अगस्त 09, 2013

पल पल बदलते हम ...

ऐसा दूसरी बार महसूस किया था ! दुर्घटना इतने करीब हुई थी । घटना या दुर्घटना के प्रति संवेदना का स्तर उससे दूरी या नजदीकी से तय होता महसूस किया ।

पहली बार जब ऐसा हुआ था तब वह जाड़े की एक सुबह थी । सहरसा को बड़ी रेल लाइन से जोड़ा जा रहा था इसलिए उसका रेल संपर्क लगभग कटा हुआ ही था । छोटी लाइन पर दिन में एक बार कोई गाड़ी चलायी जाती थी । बीच बीच में कोई इंजन यहाँ से वहाँ चला जाए तो अलग बात है । इसी मुतमयीनी में उस सुबह कुछ लोग सहरसा की ओर आ रहे एक इंजन पर चढ़ गए , चढ़ क्या गए लटक गए ! उस सुबह को अचानक से कुहरे ने घेर लिया । एक और संयोग बना जैसे किसी दुर्घटना के लिए कोई मंच तैयार हो रहा हो एक इंजन सहरसा की ओर से भी चला । बीच रास्ते में कहीं दोनों की टक्कर हो गयी कुछ लोग मारे गये ।

वह मोबाइल फोन का जमाना नही था । पुख्ता खबरों से ज्यादा अफवाहें पहुंची । सहरसा का दक्षिणी छोर सूचनाओं का गढ़ बन गया था । दुर्घटना हुई थी और दो या तीन लोग मारे गए थे पर दिन भर बहुत बड़ी दुर्घटना की अफवाहें जारी रही । मरने वालों की संख्या पचास से ऊपर बताई जा रही थी । दूसरे तीसरे दिन से बात आई-गयी होने लगी । सब अपने काम में लग गए और सही सूचना के आ जाने के बाद लोगों के लिए अनुमानों के उड़ानों का कोई अर्थ नहीं रह गया था ।

पिछले एक सप्ताह से केरल के इस इलाके में भारी वर्षा हो रही है और इस पहाड़ी क्षेत्र में कई अस्थायी झरने बन गए हैं । जो बहुत मोहक रूप ले चुके हैं । एक तरफ यहाँ सौन्दर्य बढ़ा तो दूसरी तरफ खतरा भी बढ़ा । ऊपर पहाड़ों से केवल पानी ही नहीं बल्कि मिट्टी और गाद भी खिसकने लगी साथ में पेड़ और लताएँ भी ।

पहाड़ी रस्तों पर बरसात में इस बात का खतरा बराबर बना रहता है कि आप जा रहे हों और अचानक से भूस्खलन हो गया । संभव है कुछ लोग दब भी जाएँ । यहाँ पास ही में मुश्किल से 5 किलोमीटर दूर एक जगह भूस्खलन हो गया और वहाँ खड़ी दुकाने दब गयी कुछ गाड़ियों के भी दबने की खबर मिली थी । बाद में कुछ लोग वहाँ राहत कार्य होते देखने के लिए रुके तो फिर से भूस्खलन हो गया इस बार ज्यादा लोग दब गए ।

जब खबरें हमारे स्टाफ रूम में आई तो कोई भी हिन्दी या अंग्रेजी में बात नहीं कर रहा था । पर चिंता की अपनी भाषा होती है शायद । किसी तरह मैं भी जान ही गया ।

दिन भर भारी बारिश होती रही । इधर बिजली भी गायब और यहाँ का संपर्क रेल , सड़क और हवाई तीनों मार्गों से कट गया । बाहर से आती खबरों के बीच बस इतनी ही रा हत थी कि विद्यालय का जेनेरेटर चल रहा था और मैस में खाने का स्टॉक था । अंधेरी शाम में एक विद्यालय परिसर में कई गाड़ियों में भरकर पुलिस वालों के आ जाने से पता चला केरल के मुख्यमंत्री घटनास्थल का दौरा करने आ रहे हैं । चूंकि इस इलाके का संपर्क हर तरह से कटा हुआ है इसलिए वे सीधे हेलिकॉप्टर से आएंगे और उसके लिए हमारे विद्यालय में आनन-फानन में हैलिपैड बनाया जा रहा है । मुख्यमंत्री का आना अपने आप में इस बात की सूचना थी कि दुर्घटना बड़ी है ।

मेरे लिए ये कोई बड़ी चिंता नहीं थी और न ही अन्य अध्यापकों या कि दूसरे कर्मियों के लिए पर यहाँ रह रहे छात्रों के बीच बड़ा डर था । वे अपने माँ-बाप के पास जाना चाहते थे । दूसरे दिन सुबह से ही मुख्यमंत्री के आने की सरगर्मी न सिर्फ स्कूल बल्कि उसके बाहर भी दिख रही थी । स्थानीय निवासी से लेकर मीडिया तक सभी प्रतीक्षा में थे । दसवीं कक्षा की एक लड़की केवल इसलिए रो रही  थी कि उसके पिता जो केरल पुलिस में हैं उनकी ड्यूटी रात में वहीं थी जहां दुर्घटना हुई और आज वे यहाँ स्कूल में ड्यूटी दे रहे थे । छात्र कक्षा में जाना नहीं चाह रहे थे । अंत में उन्हें भी बाहर खड़े होकर इंतजार करने का मौका मिल गया । अभी तक जो बच्चे दुखी थे ,जो डरे हुए थे उनका दुख और डर छू-मंतर हो गया । जब हेलिकॉप्टर दिखा तो उनहोने बकायदा ताली बजाना शुरू कर दिया ।

बच्चे अपने डर पर इतनी जल्दी काबू पा लेंगे इसका मुझे अंदाज़ा नहीं था ।
केरल में कॉंग्रेस की सरकार है और यहाँ यह भी देखा मैंने कि वामपंथी राजनीति की आम लोगों में गहरी पकड़ है । छात्र व शिक्षक दोनों ही समूहों में मुख्यमंत्री के विरोधी ज्यादा थे पर जब समय आया तो सभी बाहर ताली बजाते व फोटो खिंचवाते पाये गए । एक शिक्षक ने तो मेरे वहाँ नहीं जाने पर बकायदा अफसोस जताया ।

मुख्यमंत्री के आने से अबतक जो मामला बहुत गंभीर लग रहा था वह एक आयोजन जैसा बन गया । अचानक से दुर्घटना नेपथ्य में चली गयी और मुख्यमंत्री का आना मुख्य हो गया । और ताज्जुब की बात ये कि लोग घटना के इस राजनीतिकरण से दुखी भी थे और उस पूरी प्रक्रिया में शामिल भी थे । जब तक हेलिकॉप्टर रहा लोगों का फोटो खिंचवाना जारी रहा । विद्यालय के मैदान से लगी सड़क दोनों ओर से स्थानीय निवासियों से भरी थी । कभी जिनको भूस्खलन का दुख रहा होगा वे अब एक झलक के लिए पंक्तिबद्ध होकर खड़े थे । मुख्यमंत्री के वापस उड़ जाने तक वे उसी तरह से बने रहे फिर बरसाती पानी की तरह बह गए ।

बारिश अभी भी जारी है । उसी तरह से । इस स्थान का संपर्क अभी भी  सड़क मार्ग से कटा हुआ है । अखबार नहीं पहुँच पा रहे हैं । बच्चे रास्ते के बिगड़ जाने से ईद में घर नहीं जा पाये । उधर मलबा हटाने का कार्य अभी भी जारी है पर जो भय और संवेदना का वातावरण बना था वह नदारद है । यहाँ तक कि कुछ उत्साही शिक्षक एक रात दुर्घटना स्थल तक भी हो आए ।

संवेदना इतनी क्षणिक होकर रह गयी कि जो छात्र कक्षा में उस दिन मुस्कुराने तक ही हिम्मत नहीं कर पा रहे थे वे फिर से फिल्म दिखाने की मांग करने लगे हैं ।


एक बात तो अपने भीतर मैंने भी महसूस की कि मोबाइल फोन के होने से एक हिम्मत बनी रही और घरवालों से बात कर ली तो उनकी शंकाएँ भी जाती रही । इस तरह तकनीक ने एक बेफिक्री तो दी ही हमें । 

अगस्त 03, 2013

बेघर से रह गए ...


अब तो पक्के तौर पर लगने लगा है कि शहर नहीं छूटता , हम छूट जाते हैं ! वह तो हमारे नहीं रहने पर भी उसी तरह चलता रहता है जैसा हमारे रहने पर रहता था । पहले ऐसा लगता था कि एक सुबह जब हम शहर में नहीं होंगे तो शायद ये शहर वैसा ही न रहे जिसमें मैं जीता रहा था । तब शहर के न छूटने का पूरा विश्वास था । इसलिए जबतब उसके छूट जाने की कल्पना कर लेने में बड़ा ही रस आता था । फिर भी कहीं यदि फिल्म प्रेम रोग का वह गीत ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना न दोबारा सुन लेता तो मन की विकलता बढ़ जाती थी ।

उस दिन चुपके से शहर दिल्ली में दाखिल हुआ था । उसी दिल्ली में जहां पैसे बचाने के लिए बस में कुछ घंटे प्रतिदिन देता था , मैं हवाई अड्डे से एक टैक्सी में चल रहा था । मेरे लिए शहर में इस तरह जाना नया था और शहर के लिए भी मैं उतना ही अजनबी हो चुका था । जिस शहर ने आपको अपने पुराने दिनों में देखा हो वह आपके इस नए अवतार पर अवश्य ही मुंह चिढ़ाएगा । यही वजह थी कि उसने एक अतिथि से ज्यादा कि हैसियत देने से परहेज़ किया ।

दिल्ली से दाना-पानी उठने के बहुत दिनों बाद भी लगता था कि मन वहीं है और मैं भले ही वहाँ नहीं रहूँ पर मेरे होने के कुछ लक्षण तो वहाँ होंगे ही । इसलिए किसी के पूछने पर घर का पता दिल्ली का ही निकलता था । यह शायद महानगरीय जीवन की आवश्यक विशेषता हो कि वह बहुत दिनों तक कुछ यादों को जीता नहीं रह सकता । मैं यह नहीं कहता कि वह यादों को सहेजता नहीं है पर ज्यादा दिनों तक सहेज सकने का अवकाश उसके पास नहीं है । मेरे आने से पहले ही भाई ने लगातार वह स्थान छोडने के मंसूबे बनाने शुरू कर दिए थे जहां हम कई वर्ष रहे थे । और मुझे लगने लगा था कि यह देर-सवेर हो कर ही रहेगा । हम जहां रहते थे वह जगह शायद हमारे लिए ही बनी थी या कि उस जगह के हिसाब से हम ढल गए थे । वस्तुओं से लेकर हमारा स्थान तक सब निश्चित । आम तौर पर हम बहुत साफ-सफाई न रखते हों पर किसी के आने पर वह स्थान ईर्ष्या करने लायक जरूर हो जाता था । पिताजी द्वारा भेजी जानेवाली बंधी हुई रकम के लिए एक मुफीद और सटीक जगह । टीवी है तो गैलरी से जा रहा  केबल कनेक्शन भी है ! शुरू में तो हम चुपके से और रात को ही टीवी से जोड़ा करते थे लेकिन जब धीरे धीरे रहते हुए थोड़ी हिम्मत बढ़ गयी तो किल्ला-ठोंक कर जोड़ दिया । लगभग 3 साल के बाद हम पकड़े गए । उस पर भी आगे कनेक्शन लगा लेने के नाम पर काम बन गया ।

ऐसा नहीं था कि दिल्ली में इस बार अपने रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था पर जब आपका अपना ठिकाना उठ चुका हो तो आपका दायरा आपके बैग तक ही सीमित होता है उन्हीं तक आपका अधिकार भी रहता है । यदि भाई अब भी उसी घर में रह रहा होता जहां हम पहले रह रहे थे तो वस्तु और व्यक्ति का संबंध उतना अजनबी नहीं रहता जितना कि मैंने महसूस किया । भाई ने घर ही नहीं मुहल्ला तक छोड़ दिया सो उधर जाकर उस जैसा महसूस करने का भी अवकाश नहीं रहा । यूं यहाँ एक बात तो कही ही जा सकती है कि कितने दिनों तक एक ही स्थान को पकड़ कर बैठे रहेंगे और यह सही भी है पर इसके इतनी जल्दी होने ने निश्चित तौर पर खालीपन जोड़ा ।

नेहरू-विहार या कि दिल्ली-विश्वविद्यालय के आस-पास की अन्य कोई भी जगह वही जगहें थी जहां से में रात-बिरात का खयाल किए बिना भी यमुना-विहार भाग जाता था । क्योंकि अपना बिस्तर तो अपना ही होता है (था) । पर इस बार मेरी सारी दौड़ नेहरू-विहार पर जाकर खत्म हो जाती थी ।

कोई दूसरे दिन वहाँ जाना हुआ जहां भाई ने अपना नया ठिकाना बनाया है ! वह जगह पहले से जानी-पहचानी थी क्योंकि चचेरे भाई का परिवार वहाँ कुछ वर्षों से रह रहा है । सो आना-जाना लगा रहता था । ठीक बगल वाले कमरे में भाई के चले जाने से एक बार मन में यह भी उठा था कि जाया ही न जाए । अपनी भावुकता के बदले भाई से मिलकर उससे कुछ बातें कर सकने के मोह ने ज़ोर जरा ज्यादा लगा दिया था । जितनी देर रहा भाई के सेट-अप में ही रहा यहाँ तक कि खाना भी भाभी इसी कमरे में ले आयी थी । यहाँ तक कि जिन बच्चों को मैं अपने से खेलने की खुली छूट दे दिया करता था वे भी अच्छे नहीं लग रहे थे ।

भाई के कमरे में उसी के समान पड़े थे और होना भी चाहिए । पर वहाँ जाते ही मेरी नजरें उन सामानों में अपना समान खोजने लगी । भाई ने जिस तरह से मेरे सामानों को अपना लिया था उसमें किताबों को छोड़कर अब कुछ भी मेरा नहीं रह गया था । कुछ किताबें तो सामने रखी भी थी । उन्हें देखकर लगा कि मेरा कौन सा हिस्सा दिल्ली में रह गया है । शेष किताबें , नोट्स , पत्रिकाएँ और अखबार की कतरनें जिनमें मेरी कुछ छपी समग्रियाँ थीं वे नहीं दिखीं । पूछने पर पता चला कि वह सब बांध कर कहीं रख दिया गया है । मन में ऐसे भाव उठे कि सबको तभी साथ लेकर आ जाने का मन किया ।

इधर हवाई जहाज के मालिकों ने यात्री के साथ अतिरिक्त वजन की सीमा को भी पहले से लगभग आधा कर दिया है और बिना किसी प्रतिक्रिया के यह बात यात्रियों ने स्वीकार भी कर लिया । नयी सीमा के अतिरिक्त वज़न पर अलग से शुल्क देना होगा । हालांकि यह पहले भी देना पड़ता था लेकिन तब वज़न की सीमा ज्यादा थी । कंपनियाँ जानती हैं कि हवाई जहाज में चलने वाले ज़्यादातर लोग हील-हुज़्ज़त से बचने वाले लोग हैं जिनके लिए हर चीज़ का साधारण सा इलाज़ है धन । वे लोग किसी भी सूरत में विरोध नहीं करेंगे । यही काम यदि रेलयात्रा में कर दिया जाए तो जो बवाल मचेगा कि पूछिए भी मत । खैर , जब भाई के यहाँ किताबें छांट रहा था तो ये वज़न वाली बात तो ध्यान में थी ही । वापस सुशील के यहाँ नेहरू विहार आया और उसके घर के पहले वाली दुकान में किताबों का वज़न पता किया तो वह 6 किलो ही निकला !

इधर मन बार-बार पुराने दिनों की तरह ही व्यवहार करने के मूड में आ जाता था । वही किसी और के जन्मदिन को लगभग अपना ही कार्यक्रम बना लेने जैसी जिद ( और लगभग वही बन भी गया था) वही अपने तरह का व्यवहार ! रेस्तरां यदि इतना भारी सेवा कर लेता है तो वह एक जने के आने तक समय तो दे ही सकता है । अपनी यह चीप जिद और सुसंस्कृत व्यवहार करने वाले दोस्तों की शान में उससे पड़ती खलल ने तो एक बार को माहौल कड़वा बना ही दिया । तो लगा कि शहर एक मैं ही हूँ जो अपने तरह का व्यवहार करने पर आमादा हूँ । जबकि शहर से लेकर अपने दोस्तों के हिस्से से कुछ महीने ही सही अलग हो जाने के कारण अब मेरा पुराना व्यवहार बेदखल हो चुका है और लगभग विस्मृत-सा ! यही पहले से दिन होते तो शायद कोई उस तरह से प्रतिक्रिया नहीं देता जैसा कि मिला । तब मेरा वह कार्य उनके प्रतिदिन के अनुभव का हिस्सा होता ।

यात्रा का अंत आते-आते बीमार भी पड़ गया । मित्र के यहाँ टिका था उसको दी गयी असुविधाओं में यह भी जुड़ना था । कोशिश तो अपनी थी कि उन्हें और न प्रताड़ित किया जाए पर कै की आवाज़ से उनका जागरण भी हो ही गया । मित्र के यहाँ ही अपना बैग पड़ा था और उसी बैग तक अपना ज़ोर था इसलिए बहुत सी असुविधाओं के बारे में खयाल भी नहीं आया ।



अपना डेरा-डंटा उखड़ जाने के बाद पहली बार दिल्ली जाना हो पाया था सो बहुत सारे नये अनुभव भर रहे थे । यही कारण था कि दिन के जल्दी शुरू हो जाने के बाद भी रात देर से हुई उन दिनों !

अगस्त 01, 2013

नादां वहीं हैं हाय , जहां पर दाना ....


विद्यालय में यूं तो बहुत सारे छात्र हैं और सभी इंसान ही हैं , फिर भी इस स्थान को मैं भावनाओं से भरे हुए स्थान की तरह नहीं पाता हूँ । इसका कारण यहाँ का अपना समाज हो सकता है जो जीवन को वस्तुपरक ढंग से देखना सीख चुका है । समस्या यही है कि बहुत सारी बातों को हम सरलीकरण के खांचे में डालकर उन्हें नज़रअंदाज़ करना सीख जाते हैं जो जानने समझने के साधारण तौर – तरीके के बदले विशेष को प्रश्रय दिलवाता है । अर्थात, बिना किसी शोध के हम छोटी सी बात को समझने का दावा भी नहीं कर सकते जैसे शोध ही ज्ञान का एकमात्र आधार हो !


अभी हाल ही में दिल्ली से आने पर 11वीं कक्षा में गया तो पता चला कि एक छात्रा विद्यालय छोड़ कर जा रही है ! विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहां छात्रों का आना-जाना तो लगा ही रहता है सो कोई अनोखी बात हो ऐसा तो था ही नहीं । न मैंने ऐसा महसूस किया और न ही कहीं से ज़ाहिर ही हो रहा था । छात्रों ने बताया कि उसे किसी दूसरे विद्यालय में विज्ञान में नामांकन मिल गया है । यूं विज्ञान या कि किसी भी अन्य क्षेत्र में छात्रों की दीवानगी मुझे नहीं जँचती है फिर भी मैं हर किसी पर अपनी बात थोप तो नहीं सकता न ! सो उसके विज्ञान की पढ़ाई के लिए विद्यालय छोडने को उसकी तरक्की मानते हुए उसे शुभकामनायें ही दी । थोड़ी देर बाद पता चला कि ऐसा वह अपने मन से नहीं, बल्कि अपने पिता के मन से कर रही है !


एक दिन बाद वह लड़की स्टाफ़-रूम में सभी शिक्षकों से मिलने आयी । कोई दूर से ही कह सकता था कि वह घंटों रोयी होगी । बात करने पर उसने बताया कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहती है । वह वहाँ पास नहीं हो पाएगी । बल्कि यहाँ उसका मन भी लगता है और मन माफिक विषय भी मिले हैं । लेकिन पिताजी हैं कि एक बार भी सुनने को तैयार नहीं हैं !


उस दिन वह लड़की कई बार इधर-उधर दिखी- कभी यहाँ से अनापत्ति-प्रमाणपत्र लेते हुए तो कभी वहाँ से ! उसके चेहरे पर रोने के भाव हमेशा ही ताज़ा बने रहे । छुट्टी के बाद तो उसके दोस्तों के चेहरे भी उसी तरह के थे – ग़मज़दा । शाम होते होते मुझे भी अपनी कक्षा से एक बढ़िया हिन्दी बोलने वाली छात्रा खोने का ग़म होना शुरू हो गया । वैसे ही यहाँ एक कक्षा में ठीकठाक हिन्दी बोलने वाले एक-दो मिलते हैं उस पर भी उस लड़की को उसके पिता विज्ञान पढ़ने के लिए यहाँ से ले जा रहे हैं ।


पहली नज़र में तो उसके पिता सीधे सीधे अपराधी नज़र आए जो अपने बच्चे की भावनाओं और इच्छाओं का कोई भी खयाल किए बिना अपनी जिद उस पर थोप रहे हैं । लेकिन गहरायी से देखने पर मामला कुछ और ही नज़र आता है । उसके पिताजी या कि इस तरह के कोई और, केरल की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनसे यहाँ साक्षारता और शिक्षा में नयी हवा की शुरुआत मानी जाती है । जिस पीढ़ी ने केरल को शिक्षा और साक्षारता के क्षेत्र में गर्व करने का मौका दिया उसी पीढ़ी के हैं ये हज़रत ! इन्होंने शिक्षा को जिस तरह से समझा उसमें वह केवल अधिकतम आय प्राप्त करने के साधन के रूप में ही मानी जाती है । तभी साहब विज्ञान विषय में ही भविष्य देख रहे हैं ।


मैंने जब से होश संभाला तब से जब भी केरल का जिक्र सुना, देखा, पढ़ा हमेशा वह एक आदर्श राज्य के रूप में ही दिखाया गया । और इस सबने मन पर इतना असर कर लिया था कि यहाँ मैं उन्हीं से उपजी बहुत सारी पूर्वधारणाओं के साथ आया था । मैं पता नहीं क्यों यह मानकर चलने लगा था कि इस राज्य में स्त्रियों को अन्य स्थानों की अपेक्षा ज्यादा स्वतन्त्रता होगी और कम से कम उनके पास कुछ अधिकार तो होंगे ही जैसे अपने अध्ययन क्षेत्र को चुनने की । पिताओं के वर्चस्व वाले परिवारों में वैसे भी लड़कियों की पढ़ाई कोई विशेष स्थान नहीं रखती है ।


अभी विद्यालय का कप्तान को चुनने की बैठक हुई थी । उस बैठक में सबने यह स्वीकार किया कि 11 वीं कक्षा में एक भी ऐसा लड़का नहीं है जो कप्तान बन सके । ज़िम्मेदारी, अनुशासन, धैर्य और अध्ययनशीलता एक साथ किसी में भी नहीं है । कई नाम उछले पर सब किसी न किसी के द्वारा काट दिए गए । वहीं सबने एकमत से स्वीकार किया कि उसी कक्षा की एक नहीं बल्कि कई लड़कियों में कप्तान बनने की क्षमता है । इस पर मेंने कह दिया कि क्यों न इस बार विद्यालय के कप्तान की ज़िम्मेदारी इस बार किसी लड़की को ही दे दी जाए इस तरह से एक परिवर्तन भी हो जाएगा और उनकी क्षमताओं का उपयोग करने का मौका भी मिल जाएगा । सच बता रहा हूँ इस प्रस्ताव का सिरे से विरोध शुरू हो गया । छोटे-छोटे से लेकर बड़े-बड़े कई बहाने बता दिए गए । और नहीं हुआ तो उनके लड़की के रूप में असुरक्षित और कमजोर होने का मुद्दा डाल दिया गया । परिणाम ? वही जो होता आया है अपने देश में । इस बात की पूरी संभावना है कि लोग मेरे इस प्रस्ताव को दूसरे नजरिए से भी देखने की जुगत कर रहे होंगे ।


जहां देखो वहाँ समाज में व्याप्त असमानता की भावनाओं के खिलाफ लड़ने के लिए शिक्षा की ढाल लायी जाती है और ऐसा माना जाता है कि इससे परिवर्तन हो ही जाएगा । शुरू मैं मैं भी यही मानता था पर पिछले दिनों के कुछ अध्ययन और कुछ अपने अनुभवों ने शिक्षा की निरीहता को समझने का मौका दिया है । इसे केरल के आधार पर ही देखिये तो समझ जाएंगे कि शिक्षा की जो भी महिमा गाते फिरते हैं वह बेकार सी है । केरल देश में सबसे ज्यादा शिक्षित प्रदेशों में से आता है और यहाँ स्त्रियों की स्वतन्त्रता और उनके प्रति हिंसा का जो आलम है वह सहज आभास देता है कि इन सामाजिक बुराइयों पर अंकुश के लिए केवल शिक्षा से काम चलाना संभव नहीं है और इसके लिए नए रास्तों और तरीकों को तलाशने की जरूरत है ।

यहाँ मुझे हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ बड़ी मौजूं लगती हैं –

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना ?
नादां वहीं हैं, हाय ,  जहां  पर   दाना !
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे ?

मैं सीख रहा हूँ,  सीखा  ज्ञान भूलाना !  (हरिवंशराय बच्चन) ! 

जुलाई 26, 2013

लाइब्रेरी में चिरकुटई !


[ देखिये साहब अब विद्यालय के धंधे में हूँ तो इसकी ज्यादा बातें तो करूंगा ही ! फिर आप चाहे जो कह लीजिये लेकिन पत्रकार जब केवल पत्रकारिता छांटते रहते हैं और ऊ तथाकथित साहित्यकार सब जो आजकल केवल एन्ने-उन्ने कर रहे हैं सो ? अपनी खेत के कोने में टिकना ज्यादा न बढ़िया होता है । पर जब खेतवे में खद्धाई (संभ्रांत हिन्दी वालों के लिए गड्ढा) हो तो मन करबो करेगा त नहीं ने बाहर जा सकते हैं ! ]
ऊ रही भूमिका ई रहा मजमून !

        लाइब्रेरी होता है एगो जिसको प्रेमचंद महराज गोदानवा में रायबरेली कहे हैं । ऊ बड़े आदमी थे कुछो कह सकते हैं । लेकिन एगो बुद्धू हम थे जो केतना दिन तक ने उसको प्रिंटिंग का मिस्टेक मान के बैठे रहे । कनिए उससे भी पहले चलिये जब हम इसकूल में पढ़ रहे थे । पहले तो साल का एगो-दू गो महिना ऐसे-हिये निकल जाता था – बिना किताबे का । फिर कोनो जोगाड़ भिड़ा के किसी छौड़ा ( ऊँह मुंह न देखअ सीनियर के ) से अधिया दाम में किनते थे । बहुत घीच-तान हुआ त मायो-बाप ला देता था एगो-दूगो किताब । तब तक इसकुल में ऐसेहिए आना आ जाना । मौजे न था एकदम ! ( फेसबुक होता त दूगो एस्माइलीयो न साट देते ) । त आगु बढ़िए ई का पैर में जाँता बान्ह लिए हैं । त साहब कौनों लाइब्रेरी जैसा नहीं था । इसी तरह होते-हवाते सतमा पास कर गए आ निकल के आ गए सहरसा । बिधायक के दादा के नाम पर हाई-इसकुल त था लेकिन लाइब्रेरी नहीं था । अपना बस्ता ले के जाना आ उसी को पढ़ना । पढ़ना क्या झख मारना । शुरू में कुछ पढ़ाई-पुढाइ हुई बाद में बस महिना में दू बार फी-कलेक्सन होता था । पता नहीं ऊ पइसवा किसके पास जाता था । तो ऊ हाई इसकुलवो में लाइब्रेरी नहिये देखे । मैट्रिक परीक्षा के बाद पहली बार पता चला कि सहरसो में एगो लाइब्रेरी हाई - डी.बी. रोड में । कुछ दिन ऊहों गए । किताब निकाले के औकात हमारा तभियो न हुआ था । चार-छ गो अकबार पड़ल रहता था । किताबो सब था लेकिन उठा नै सकते थे । बाद में ऊ लाइब्रेरी उठ के हुआं से सुपर मार्केट चला गया और हम उठ के सहरसा से सिद्धे दिल्ली ।
         
            दिल्ली में देखा त एक से एक बड़का-बड़का लाइब्रेरी ! कौलेज में एडमिसन हुआ तब आया लाइब्रेरी से किताब उठाने का औकात । पर एगो समस्या यहाँ भी था – एक तो जो किताब कोर्स में लगा था ऊ मिलता नहीं था और मिल गया तो कुछ जरूरी और ज्यादा बहुत जरूरी हिस्सा गायब रहता था । फिर इधर उधर का बहुत किताब पढे । धन्न ऊ सीआरएल का लाइब्रेरी जो उतना जगह दिया और उतना बढ़िया बढ़िया किताब का दर्शन कराया कि असली पढाय बिसर के झाड-फ़नूस पढ़ते रहे । एमे हिन्दी में उसी से कम नंबर आया !  लेकिन अपसोच कहाँ है ! ऊ झाडे-फ़नूस है जे आज काम दे रहा है ।
               
               इधर हम कर लिए नोकरी आ आ गए केरल । यहाँ एगो इसकुल में काम मिला है हिन्दी पढ़ाने का । ऐसे त ईधर पादनेयो का फुर्सत नै है लेकिन जब गलती से ऊ करने का टैम मिल जाता है त चढ़ लेते हैं दस-बारह सिरही – आ जाता है लाइब्रेरी । तीन गो गोदरेज (गोदरेज कंपनी का स्टील का आलमारी एतना ने बिका कि अब सहरसा का महाबीर चौक बाला अलमारी भी गोदरेजे हो गया है ।  ) है हिन्दी का ! पहले दिन गए थे त ऊ मैडमिया केतना गर्व से दिखाई थी कि एतना किताब है जी तुम यहीं आ के पढ़ लिया करो । अब जब हम सच्चे के एक दिन पढ़ने पहुँच गए त क्या देखते हैं कि पचास गो किताब को एन्ने से उन्ने कीजिये त एगो किताब मिलेगा उहो कहिया का छपा हुआ ! बाकी ऊंचास गो किताब में हिन्दू धर्म के महान संत , वीर शिवाजी , भारत के महान राष्ट्रपति वी.वी गिरि , योग क्या है और इससे भी बढ़कर इसका-उसका, न जाने किस किस का  एमफिल’, पीएचडी का छपा हुआ शोध-परबन्ध । छांट छांट के अपने लिए कुछ किताब अलग किए कुछ छात्रों के ले जाने के लिए । सब किताब पर केंद्रीय हिन्दी संस्थान या कि कोनो इसी का निदेशालयवा है कहीं पर उस सब का मोहर । साथ में इ भी लिखल था कि ई कितबिया फलाने संस्थान ने सप्रेम-भेंट किया है ।
                     मंगनी बरदा का दाँत नहीं देखते हैं कि ऊ कितना बूढ़ा है । चाहे ऊ कल्हे काहे न मर जाए पर मुफ्त में ले जरूर लेंगे । सबसे बड़ ई है कि दाम नहीं न लगा जी । जो मिला रख लिया । कौन सा किसी को पढ़ना है । पढ़ना है त अपना खरीदो ।
              
                  ई हिन्दी का जो केंद्रीय दुकान सब है ई पता नहीं कहाँ से ई एक से एक बेकार किताब उठा उठा के ले आता है आ भेज देता चुन चुन के सब सरकारी ईस्कूल में - उपकार का बोझा बना के , बोरा में भर के ! एगो बात इहो है कि केरल में किसी को हिन्दी तो आता नै है उतना सो जो सो किताब भेज दिया सब रख लिया आ कहियो उ संस्थानवाँ सब के बोला भी नहीं कि - रे भाय , तुमको कोई फिरी में देता है त तुम रखो हमको काहे दे देते हो ई कूड़ा-करकट । ई अरकच – भतुआ अपनैए पास रख लो ।

                 आ दु गो बात ऊ किताब लिखे बला सब से ! हे भाय- बहिन काहे जिद करते हो कि कुच्छो ते लिखबे करेंगे ! कोई कोई नहीयो लिखता है । आ कि सब कुकुर काशिए चला जाएगा त बाबू हो पत्तल कौन चाटेगा गाम के भोज में ! ऊ फेसबुक आ बेबसाइट बना बना के साहित्य में भुंकेगा कौन ! ई जो बेकार किताब लिख लिख के शाहदरा , लक्ष्मीनगर आ मौजपुर से छपाते हो ऊ में पैसबे न लगता है जी ! ऊ बचा लोगे तो धीया-पूता के प्राइभेट इसकुल का दू-तीन साल का फीस न भरा जाएगा । पर नै जी तुमको तो एगो किताब छपाना है । रे तोरा केतना कहें कि कोन का दिमाग खराब हुआ है जो तुम्हरा ऊ कॉपी-पेस्ट वाला डीजर्टेसन पढ़ेगा । छोटका बच्चा सब त ऐसेहिए कोनो किताब नै पढ़ना चाहता है ऊपर से तुम्हारा ई हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील । चूल्हे में झोंको ऐसे किताब को । तुम तो ससुर फिरी में किताब लिखने के नाम पर राष्ट्रपति भवन में अनूप भाई का किताबियो ले गए आ जैसे ही किताब छपा आ ऊ जाने लगी कि लगा दिया नोकरी राजस्थान के कौलेज में ! ई बेकार का किताब लिख के हमरे आ हमरे जैसे कैक इसकुल के लाइब्रेरी को तो 4-4 गो कॉपी भेज के भरिए न दिये हो !

त भैया इस तरह पूरा हुआ हमरे आज के भड़ास का कोटा !  

जुलाई 23, 2013

झपकियाँ लेते हुए


मैं अपनी डायरी और उसके लिखने को उसी तरह बेतरतीब मानता हूँ जैसा कि मैं हूँ । और कोई आश्चर्य नहीं कि यह मेरी तरह ही उथली या कि बकवास से भरी है और एक मित्र कि भाषा में कहूँ तो अल्हड़ सी ! पता नहीं उन्होने मेरे लिए अल्हड़ शब्द का प्रयोग सकारात्मक या नकारात्मक दोनों मे से किस अर्थ में किया पर आज तक तो मैं अल्हड़ को नकारात्मक ही मानता ,सुनता और समझता आया हूँ ! हालांकि इन सब से अब कोई फर्क नही पड़ता । आप अपने जीवन के एक बड़े हिस्से में ऐसे ही हैं तो अपने उसी व्यक्तित्व के साथ जीना सीख लेते हैं और आपको पता होता है कि लोग जो कह रहे हैं वह क्या और कैसे है । बहरहाल सोमवार यानि कि कल सुबह क्लास में जाने से पहले स्टाफ रूम में बैठा था और उस बेकारी भरे माहौल में नींद का झोंका आ-जा रहा था पास में एक पन्ना पड़ा था तो कुछ कुछ गोदता गया । यहाँ नज्र किए देता हूँ ... शायद अपने होने और उसकी व्यर्थता को आप भी समझ सकें ।

सुबह 8.10
विद्यालय में बैठा हूँ और आज की पहली दोनों कक्षा खाली है , मेरा काम नाश्ते के बाद शुरू होगा यानी  9.30 बजे । अभी तक अखबार भी नहीं मिल पाया है दो-तीन राउंड फेसबुक के भी देख लिए । जब से सीधे द हिन्दू वालों से अखबार लेना शुरू किया तब से यही हो रहा है । जो भाई जी घर पे दे जाते थे उन्हें बंद करवा कर सीधे कंपनी से ही लेना शुरू किया है । सीधे खरीदने में हर महीने के 50 रुपयों की बचत है । पर इस बचत में वो आजादी नहीं है । अखबार स्कूल में डाला जाता है घर पर नहीं तो ज़ाहिर है रविवार को भी यहीं आना पड़ता है अखबार लेने । रविवार को विद्यालय के प्रांगण में आना ऐसा लगता है अपने को जैसे मैंने कोई सज़ा दे दी हो ! खैर , फेसबुक के एक दो राउंड और देखने के बाद टेबल पर पड़े चार-पाँच नोटबुक भी जांच लिए और जो काम तीन दिनों पहले का था उस पर तीन दिन पहले की तारीख आज डाल कर हस्ताक्षर कर दिए । यहाँ यह बताता चलूँ कि ये वे बचे हुए नोटबुक हैं जो घर से वापस आए छात्रों ने आज सुबह दिए हैं ।

छात्रों के नोटबुक से ऊब गया हूँ ... वही गाइड बुक के उत्तर छाप दिये हैं सबने । यदि बुलाकर पूछता हूँ तो साफ नकार मार देंगे कि जी मैंने नकल नहीं की । पर हो भाय और बहिन जब तुम एक वाक्य शुद्ध शुद्ध नही लिख सकते तो ये उत्तर कैसे सटीक और शुद्ध भाषा में लिख मारे हो । तुम्हारी हिन्दी क्या हमसे इतनी छिपी है ! इधर एक दो ने नयी चालाकी शुरू कर दी है वे जानबूझ कर एक प्रश्न के उत्तर में दो- तीन गलत वर्तनी डाल देते हैं ताकि मैं समझ जाऊँ कि उनहोने कोई नकल नहीं मारी है और मैं उसे गाइड बुक की प्रतिलीपि मानने की भूल नही करूँ ।

इधर नींद आँखों पर चढ़ने लगी है । लग रहा है ऊपर की पलकों पर बहुत मोटा बोझ रखा हुआ है जो धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है । स्टाफ रूम में एक दो लोग बैठे हैं जैसे किसी छोटे स्टेशन पर आधी रात के बाद की अंतिम गाड़ी का इंतेजार करते हुए एक-दो लोग मिलते हैं । उनमें भी शायद नींद की पहचान उभर रही है या रात की नींद का असर घुस रहा है । जिस भी टेबल पर नजर जाती है नोटबुक के ढेर लगे हैं जैसे किसी सरकारी दफ्तर में बाबुओं की टेबल पर होता है । छात्रों की नोटबुक की जांच एक ऐसा काम लगता है जो अध्यापकों का नहीं लगता । ऐसा करते हुए वह किसी भी दफ्तर के बाबू सा लगता  है या वही बन जाता है । वही खीज़ , वही बिना देखे कलम घिसते जाना । बीच बीच में कहीं कहीं अपनी लाल कलम से कोई निशान छोड़ देना ताकि गहराई से पढे जाने का भ्रम बना रहे । मेरे लिए यह और आसान है दो-चार शब्दों के हिज्जे को घेरकर नया लिख दो .... तो कहने को कोई भी कह सकता है कि मैंने या किसी बहुत समय देकर ध्यान  से पढ़ा है पर मामला बहुत कम बार ऐसा हो पाता है ।

8.20 बजे :
अबे ! ये जॉनसन इतनी ज़ोर से घंटी बजाता है कि कान फट जाए । जबकि एलेक्ट्रानिक घंटी भी पड़ी है लेकिन भाई साहब उसे छोडकर यही बजाएँगे ! सोमवार की सुबह का अपना एहसास ही नींद की खुमारी में रहना है और थोड़े जागे और थोड़े सोये से बैठना है उसे ये हज़रत घंटी बजा कर तोड़ देने पर उतारू हैं ।
ये सोमवार का ही दिन है जब मैं शिद्दत से सोचता हूँ और अभी भी सोच रहा हूँ कि , एक अध्यापक को भी कॉलेज के प्राध्यापकों की तरह अपनी कक्षा भर में आने की छूट होनी चाहिए । इससे उसकी उत्पादकता बढ़ेगी क्योंकि उसे आराम मिलेगा । यूं नींद की झपकियों से भरे वह स्टाफ रूम में रहे तो कौन सा पहाड़ तोड़ेगा ?
यहाँ खाली बैठने से लगता है कि , सब काम पर गए हैं और हम ही एक –दो निठल्ले बचे हैं । यह एहसास और थका देता है यहां से उठकर काम करने के लिए जाने में हिम्मत के कई डोज़ की जरूरत पड़ेगी । फिर भी कक्षा के मोड में आते-आते अपने को थोड़ा टाइम तो लग ही जाएगा ।

यहाँ बैठे बैठे ये सब कुछ गोदने से और भी भाव उभर कर आ रहे हैं । एक तो बड़ा सही सा लगा है जिसका क्रम भी थोड़े से फेरबदल के साथ जुड़ता चला जा रहा है । इसे जोड़-जाड़ के एक बड़ी कहानी बनाई जा सकती है । पिछले कुछ समय से लग रहा है कि कहानी लिखना तो छूट ही गया । अब पता नहीं कहानी शुरू भी हो पाएगी भी या नहीं । उसकी अपनी मांग है और उन्हें पूरा करने का धैर्य अब खत्म हो रहा है । मानसिक स्तर पर बहुत सारा सोच –विचार हो जा रहा है पर उसे भौतिक रूप देना कठिन होता जा रहा है ...



जुलाई 21, 2013

धूप में निकल कर !


कामकाजी ज़िंदगी में रविवार एक इत्मीनान है और दिन भर वही इत्मीनान तारी रहता है । कुछ भी करिए कहीं भी जाइए, कहीं भी समय पर पहुँचना नहीं है बस अपनी इच्छा पर है जितनी देर जहां मन किया ठहर लिए । मन किया सो गए , नही तो कुछ उठा के पढ़ लिए । यूं इस दिन भी काम कम नहीं होते बल्कि आम दिनों के मुक़ाबिल देखें तो ज्यादा ही होते हैं पर समय की पाबंदी नहीं रहती सो मन एक प्रकार से आज़ाद ख़याल हो कर यहाँ वहाँ जा सकता है , ये-वो कर सकता है ।


यहाँ तो अपना काम रविवार के दिन भी बिना अलार्म के नहीं चलता । सप्ताह के अन्य दिनों की तुलना में यह आज भले ही देर से बाजा पर नींद का असर वही था जो रोज़ रहता है । आज भी चक्रव्यूह फिल्म के गाने भैया देख लिया है बहुत तेरी सरदारी रे को कोसते हुए मन जागा था । इस गाने को कोसा इसलिए कि इसे मैंने अलार्म टोन लगा रखा है आजकल । इसकी आवाज़ जरा तेज़ है ! बच्चन की कविता आत्मपरिचय की तरह शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ वाला भाव नहीं है इस गाने में । आग है तो आग के ज्वाला-युक्त वाणी भी चाहिए और जरूरी भी है । घिघिया के यदि सच कहा भी जाए तो सच का क्या असर होगा ? बच्चन की कविता कविता के लिए ठीक है पर वो कवि को आर्मचेयर इंटेलेक्चुअल से ज्यादा कुछ नहीं बनाती ।
सुबह सुबह यदि नहाने का विचार त्याग दिया जाए तो आधा घंटा सोने को और मिल जाता है । ऐसा हर दो-तीन दिनों के अंतराल से मैं कर लेता हूँ और हर बार का बहाना खुद से यही बनाना होता है कि – सुबह की इतनी प्यारी नींद के लिए इतना चलता है ।


नाश्ते के बाद आज मन थोड़ा भटकने का कर रहा था । अनायास ही पैर रास्ता नापने की तैयारी करने लगे । यहाँ स्कूल में कुमुदनी का एक छोटा सा तालाब है । जब से वहाँ फूल खिलने शुरू हुए हैं तब से वहाँ जाने के मन को मनाना नहीं पड़ता । आज वहाँ एक ही फूल खिला था , वह भी क्षत-विक्षत-सा लेकिन पौधे से जुड़े होने के कारण उसमें जीवन की संभावनाएं दिख रही थी । कटा-फटा फूल भी मुसकुराता है ! उसका तन चोटिल है मन में उन चोटों के निशान भी जरूर ही होंगे पर वह फूल जीतने भी हिस्से में मेरे सामने था अपनी मुस्कान से लबरेज ! कुमुदनी के इन पौधों के पास छात्र खेलते हैं बल्कि बच्चे खेलते हैं । बहुत से पौधों के हिस्से नीचे पानी में दबे पड़े हैं । क्या ये पौधे किसी की शिनाख्त कर सकते हैं !


कुमुदनी को लेकर अफसोस तो था पर मन इसके लिए तैयार न था कि अफसोस किया जाए । बाहर निकला तो चलने की इच्छा और तेज़ जैसी हो गयी । बहुत दिनों बाद धूप देखी थी सो धूप का आकर्षण संभाले नहीं संभल रहा था । मैं जिन इलाकों में अब तक रहता आया था उनमें से कहीं भी मैंने धूप के लिए इतना आकर्षण महसूस नहीं किया । इसके विपरीत लगातार यह भाव बनते रहते थे कि धूप जाए और छांव आए । पर यहाँ केरल के इस इलाके में बादल और बारिश धूप को जिस तरह दबाये रखते हैं कि अपना बचपन याद आ जाता है जब मैं दब्बू- सा हुआ करता था । बारिश और धूप के खेल में धूप को पिछले डेढ़ महीने में कभी भी जीतते नहीं देखा बल्कि मुक़ाबला करते भी नहीं देखा । आज बहुत दिनों बाद धूप देखी तो उसके मुक़ाबले के लिए तैयार होने की हिम्मत के आमंत्रण को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं रहा । किताब की दुकान पर ज़्यादातर मलयालम की सामाग्री ही थी और जो अंग्रेजी में थी उन्हें बहुत पुरानी से कम कुछ नहीं कह सकते । हिन्दी ? हिन्दी इल्ला ! हिन्दी यहाँ नहीं मिलेगा एर्णाकुलम जाओ । केरल के इस क्षेत्र में मैं रहता हूँ वहाँ के बहुत से बाज़ारों को देख आया हूँ यहाँ किताबों को लेकर एक खास तरह का चलन देखने को मिला है । ज़्यादातर इंजीनियरिंग से जुड़ी किताबें मिलती हैं और उसके बाद नर्सिंग से जुड़ी हुई । इसका कोई न कोई सामाजिक आधार जरूर होगा । दुकानों में अंग्रेजी या मलयालम के उपन्यास ही खोजिए तो नहीं मिलेंगे उसके लिए भी बड़े शहर जाना पड़ेगा । यहाँ की किताब की दुकानों में उपलब्ध समग्रियों के आधार पर इतना तो मानना पड़ रहा है कि यहाँ, पढ़ने की आदतों को पाठ्यक्रम आधारित पुस्तकों तक सीमित रखने की कवायद काफी पहले से चल रही है ।

कभी कभी निकालने वाली इस प्यारी धूप में मैं उस रास्ते पर दूसरी बार चल रहा था । वह रास्ता डरावना तो है पर उसकी घनी हरियाली आकर्षित करती है । यही वजह है कि कई बार सहकर्मियों के मना करने के बावजूद मैं उस रास्ते का मोह त्याग नहीं सकता । वे इधर आने को इसलिए मना करते हैं क्योंकि वह जंगल का क्षेत्र है जहां कई प्रकार के जानवर हैं विशेषकर हाथी दूसरे मेरे साथ भाषा की भी समस्या है । उनके कहने से भी मन नहीं मानता कि उस रास्ते पर कभी कोई हाथी मिल जाएगा । ऊपर से जंगल के स्वतंत्र वातावरण में जानवरों को देख पाने का मोह और उस रास्ते की ओर खींचता ही है ।


मैं उस सुनसान रास्ते पर चल रहा था । एक्का-दुक्का कोई गाड़ी निकल जाती पर इससे रास्ते की शांति पर कोई असर नहीं पड़ता महसूस हुआ । आगे एक स्थान पर पहाड़ से गिरता पानी सड़क पर बह रहा था । पक्की काली सड़क पर पारदर्शी पानी एक मोहक दृश्य बना  रहा था ! रास्तों के ऊपर से बहता पानी मैं खूब देख चुका था पर वह कच्ची सड़क पर बहता था हाँ उनमें कभी कभी मछलियाँ जरूर दिख जाती थी ।
उस रास्ते पर जितना बढ़ते जाओ जंगल उतना घना होता जाता है । एक बिन्दु के बाद आकर्षण पर वातावरण की भयावहता हावी होने लगती है । सागवान के ऊंचे–ऊंचे पेड़ और न जाने कई अन्य कौन-कौन से पेड़ जिनकी बनावट से कई बार उनमें मनुष्य के चेहरे जैसे भाव उभरते प्रतीत होते थे फिर पेड़ों की फुनगी को छूती मोटी जड़ों वाली लताएँ । सब मिलकर ऐसा घना आवरण बना रहे थे कि उसके पार देखना संभव न हो । ऐसे में छोटी सी चिड़ियाँ की आवाज भी बहुत डरावनी लग रही थी । दो दिन पहले ही रश्किन बॉन्ड की ट्रेडमार्क भुतहा कहानियाँ पढ़ी थी सो कई तरह के चित्र और भाव एक साथ उभर रहे थे । जंगल के उतने भीतर जाने के बाद भी मैंने न कोई जानवर देखा और न ही कोई चेहरा । लेकिन उन दोनों का भय बना रहा । पर ऐसा नहीं लग रहा था कि कहीं से कुछ झट से सामने आ जाएगा ।


कुछ साल पहले मैं भीमबेटका की गुफाओं में आदि मानव द्वारा बनाए गए चित्रों को देखने के लिए गया हुआ था । मध्य-प्रदेश की सरकार और उसका पर्यटन विभाग कितनी भी अपनी प्रशंसा कर ले और अपने यहाँ आने को आमंत्रण पर आमंत्रण दे लेकिन भोपाल से महज़ 20 किलोमीटर दूर ये गुफाएँ यातायात की दृष्टि से संपर्कहीन ही हैं । ओबेदुल्ला गंज के आगे कोई सवारी मिलनी संभव नहीं है मालवाहक ट्रकों और ट्रैक्टरों के अलावा कोई साधन नही है । जाते समय तो एक ट्रक वाले ने भीतर बैठा लिया था पर लौटते हुए एक रेत लदे ट्रक के पेछे रेत पर बैठ कर आना पड़ा । इतना ही नहीं ट्रक वाले जहां छोडते हैं वहाँ से गुफाएँ और तीन-चार किलोमीटर चढ़ाई पर हैं जहां तक जाने के लिए या तो आपके पास अपनी सवारी हो अन्यथा पैदल ही आसरा है । यह दशा देखकर यह सोचने को विवश होना पड़ा कि ये पर्यटन सीमित संसाधनों वाले लोगों का काम नहीं है उनके लिए तो घूमा-फिरी है । जेब जितनी आज्ञा दे उतना घूम-टहल लो । बहरहाल जब मैं ट्रक से उतर कर ऊपर गुफाओं की ओर पैदल जा रहा था तो अकेला था । मई की तेज़ धूप में सूखी पहाड़ी तप रही थी और पेड़ों से गिरे पत्तों का पानी जल चुका था । चारों ओर सन्नाटा था कहीं कोई नहीं । उस सन्नाटे में एक मक्खी का भिनभिनाना भी किसी बड़े जीव की आवाज जैसा सुनाई दे रहा था । तब हर विचित्रता एक अलग तरह का भय पैदा कर रही थी । वहाँ भी अकेला था और आज इधर केरल के जंगल में भी अकेला था । मैं ऐसा नही कहता कि मुझे भय नहीं हुआ पर भय से जुड़ी जितनी कहानियाँ सुन रखी थी उस जैसा कभी नहीं लगा । ऐसा कभी नहीं लगा कि कोई कहीं से आ के दबोच लेगा या कि कुछ और ।
आज धूप ने मौका दिया तो अपने हिम्मत की जांच करने का मौका इधर भी मिल गया । मैं अपने भय के तमाम मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू को जब देखता हूँ तो ये फिर से मुझे अपने मन की ही ऊपज लगती है ।


रविवार शायद इसी तरह की बातों के लिए होता है जब कपड़े धोते-धोते किन्हीं बेवजह से खयालात को समेटने का मन कर जाए या फिर समस्त भय को दरकिनार कर मन फिर से एक बार जंगल या कि भीमबेटका के चित्रों को देखने के लिए ललचा जाए ।  

जुलाई 14, 2013

हमारी आग पर उनकी रोटी


इसे जिस भी तरह से प्रस्तुत किया जाता है अच्छाई से लबरेज़  और सुखद रूप से क्रांतिकारी भी लगने लगा है कि एक लड़की गोलियां खाकर भी अपनी शिक्षा को जारी रखना चाहती है . यह सबकुछ ऐसा है कि अब लगने लगा है उसकी देखा देखी सभी लड़कियां स्कूल जाने के लिए गोलियाँ तक झेलने की हिम्मत कर बैठेगी और किसी ने उन्हें रोका तो संसार को दिशा दिखाने वाले राष्ट्र और वैश्विक संस्था तो है ही . वे रोकने वालों को अपने हवाले ले लेंगे .
    

 आलोक धन्वा की एक कविता है -पतंग . ढेर सारे बिंबों से भरी इस कविता में वे बताते हैं कि , बच्चे पतंग की पतली डोर के सहारे छत के कोर तक जाने का सहस कर लेते हैं और ऐसे लगने लगता है कि यह डोर उन्हें थामे हुए है . कभी यदि वे गिर जाएँ और उन्हें कुछ नही हो तो उनका साहस और बढ़ जाता है . यह समाज भी ठीक वैसी ही दशा प्रस्तुत कर रहा है . शिक्षा प्राप्त करना पतंग की डोर के समान है और थोड़े से लोगों को छोड़ दिया जाये तो बहुसंख्यक बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना छत की कोर तक चले जाने जैसा 'रिस्की' है और अधिकांश बार उन्हें गिरते पाया जाता है . एक आधा बार ही ऐसा हुआ होगा कि वे गिरे और उन्हें कुछ हुआ नही ! मार्क टुली की एक किताब है 'द हार्ट ऑफ़ इंडिया'. पूर्वांचल के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से पर लिखित यह किताब यूँ तो हमें वाही सब बताती है जो हम आम जीवन में देखते हैं परन्तु जैसा कि हमेशा से होता आया है  एक विदेशी की नजर इसे आश्चर्यजनक रूप से विश्वसनीय बना देती है . इसी किताब में दो भाइयों का जिक्र है जो जाती और वर्ग दोनों के अनुसार तथाकथित निम्न मानी जाने वाली पृष्ठभूमि से आते हैं . वहां शिक्षा का प्रवेश दिखाया गया है लेकिन शिक्षा अंततः उन्हें इतना ही दे पाती है कि रोजगार को प्राप्त करने के लिए उन्हें भारी घूस की जरुरत है . जो वे कभी जमा नहीं कर पाते . उनका रोजगार विहीन होकर रह जाना उनके आस पास के लोगों की शिक्षा पर विश्वसनीयता को स्थायी तौर पर समाप्त कर देता है .
               

शिक्षा हमारी कितनी मदद कर सकती है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए बार- बार इतना ही उभर कर आता है कि थोड़े बहुत वैचारिक परिवर्तन और कुछ सूचनाओं के भर देने के अतिरिक्त इसका कोई काम नहीं . परन्तु कई लाख बार इसे ही बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता रहा  है . जबकि जो कार्य शिक्षा अक्षरों और लिपियों के माध्यम से करती है वह अनुभव और जरुरत के अनुसार आ ही जाता है . फिर तुरंत शिक्षा के पैरोकार शिक्षा का दायरा बढ़ा कर सबकुछ उसी के भीतर ले आते हैं . ठीक उसी समय यह कहने की जरुरत है कि जब सबकुछ शिक्षा के घेरे में ही आता है तो ये शिक्षित-अशिक्षित के ढोंग और विभाजन , ये विद्यालयी तामझाम आदि कहाँ से आवश्यक हो गए . एक बड़ी आबादी का केवल हीनता के साए में या हाशिये पर रहना कि वे शिक्षित नहीं हैं और उनकी इस दशा पर ही सारे दोष मढने की प्रक्रिया को भी देखने और फिर से समझने की जरुरत है . देखा जाए तो शिक्षा की दी हुई व्याख्या ही हम लगातार ढो रहे हैं . यह व्याख्या उसी 'व्हाइट मैन्स बर्डन' वाली बात से निकलती है .
      

 मलाला के जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने मलाला दिवस घोषित कर दिया . दुनिया भर के समाचार प्रदाताओं के लिए यह पहली बारिश के जैसी सुखद अहसास भरने वाली खबर थी . और पूरी पश्चिमी राजनीति के लिए ऐसा तब था जब वर्ष 2012 के अक्तूबर में किसी दिन मलाला को गोली मार दी गयी थी . मानवाधिकार का हमेशा दम भरने वाले देशों के सामने अफगानिस्तान , ईराक फिलिस्तीन और पकिस्तान आदि देशों के बड़े क्षेत्र में लगातार की जा रही भारी हिंसा और मानवाधिकार हनन के डरावने आंकड़ों के बीच इससे सुखद खबर कुछ नहीं हो सकती थी . अपना चेहरा छुपाने के उन्हें बड़ी चादर मिल गयी थी . अचानक से मलाला उनकी बच्ची हो गयी और उन्होंने उसके लिए हर संभव व्यवस्था कर दी . मलाला के माध्यम से उन्हें युद्ध झेल रही जनता के मन को भ्रम में डालने का एक सुनहरा मौका मिल गया था .


                कसी भी समाज में युद्ध को स्वीकार नहीं किया जाता उस पर जब युद्ध बाहर से थोपा जाये तब तो और नहीं  . इसका सीधा सा करण है अव्यवस्थित जीवन और खून-खराबा . ऐसा नही है कि ईराक , अफगानिस्तान , फिलिस्तीन और पाकिस्तान के हालात एक जैसे हों लेकिन इन सब के बीच एक कड़ी है पश्चिमी देशों का यहाँ चल रहे युद्ध में शामिल होना . बहुतेरे हैं जो इन युद्धों के पक्ष में खड़े हैं और आने-बहाने यही बात करते हिं कि ये युद्ध प्रतिक्रियावादी शक्तियों के खिलाफ लड़े गए या लड़े जा रहे हैं . मजमून यह कि ये शक्तियां इन देशों में रह रहे नागरिकों के जीवन को 'विकास' नहीं बल्कि 'रूढ़ियों' की और धकेल रही हैं या थी . लेकिन इन युद्धों से व्यक्ति की स्वतंत्रता मिल गयी हो वह पुनः 'विकास' के रास्ते पर लौट आया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता . इसके विपरीत जान -माल की भारी क्षति ही हुई जो शायद उन प्रतिक्रिया वादियों के रहने से या उनके डर से नहीं होती .


          पश्चिम की यह युद्धप्रियता निश्चित तौर पर एक ही धर्म के खिलाफ दिखती है लेकिन यह उससे भी बढ़कर एक समान संस्कृति थोपने का कार्य है . क्या हो गया जो लोनों ने केवल पारंपरिक शिक्षा ही ग्रहण की . हालाँकि ऐसा कहने के अपने खतरे हैं फिर भी क्या हो गया जो लड़कियों या कि लड़कों ने पश्चिमी तर्ज की शिक्षा ग्रहण नहीं की ? जहाँ तक लड़कियों के घर बैठ जाने और पर्देदारी में रहने के लिए दी जाने वाली धमकियों की बात है तो उसके विरुद्ध परिवर्तन भीतर से संभव है जो थोड़े से देर सवेर से हो जायेगा . समाजशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर देखा जाये तो समाज में अपेक्षित परिवर्तन थोपा नहीं जा सकता बल्कि यह स्वाभाविक रूप से ही हो पाता है . अभी यदि मलाला को पश्चिमी देशों और उनकी संतान संयुक्त राष्ट्र संघ ने गोद ले ही लिया तो क्या इन देशों में या कि विश्व भर में लड़कियों , वंचितों के लिए प्रतिक्रियावादियों के खिलाफ कम से कम स्कूल जाने के मामले में लोग खड़े हुए ?
इस पूरे घटनाक्रम को पश्चिम की स्वयं को श्रेष्ठ मानने और इस पर  बार-बार जोर दिए जाने की प्रक्रिया के रूप में ही देखे जाने की आवश्यकता है . एक दौर था जब ये देश खुलेआम इन बातों को कहा करते थे पर आज वे स्वयं कहने से बच रहे हैं . आज उनहोंने इसके लिए पहले से भी कारगर हथियार गढ़ लिया है . ये देश अब तीसरी दुनिया की उन प्रतिभाओं , घटनाओं और विशेषताओं को अपना संरक्षण देते हैं जो इस दुनिया की रुढियों , पारंपरिक ज्ञान और कटु वास्तविकताओं को पश्चिम की घृणा भरी दृष्टि से देखते हैं . यही करण है कि पश्चिमी देशों को जहाँ भी इस तरह के मौके मिले उन्होंने खूब भुनाया . यदि लगन फिल्म में क्रिकेट का मैच अंग्रेज जीत जाते तो फिल्म का ऑस्कर जीतना पक्का था . इसे 'स्लमडॉग मिलिनेयर' की ऑस्कर में सफलता और अरविन्द अदिगा के 'द व्हाइट टाइगर' और इस जैसी ई अन्य किताबों के बुकर पुरस्कार जीत जाने से जोड़ कर देखें तो कड़ी जुडती प्रतीत होती है . लगन किसी भी दृष्टि से स्लमडॉग से बेहतर फिल्म थी लेकिन उसकी असफलता थी उसमें स्थानीय सोच की जीत होना . पश्चिम उन लोगों को प्रश्रय देकर अब अपना काम कर रहा है जो तीसरी दुनिया के भीतर की वास्तविकताओं को पश्चिम की नजर से देखते हैं .


   जहाँ तक मलाला का प्रश्न है तो संयुक्त राष्ट्र या कि उनके संरक्षकों को केवल वही क्यों दिखी ? और लड़कियां भी मारी गयी . स्वयं मलाला की डायरी में इसका जिक्र है . ये तो रही पढने लिखने वाली लड़कियों की बात क्या उन्हें उनका कुछ भी ध्यान है जो वर्षों तक चले युद्ध में मारे गए ? यदि चरमपंथियों ने स्कूल खाली करवाकर उसमें अपना ठिकाना बनाया तो अमेरिकी गठबंधन की सेना ने पूरा स्कूल ही उड़ा दिया . कोशिश भी नहीं की कि यदि स्कूल बचे रह गए तो छात्र-छात्रा वापस आयेंगे .

       वास्तव में मलाला उनके ही एजेंडे का हिस्सा है . जिसका अमेरिका नीत गठबंधन ने फायदा उठाया और अब भी ऐसा कर रहा है . पहले बीबीसी से उसकी डायरी प्रसारित हुई  जिसे उसके माध्यम से आम जनता में गठबंधन की सेना के लिए सहानुभूति प्राप्त करने की कोशिश की गयी . अंततः जब मलाला को गोली मारी गयी तब उन्हें अपने कार्यों  को छिपाने का और शेष विश्व को एक झुनझुना पकडाने का मौका मिल गया . चुकी उसकी जानकारी बीबीसी के माध्यम से गठबंधन को थी इसलिए उन्होंने इस मौके का पूरा फायदा उठाया . एक तरफ देखा जाये तो ऐसी कई लड़कियां मारी गयी और उन्हें केवल तालिबान या उन जैसों ने ही नहीं मारा . पर उनके बार में संयुक्त राष्ट्र या उसके खैरख्वाह क्या राय रखते हैं यह अब तक प्रकाश में नहीं आया है .


         मलाला को गोली मारी गयी यह एक शर्मनाक घटना है उसे सुरक्षित अपनी शिक्षा जारी रखने देना एक आदर्श स्थिति है लेकिन बार बार यही बात आती है कि केवल मलाला ही क्यों ? यदि पश्चिम अबतक उस 'सफ़ेद चमड़ी वाले आदमी' के 'बोझ' को ढो रहा है तो अन्य पीड़ितों की और ध्यान क्यों नहीं देता . इतना नहीं तो कम से कम वह अपनी तबाही मचने वाले कार्यों के दौरान इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखता है ?

   हम प्रतीकों में जीने वाले लोग हैं और हमें झट से एक प्रतीक दे दिया जाता है . प्रतीक देने वालों के प्रति हमारी कृतज्ञता देखते ही बनती है वे इसी का मजा लेते हैं क्योंकि वैचारिक गुलामी उनके अन्य उद्देश्यों को बड़ी आसानी से पूरी कर सकती है .

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...