जुलाई 02, 2014

दृष्टिहीन की कलम


अमेरिकी राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति भले ही बदलते रहे हों पर पिछले साठेक सालों से वहाँ के कार्यालय की एक चीज नहीं बदली है । वह है कार्यालय द्वारा प्रयोग की जाने वाली कलम की कंपनी । राष्ट्रपति जिस कलम का इस्तेमाल करते हैं वह स्किलक्राफ्ट यू एस गवर्नमेंट नामक कंपनी तैयार करती है । अमेरिका में प्रतिवर्ष पाँच मिलियन डॉलर मूल्य की ये कलमें बेची जाती हैं जिनमें से लगभग 60 फीसदी सेना के द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं । 

इन कलमों की एक विशेषता है । ये दृष्टिबाधित लोगों द्वारा तैयार की जाती हैं । 1938 ई में ग्रेट डिप्रेसन’# के दौरान वहाँ की सरकार ने दृष्टि बाधित लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट ने एक ऐसे कानून पर दस्तख़त किए जिसके अंतर्गत अमेरिकी सरकार को अपने दृष्टिहीन नागरिकों द्वारा उत्पादित सामान खरीदना था । यह कानून वेंगर – ओ डे के नाम से जाना जाता है । जल्दी ही इसमें कलमों को भी शामिल कर लिया गया । स्किल क्राफ़्ट कलमें वही कलमें हैं ।

एक ब्रांड के रूप में इस कलम को स्थापित होने में एक दशक से ज्यादा लग गए । लेकिन आज अमेरिका के 37 राज्यों के 5500 से अधिक दृष्टि बाधित लोग इस कंपनी के विस्कॉन्सिन और नॉर्थ कैरोलिना इकाइयों में भारी मात्रा में इन कलमों का उत्पादन कर रहे हैं । इसके साथ साथ और भी लगभग 3000 प्रकार के उत्पादों का निर्माण कर रहे हैं । 

ये कलमें आज भी उन्हीं विशेषताओं के लिए जानी जाती है जो आधी सदी पहले के एक 16 पृष्ठों वाले दस्तावेज़ में निश्चित की गयी थी । इनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ये शून्य से 40 डिग्री नीचे और 70 डिग्री ऊपर के तापमान पर कम से कम 1500 मीटर की लिखाई सम्पन्न करे वह भी बिना रुके हुए ।

यह तो हुई अमेरिका की बात जहां कलम तो बस एक बहाना था बड़ी संख्या में दृष्टि बाधित लोगों को जीवन की मुख्यधारा में शामिल करने का । कलम निर्माण के साथ ही बहुत से अन्य उत्पाद भी वहाँ दृष्टिहीन लोग बनाते हैं और उनसे सरकार वे उत्पाद खरीदती है ।

अमेरिकी जनसंख्या के मुक़ाबले हमारे देश की जनसंख्या में दृष्टिबाधित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा होगी । पर कहीं भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं जो इन्हें मुख्यधारा तो दूर अपना आत्मविश्वास और आत्मसम्मान ही लौटा सके । हमने अपने इन साथी नागरिकों के लिए ऐसा माहौल बनाया है जिसके अंतर्गत खाते पीते घरों के लोगों को छोड़ दें तो ये बस भीख ही मांग सकते हैं और जो नहीं मांग सकते वे और बुरी हालत में जीते हैं ।

अपने देश में एक सूरदास हुए कवि और गायक । उनकी आँखें नहीं थी । तब से आजतक पूरी हिन्दी पट्टी में सूरदास दृष्टिहीन लोगों के लिए कभी संज्ञा तो कभी विशेषण बनकर सामने आता है । शायद ही कुछ लोग ऐसे मिलें जिनको लोग उनके नाम से पुकारते हैं वरना सब सूरदास हैं । इसका दुखद पहलू यह है कि उनसे अपेक्षा रहती है कि वे कुछ न कुछ गाएँ । दृष्टिहीन होना , सूरदास कहाना और गानगीर होना एक दूसरे के लिए अनिवार्य हो । तभी रेलवे स्टेशन , ट्रेन , बस अड्डे , गाँव- आँगन जहां जहां देखिये दृश्य हीनता के शिकार लोग बेसुरे होने पर भी गीत गाने के लिए बाध्य हैं । उनकी फटी हुई आवाज इसकी पूरी सूचना देता है कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लगातार ऐसा करते आ रहे हैं ।

बचपन की एक घटना याद है । हमारी नानी के यहाँ एक व्यक्ति आए । उनको देखती ही किसी ने कहा – 'सूरदास , गीत सुनेबइ त न भीख मिलत' । उस व्यक्ति का जवाब मुझे अभी तक याद है – 'सब सूरदास गानगीरे नै होई छै' । यकीन मानिए उस व्यक्ति को जरा सी भीख भी नहीं दी गयी और दुत्कार कर आँगन से बाहर कर दिया गया ।

शैलेश मटियानी की कहानी है दो दुखों का एक सुख उसमें भी स्टेशन की पटरी पर बैठा सूरदास गाना ही गाता रहता है ।
निश्चित तौर पर भारत के सभी सूरदास भीख नहीं मांगते हैं । पैसे वाले घरों के लोग बाहर ही नहीं निकलते हैं लेकिन जिनके परिवार की माली हालत औसत दर्जे की भी है उन्हें बाहर आना ही पड़ता है । बाहर जो दुनिया है उसमें भूख मिटाने के लिए कोई रोजगार नहीं है ।


हम अमेरिका को बहुत भला बुरा कहते रहते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सम्मान और पहचान दिलाने में जितनी मदद वहाँ की सरकार करती है उतना हम सोच भी नहीं सकते । उदाहरण हमारे सामने है । वहाँ 1938 ई में ही सरकारी तौर पर दृष्टिबाधित लोगों को रोजगार देने के लिए राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम बनाए गए और हम अभी तक विचार करने की हैसियत में भी नहीं आ पाये हैं । 

# ग्रेट डिप्रेसन के बारे में इस लिंक पर पढ़ें ---
http://history1900s.about.com/od/1930s/p/greatdepression.htm#


जून 06, 2014

गैर बराबरी की मातृभाषा में शपथ-ग्रहण


मेरे पिताजी संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ाते हैं । उनका महाविद्यालय जिस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है वह विश्वविद्यालय भी संस्कृत विश्वविद्यालय ही है । यहीं से कह सकता हूँ कि आज जब वे अपने कार्यस्थल पर गए होंगे तो वे और उनके सहकर्मी मिले होंगे तो बहुत खुश हुए होंगे । बहुत चर्चा हुई होगी और आशा-उम्मीदें भी बंधी होगी । इस खुशी का कारण पक्के तौर पर यह होगा कि कल बहुत से सांसदों ने संस्कृत में शपथग्रहण किया है । समय तो अब पहले जैसा नहीं रहा कि समाचार पहुँचने में दो तीन दिन अलग जाये और जब तक पहुंचे तब तक यह एक अफवाह की शक्ल ले ले । लेकिन संस्कृत महाविद्यालय में जश्न का सा माहौल तो आज ही रहा होगा ।   

संस्कृत भाषा मेरे पिताजी और उनके जैसे बहुतों को रोटी दे रही है । हमारे घर की एक एक ईंट मे उसी भाषा का योगदान है । इतना स्वीकार करते हुए भी मुझे कई बार यह लगा कि मेरे पिताजी जिस स्थान पर काम करते हैं वह किसी और ही दुनिया में है । यहाँ यह कह देना कि वह महाविद्यालय एक पिछड़ी हुई दुनिया की चीज है बड़ी हल्की बात होगी । ऐसी बात उस संस्थान के बारे में लोग कहते भी हैं । उस महाविद्यालय में छात्रों की न्यूनता को देखकर बिना कुछ कहे इसे समझा जा सकता है । लेकिन मेरा मानना है कि अपने पिछड़ेपन को लेकर नहीं बल्कि दुनिया की ओर पीठ करके खड़े होने की प्रवृत्ति उस संस्थान को बाकी दुनिया से काट देती है ।

यह बात मेरे पिताजी और उन जैसों की खुशी से अलग है । निश्चित तौर पर इस तरह से बात करना उन सबके प्रति द्रोह की तरह देखा जाएगा इसके बावजूद मुझे उस संस्थान की अगतिशीलता से चिढ़ के स्तर तक परेशानी है । कई बार मुझे लगता है कि संस्कृत कैसी भी उपयोगी भाषा रही हो लेकिन इसके भीतर अहंकार, दंभ, गैर बराबरी, उत्पीड़न आदि के तत्वों को आश्रय देने के सारे खाने मौजूद हैं । उन खानों में घुसे बैठे ये तत्व भाषा के मूल कार्य को खत्म कर उसे भय और गैर बराबरी की भाषा के दर्जे तक ले आए हैं । भाषा के द्वारा यह सब कैसे संभव हो पाया और कब इसकी शुरुआत हुई यह अलग चर्चा का विषय है तथा बहुत सी विशेषज्ञता की मांग करता है लेकिन इन सबने मिलकर संस्कृत भाषा का जो स्वरूप बनाया है वह मूल रूप से घृणा का ही ठहरता है । और आश्चर्य तो तब होता है जब उसी भाषा से धन अर्जित करने वाले लोग उस भाषा के सिमट जाने के मूल कारण को ठीक करने के बजाय उसे ही दुहराने में लगे रहते हैं ।

संस्कृत भाषा ने जो भी साहित्य दिया हो लेकिन उसके सेवकों के लिए उनका कोई महत्व नहीं है । संस्कृत आज भी अपने सेवकों में लोकप्रिय है तो बस अपने भीतर से उपजे कर्मकांड की वजह से । यही कर्मकांड उन सेवकों को रोटी देता है और तमाम प्रयासों के बावजूद भी लगातार बनी हुई जाति व्यवस्था में उन्हें स्व-निर्मित और स्वनिर्धारित श्रेष्ठता का भ्रम देता है ।

यहाँ यह कह देना भी ठीक ही रहेगा कि ऐसा केवल सहरसा जिले के उस महाविद्यालय तक ही सीमित नहीं है बल्कि बड़े शहरों के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में चलने वाले संस्कृत विभागों की भी यही हक़ीक़त है । इन विभागों में संस्कृत की जातीय संरचना उसी तरह अटूट चल रही है । दिल्ली में बहुत दिन रहा तो दिल्ली विश्वविद्यालय की दशा से पूरी तरह वाकिफ हूँ । मुश्किल से एक दो नाम होते हैं गिनाने को जो संस्कृत की सेवक जातियों से अलग हों । बीएचयू तो खैर बहुत सारे विषयों में वह जातीय रचना बनाए हुए है ।

अब फिर से बात करते हैं उस खबर की जिसे सुनकर मेरे पिताजी और उनके सहकर्मी बहुत खुश हुए होंगे । वही संस्कृत में शपथ लेने वाली बात ।संस्कृत में शपथ लेना एक दुराग्रह है । दुराग्रह इसलिए कि उस समाप्त हो चुकी भाषा को बस शपथ ले लेने से जीवित नहीं किया जा सकता । एक चुकी हुई भाषा के प्रति सम्मान होना चाहिए । उसे सुरक्षित भी रखने की आवश्यकता है ।  लेकिन ऐसी वह अकेली भाषा नहीं है जो अस्तित्वहीन हो रही हो, इस देश की हो और प्राचीन हो ।

संस्कृत में शपथ लेने का सारा मामला ही दूसरा है । यह भाषा शपथ लेने को प्राचीन राजसी ठाठ देती है । जिस भाषा में राजा महाराजा राज्यारोहण करते रहे हैं और जो भाषा अपने उत्स से लेकर आजतक राजा और प्रजा में अंतर करवाती आ रही है उस भाषा में शपथ लेना राजत्व को पुनर्जीवित करने का भ्रम देता है । इतना तो सब जानते हैं कि संस्कृत अपने चरम काल में भी केवल शासकों की भाषा ही थी जो इस शपथग्रहण से प्रमाणित हो गयी । इस भाषा में शपथग्रहण को अंग्रेजी में कसम लेने के बरक्स देखा जा रहा है । कहा जा रहा है कि अंग्रेजी जो शासकों की भाषा थी उसके मुक़ाबले संस्कृत को रखा गया । जबकि संस्कृत शासकों की ही भाषा थी । जिन लोगों ने ऐसा किया वह निश्चित तौर पर यह दिखाना चाहते थे कि राजा और प्रजा में अंतर है । राजा राज के अनुकूल बोली बोलता है ।

फिर आती है भाषा की रक्षा और उसके सम्मान की बात तो संस्कृत अकेली भाषा नहीं है । और बहुत सी भाषाएँ हैं जिनको बोलने वाले दो चार ही बचे हैं । जब बचाना ही था तो उन्हें बचाते । किसी भाषा की रक्षा और उसका सम्मान इस तरह से नहीं होता है कि चार लोग शपथ के दस वाक्य उस भाषा में बोल लेंगे और वह भाषा बढ़ गयी । किसी भी भाषा की रक्षा के लिए खास सोच की जरुरत है जो रोजगार से ज्यादा जुडती है । यह कहना बहुत कठिन नहीं है कि आगे संस्कृत या इस तरह की अन्य किसी भाषा में रोजगार का सृजन हो सकेगा । शायद ही सरकारी पैसे और संरक्षण में चल रहे महाविद्यालयों से कहा जाएगा कि आप अपने यहाँ संस्कृत भाषा से गैर बराबरी बढ़ाने वाले तत्व निकालिए और इसे एक भाषा और साहित्य के रूप में आगे बढ़ाइए न कि आपसी नफरत की संचारक भाषा के रूप में ।


मई 15, 2014

हमें साथ रहना नहीं आता !


आज मेट्रो में चलते हुए मेरे भाई राजीव ने पूछा कि उत्तर पूर्व के लोग फिल्मों में क्यों नहीं आ पाते ... सवाल बड़ा सही था पर उसका सबसे चलताऊ उत्तर ये हो सकता है जो कि मैंने दिया भी कि चूँकि फिल्मों से हमारा मतलब ज्यादातर हिंदी फिल्मों से होता है और उन्हें हिंदी नहीं आती और आती भी है तो उनके उच्चारण की हिंदी इसीलिए वो इधर स्वीकार्य नहीं है ... पर क्या सच बात यही है ? 

सोचिये तो लगता है कि हम उत्तर भारतीय अपना स्थान और सम्मान तो चाहते हैं पर पूर्वोत्तर और दक्षिण के लोगों के लिए जरा सी स्पेस छोड़ने के लिए राजी नहीं हैं . 
दक्षिण को तो भूल भी जाइये क्योंकि वहां विकास अपने तरीके से ही हुआ पर उत्तर से बढ़िया हुआ है लेकिन पूर्वोत्तर ? 

पूर्वोत्तर के लिए हमारे पास कोई प्लान नहीं है ... जो थोड़े बहुत हैं भी वे वहां के लोगों पर  दोषारोपण के अलावा कुछ नहीं करते ! वहां की ख़बरें मुख्यधारा की मीडिया में नहीं आती , और आ गयी तो पूरी नहीं आती . इसका एक उदाहरण हमारी दोस्त गायत्री ने दिया कि मनोरमा इयर बुक में असम की राजधानी गुआहाटी दी हुई है ! इस बाबत मैंने अपने एक दोस्त से यूँ ही पूछ लिया कि असम की राजधानी कहाँ हैं तो उसका जवाब था गुआहाटी ! मनोरमा इयर बुक से बहुत से प्रश्न सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूछे जाते हैं ! जहाँ राजधानी के नाम में इतनी बड़ी गड़बड़ी हो सकती हो वहां दूसरे आंकड़ों को संदेह से देखना स्वाभाविक है . इस तरह की जानकारी वाले लोग यदि सरकारी सेवा में जाते हैं तो उत्तरपूर्व के प्रति क्या नजरिया रखेंगे या रखते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है ! 

सरकारी सेवा में, खेल में, मनोरंजन में पूर्वोत्तर की भागीदारी नगण्य है . एक दो नाम गिनाये जा सकते हैं . पर क्या यह उसी तरह है जिस तरह कि उत्तर भारतीय इन क्षेत्रों में भरे पड़े हैं ... ? 
पूर्वोत्तर का सिनेमा हमारे भोजपुरी सिनेमा से उत्कृष्ट फिल्में दे चुका है और उधर का रंगमंच भी यहाँ से कहीं बेहतर है फिर भी उनकी भागीदारी मुख्यधारा में बहुत कम है . बिहार-यू पी के लोगों का मजाक उड़ाकर बहुत सारी फिल्में बन जाएँगी पर पूर्वोत्तर का जिक्र हमारी फिल्मों में मजाक के रूप में भी नहीं आता है ! अभिनेता-अभिनेत्री बनाने की बात तो बहुत दूर है ! 

एक खेल है हमारे यहाँ क्रिकेट ! सारा भारत उसके साथ उगता डूबता है पर प्रतिनिधित्व के नाम पर यहाँ भी उत्तरपूर्व खाली हाथ है . जबकि निजी स्वामित्व वाले विद्यालयों को छोड़ भी दें तो नवोदय और केन्द्रीय विद्यालयों जैसे सरकारी पैसे से चलने वाले विद्यालयों से हर बार ख़बरें मिलती हैं कि उत्तर पूर्व रीजन के फलां ने इतनी बढ़िया बैटिंग या बोलिंग की है कि उसका चयन कम से कम अंडर -19  में होना ही चाहिए ! पर न तो वहां होता है और न ही उससे आगे ! यहाँ यह कहा जा सकता है कि पूर्वोत्तर के लोग फ़ुटबाल के मुरीद हैं पर यह आधा सच है . बंगाल से सौरव गांगुली के चयन के बाद पूर्वोत्तर में क्रिकेट खूब लोकप्रिय हुआ था लेकिन उचित प्रोत्साहन के आभाव में बात आगे नहीं बढ़ पायी . क्रिकेट की बीसीसीआई की टीम को छोड़ भी दें तो आई पी एल तक में बेंच पर बैठा उत्तरपूर्व कोई नहीं दीखता है . 

अब बात क्रिकेट की चल पड़ी है तो दक्षिण अफ्रीका का  उदाहरण याद आया है . वहां अश्वेत लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए क्रिकेट से लेकर बहुत से खेलों में उनके लिए स्थान आरक्षित कर दिया है . यह उदाहरण भारत में भी अपनाया जा सकता था . तब शायद उत्तरपूर्व हमसे जुड़ा हुआ महसूस करता ! 

हम चुनावी फायदे के लिए आरक्षण की बात तो करते हैं पर देश के सुदूरवर्ती लोगों को जोड़ने के लिए आरक्षण की बात नहीं करते हैं . हाँ घुमा-फिरा कर वही नौकरियों वाले आरक्षण की बात लोग जरुर करते हैं . पर यहाँ यह सोचना जरुरी है कि सरकारी नौकरियां इतनी नहीं हैं कि बहुत बड़ा आकर्षण पैदा कर सके . पर फ़िल्मों और क्रिकेट में उनकी भागीदारी को यदि पक्का किया जाये तो बात बदल भी सकती है . 

पर मुझे नहीं लगता है कि कभी ऐसा हो पायेगा ... होगा बस यही कि चीन दोनों ओर से एक दूसरे के प्रति अविश्वास होगा आरोप प्रत्यारोप होंगे और लगातार तनाव बना रहेगा ! 

अप्रैल 15, 2014

गुच्ची बाबू


उस आदमी से उसकी जान-पहचान उसके पिता के जीवन बीमा के एजेंट के रूप में ही थी लेकिन छोटे शहरों का चलन कहिए या कि ढंग या कि एक गुण कि यहाँ लोग दूसरों के मामले में हद से ज्यादा दिलचस्पी लेते थे खासकर तब जब उस छोटे शहर में भी आपकी हस्ती किसी कीड़े भर की भी न हो ।

मैट्रिक परीक्षा का रिजल्ट आया था । उस दिन आकाश ढंका था । कभी कभी कुछ बूँदा-बाँदी हो जाती थी ठीक उसकी आँखों की तरह । और मेघ गरज उठते थे उसके पिता की कर्कश और निश्चित तौर पर रूखी आवाज की तरह । वह पास तो हो गया था पर परिणाम उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं आया था । ऐसा नहीं था कि उसे अस्सी-नब्बे के प्रतिशत में अंकों की आवश्यकता थी लेकिन कम से कम प्रथम श्रेणी की उम्मीद तो थी ही ! वैसे भी बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के रहते किसी अस्सी–नब्बे प्रतिशत अंक दुर्लभ ही हैं । वह खुद दुखी था और ऊपर से आसपास हो रहा लानतों से भरा गर्जन । काल बैशाखी की विकरालता न महसूस हो ऐसे में तो !

पिताजी गायों के रहने की जगह की खपड़ैल की छत मरम्मत करवा रहे थे या कर रहे थे यह याद नहीं है पर गुच्ची बाबू एल आई सी एजेंट नीचे खड़े होकर उनसे बात कर रहे थे । पिताजी, गुच्ची बाबू से एक नया बीमा करवाने वाले थे । पहले ही सारी बातें तय हो गयी थी लेकिन उसके परिणाम ने उस एजेंट की आशाओं पर पानी फेर दिया । उसके पिता ने बीमा नहीं करवाया । जिसका एकमात्र कारण था उसके मैट्रिक का परिणाम । वह तो पहले ही दुखी था ऊपर से कई बातें सुनना जब मैट्रिक में फर्स्ट नहीं कर पाया तो आगे क्या करेगा , काम करने वालों की छुट्टी कर के इसको लगा देंगे गाय के काम में । गुच्ची बाबू के मन में अपने कमीशन के न मिलने का दुख जरूर रहा हो लेकिन उन्होने उसका पक्ष रखने की कोशिश की थी । पर पिताजी ! जरा देर के लिए भी सुनने को तैयार नहीं थे । और वह उस नाराजगी की शुरुआत थी जो परिणाम आने के लंबे समय तक बनी रही ।

उस रात उसकी आँखें बहुत बरसी थी दिन भर लटके बादलों की तरह ! रात में कभी नींद आई होगी पर उससे पहले जो बातें चल रही थी उन बातों ने लंबे समय तक सोने नहीं दिया था । यह बात ठीक थी कि वह द्वितीय श्रेणी से पास हुआ था जिसकी उम्मीद उसे भी नहीं थी लेकिन इसमें न वो कुछ कर सकता था न कोई और । माँ पहले भी कहा करती थी तुम पढ़ लिख लोगे तो मुस्लिम के मुंह में आग पड़ जाएगी , तुम्हें कुछ हो जाये तो मेरे मुंह में कालिख-चूना लगा देना । लेकिन उनके कहने का टोन पिता के गर्जन और नाराजगी सा नहीं था । माँ की बहती नाक उसके आँखों के जैसी ही थी । साथ में अपने करीबी दोस्त का चेहरा जो अपनी द्वितीय श्रेणी में ही खुश था और उसके माँ-बाप उससे ज्यादा खुश थे उन्होने लड्डू भी बांटे ।

आज स्थिति साफ उलटी हुई थी ! वह आज उसी बीमा एजेंट के साथ बैठकर अपने जीवन बीमा की बातें कर रहा था । कर क्या रहा था बल्कि उस व्यक्ति को एक बीमा योजना दे रहा था जिसके सामने उसके पिता ने कुछ साल पहले खारिज़ कर दिया था । यह खारिज होने के तमगे से बाहर आकर गुच्ची बाबू के सामने खड़े होने की बात थी ।


वैसे भी वह जिस जगह से आता है वहाँ जीवन बीमा करवाना एक लग्ज़री है । वह अब भी माँ के चेहरे में कालिख-चूना लगा कर उन्हें बिजूका बनाने की नहीं सोच सकता !

मार्च 29, 2014

स्टाफ रूम के बहाने


एक दोस्त ने कहा कि तुमने फोन नहीं उठाया तो मुझे लगा कि तुम ऑफिस में होगे इसलिए मैंने फोन काट दिया । बात सही थी उसका जब फोन आया तब मैं सच में अपने काम पर था पर कुछ था जो अटपटा था । हाँ ऑफिस अटपटा था । मैं जहां काम करता हूँ वह एक स्कूल है और उसके लिए हममें से कोई भी ऑफिस शब्द का प्रयोग नहीं करता है । इसलिए बात अटपटी लगी । दोस्त का भी दोष नहीं है उसके लिए तो काम करने की जगह केवल ऑफिस ही है । उसके लिए क्या लगभग सभी के लिए कार्यस्थल ऑफिस के रूप में रूढ हो चुका है और हमारे लिए यह स्टाफ़ रूम और कक्षा के रूप में ।

एक शिक्षक के रूप में मैं कभी नहीं सोचता हूँ कि मैं ऑफिस जा रहा हूँ । मेरे लिए तो यह विद्यालय है कार्यालय नहीं । जबकि मैं यहाँ काम ही तो करता हूँ । फिर ये कार्यालय क्यों नहीं है ? तो क्या पढ़ना – पढ़ाना कार्य नहीं है ? या फिर कार्य और पढ़ाने में क्या अंतर है ?

इन प्रश्नों पर अपने छात्रों की प्रतिक्रिया जानने के लिए मैंने अपनी कक्षाओं में इस पर एक बातचीत कारवाई । यह मेरे लिए दुतरफा फ़ायदे का सौदा था । पहला तो यह कि मुझे अपने प्रश्नों पर हम शिक्षकों को झेलने वालों की सीधी प्रतिक्रिया मिल जाएगी दूसरे , इसी बहाने उनका दस अंक का आंतरिक मूल्यांकन भी हो जाएगा । छात्रों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । केवल  इसलिए नहीं कि इसके माध्यम से उनका मूल्यांकन होता बल्कि इसलिए भी कि इस तरह उन्हें अपनी भड़ास निकालने का मौका मिल गया था ।
हमारा ठिकाना कार्यालय न होने के पीछे उनके तर्कों को इस प्रकार समेटा जा सकता है - कार्यालयों में गंभीर काम होते हैं , वहाँ रूपाय पैसे का हिसाब रखा जाता है , कागजी काम होते हैं दूसरे कार्यालयों से पत्र – व्यवहार होता है , वहाँ जरा-सी त्रुटि का भी अवकाश नहीं है , वहाँ आर टी आई का डर है । एक अध्यापक के ठिकाने में यह सब नहीं है । जैसा कि बड़ी सरलता से देखा जा सकता है कि छात्रों के लिए अध्यापन एक गंभीर काम नहीं है ।

उनकी इस प्रतिक्रिया पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ । इसके पीछे के कारण पर यदि हम जाएँ तो बात स्पष्ट हो जाएगी । बच्चे दरअसल वही कह रहे हैं जो वे अपने आसपास से सीख रहे हैं खासकर बड़ों से । बड़ों की बच्चों के संबंध में सामान्य राय कुछ इन वाक्यांशों में प्रकट होती है- वह तो अभी बच्चा , तुम बच्चे हो , पहले बड़े तो हो जाओ आदि । ऐसा केवल उनके घर और आस – पड़ोस के लोग ही नहीं करते बल्कि हम शिक्षक भी यही करते हैं ।

कई बार मैंने सुना कि जीवविज्ञान में प्रजनन संबंधी अध्याय पढ़ाते हुए शिक्षक या शिक्षिका असहज हो जाते हैं । मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान न सिर्फ जीव विज्ञान बल्कि हिन्दी में भी ऐसा महसूस किया था । हाईस्कूल में हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक ने गुस्से से कहा था कि यह अध्याय छोटे बच्चों के लिए हाई ही नहीं । जबकि हम हाईस्कूल में आते ही शारीरिक और मानसिक रूप से अपने बड़ों की श्रेणी में रखने की बेताबी वाली उम्र में पहुँच चुके थे ।

हरिमोहन शर्मा जो शायद अभी दिल्ली विश्वविदयालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हैं हमें विद्यापति पढ़ाते थे । धार्मिक पद जो बहुत थोड़े थे उनका अर्थ तो उनहोंने कर दिया लेकिन उससे इतर पद जिनमे शारीरिक सौन्दर्य और अंगों के वर्णन थे उनका कुछ नहीं किया । जब हमने इस बाबत बात की तो उनका सीधा कहना था कि बाद में समझ जाओगे । वह बाद तो अशोक प्रकाशन की गाइड मिलने के बाद ही आ पाया । मैं स्वयं बरहवीं कक्षा को हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध शिरीष के फूल पढ़ा रहा था । उसमें एक स्थान पर वात्स्यायन और उसके कामसूत्र का जिक्र है । एक छात्र ने पाठ से उसका संबंध पूछ लिया तो मेरी स्थिति बड़ी ही असहज हो गयी और उसे थोड़ा और बड़ा हो जाने के लिए बोलकर आगे बढ़ गया ।

हम बड़े बच्चों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखना चाहते हैं । इसी कारण हम उनकी समझ से भी दूरी बनाना चाहते हैं क्योंकि उसकी समझ हमारे और उनके बीच की दूरी को कायम नहीं रहने देगी । इसके लिए हम उनकी और अपनी समझ के बीच एक उंच नीच का भेद रखते हैं जो वास्तविक से ज्यादा भ्रम है । इसके बाद हम इस भ्रम को लगातार तरह तरह से मजबूत करते रहते हैं । इसके अंतर्गत बच्चों से जुड़ी लगभग हर गतिविधि आ जाती है और इसी के तहत उनकी पढ़ाई से जुड़े लोग भी आते हैं  । इसके अतिरिक्त कुछ और बातें हैं जो इस प्रकार के संप्रत्यय का निर्माण करने में सहायक हैं ।

शिक्षण को समान्यतया आधे दिन का काम माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि हर तरफ से असफल होकर व्यक्ति अपने अंतिम विकल्प के रूप में इसे चुनता है । इसमें से अंतिम बात का तो ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी है । अंग्रेजों ने जब अपनी तरह की शिक्षा प्रणाली की शुरुआत बंगाल में की तो उन्हें शिक्षकों की आवश्यकता थी । उन्होने उनके लिए वेतन की व्यवस्था की । उससे पहले तक इसके लिए शनिचरा और सीधा देने के अतिरिक्त कोई व्यवस्था नहीं थी । अब अंग्रेजों के लिए मुश्किल की स्थिति यह बन गयी कि उन्हें शिक्षक मिल ही नहीं रहे थे क्योंकि जो मेहनतना रखा गया वह बहुत कम होने के कारण अनाकर्षक था । फिर इस बात के प्रमाण भी हैं कि शिक्षकों की मांग और उनके नहीं आने के मद्देनजर अंग्रेजों ने न्यूनतम अर्हताओं में भी भारी कमी की । हालांकि इस बात से पूरे देश की शैक्षिक दशा को नहीं समझा जा सकता क्योंकि यह केवल बंगाल से संबन्धित है और अन्य स्थलों के प्रमाण हमारे पास नहीं हैं । इसके बावजूद अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि पहले शनिचरा या सीधा फिर अंग्रेजों के द्वारा निर्धारित अनाकर्षक वेतन ने शिक्षकों की किस प्रकार की छवि गढ़नी शुरू कर दी थी । शिक्षक स्वयं इस काम को अपनी आय के लिए पूर्ण न मानकर ट्यूशन , एजेंटी , खेती या कोई अन्य संगत काम करते आ रहे हैं । याद कीजिये पाथेर पांचाली का वह दृश्य जिसमें बच्चे बाहर पढ़ाई कर रहे हैं और उन्हें घेरकर बिठाने वाला तथाकथित अध्यापक भीतर अपनी दुकान चला रहा होता है और जब बच्चे शोर करने लगते हैं तो वह आकार छड़ी से उनकी खबर लेता है ।

ये सारी बातें बच्चे के मन में अध्यापकों की कोई बहुत अच्छी छवि नहीं बनाती हैं । अपने छात्रों के द्वारा अध्यापन को कार्य की श्रेणी में न रख पाने का मलाल तो था लेकिन इस बात की खुशी थी कि उनहोंने इतनी आलोचनात्मक दृष्टि हिन्दी में तो विकसित कर ही ली जो केरल में दुर्लभ होने के कारण निश्चित रूप से उल्लेखनीय है ।
आखिर में हमारा स्टाफ रूम ! एक ऐसी दुनिया जहां छात्रों का प्रवेश समान्यतया वर्जित है । उनके लिए वर्जित होने में ही इसके डायनामिक्स की समझ निहित है । यह वस्तुतः ऐसी दुनिया है जहां अध्यापक वही व्यक्ति नहीं है जो वह थोड़ी पहले कक्षा में था या थोड़ी देर बाद होगा । यहाँ वह उन नजरों से दूर है जिनको वह गंभीर रहना , अच्छे आचरण करना और पता नहीं कितने नैतिक आचरण सिखाता है । फिर महात्मा गांधी का वह चीनी छोड़ देने वाला किस्सा भी वही शिक्षक कक्षा में बताता है । इसलिए उससे सहज अपेक्षा रहती है कि वह उन नैतिक आचरणों को प्रैक्टिस में लाये । लेकिन स्टाफ रूम में वह सब होता है जो एक मनुष्य सहज रूप में कर सकता है मसलन हंसी ठट्ठा , मोबाइल पर गाने , अश्लील चुट्कुले , चुहलबाजी , चुगलखोरी, लड़ाई आदि । बस इतना ध्यान रहे कि आवाज बाहर नहीं जानी चाहिए । यह तो रही हमारे स्टाफ रूम की बात । आगे दिल्ली के एक मित्र ने बताया था कि उसके स्टाफ रूम में तो अध्यापक मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखते हैं । ठीक विधानसभा में ऐसा करने वालों की तरह ।


फिर भी मैं मानता हूँ कि स्टाफ रूम में हम एक तरह से मर्यादित ही रहते हैं हाँ उसका स्तर भले ही कम हो । ऊपर ज़ाहिर ही हो गया है कि कक्षा में हम वो नहीं होते जो हम स्टाफ रूम में होते हैं और जो हम स्टाफ रूम में होते हैं वह अपने घर में नहीं होते । शुक्र है कि ये तीनों जिंदगी अध्यापक एक ही साथ नहीं जीता है । दिन के अलग अलग हिस्से न हो तो वह तो एक्सपोज़ ही हो जाये । 

फ़रवरी 23, 2014

भटका हुआ हाइवे


फिल्म हाइवे । नाम से ही लगता था कि इसके भीतर कुछ होगा जो सड़क पर घटित होगा । एक आशंका यह भी थी कि यह सड़क जैसा पल पल बदलने वाला भी न हो जाए । हालांकि वर्तमान हिन्दी फिल्मों के चलन को देखते हुए इस आशंका को खारिज करने में देर नहीं लगी । बहरहाल फिल्म शुरू हुई घर से सड़क तक जाने में और फिर चलने लगी सड़क – दर - सड़क । और जब फिल्म खत्म हुई तो लगा कि चलो एक यात्रा-वृतांत खत्म हुआ ।

इसे यात्रा-वृतांत कहना ज्यादा सही लग रहा है मुझे । इसलिए नहीं कि इसका नाम हाइवे था और इसमें पात्र एक से दूसरे सीन में यात्रा ही कर रहे थे बल्कि इसलिए कि इसके अलावा फिल्म में कहने का कोई दूसरा तरीका निर्देशक ने नहीं लिया ।

तो सबसे पहला प्रश्न उठता है कि यह यात्रा-वृतांत किसका है ? तो इसका उत्तर यदि एक वाक्य में दिया जाए तो वह होगा – यह फिल्म की नायिका का यात्रा-वृतांत है । लेकिन यदि ठहर कर देखें तो यह सोचना जरूरी हो जाता है कि भई जब फिल्म हाइवे ही थी और उसी पर चली तो उसके अकेले का यह वृतांत क्यों है । क्यों न यह उसके साथ चलने वालों का भी है या यह यात्रा ही क्यों है ?
फिल्म में क्या क्या होने वाला है इसका अंदाजा हो जाता है । होने वाला पति फ्रेम से बाहर है और न ही लड़की का घर या उसके घरवाले फ्रेम में है । अब बस वही वही है जो जो लड़की के आसपास है । दर्शकों के सामने वही दृश्य आते हैं जो लड़की और आसपास के हैं । दरअसल कैमरा अब लड़की के साथ ही चलता है । और अंत तक उसी के साथ रहता है ।

हिंदुस्तानी फिल्मों में निर्देशक , दर्शकों को कहानी के बारे में पहले ही अंदाजा लगा लेने की छूट दे देता है । फिर भी दर्शक है कि तीन घंटे बैठा रहता है ।

लड़की बड़े बाप की बेटी है । उसे उसके होने वाले पति के सामने से अगवा कर लिया गया है इसके बाद भी निर्देशक कैमरा लेकर लड़की के साथ ही चल रहा है । भई वाह ! जबरन अपनी बात थोपना इसे कहते हैं ।

अपेक्षा यह थी कि यदि फिल्म हाइवे है तो नजारे और नजारों की बारीकियाँ भी उसी की होंगी पर यहाँ निराशा ही हाथ लगती है । हाइवे और फिल्म का संबंध हाइवे पर होकर भी टूटता है क्योंकि फिल्म उससे कोई संवाद नहीं करती बल्कि उस पर चलती भर है । इस चलने की दिशा , उद्देश्य और आसपास के वातावरण से इसका सह-संबंध बड़ा रूखा रूखा सा है । ऐसा लगता है कि फिल्मकार ने जो सोच रखा है वह उतना ही दिखाएगा और वैसे ही दिखाएगा । और अकारण नहीं है कि फिल्म सहज राह पर नहीं चलती । बस अपने आपको तब तक खींचती रहती है जबतक कि निर्देशक जिस रूमान के पीछे भाग रहा था उसका कारण न मिल जाए । दरअसल फिल्म के आरंभ में जिस तरह से भूमिका बांधी गयी थी उसके बाद निर्देशक से इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं थी ।

हम सभी जानते हैं कि हमारी फिल्मों में यदि नायिका का अपहरण हो जाए और वह अपने अपहरणकर्ता के साथ ही रहे तो उनमें आपसी सहचर्य जनित आकर्षण तो उत्पन्न हो ही जाता है । इसलिए यह एक बड़ी प्रेडिक्टेबल सी फिल्म थी । लेकिन फिल्म में अपने ही घरों में रिशतेदारों द्वारा छोटी लड़की के शारीरिक शोषण पर बात की गयी । हालांकि इस पर बहुत बेहतर तरीके से बात नहीं हो पायी और यह अपने आप में एक फिल्म की मांग करता हुआ-सा विषय है इसके बावजूद इस बात की खुशी तो होनी ही चाहिए कि किसी मुख्यधारा की फिल्म की नायिका को इसका शिकार दिखाया गया और उसे उसका प्रतिरोध करते हुए दिखाया गया । यहाँ फिर से कहना पड़ेगा कि निर्देशक का यह प्रयास केवल फिल्म को एक नया मोड देने के लिए था । यह उसका केंद्रीय मुद्दा नहीं था और इस विषय को बखूबी डील भी नहीं किया गया ।

यह फिल्म हाइवे कहीं नहीं जाती है । पूरी फिल्म किसी शृंखला की बिछड़ी हुई कड़ियों सी यहाँ वहाँ छितराई सी चलती है जिसे बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता ।


रणदीप आरंभ में अच्छे लगे हैं पर धीरे धीरे वे उसी छोले में घुस जाते हैं जो सामान्यतया हमारे नायक ओढ़े रखते हैं । उसी तरह फिल्म शुरू में ठीकठाक चल रही होती है पर बाद के हिस्से में वह खींचती जाती है किसी अज्ञात दिशा में वह भी सतही तरीके से ।

फ़रवरी 21, 2014

पटनियाँ बाबू सब के लिए मुफ्तीया वाई-फ़ाई !


हमारे नीतीश भैया ने विश्व का सबसे लंबा मुफ़तिया 'वाई-फ़ाई ज़ोन' बना के नाम तो कमा लिया गुरुजी ! कम से कम अहिए बहाने उनका नाम तो चमकेगा और राजनीति का दू–एक दिन भी भटकेगा । बीस किलोमीटर का मुफ्तीया वाई-फ़ाई ! मन तो करता है उठाएँ अपना झोरा-झपाटी आ जा के बैठ जाएँ ऊ सड़क पर जहां ई बेबस्था है । आजकल तो अपने पास वाई-फ़ाई को पकड़ने का बहुत जोगाड़ है, ऊपर से मुफ्तीया ! पर हम त यहाँ केरल में झक मार रहे हैं हम कहाँ जाएंगे ? हमरे पूज्य पिताजी कहते हैं बन के गीद्दर जइहें किद्धर ! बन मने जंगल , गिद्दर मने गीदड़ आ किद्धर मने किधर ! एहेन बिहारी बन के गिद्दर सब भरल है देश में । त सवाल ई है कि जब सब लैपटॉप वला बिहारी बाहरे है त किसके लिए किया है ई नितीश भाय ने ?

काम–धंधा के बिना छौरा सब एन्ने–उन्ने ढ़नकल फिरता है । बेसी से बेसी दिनभर में चार ठो गुटखा खा लिया , मांग – मूंग के अधका सिकरेट मार लिया आ छौरी सबका इसकुल – कौलेज होते हुए दु-चार ठो छौरा सब से मार करते हुए घर आ के बड़की चाहे छोटकी कोई भी बहीन हो उसको डांट के अपना खीस निकाल लिया ! अब एहेन में ई वाई-फ़ाई का कोनो  काम है ? नितीश का पैसा डाँड़ गया !

बिहार में सबसे बेसी नोकरी देने वला बेबस्था है ठीकेदारी पर प्राइमरी से लेकर +2 तक में मास्टरी । उसमें केतना पईसा मिलता है सबको पता है । जेतना मिलता है ओतना में मिठुआ जैसा ठीकठाक पीने वला रहे तो महिना भर का चखना नहीं आएगा दारू की बात करते हैं ! आ जो ऊ लेडीज सब मस्टरनी बनीं हैं उनका तो सब पैसबा जान-आन में ही चला जाता है । दू चार सौ बच गया तो परिबार के हाथ में भी देना है । बेचारा सब एगो लेपेस्टिक तक नहीं खरीद सकता है । तब ई नितीश बाऊ जो किए हैं ऊ मजाके न है जी !

एगो ठीका वला मास्टर मान लीजिये आज से गुठका का दाना तक मुंह में न ले तब भी तीन -चार मैहना का 'मानदेय' जाएगा तब आएगा एक ठो सैमसंग ! नहीं तो फिरी वाई-फ़ाई का इस्तेमाल करने के लिए छौरा सब अपने बाप के गला पे चक्कू न रखेगा ! छौरी सब का कोई गिनतिए नै है ! ऊ लोग घर से सड़क पर नै निकल सकता है त एतना दूर पटना दानपूर जाएगा वाई-फ़ाई चलाने !

आगू बात ई है कि भैया ने बिहार को हाइटेक बनाने का बात किया है लेकिन उ सब पटनिया बाबू लोग के लिए ही है ! जहां चार-छ गो नेता-भगता, हाकिम-पेशकार-ठीकेदार सबके पास आकाशी पईसा आया है । वही लोग का बेटा-पुतौह आजकल पटना में पेरिस का मज़ा मार रहा है । नै ते चल जाइए तनि देहात में सब बुझा जाएगा । आ बिहार का देहात मने ई नै है जो आप शहर आ देहात मने समझते हैं । पटना के बाहर जो है सब देहाते है जी !


देखिये ने जो भी बड़का बड़का चीज है सब पटने में हैं । पटना त मान लीजिये एगो बड़ा शहर बनिए गया । लेकिन शेष बिहार ठीक उसी तरह का जैसा गणित में भागफल निकालते हुए शेष रह जाता है ! एकदम निरीह ! राज का बिकास हो रहा है लेकिन ई राज मने पटना है केवल पटना ! उससे बाहर जाइए त कुछ कत्तो नै ! उसी तरह जैसा पहले था ! पटना चमकता जा रहा है और ऊ सहरसा – तहरसा , किशनगंज- फिसनगंज सब ऐसेहिए रहेगा । 

फिर भी दाद देना पड़ेगा नितीश भाय का कि आब टाका-पईसा वाला छौरा सबके लिए एगो बढ़िया बेबस्था कर दिया है । आब ऊ लोग वहाँ से फेसबुक करेगा !

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...