मैं
अपनी डायरी और उसके लिखने को उसी तरह बेतरतीब मानता हूँ जैसा कि मैं हूँ । और कोई आश्चर्य
नहीं कि यह मेरी तरह ही उथली या कि बकवास से भरी है और एक मित्र कि भाषा में कहूँ तो
अल्हड़ सी ! पता नहीं उन्होने मेरे लिए अल्हड़ शब्द का प्रयोग सकारात्मक या नकारात्मक
दोनों मे से किस अर्थ में किया पर आज तक तो मैं अल्हड़ को नकारात्मक ही मानता ,सुनता
और समझता आया हूँ ! हालांकि इन सब से अब कोई फर्क नही पड़ता । आप अपने जीवन के एक बड़े
हिस्से में ऐसे ही हैं तो अपने उसी व्यक्तित्व के साथ जीना सीख लेते हैं और आपको पता
होता है कि लोग जो कह रहे हैं वह क्या और कैसे है । बहरहाल सोमवार यानि कि कल सुबह
क्लास में जाने से पहले स्टाफ रूम में बैठा था और उस बेकारी भरे माहौल में नींद का
झोंका आ-जा रहा था पास में एक पन्ना पड़ा था तो कुछ कुछ गोदता गया । यहाँ नज्र किए देता
हूँ ... शायद अपने होने और उसकी व्यर्थता को आप भी समझ सकें ।
सुबह 8.10
विद्यालय
में बैठा हूँ और आज की पहली दोनों कक्षा खाली है ,
मेरा काम नाश्ते के बाद शुरू होगा यानी 9.30
बजे । अभी तक अखबार भी नहीं मिल पाया है दो-तीन राउंड फेसबुक के भी देख लिए । जब से
सीधे द हिन्दू वालों से अखबार लेना शुरू किया तब से यही हो रहा है । जो भाई जी घर पे
दे जाते थे उन्हें बंद करवा कर सीधे कंपनी से ही लेना शुरू किया है । सीधे खरीदने में
हर महीने के 50 रुपयों की बचत है । पर इस बचत में वो आजादी नहीं है । अखबार स्कूल में
डाला जाता है घर पर नहीं तो ज़ाहिर है रविवार को भी यहीं आना पड़ता है अखबार लेने । रविवार
को विद्यालय के प्रांगण में आना ऐसा लगता है अपने को जैसे मैंने कोई सज़ा दे दी हो !
खैर , फेसबुक के एक दो राउंड और देखने के बाद टेबल
पर पड़े चार-पाँच नोटबुक भी जांच लिए और जो काम तीन दिनों पहले का था उस पर तीन दिन
पहले की तारीख आज डाल कर हस्ताक्षर कर दिए । यहाँ यह बताता चलूँ कि ये वे बचे हुए नोटबुक
हैं जो घर से वापस आए छात्रों ने आज सुबह दिए हैं ।
छात्रों
के नोटबुक से ऊब गया हूँ ... वही गाइड बुक के उत्तर छाप दिये हैं सबने । यदि बुलाकर
पूछता हूँ तो साफ नकार मार देंगे कि जी मैंने नकल नहीं की । पर हो भाय और बहिन जब तुम
एक वाक्य शुद्ध शुद्ध नही लिख सकते तो ये उत्तर कैसे सटीक और शुद्ध भाषा में लिख मारे
हो । तुम्हारी हिन्दी क्या हमसे इतनी छिपी है ! इधर एक दो ने नयी चालाकी शुरू कर दी
है वे जानबूझ कर एक प्रश्न के उत्तर में दो- तीन गलत वर्तनी डाल देते हैं ताकि मैं
समझ जाऊँ कि उनहोने कोई नकल नहीं मारी है और मैं उसे गाइड बुक की प्रतिलीपि मानने की
भूल नही करूँ ।
इधर
नींद आँखों पर चढ़ने लगी है । लग रहा है ऊपर की पलकों पर बहुत मोटा बोझ रखा हुआ है जो
धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है । स्टाफ रूम में एक दो लोग बैठे हैं जैसे किसी छोटे स्टेशन
पर आधी रात के बाद की अंतिम गाड़ी का इंतेजार करते हुए एक-दो लोग मिलते हैं । उनमें
भी शायद नींद की पहचान उभर रही है या रात की नींद का असर घुस रहा है । जिस भी टेबल
पर नजर जाती है नोटबुक के ढेर लगे हैं जैसे किसी सरकारी दफ्तर में बाबुओं की टेबल पर
होता है । छात्रों की नोटबुक की जांच एक ऐसा काम लगता है जो अध्यापकों का नहीं लगता
। ऐसा करते हुए वह किसी भी दफ्तर के बाबू सा लगता है या वही बन जाता है । वही खीज़ ,
वही बिना देखे कलम घिसते जाना । बीच बीच में कहीं कहीं अपनी लाल कलम से कोई निशान
छोड़ देना ताकि गहराई से पढे जाने का भ्रम बना रहे । मेरे लिए यह और आसान है दो-चार
शब्दों के हिज्जे को घेरकर नया लिख दो .... तो कहने को कोई भी कह सकता है कि मैंने
या किसी बहुत समय देकर ध्यान से पढ़ा है पर मामला बहुत कम बार ऐसा हो पाता है ।
8.20
बजे :
अबे
! ये जॉनसन इतनी ज़ोर से घंटी बजाता है कि कान फट जाए । जबकि एलेक्ट्रानिक घंटी भी पड़ी
है लेकिन भाई साहब उसे छोडकर यही बजाएँगे ! सोमवार की सुबह का अपना एहसास ही नींद की
खुमारी में रहना है और थोड़े जागे और थोड़े सोये से बैठना है उसे ये हज़रत घंटी बजा कर
तोड़ देने पर उतारू हैं ।
ये
सोमवार का ही दिन है जब मैं शिद्दत से सोचता हूँ और अभी भी सोच रहा हूँ कि ,
एक अध्यापक को भी कॉलेज के प्राध्यापकों की तरह अपनी कक्षा भर में आने की छूट होनी
चाहिए । इससे उसकी उत्पादकता बढ़ेगी क्योंकि उसे आराम मिलेगा । यूं नींद की झपकियों
से भरे वह स्टाफ रूम में रहे तो कौन सा पहाड़ तोड़ेगा ?
यहाँ
खाली बैठने से लगता है कि , सब काम पर गए हैं
और हम ही एक –दो निठल्ले बचे हैं । यह एहसास और थका देता है यहां से उठकर काम करने
के लिए जाने में हिम्मत के कई डोज़ की जरूरत पड़ेगी । फिर भी कक्षा के मोड में आते-आते
अपने को थोड़ा टाइम तो लग ही जाएगा ।
यहाँ
बैठे बैठे ये सब कुछ गोदने से और भी भाव उभर कर आ रहे हैं । एक तो बड़ा सही सा लगा है
जिसका क्रम भी थोड़े से फेरबदल के साथ जुड़ता चला जा रहा है । इसे जोड़-जाड़ के एक बड़ी
कहानी बनाई जा सकती है । पिछले कुछ समय से लग रहा है कि कहानी लिखना तो छूट ही गया
। अब पता नहीं कहानी शुरू भी हो पाएगी भी या नहीं । उसकी अपनी मांग है और उन्हें पूरा
करने का धैर्य अब खत्म हो रहा है । मानसिक स्तर पर बहुत सारा सोच –विचार हो जा रहा
है पर उसे भौतिक रूप देना कठिन होता जा रहा है ...
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