक भी शुद्ध व्यापार था और उसने उसे उसी तरह से बेचा जिस तरह से कि तारे ज़मीन पर बिकी थी – भावनाओं के मोल ! सामाजिक मुद्दे और भी हैं , कन्या भ्रूण हत्या आज भी हो रही है पर आमिर साहब मोटी रकम लेकर भी कोई धारावाहिक नहीं ला रहे हैं !

यहाँ एक दूसरा पेंच भी है . यदि दूसरे अभिनेता की कोई ‘बिना दिमाग’ वाली फिल्म आती है तो कोई बात नहीं बल्कि यहाँ तक भी देखा गया है कि वे अभिनेता परदे पर आकर दर्शकों पर एहसान करने जैसा अभिनय कर के निकल जाता है तो भी वह ‘प्यारा’ ही लगता है . इसके उदहारण के लिए दबंग के बाद की सलमान की फ़िल्में , सिंघम सर, अक्षय कुमार और न जाने ऐसे कितनों को शामिल किया जा सकता है . पर उसी तरह की बिना दिमाग की फिल्म शाहरुख़ की आये तो पसंद - नापसंद से आगे बढ़कर भर्त्सना तक के मुखर स्वर सुनाई देने लगते हैं .

शाहरुख़ के प्रति इस अस्वीकार का उत्तर ढूंढनें के लिए न तो बहुत दूर जाने की जरुरत है और न ही ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता है . इसके लिए बस भारत की सामान्य सामाजिक विशेषताओं को एक बार देखने की जरुरत है . शाहरुख़ ने लम्बे समय तक रोमांटिक फिल्में की . आज भी जब तब वह ऐसा करता रहता है और नहीं तो कम से कम हर फिल्म में रोमांस तो करता ही है . शायद यही कारण है कि वह कम से कम रोमांस तो सबसे अच्छा कर लेता है . यहीं भारत की रूढ़ी-प्रियता आ जाती है . फिल्मों के मामले में तो आज भी साधारण सामाजिक यथार्थ सामने आते हैं . लड़के और ‘मर्द’ माड़-धाड़ पसंद करते हैं वहीँ लड़कियों और स्त्रीयों के लिए रोमांस छोड़ा गया है . इस पुरुष केन्द्रित मानसिकता ने शाहरुख़ को स्त्रियों का हीरो बना दिया और उसमें भी उन स्त्रीयों का जो खाते पीते घरों से हैं और जिनके पास प्यार, रोमांस आदि पर सोचने के लिए खाली वक्त है . वैसे भारत में बहुत सी स्त्रीयां तो ऐसी हैं ही जिनको फिल्म देखना नसीब नहीं होता और यदि होता भी है तो घर के पुरुष की पसंद की फ़िल्में ही देखनी पड़ेगी . उनके मन में तो कोई हीरो हो क्या लेना-देना वाला भाव ही रहता है ! भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की पसंद की चीजों को अपनाना आवश्यक रूप से निषिद्ध ही हो जाता है . यह रूढ़ि स्वयं शाहरुख़ अपने एक विज्ञापन में भी प्रयोग कर लेता है और मर्दों वाली क्रीम बेचता है ! यही वजह है कि आज भी गाँव के मेले में यदि विडियो हॉल आया तो किसी भी फिल्म से ज्यादा अमिताभ बच्चन की ‘मर्द पिक्चर’ पसंद की जाती है .

हाल के वर्षों में शाहरुख़ ने इस्लाम और दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अपना प्रेम स्पष्ट रूप से ज़ाहिर किया है . जो किसी भी सूरत में गलत नही है . लेकिन बहुसंख्यक हिन्दू जनसँख्या जो दर्शक में बदलती है उसकी नज़र में यह एक अपराध है . इस दिशा में यदि कोई शोध किया जाये तो इसे आंकड़ों के हिसाब से भी साबित करना कठिन नहीं रहेगा . अभी शाहरुख़ अन्य अभिनेताओं के साथ उत्तराखंड की आपदा से पीड़ित लोगों के लिए आगे आया तब तक ठीक था लेकिन जैसे उसने पकिस्तान के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए नृत्य किया कि राजस्थान में हिन्दू संगठनों ने उसके फिल्म को रोकने तक की धमकी दे डाली ! यहाँ हिन्दू दर्शक यह देने से भी नहीं चूकते कि अन्य मुसलमान अभिनेता इस तरह खुलेआम इस्लाम की बात नहीं करते . बल्कि आमिर खान तो बाक़ायदा लालकृष्ण अडवाणी के लिए तारे ज़मीन पर फिल्म की स्क्रीनिंग करता है . शाहरुख़ एक मुसलमान है पर यदि वह हिन्दू बहुल धर्मनिरपेक्ष देश में अभिनय कर के अपना पेट चलाना चाहता है तो उसे दिलीप कुमार की तरह हिन्दू नाम रख लेना चाहिए या नहीं तो हिन्दुओं को खुश रखने वाला व्यवहार करना चाहिए जो ज़ाहिर है उसके इस्लाम को परे रखने से होगी .


फिल्म देखना और उसके आधार पर पसंदीदा नायकों का चयन आवश्यक रूप से भारत के सामाजिक सच  का प्रतिबिम्बन है और उसे रूढ़िबद्ध मनःस्थिति की सहज प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है . मुद्दा शाहरुख़ को पसंद या नापसंद करने का नहीं है बल्कि उसके माध्यम से यह समझने का है कि हम सदियों से जहाँ खड़े थे उससे एक कदम भी आगे नहीं बढे हैं बल्कि और गहरे धंसते गए हैं . फिल्मों के व्यावसायिक रूप से सफल हो जाने और नहीं हो जाने से इस बात को कभी पुष्ट नही किया जा सकता कि शाहरुख़ के माध्यम से हमारी बहुसंख्यक मानसिकता में बड़ा बदलाव आ गया है .  

अगस्त 14, 2013

गोद से उतार देने का समय

देश से मुझे भी प्यार है लेकिन यह प्यार ऐसा नहीं है कि इसके लिए देश के गू-मूत तक को शरीर पर लेपा जाये और इस तरह जिया जाए कि सबकुछ अच्छा अच्छा ही है . ऐसा मुझे स्वीकार नहीं है ! इस तरह के बहुत से अस्वीकार को लेकर अब जीने का आदि हो रहा हूँ और इसीलिए घर से लेकर बाहर तक ‘ज्यादा समझदार’ मान लिया जाता हूँ . यहाँ ज्यादा समझदार होना कोई प्रशंसा नहीं बल्कि व्यंग्य है जो यह मानकर किया जाता है कि अब खुद ही मान लो कि तुम क्या हो . किसी ने ऐसे ही एक दिन कहा था कि हिन्दू धर्म के मानने वालों ने महात्मा बुद्ध को बुद्ध के बजाय बुद्धू कहना शुरू कर दिया और बहुत तेजी से इस शब्द को बुध्द के बरक्स उनके ज्ञान के बदले भाषाई चमत्कार के जरिये हीनता दिखाने लिए प्रचलित कर दिया . जब स्वतंत्रता दिवस या कि गणतंत्र दिवस का मौका आता है सब तरफ अच्छा-अच्छा बताने की होड़ लग जाती है जैसे इससे बढ़िया कोई देश ‘न भूतो न भविष्यति’ ! और इन दिनों पर यदि देश के सबंध में एक हरफ भी बुराई करने के लहजे में आया तो वो हरफ फिर से हलक में डाल दिए जाने तक बाध्य किया जायेगा . देश को लेकर प्रेम इस कदर आकार लेता है कि यह कट्टरता की हद तक चला जाये .

मैंने बहुत दिनों से टीवी नहीं देखा है इसके बावजूद कह सकता हूँ कि सभी टीवी चैनलों ने स्वतंत्रता दिवस को भुनाने के पुरे इंतजाम कर रखे होंगे . क्या समाचार और क्या फ़िल्मी चैनल सब के सब एक से एक पॅकेज के साथ तैयार होंगे . ऐसा नहीं है कि विदेशी पूँजी से चलने वाले ये सब अचानक से भारत भक्त हो गए बल्कि रघुबीर सहाय की एक कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ से एक पंक्ति ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ लेकर कहें तो यह कि वे सभी अपना अपना वक्त आम लोगों की देशभक्ति के बदले व्यापारियों को बेचने के लिए तैयार हुए हैं .

यह बात तो सबसे पहले कहना चाहता था कि हमारे बहुलतावादी समाज में दिवसों की भी बहुतायत है . बहुत से धार्मिक दिवसों के बीच कुछ गैर-धार्मिक प्रकार के भी हैं पर हर दिवस पर इतनी सकारात्मकता बहती रहती है कि कभी कभी मन यह मानने लगता है कि देश में नकारात्मक तो कुछ है ही नहीं . हर दिवस पर संबंधित व्यक्ति, वस्तु , स्थान और भाव का गुणगान होता है . और उसे सामान्य से बड़ा दिखाने की कवायद का नतीजा ये होता है कि साल दर साल हम उनके बारे में आलोचनात्मक न होकर अनुकरणात्मक होते चले जाते हैं . यही हाल हमारे स्वतंत्रता दिवस का भी है .

हमें जिन परिस्थितियों में आजादी मिली उनमें यह स्वाभाविक ही था कि देश का गुणगान हो ताकि हमारे लिए कम से कम बोलने के हवाई स्तर पर ही सही बाहर के मुल्कों से टक्कर लेने का आत्मविश्वास पैदा हो सके . इसलिए नेहरु से लेकर उस दौर के अन्य राजनेताओं , बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों ने इस तरह के काल्पनिक वातावरण का निर्माण किया . मनोज कुमार के फिल्मों और उसके गानों में इसकी झलक दिख जाएगी . उनकी फिल्में इस मामले में अकेली नहीं ठहरती हैं इस तरह की प्रवृत्ति हर जगह मिल जाएगी . तब के लिए यह ठीक था क्योंकि तब की वास्तविकताएं दूसरी थी लेकिन लगातार प्रश्न न करने से वही स्थिति बनी रही और क्रमशः और मजबूत होती गयी . इस देश में धर्म जिस तरह बहुत गहरी जड़ें फैलाये हुए है देशभक्ति ने भी वही रूप ले लिया है . इसका असर यह हुआ है कि हम देश को धर्म की तरह ही आलोचना के दायरे में नहीं रख सकते और यदि ऐसा किया तो बहुत संभव है कानूनी कार्रवाई का डर दिखा कर यह मानने को बाध्य कर दिया जाये कि देश बहुत ‘सुन्दर’ , ‘न्यारा’, प्यारा है . इस तरह का राष्ट्रप्रेम देश के लिए तो खतरनाक है ही उसमें रहने वालों के लिए भी उतना ही कष्टकारी है . और यही करण है कि देशप्रेम के दायरे में रखकर बहुत सी ऐसी बातें थोपी जाती हैं जो कहीं से भी स्वीकार करने के योग्य नहीं होती हैं .  जैसे कोई माँ अपने बिगड़े हुए बेटे की हकीकत उसके बाप से छिपाती फिरती है और लड़के की करनी पर खुद कोने में जाकर रोती है उसी तरह हम पहले स्वतंत्रता दिवस से आज तक देश की बुराइयों को छिपाते आ रहे हैं और उस माँ की तरह दोहरी मार भी हम ही झेल रहे हैं .

अभी कल मंथन फिल्म देख रहा था . वह फिल्म लाख डॉ. वर्गीस कुरियन के अथक प्रयासों से गुजरात में सहकारी डेयरी स्थापित करने की बात करती हो पर उसका केन्द्रीय भाव तत्कालीन भारत की जातीय जकड़नों को ही रेखांकित करता है . वह फिल्म अमूल से ज्यादा जातीय वास्तविकताओं की फिल्म है . यह फिल्म सत्तर के दशक में बनी थी तब की जातीयता और आज की जातीयता में कोई अंतर नहीं आया है . भले ही यह अब फिल्मों और साहित्य की चहारदीवारी से बाहर कर दिया गया हो लेकिन इसकी सामाजिक स्वीकार्यता घटने के बदले बढ़ी ही है . इस तरह की बहुत सी अन्य वास्तविकताएं हैं जो लगातार बनी हुई हैं और बढती भी जा रही हैं . धर्म समाज को पहले से भी ज्यादा संगठित रूप से संचालित कर रहा है . आज आजादी के 66 वर्ष होने को आये फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य भुखमरी के मोर्चे पर हम पहले की तरह ही हाथ बांधे रक्षात्मक रूप से खड़े हैं फिर भी हम इतनी बेगैरती से देश का गुणगान करते ही रहते हैं . और तो और हम अपने देश की गरीबी का आंकड़ा तय करने के लिए स्थानीय आवश्यकता के मानदंड तक नहीं बना पाए जो यहाँ के अनुकूल हो .

एक तरह से कहा जाये तो हमारा देश आज भी एक बच्चा ही है जिसे उसके निवासियों ने बच्चा समझकर गोद से उतारा ही नहीं और इस लाड-दुलार ने इसे आजाद होने के 66 वर्ष के उपरांत भी अपरिपक्व और अविकसित ही रखा है . समय आ गया है कि अब इसकी बहुत ज्यादा जय-जय करने के इसकी बुराइयों को रेखांकित किया जाये ताकि ध्यान उस ओर हो जिस ओर इसका जाना जरुरी है  

अगस्त 13, 2013

प्रिंटिंग का पर्यावरण पक्ष

कागज ने हमें केवल अपने एक से एक पुलिंदे नहीं दिए जो बहुत सारे काले काले डिज़ाइन से भरे हो बल्कि लाखों करोड़ों पात्र, घटनाएं, सिद्धांत, भावनाएं और चित्र दिए . इसके साथ ही दी आजादी उन्हें यहाँ से वहां ले जाने की, उन सब को जब चाहे तब खोल कर देख लेने की स्वतंत्रता मिल गयी थी इसी कागज के सहारे . लिखा तो पहले भी जाता था पर पहले लिखना जितना विशिष्ट था उसे पढना और भी विशिष्ट . विभिन्न ताम्रपत्र, पत्थरों के अभिलेख जिस उत्साह से लिखे गए उस उतने ही उत्साह से पढ़े भी गए हों इसकी सम्भावना कम ही है . अपने रोज़ के कामों से व्यक्ति फुर्सत पाकर व्यक्ति जब तक निश्चित न कर लेता होगा कि आज मुझे राजा, सम्राट या कि बादशाह का लेख पढने जाना है तब तक उसके पढने की सम्भावना तलाशनी बेकार है . कागज़ ने इसी सम्भावना को बढ़ा दिया बल्कि पढने को सहज बनाते हुए इसे सबके लिए सुलभ और लोकतान्त्रिक बनाया . कागज़ की खोज करने वालों के लिए भी यही पढने की सहजता या सहूलियत वह आकर्षण रही होगी जिसने उन्हें प्रेरित किया .


आगे यह कोई विशेष जानकारी की बात नहीं है कि कागज़ प्रकृति में उपलब्ध वस्तुओं से बनायीं जाता है . प्रकृति की दी हुई बहुत सी चीजों में से कागज़ बनाने वाले पदार्थ भी हैं जो मुख्यतः पेड़ पौधे हैं . जहाँ पेड़ पौधे आते हैं वहीँ उनकी सुरक्षा भी आ जाती है क्योंकि उन पर ही हमारा अस्तित्व टिका पड़ा है . और आज जब पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता इतनी बढ़ गयी है तब पेड़-पौधों से कागज़ बनाना ऐसा लगता है कि बहुत बड़ा अपराध किया जा रहा हो . हमारे तमाम विद्यालयों में पर्यावरण के प्रति सचेत करने वाली बहुत सी बातें किताबों और नीतियों के माध्यम से डाल दी गयी हैं सो उसके प्रति चेतना बनना कोई दूर की कौड़ी नहीं रह गयी है . छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता , अफसरान , राजनेता आदि सभी किसी न किसी बहाने ये बात जताने में लगे ही रहते हैं कि पेड़-पौधे बचाने ही पड़ेंगे . कागज उद्योग को पेड़-पौधों का भरी दुश्मन माना जाता है . यही करण है कि लगातार कागज के उपयोग को कम करने की बातें हो रही हैं . साथ ही जोरदार कवायदें भी चल रही हैं .


जब से कंप्यूटर आया तब से लगा कि कागज़ को चलता किये जाने का एक जबरदस्त माध्यम हाथ लग गया . काम भी जल्दी हो जायेगा , कागज़ जैसी सार-संभाल भी नहीं और सबसे बड़ी बात कागज़ की जरुरत ख़त्म होने से पेड़ –पौधे बच जायेंगे और उनके बचते ही मानव के अस्तित्व में अनश्वरता का भाव आ जाना स्वाभाविक है . निजी उद्यमों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में कंप्यूटर केवल इस आशा के साथ नहीं लगाये गए कि ये काम करने की गति तेज करेंगे लागत कम करेंगे बल्कि कागज़ की प्रतिवर्ष होने वाली खपत को निश्चित रूपेण कम करना . किताबें डिजिटल होने लगी . पत्र-पत्रिकाओं के ऑनलाइन संस्करण आ गए . पर क्या इन सब का यह अर्थ निकला जाये कि वाकई में कागज़ की खपत को कंप्यूटर ने कम किया ?


बात शुरू करते हैं दिल्ली से जहाँ कुछ बड़े बड़े विश्वविद्यालय हैं. जहाँ ढेरों लोग हर साल एम.फिल पी.एच डी करते हैं. कुछ लोग जो स्वयं से टाइप करते हैं उनको छोड़कर जो भी हैं वे सभी पटेल चेस्ट जैसी जगहों पर खुले सैकड़ों दुकानों से अपना प्रोजेक्ट से लेकर लघु–शोधप्रबंध और शोधप्रबंध बनवाते हैं. वहां पर यह बड़ा सामान्य सा है कि टाइपिंग के बाद कई कई बार प्रिंट आउट लेकर देखा जाता है कि कोई गलती तो नहीं रह गयी. आखिर लोगों के काम का सवाल है वे अपना परफेक्शन तो देखेंगे ही. अब इस स्थिति की तुलना करते हैं पुराणी टाइपिंग मशीन से. उसमें याददाश्त जैसी कोई चीज होती ही नहीं थी. और चूँकि टाइप करना बहुत सरल नहीं था तो टाइपिस्ट की भी कोशिश रहती थी कि कम से कम गलती हो ताकि वापस फिर से टाइप न करना पड़े. यहीं पर एक और यंत्र का जिक्र करना जरुरी है वह है कंप्यूटर से जुड़ा हुआ प्रिंटर. इसने कागज़ के प्रयोग को एक नयी दिशा दी. कुछ भी प्रिंट कर लेने की आजादी ने पटेल चेस्ट जैसे स्थानों पर बैठ कर टाइपिंग की गलतियाँ सुधारने का काम पूरा का पूरा प्रिंट-आउट घर ले जाकर गलतियाँ ताकने का हो गया . कई बार की गलतियों और रद्दोबदल के लिए कई बार प्रिंटआउट . प्रिंटर ने एक तरह से कागज़ की खपत को बहुत तेजी से बढाया है . पहले जहाँ बहुत कम प्रिंटर हुआ करते थे अब यह पर्सनल कंप्यूटर से जुड़ने वाले एक आवश्यक उपस्कर का रूप ले लिया है. मेरे ही कुछ दोस्तों के पास अपने प्रिंटर हैं . और हद तो तब है जब एक ही कमरे में रहने वाले दो मित्रों के पास अपना अपना प्रिंटर है ! प्रिंटर उद्योग का बहुत तेजी से विकास होता जा रहा है .


यह समझना बड़ा ही पेंचीदा लगने लगता है कि डिजिटलाइजेशन के नाम पर एक अलग बाजार तैयार हो रहा है वहीँ दूसरी तरफ प्रिंटर का बाज़ार अलग ही परवान चढ़ रहा है . प्रिंटर की बिक्री में बहुत तेजी आई है और इसे प्रिंटर बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापनों में देखा जा सकता है . एक कम्पनी के प्रिंटर के लिए कहा जाता है कि अमुक माडल का प्रिंटर घर ले आइये और अपने बच्चे का ‘भविष्या’ ‘उजवल’ बनाइये . यहाँ भविष्या और उजवल शब्दों का उच्चारण अपना ही अर्थ रखता है . उनकी अर्थछवियाँ इन शब्दों को अपने साधारण अर्थ से मुक्त कर एक उच्चवर्गीय अर्थ देती है . यह हिंदी का वही स्वरुप है जो उच्च-मध्यवर्ग और उच्च-वर्ग में चल रहा है . मानें या न मानें पर यह हिंदी आकर्षक हो चली है . इस आकर्षण का केंद्र भाषाई न होकर सामाजिक प्रतिष्ठा के नए मानदंडों का बनना है .


सरकारी और निजी संस्थानों में कंप्यूटर आधारित काम ने सिद्धांत रूप में कागज के प्रयोग को नियंत्रित करने का काम किया . यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि केवल सिद्धांत रूप में . भारत जैसे कुप्रबंधन से भरे देश में आज भी कंप्यूटर आधारित आंकड़ों , जानकारी और समग्र सामग्री को सहेजकर रखना कठिन बना हुआ है . असुरक्षित होने के डर से तमाम सरकारी संस्थानों में एक ही सामग्री को कंप्यूटर और कागज दोनों पर दर्ज करने की परंपरा बनी हुई है . इसने न सिर्फ संसाधनों का दुरूपयोग बढाया है बल्कि काम में समय की लागत को भी बढाया है . सरकारी कार्यालयों में कई कई कंप्यूटर आ जाने के बाद भी कागज़ आधारित पदार्थों की खरीद उसी तरह जारी है जिस तरह पहले होती थी .



जिस तरह बार-बार पर्यावरण संकट की लकीर पीटी जाती है उसे देख-समझ कर तो यही लगता है कि सरकारें और उससे भी बड़ी संस्थाएं या तो मूर्ख हैं या मूर्ख बना रही हैं . पहले की सम्भावना कम ही है तो यही तय लगता है कि वे मूर्ख बना रही हैं . यदि वे पर्यावरण के प्रति इतने ही कटि-बद्ध हैं तो उन्हें बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारनामे नहीं दीखते . उन्हें नहीं दीखता कि लगभग सभी इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी के प्रिंटर बाजार में आ गए हैं और वे लोगों की जेब के लिए इतने मुफीद हैं कि उनका खरीदा जाना लगभग तय ही होता जा रहा है . ऐसे में कागज़ का प्रयोग तो बढ़ना स्वाभाविक ही है फिर पेड़-पौधों का उसी अनुपात में काटा जाना भी स्वाभाविक सा हो जाता है . 

अगस्त 11, 2013

दो कवितायेँ ....

 [ आज दो कवितायेँ डाल रहा हूँ ... इधर कुछ खोजते हुए मिल गयी ... बहुत पहले नहीं लिखी गयी ये तो तय है क्योंकि इन्हें मैंने इसी साल की डायरी से उठाया है .. दो अलग अलग मूड हैं पर ठीक से देखें तो एक बाद ही दुसरे का क्रम बनता सा लगता है ... मैं नहीं जानता कि कविताओं को कौन पढ़ता है या ज्यादा स्पष्ट रूप में कहें तो मेरी इन कविताओं को कोई पढ़ेगा भी ये मुझे नहीं पता फिर भी सामने लाने में क्या बुराई है ... ]



  नए चेहरे के साथ 

मुस्कुराते चेहरे की भूमिका
अब ख़त्म होती जा रही है
लगातार गंभीर और
अवाक रहना
दिनचर्या में शामिल है
यह एक नया रंग है
पर गहरा मोटा और टिकाऊ
क़दमों में पागलपन लिप्त है
मन पर चढ़ा क्षोभ लगातार

ऐसे में
हंसने की सम्भावना बहुत दूर है
पर हंसना पड़ता है
हर बार न चाहते हुए
न हंसने वाली बात पर
तब बनता है चेहरे पर खिंचाव
फिर भागने लगते हैं लोग
मेरे उस चेहरे से ....

नया चेहरा लगभग गढ़ा जा चुका है
अपनी मर्जी में बना  
सड़ा–सा मुंह

जिनकी मजबूरी वही देखेंगे ....  
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  यूँ भी हो 

जरा मस्ती से बाते हो जाए
बातों से मस्ती हो जाए

दो उलझे गिरह खुल जाए
एक हंसी पलटे तो आँखें देर तक चमकें
कुछ रोना भी बह निकले मन से
तो बढाकर हाथ रोकूँ न
रह रह के बस ये हवा चले
मन उठने को भी हो तो फिर फिसल जाये
कुछ झरे महुए-सा हाथों पे टप-टप
महके अँधेरी सुबह में हर सिंगार से पटी पड़ी जमीन की तरह
पानी की सतह पे कागज की नाव हो
तैर उठे मन घास की गंध थामे
एक साईकिल हो बारिश के पहिये वाली
झर झर पानी की रफ़्तार
चलें चींटी का घर देखने

सुबह गहरी हो और ठहरे देर तक
न भागे हर दिन की तरह जल्दी से
वो बेशक चाय न पिए पर बैठे अपने पहलू
आज धूप आये भी तो नया छाता ओढ़े
फिर कपड़े की छेद से सूरज से हंसी मजाक हो जाए
कूद पड़े चाँद शाम की गोद में
और रात मेरा सर सुबह तक सहलाए

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...