जनवरी 27, 2016

न हो कमीज़ तो पैरों से पेट ढँक लेंगे

Alok Jha's photo.

आज मैंने अपनी कक्षा में एसएमएस मार्केटिंग का जिक्र किया बाजार के पहुँच को समझाने के लिए । पाठ था जैनेन्द्र का बाजार दर्शन । बात उस से आगे बढ़ गयी कि उसी तरह एसएमएस से जुड़े किस्से की तरफ ।

कुछ दिनों पहले एक एसएमएस आया था एक कंपनी का कि तीन कपड़े खरीदने पर कंपनी तीन और कपड़े मुफ्त दे देगी । मेरे पास पैसे नहीं थे तो मैंने अपने एक मित्र को यह बात बताई उसने कहा वो ले लेगा । हम दोनों चल दिए । दुकान वाले से उस छूट के बारे मे बात की तो उसने कहा हम ये छूट यहाँ नहीं देते । केरल में इस तरह की छूट नहीं चलती । मेरे लाख समझाने पर भी कि कंपनी वही है और एसएमएस में साफ कहा गया है कि यह राजस्थान में लागू नहीं है वह दुकानदार नहीं माना । हम दोनों दोस्त मायूस होकर चले आए ।

जब मैंने यह किस्सा अपने छात्रों को बताया तो उनमे से एक ने कहा कि गुरुजी आप केस कर दो । मैंने कहा रहने दो । पता नहीं कुछ हो भी पाएगा कि नहीं ।

इस पर एक लड़की बोल उठी कि गुरु जी आपने पिछले साल ग्यारहवीं में दुष्यंत का एक शेर कहा था -
न हो कमीज़ तो पैरों से पेट ढँक लेंगे
ये लोग मुनासिब हैं इस सफर के लिए ।
और आप ही कुछ नहीं होगा इसलिए केस नहीं कर रहे हैं ।

मैं इस बात से चकित था कि यहाँ केरल के विद्यालय में जहां कल का पढ़ाया हुआ आज भूल जाते हैं बच्चे , पिछले साल का पढ़ाया गया शेर याद कैसे रह गया उस बच्ची को । दूसरी बात कि हिन्दी की कोई कविता भी नहीं एक मुकम्मल शेर । कविता तो कई बार गाते सुनते हैं तो याद होना लाज़िमी है पर शेर और ग़ज़ल बड़ी चीज है इनके लिए ऐसा मैं मानता था ।

पर वह आश्चर्य ज्यादा देर तक नहीं रहा क्योंकि शेर दुष्यंत का था । दुष्यंत जिनके शेर लोकोक्तियों की शक्ल ले चुके हैं उनके लिए यह बड़ी बात नहीं कि किसी की जुबान पर चढ़ जाये और वह सही समय पर उपयोग कर ले ।

और ऐसे शायर हमे यह शुबहा भी दे जाते हैं कि छात्रों के साथ जो काम मैं करता हूँ या जो मेरा तरीका उसे आगे बढ़ाते रहना चाहिए ।

कौव्वे के बच्चे


बचपन से ही कौवों को देखता आ रहा हूँ । हाँ , सभी देखते हैं क्योंकि वे हैं ही इतनी बड़ी मात्रा में । वही कौवे जो कभी रोटी का टुकड़ा ले के भाग जाते थे कभी हमारे हाथ से कोई खाने का समान !

कौवे पहले ज्यादा खतरनाक काम करते थे । वे उड़ाई हुई रोटी के टुकड़े या कोई अन्य खाद्य पदार्थ खपड़े के नीचे छुपा देते थे और भूल जाते थे । फिर उन्हें जब याद आता तो छत के बड़े हिस्से के खपडों को उलटने पलटने की कोशिश करते । इस काम में कई खपड़े टूट जाते थे । फिर बारिश के मौसम में छत के उन टूटे हुए या खिसके हुए  हिस्सों से पानी की बूंदें टपकती थी । आज तो खपड़ैल वाली छत ही खतम हो गयी हैं ।

छठ पर्व के समय कौवों पर सबसे ज्यादा निगरानी रखी जाती थी । उस पर्व में पवित्रता का ज्यादा महत्व होता है । खरना के दिन जब आँगन में प्रसाद की सामाग्री धोयी -सुखाई और ओखली - मूसल में कूटी जाती थी तो स्त्रियाँ बांस की लंबी - लंबी करचियाँ लेकर कौवों को उड़ाती रहती थी । यदि किसी की सामाग्री में किसी कौवे ने चोंच भी भिड़ा दिया तो संबन्धित व्यक्ति और अन्य लोग भी इसे बड़ा अपशकुन मानते थे ।

पिछले कुछ वर्षों से छठ में शामिल ही नहीं हुआ हूँ तो अभी के हालात नहीं पता ।

खेतों में तो कौवों का उत्पात जग जाहिर है । मेरी माँ बताती हैं कि अपने बचपन में वे और उनके अन्य भाई बहन मकई बोने के बाद , फसलों में दाने आने के बाद खेतों में कौवों को भागने के लिए पुतले बनाकर लगते थे । उन पुतलों की शर्त ये होती थी कि वे डरावने हों । कभी कभी उन पुतलों से उन्हें ही डर हो जाता था । इतना ही नहीं वे कौवों को भागने के लिए गीत भी गाती थीं - 'हा - हो रे , पर्वतिया कौवा ...' ।

कौवों का उत्पात मैंने भी बहुत देखा है और ढेर सारी कहानियाँ भी सुनी हैं । लेकिन कभी कौवों का घोंसला देखने का मौका नहीं मिला । उनके बच्चों को तब ही देखता जब वे उड़ने लगते और बच्चे तभी लगते जब उनके माता - पिता उन्हें खाना खिलाते ।

अभी हाल में एक यात्रा के दौरान मुझे कौवे का घोंसला देखने को मिला साथ ही दिख गए कौवे के बच्चे । इतने छोटे जिनको बच्चे ही कह सकते हैं । उनकी चोंच काफी बड़ी थी उतनी ही जितनी वयस्क कौवों की होती है । कैमरा था तो तस्वीरें ले ली ।

वहीं मैंने एक और बात देखी कि उन बच्चों की देखभाल कौवा -कौवी ही कर रहे थे कोई कोयल नहीं । मैंने सुन रखा था कि कौवे अपने बच्चों की देखभाल नहीं करते , कौवे दुष्ट होते हैं और अपने अंडे कोयल के घोंसलों में रख आते हैं वगैरह । अब ये बातें कितनी सच हैं ये मैं नहीं जानता पर मैंने वहाँ जो देखा उससे कौवे मुझे दुष्ट नहीं लगे । हाल में दोस्तों ने बताया कि बात उल्टी ही है । कौवे के घोंसले में कोयल अपने अंडे रख जाती है । उसके बाद भी सभी बच्चे काले कौव्वे के समान ही थे । सो कोयल के होने की संभावना नहीं है । 
उनके बच्चे तो बहुत ही प्यारे थे ।

अपना अपना काम



चेन्नई हवाई अड्डे के बाहर 13-14 बरस का एक लड़का मिला । चेहरे की हवाइयाँ उडी हुई और आँखों के आसपास रोने के निशान ! मैं उसकी ओर ध्यान भी नहीं देता यदि उसने अपने पिता को फोन करने के लिए मेरा फोन नहीं मांगा होता ।

उसके पिता किसी दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में थे , वह दवाई लेने चेन्नई आया था । ऑटो वाले ने उसे लूट लिया । उसके पास फोन, लैपटाप आदि सब थे पर सब छीन लिया गया । उसने हवाई अड्डे के पुलिस वालों से शिकायत भी की लेकिन हमारे अलग अलग प्रकार के पुलिस वाले तो अलग अलग देशों की तरह व्यवहार करते हैं न । सो उन्होने उससे कहा कि जहां घटना हुई वह तो राज्य पुलिस के दायरे में आता है ।

इस बीच उसने जो दो फोन नंबर दिए थे वे भी सेवा में नहीं बताए जा रहे थे । मतलब एक पूरी सेटिंग बन गयी थी जिसके बाद मैं ही पहल करता और मैंने किया भी - तुमने खाना खाया ? उसने खाना नहीं खाया था । खाने की बात पूछते ही उसे लगा कि मैं उसकी मदद कर सकता हूँ । उसने अपने पिता की दवाई के लिए कुछ पैसे माँग लिए । मैंने दे भी दिए ।

रूपय देते देते समय मेरे मन में दो भाव थे । पहला तो यही था कि यह बच्चा मुश्किल में है इसकी मदद होनी चाहिए । पर दूसरा साफ कहता था कि यह बच्चा झूठ बोल रहा है । इतनी सारी त्रासदी इसी इसी लड़के के साथ नहीं हो सकती , और इसके बाद वह यहाँ हवाईअड्डे पर क्या कर रहा है आदि बातें दूसरे भाव का समर्थन भी कर रहे थे ।

मुझे दोनों ही स्थितियों में पैसे देने में कोई दिक्कत नहीं थी । मैं यह मानकर भी चलूँ कि उसने मुझे धोखा दिया तो भी मैं खुश हूँ । यदि मैं लोगों पर अविश्वास ही करता रहूँ तो किसी पर विश्वास कर ही नहीं पाऊँगा । उस हालत में तो मुझसे किसी जरूरतमन्द की भी मदद नहीं हो पाएगी । जान -बूझ कर भी यदि मैंने उसे पैसे दिए तो उसकी खुशी इसी लिए है ।

अंत में यह भी कि, सब अपना - अपना काम करते हैं । किसी के बुरा होने या करने के कारण मैं अपना काम तो नहीं छोड़ सकता न ।

उम्मीद




यह कबूतर के बच्चे के साथ मेरी सेल्फ़ी है ... सेल्फ़ी शब्द इतना चल पड़ा है कि इसे लिखते या बोलते हुए मन उसी तरह झिझकने लगता है जैसे व्हाइ दिस कोलावेरी , कोलावेरी , कोलावेरी डी सुन कर होता था / है ।

कुछ दिनों पहले की बात है , मैं घर से लौट रहा था काम पर । उसी सिलसिले में कुछ समय के लिए दिल्ली रुकना हुआ । जब समय कम हो तो आप अपने पुराने ठीहों पर अपने दोस्तों से शायद ही मिल पाते हैं ! मैंने भी दोस्तों को दिल्ली विश्वविद्यालय या उसके आसपास के बजाय कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क बुला लिया ।

अभी अभी सुबह ही हुई थी वातावरण पर खास सुबह का रंग और असर था जो दिल्ली में अमूमन दिखने को नहीं मिलता । बरहखंभा रोड मेट्रो स्टेशन वाली सड़क के ऊपर कहीं पर सूरज टिका हुआ था जो पार्क में बने झरने के ऊपर के पुल के बीचोबीच खड़े होकर देखने से ठीक नाक की सीध में लग रहा था । इतना ही नहीं सूरज ने अपने नीचे के पूरे वातावरण को अपने अंदाज में इस कदर बदल दिया था कि किसी भी मकान / दुकान की कोई ख़ास छवि नहीं बन रही थी सब सूरज के रंग में ही रंगे थे ।

पार्क के भीतर एक दो लोग कसरत कर रहे थे , कुछेक दिल्ली की भागदौड़ में स्कूल , कॉलेज या काम पर जाने से पहले प्यार के हसीन लम्हों को जी रहे थे । और कुछ उन्हें ही देखे जा रहे थे जो सबकी नज़र बचा कर भी एक छोटे से किस के लिए तमाम मेहनत कर रहे हों ।

मैं जहाँ खड़ा था उसके ठीक नीचे कृत्रिम झरना था । उसके बंद होने के बावजूद मुझे वहाँ खड़ा होने में मजा आ रहा था । वहाँ ढेर सारे कबूतर थे और कुछ कौव्वे भी । कबूतर इधर उधर से कुछ कुछ चुनकर खाते फिर उनका पूरा झुंड एक साथ फर्र की आवाज करते हुए एक गोल चक्कर लगाने उड़ जाता । इसी दौरान मैंने देखा कि एक कबूतर पानी में तैर रहा है । मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । मुझे लगा कि यह तो जीव विज्ञान और उसके अनुकूलन की दिशा में एक नया आयाम है । पर अगले ही पल मेरा आश्चर्य उड़ गया । वह कबूतर पानी में गिर गया था और डूबने से बचने की जुगत में था ।

उस कबूतर के ऊपर कव्वे मंडराने लगे और एक चील तो बिलकुल उसके पास तक गोता लगाते हुए चली आई । मैं उस कबूतर को बचाना चाह रहा था पर वह जहाँ था वहाँ से उसे किनारे तक लाना एक बड़ी मुसीबत थी । इधर उधर नज़र दौड़ाई तो एक लंबा डंडा मिल गया । जब मैंने नीचे जाकर डंडे से उस कबूतर को अपनी ओर खींचना शुरू किया उस समय कई कव्वे पता नहीं कहाँ से मेरे आसपास आ धमके । बहरहाल किसी तरह मैंने उस कबूतर के बच्चे को पानी से निकाल लिया । उसका बदन पूरा भींगा हुआ था और ज़ोरों की कंपकंपी थी उसमें ।

उस झरने के पानी से बाहर ढेर सारे कबूतर दना चुग रहे थे मैंने उसे उनके बीच ही रख दिया । पर मेरे हटते ही कबूतर उड़ गए और उनका स्थान कौव्वों ने ले लिया जो उसे नोच डालना चाहते थे । वह बच्चा कबूतर उड़ भी न पाये । अंत में मैंने उसे सेंट्रल पार्क के गेट पर खड़े गार्ड के पास रखने का निश्चय किया । मैं जब उसे ले जा रहा था तो एक चील ने झपट्टा मारा । सही समय पर यदि मैंने हाथ न हटाया होता तो कबूतर उस चील के पंजे में होता । इतने नजदीकी हमले से कबूतर बहुत घबरा गया और मेरे हाथ में फंसा उसका शरीर ज़ोरों से काँपने लगा ।

अच्छी बात यह रही कि गार्ड उसकी देखभाल के लिए राजी हो गए । आज मैं यहाँ केरल में हूँ । मुझे नहीं मालूम कि उस कबूतर के बच्चे के साथ क्या हुआ होगा । पर मैं यह नहीं सोचता हूँ । मुझे मालूम है कि उसके साथ बहुत सी मुश्किलें पेश आयीं होंगी । नीचे कुत्ते और बिल्लियों का खतरा तो ऊपर कव्वे और चील का । पर उम्मीद करता हूँ कि वह बच गया होगा ।

अपने हिस्से का काम कर तो दिया है बाकी तो बस उम्मीद ही है ।

धनुष्कोटी के खंडहर


दरअसल मेरी यात्रा का उद्देश्य केवल धनुषकोटी ही जाना था बाकी जगहें तो आसपास होने के कारण बाद में जुड़ती चली गईं । यहाँ जाना उसी दिन तय कर लिया था जब मैंने इसके बारे में पढ़ा था मतलब काफी पहले । बस समय मिलने की देर थी और मैं पहुँच गया ।
धनुष्कोटि हमारे हालिया इतिहास का हिस्सा है । बहुत पुरानी बात नहीं है बस 1964 की है जब एक शाम भीषण चक्रवाती तूफान ने इस अंतिम छोर पर बसे गाँव को घेर लिया और कुछ ही घंटों में गाँव तबाह हो गया । कहते हैं धानुष्कोटि स्टेशन पर एक ट्रेन तभी तभी आकर रुकी थी जब वह तबाही शुरू हुई । उसमें ज़्यादातर बच्चे सवार थे । कुछ ही बच पाये । उस तूफान ने सब कुछ ख़त्म कर दिया । बहुत लोग मारे गए और यह गाँव लोगों के रहने के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया । जो लोग बचे उनसे वह स्थान खाली करवा लिया गया और वे आस पास के स्थानों में रहने भेज दिए गए ।

वह गाँव उस तबाही की रात से पहले एक भरा पूरा गाँव था ... हाँ समुद्र से उसकी कुछ ज्यादा ही निकटता थी सो उसके परिणाम से गाँव अवगत होगा ही लेकिन इतने बुरे परिणाम की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । वही डर है कि आज भी लोग वहाँ से रात को निकल जाते हैं और आज भी वहाँ स्थायी बसावट नहीं है ।

धनुष्कोटी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या -49 का अंतिम बिन्दु है उसके बाद समुद्र फिर श्रीलंका । वहाँ तक जाने के लिए रामेश्वरम जाना ही पड़ता है जहां से आगे 20 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है । अब तो सरकारी बसें उस ना-आबाद गाँव से 6 किलोमीटर पहले तक जाती हैं फिर आप को या तो मेटाडोर या फिर जीप मिलेगी । पास में ही कथित राम सेतु और वह बिन्दु भी है जहां बंगाल की खाड़ी और हिन्दी महासागर मिलते हैं ।

धनुष्कोटि तक पहुँच जाना मेरी उपलब्धि थी । वहाँ पहुंचा तो उसे उसी तरह स्थिर और मूक पाया जैसी मैंने कल्पना की थी । उन इमारतों के हिस्से अब भी खड़े हैं जिन्हें देख कर अंदाजा लगा सकते हैं कि कभी इनमें लोग रहते होंगे , कभी यहाँ भी चहल पहल रही होगी । सड़क की ईंटें समुद्री लहरों से उखड़कर बाहर आ गयी हैं लेकिन भरपूर अंदाजा देती हैं कि कभी वह कितनी काम की रही होगी । रेलवे स्टेशन के अवशेष खड़े हैं उसकी पानी की टंकी कि पूरी की पूरी संरचना खड़ी है । स्कूल की दीवार के हिस्से बचे हैं , अस्पताल के कमरों के ऊपर छत नहीं हैं दरवाजे नहीं हैं लेकिन उसके कमरों की निजता अभी भी सुरक्षित है । हाँ उन कमरों में लारों द्वारा भर दी गयी रेत का साम्राज्य है । डाकघर, मंदिर और सबसे ऊंचे सिर उठाए खड़ा चर्च जिनमें कभी लोगो की ठीक ठाक आवाजाही रही होगी आज क्षत विक्षत खड़े हैं ।


स्टेशन , डाकघर , अस्पताल , मंदिर , चर्च आदि संस्थान बताते हैं कि यह उस 1964 में बड़े महत्व का स्थान रहा होगा । इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह श्रीलंका से बस 18 मील दूर है । वहाँ से कुछ दिखता तो नहीं था पर वोडाफोन मोबाइल पर श्रीलंका का संदेश जरूर आ गया ।

इन संस्थानों से अलग लोगों की बात करें तो उनके घर भी उसी तरह ध्वस्त हो गए जैसे उनके प्राण । जो बचे वे घर छोड़ कर चले गए भविष्य की किसी आपदा से बचने के लिए । यहाँ रह गए उनके घर जो समय के साथ खाली और नष्ट होते चले गए । मकानों की बनावट से पता चलता है कि धनुष्कोटि काफी पहले से आबाद रहा होगा और कालांतर में लोगों ने स्थायी घर बना लिए । पर तूफ़ान ने उन्हें यह मानने पर बाध्य कर दिया कि यह स्थान जीवन के अनुकूल नहीं है ।

इन खंडहरों और समुद्र को मिलाकर एक पूरे लैंडस्केप को देखें तो यह स्थान कितना ही सुंदर और भव्य लगता है । हल्की स्वर्णिम रेत पर खड़े धूसर रंग के खंडहर और इन सब की पृष्ठभूमि में जहां तक नजर ले जाइए नीला समंदर । इस गाँव में जहां कोई नहीं रहता , जहाँ समुद्र ने इतनी बड़ी तबाही मचाई उसका समुद्र तट इतना सुंदर, आकर्षक और शांत कैसे हो सकता है ?

नीले समंदर पर रुई जैसे सफ़ेद बादलों वाला आकाश ... और सूरज की तेज चमक वाली रोशनी सब तो हैं वहाँ पर उसके अपने लोग नहीं हैं । पर्यटक हैं जो शाम से पहले निकल जाएंगे या नहीं तो निकाल दिए जाएंगे ।

वहाँ किसी दीवार के साये में खड़े होकर या फिर टूटे हुए मंदिर में धूप से बचने के लिए बैठे हुए कुत्ते को देखकर कई बार यह खयाल आता है कि यहाँ भी ठीक वही दुनिया रही होगी जहाँ से हम आते हैं । उतनी ही हंसी और आँसू रहे होंगे । किसी ओर से मछलियाँ पकड़ी जा रही होंगी और किसी घर से मछलियों के पकने की महक आ रही होगी । पर अभी तो बस अंदाजे हैं ।

भारत सरकार बहुत तेजी से वहाँ तक का राष्ट्रीय राजमार्ग ठीक कर रही है जो तब तबाह हो गया था । यह काम कई सालों से चल रहा है । सड़क को दोनों तरफ से पत्थरों से घेरा जा रहा है ताकि कठिन से कठिन अवस्था में भी सड़क सुरक्षित रहे । इसलिए समय लग रहा है और एक दो साल और लगे । इस बीच वहाँ हो आना ज्यादा अच्छा है क्योंकि जो रोमांच मेटाडोर से पानी के बीच में चलने में है वह राष्ट्रीय राजमार्ग से कतई नहीं मिलने वाला ।

अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले



निदा फ़ाजली ने एक गद्य लिखा है जो 'अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले' नाम से हमारे यहाँ दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में लगा है । यह गद्य क्रमशः कम होती मानवता के बारे में है । हम अपने समान दूसरे मनुष्यों के प्रति असंवेदनशील तो हुए ही हैं साथ ही पशु - पक्षियों , पेड़ - पौधों के लिए अपने मन में सहानुभूति की कोई गुंजाइश नहीं रहने दी है ।

जब भी मैं यह गद्य पढ़ाना शुरू करता हूँ तो निदा का ही एक दोहा जरूर कहता हूँ , जो अपने एम ए के दिनों में उर्दू विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित मुशायरे में उनसे ही सुना था । तब सेलफ़ी का जमाना नहीं था अन्यथा इस बात के प्रमाण स्वरूप उनके साथ अपनी तस्वीर जरूर डाल देता । बहरहाल दोहा कुछ इस तरह है -
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान 
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान


पहली बात तो यह कि इस दोहे को यहाँ पर समझाना बड़ा कठिन है लेकिन जब एक बार वे समझ लेते हैं तो बात बहुत तेजी से आगे बढ़ जाती है । क्योंकि जिस प्रकार की धार्मिक जिद यहाँ है वह शायद ही कहीं और देखने को मिले सो धर्म किसी बात को समझने समझाने का बड़ा ज़रिया बन जाता है ।

मैं आगे कहता हूँ कि बस अंदाजा लगाएँ कि आपके यहाँ हर गली - नुक्कड़ पर खड़े मंदिर , मस्जिद और चर्च कितनी बड़ी संख्या में हैं और इस बात का भी अंदाजा लगाएँ कि देश या आपके ही राज्य में कितने लोग बेघर हैं । यदि उन बेघरों को उनमें रहने दिया जाये तो देश की कितनी बड़ी समस्या हल हो जायेगी ।

इस स्थिति तक आते आते मैंने हर साल देखा है कि कक्षा बहुत शांत हो जाती है लगभग निस्तब्द्ध ! फिर एक बात उठती है हम ऐसा करते क्यों नहीं । तो हमारे छात्र लगभग एक से उत्तर देते हैं चाहे किसी भी धर्म के हों । उनके उत्तरों के हिसाब से बेघर लोगों के रहने से मंदिर , मस्जिद और चर्च अपवित्र हो जाएंगे ।

इसके बाद मेरा अगला प्रश्न होता है - मान लो यदि सच में ईश्वर उन जगहों पर रह रहे होते तो क्या वे उन बेघरों को मना करते ?
वे कहते हैं - नहीं ।
मैं फिर पूछता हूँ - क्यों ?
लगभग समवेत उत्तर आता है - क्योंकि ईश्वर सबसे दयावान है वह कभी नहीं चहेगा कि कोई बेघर रहे ।

फिर ईश्वर के नाम पर ही , हम बेघरों को उन स्थानों में रहने से मंदिरों , मस्जिदों और चर्च के अपवित्र हो जाने की चिंता किए बगैर रहने क्यों नहीं देते ? हिन्दू धर्म में तो दलितों के मंदिरों में प्रवेश तक को रोकते हैं , रहना तो दूर की बात है । यहाँ तक आते आते छात्र निरुत्तर हो जाते हैं और मुझे भी लगने लगता है कि यह उनके साथ ज्यादती है ।

मैं निदा के लिखे प्रसंगों की ओर चला जाता हूँ । लेकिन मन में इतना निश्चिंत जरूर हो जाता हूँ कि जो प्रश्न उनके भीतर छोड़ चुका हूँ वे उनसे जरूर लड़ेंगे । शायद उत्तर खोजने की कोशिश करें और न खोज पाये तो भी एक बेघर को उस अपवित्रता वाले चश्मे से नहीं देखेंगे ।

सबके खियावे के अनवा दs






चंदा मामा , चंदा मामा , हँसुआ दअ 
ऊ हँसुआ काहे के , खरई कटावे के ,
ऊ खरई काहे के , बरधा खियावे के ,
बरधा खियावे के खरई दअ ...
चंदा मामा , चंदा मामा, हँसुआ दअ


ऊ बरधा काहे के , हरवा चलावे के , 
ऊ हरवा काहे के , खेतवा जोतावे के,
खेतवा जोतावे के हरवा दअ .... 
चंदा मामा , चंदा मामा, हँसुआ दअ


ऊ खेतवा काहे के , अन्न उपजावे के, 
ऊ अन्नवा काहे के , सबके खियावे के,
सबके खियावे के अन्नवा दअ ... 
चंदा मामा , चंदा मामा हँसुआ दअ !





भोजपुरी भाषा की यह लोरी कितनी छोटी जरूरतों की बात करती है ... जब हम इस तरह के गीत सुनते - पढ़ते हैं तो स्वाभाविक रूप से पुरानी चीजों को याद करने लगते हैं और आज से उसकी तुलना करने लगते हैं , जिसे कई बार लोग स्वीकार नहीं करते । लेकिन केवल पुरानी बात और नोस्टाल्जिया का हवाला देकर ऐसे गीतों को ख़ारिज नहीं किया जा सकता । ये गीत हमें जीवन का वास्तविक अर्थ समझाते हैं और अंत तक आते आते जिस तरह सब की बात करने लगते हैं वह आज की लोरियों में नहीं मिल सकता !

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...