जनवरी 22, 2015

ये उम्मीदों की बोझ और ये उनका कंधा !



नवोदय विद्यालय के शिक्षक के रूप में  (हाउस मास्टर के रूप में भी) जब-जब बच्चों के  माता-पिता से मेरी मुलाक़ात हुई है तब-तब  मेरा सबका ऐसी एक-दो माताओं से पड़ा है जिनके लिए उनके बच्चे बड़ी उम्मीद हैं और ऐसे में जब बच्चे के अंक जरा से कम आते हैं या उनके अनुशासन में रहने की छोटी सी भी शिकायत मिलती है तब उनका दुख उनकी आँखों पर जाता है । उस समय जो आँसू उन आँखों में आते हैं वे बिना कहे जीवन की उन तमाम मुश्किलों तक आपको सहज ही खींच लेते हैं जिन तक का सफर संभव है आपने कभी भी न किया हो । कुछ स्थितियों में पति का देहांत हो चुका है लेकिन ज्यादार स्थितियों में पति का शराबी होना सामने आ जाता है । स्थिति तब और बुरी हो जाती है जब बच्चा भी रोने लगे

मेरे हाउस में कई बच्चे ऐसे हैं जिनके पिता इतनी शराब पीते हैं कि वे सामान्य कार्यकलाप के लिए भी अक्षम माने जाते हैं । अपने बच्चे से मिलने खुद नहीं आते तो ज़िम्मेदारी स्वाभाविक रूप से माँ पर आ जाती है । यदि बच्चे से मिलना हो तो भी वही आती है, उसकी कोई शिकायत मिले तो उसे सुनने और उस पर आँसू बहाने भी वही आती है ।

अभी पिछले महीने का ही तो किस्सा है ! बारहवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने अपने घर से थोड़े पैसे मंगाने के लिए मेरा बैंक अकाउंट नंबर लिया । मैं उस बात को भूल गया । कई दिनों के बाद किसी अंजान जगह के यूनियन बैंक के मैनेजर का फोन आया कि एक व्यक्ति मेरे खाते पर पैसा जमा करवाने आया है और फॉर्म पर केवल खाता संख्या लिखकर नशे में धुत्त बैंक में निढाल पड़ा हुआ है । मेरे खाते की डिटेल्स से उस मैनेजर ने मेरा फोन नंबर निकाला था । मैं यहाँ कल्पना ही कर सकता हूँ कि मेरे हाउस के उस छात्र की माँ बहुत व्यस्त होगी और खुद नहीं आ पायी होगी और उसे विश्वास नहीं रहा होगा फिर भी उसने अपने पति को पैसे जमा कराने भेजा होगा । … उसकी पति वह भी नहीं कर पाया !

केरल में शराब की खपत बहुत ज्यादा है और जिस अनुपात में शराब की खपत है उसी अनुपात में स्त्रियाँ बाहर काम पर जाती देखी जा सकती है । मैं यहाँ यह नहीं कह रहा हूँ कि उनका काम पर जाना बुरा है या गलत है या कि उनको काम नहीं करना चाहिए बल्कि मेरा कहना यह है कि पुरुष के शराबी होने के कारण स्त्री पर काम को प्राप्त करने और उसे बनाए रखने का दबाव दोगुना है । यह अकारण नहीं है कि केरल की लड़कियां छोटी उम्र में ही यह तय कर ले कि उन्हें नर्स ही बनना है डॉक्टर नहीं । छोटी उम्र से ही भोगा हुआ आर्थिक संघर्ष जल्द से जल्द रोजगार प्राप्त करने को लगातार दबाव बनाता होगा ।

हमारा विद्यालय ऐसा विद्यालय है जो परीक्षा लेकर छात्रों को प्रवेश देता है । इसलिए बच्चे स्वाभाविक रूप से ज़हीन मान लिए जाते हैं । ज़हीन बच्चा घर की हालत में सुधार लाये यह दबाव बिना कहे उस पर आ जाता है । फिर उसकी हर गतिविधि इसी उम्मीद और उससे उपजे दबाव के दायरे में रखकर देखी जाती है । नवोदय विद्यालय खुले तौर पर उन बच्चों को प्राथमिकता देता है जिनके परिवार हाशिये पर जी रहे हैं (कम से कम आर्थिक स्तर पर) । इसलिए ऐसे बच्चों की संख्या आनुपातिक रूप से ज्यादा है जिनपर हर क्षण अपने परिवार के भविष्य को सुधारने का अतिरिक्त दबाव है ।

भारत हमारा ऐसा देश है जहां रोजगार पाने के लिए बच्चे को बहुत संघर्ष करना है इस स्थिति में जब हाशिये पर जी रहे माता-पिताओं की बात आती है तो उनकी सारी उम्मीदें और खुद बच्चे के सपने उनके बचपन को बुरी तरह प्रभावित करने लगते हैं । शिक्षक जो उन बच्चों की पारिवारिक दशा से वाकिफ होते हैं वे भी इस स्थिति का फायदा उठाते हैं और वे कई बार उन बच्चों के न कम अंक पाने या ‘अ–अनुशासित’ व्यवहार के प्रति हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं । बिना इसकी परवाह किए कि इससे उन बच्चों के मानसिक स्वस्थ्य पर कितना दबाव पड़ेगा ।

हमारे शिक्षाविदों ने बिना बोझ की  शिक्षा पर बहुत बातें की है सरकार ने उस पर नीति भी बना दी आजकल बच्चों को शारीरिक दंड दिया जाना भी गैर कानूनी हो गया है लेकिन यदि गौर से देखा जाये तो ये वे प्रश्न हैं जो अपेक्षाकृत खाते पीते घरों के बच्चों की समस्याएँ हैं । अपने बच्चे की पीठ पर का भरी बस्ता और उनके गालों पर थप्पड़ के निशान भरे पेट वाले माँ बाप को तो अवश्य ही बुरा लगता होगा लेकिन मुफ़लिसी में जी रहे माँ – बाप इसे भी अपने बच्चे की तरक्की ही मानते होंगे ।

हमारी सरकारों ने या शिक्षाविदों ने बच्चों की पीठ का बोझ कम कर दिया और उन्हें मार खाने से भी बचा दिया लेकिन क्या उन्होने कभी विद्यालयों में पढ़ रहे बच्चों के भविष्य के  रोजगार बारे में सोचा ? जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो इतना भर पाते हैं कि हमारी सरकारें और हमारे शिक्षाविद सबकुछ बच्चों पर छोड़ अपना पल्ला झाड़े बैठे हैं सरकारों को शायद ही परवाह है कि बच्चा अपने भविष्य के लिए कितना आशंकित और चिंतित है और इस बात का तो उन शिक्षाविदों को अंदाजा भी नहीं है कि बच्चों पर बस्ते और अध्यापक की मार से ज्यादा रोजगार का दबाव है । वे कभी ‘पैरेंट्स टीचर मीटिंग’ में आयें तो देख पाएँ उस संचित दुख और उससे बाहर न निकल पाने के त्रास को । तब वे जान पाएंगे कि उन्होने जो दुनिया बना रखी है उसमें बच्चे के पास एक ही विकल्प है कि वह अति प्रतिभाशाली बन जाये, सर्वगुण सम्पन्न हो तभी उसे रोजगार मिलेगा और तब वह अपनी माँ का असली सहारा होगा । यदि वह अति प्रतिभाशाली और सर्वगुण सम्पन्न होने से जरा भी कम है तो ये दुनिया उसकी नहीं है । वह हाशिये पर ही रहेगा । उसकी माता जी की आस का कुछ नहीं होगा !


(खैर आज दसवीं कक्षा के छात्रों की माता –पिता के साथ हम शिक्षकों की मुलाक़ात थी । उस लड़के की माँ रो रही थी वह भी रो रहा था । मेरे पास सांत्वना के दो शब्द थे वो कह दिए पर रोजगार का संकट तो ऐसा है कि सरकार के सुलझाए ही सुलझे। )

जनवरी 02, 2015

एक फौरी टिप्पणी


गोवा गया था । यह एक ऐसे राज्य की यात्रा थी जिसके बारे में तरह तरह से अलग अलग तरह की बातें सुन रखी थी। वो कहते हैं न कि अपने मरे ही स्वर्ग दिखता है तो ठीक यही बात थी । वहाँ गया तो पता चला कि गोवा जैसा सुन रखा था वैसा तो जो है सो है यह अपने आप में अनोखा जरूर है ।

छोटा सा राज्य । छोटे छोटे शहर और एक साथ पचास गाडियाँ सड़क पर दिख जाएं तो समझिए कि जाम लगा ! पर सड़कें इतनी साफ सुथरी थी कि वहाँ जाम का भी अपना मजा था । वहाँ की सड़कें अतिक्रमण से मुक्त हैं । हाँ वही अतिक्रमण जिसमें दुकानदार अपने दुकान के सामने वाली जगह को भी अपनी समझते हैं और उनका वश चले तो जो स्थान गाड़ियों के चलने के लिए है वहाँ तक अपना सामान पसार दें । देश में अबतक जहां भी रहा हूँ और जितना भी घूमा-फिरी की है मैंने उनमें से पहला ऐसा राज्य देखा जहां दूकानदारों ने सड़क तो जाने दीजिये फुटपाथ तक को अपनी दुकान से मुक्त रखा है । वहाँ जाकर पता चलता है कि बाजार में भी फुटपाथ पर चला जा सकता है । वरना चले जाइए दिल्ली के बाज़ारों में जहां बाजार ही फुटपाथ पर सजता है । हमारे सहरसा की बात भी सुन लीजिये जहां रेलवे का फ्लाईओवर इसलिए नहीं बन पा रहा है क्योंकि उससे वहाँ का बंगाली बाजार, जो पूरा का पूरा अतिक्रमण का नमूना है, वह टूट जाएगा ! हमारे यहाँ की सब्जी मंडी भी ऐसी ही है ।

गोवा की दुकानों के सामान बाहर पसरे नहीं होते इसलिए उनकी समृद्धि और उनके भीतर मिलने वाले सामानों का अंदाजा नहीं लग पता । लेकिन ज्यों ही आप दुकानों के भीतर जाते हैं त्यों ही महसूस कर सकते हैं कि वे बाहर से जितने मामूली दिखते हैं उतने हैं नहीं । इसका फायदा यह है कि बाहर सड़क अनावश्यक रूप से भरी नहीं लगती । लोग सामान दुकानों में जाकर खरीदते हैं , फुटपाथ चलने के लिए है और बाकी रहा सड़क का कोलतार वाला हिस्सा तो वह गाड़ियों के चलने के लिए है । ठीक इसी तरह की बनावट लखनऊ के हजरतगंज बाजार की भी है पर वहाँ अतिक्रमण ने पूरे सौन्दर्य और बाजार के मकसद को ही बिगाड़ के रखा हुआ है । जबकि हजरतगंज में कभी उतनी भीड़ नहीं जुटती जिनती गोवा में समय समय पर जुटती रहती है ।

अब सड़क आदि की बात चल रही है तो लगे हाथ गोवा की परिवहन व्यवस्था की बात भी कर लें । छोटा राज्य है ठीक है पर उसकी परिवहन व्यवस्था ठीक नहीं है । परिवहन में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा भागीदारी  निजी क्षेत्र की है इसलिए बहुत ज्यादा मनमानी है । वहाँ आपको अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए मोटरसाइकिल सवार मिल जाएँगे जिन्हें ‘पायलट’ कहा जाता है , तिपहिया ऑटो है , टैक्सी और छोटी बसें हैं । देखिये स्थानीय और बाहर से आने वाले पर्यटकों में जो धनी लोग हैं उन्हें गोवा की यातायात व्यवस्था में कोई खराबी नजर नहीं आएगी लेकिन वहाँ के स्थानीय निम्नवर्ग के लिए और बजट टूर पर गए पर्यटकों के लिए गोवा की परिवहन व्यवस्था खराब है । अब लगे हाथ यह भी जान लीजिये कि गोवा कोई बहुत ज्यादा अमीर लोगों का राज्य नहीं है और बजट टूर करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती है ।

मोटर साइकिल सवार जिनको पायलट कहा जाता है वे सामान्यतया ज्यादा पैसे मांगने के लिए बदनाम हैं , ऑटो वाले तो साधारण हैसियत के पर्यटकों और स्थानीय लोगों को मुंह भी नहीं लगाते और ज्यादा बात की तो आपको बस स्टॉप का रास्ता बता देंगे । रही बात टैक्सी वालों की तो मैंने उनसे बात भी नहीं की लेकिन कुछ लोग जो वापसी में ट्रेन में मिले उनहोने कहा कि टैक्सी वाले ने ‘लूट’ लिया । आपके पास ले दे के उन छोटी बसों का ही विकल्प रह जाता है जो बहुत ठुँसी हुई भरी रहती हैं या नहीं तो ठुँसकर भरने तक का इंतजार करती रहती हैं ।

गोवा जाएँ तो वहाँ के खाने जरूर खाएं । वहाँ की तरकारी की तरी में अपना ही स्वाद पाया मैंने । जीभ को वह स्वाद एक बार तो अटपटा लगा लेकिन स्वाद अच्छा था । वहाँ गोवा समोसा मिलता है जिसकी स्टफिंग तो समोसों जैसी ही रहती है लेकिन मसाले और भुने जाने के अपने तरीके के कारण उसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है । कोंकण का इलाका है और वडा – पाव न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता । पाव-भाजी भी मिलती है लेकिन उसके स्वाद में कोई खास अंतर नहीं था । हाँ मडगाँव के इलाके में बन के साथ परोसी गयी रस-ऑमलेट बेहतरीन थी । ठीक इसी तरह अलग स्वाद बन के साथ मशरूम करी का भी था । मीठे में वहाँ गुलाब जामुन भी थे , शीरा भी था और लड्डू-जलेबी जैसी राष्ट्रीय मिठाइयाँ भी लेकिन काजू की बनी हुई एक भरवां मिठाई का स्वाद अभी तक जीभ पर बना है । वह मिठाई बहुत महंगी थी और उसका नाम भी मैं भूल गया ।

गोवा को जितना फिल्म वालों ने दिखाया है वह कमोबेश वैसा ही है । सबसे बड़ी समानता कपड़ों को लेकर देखी मैंने । आम गोवन स्त्रियाँ फ्रॉक पहनती हैं जिसमें जांघ के नीचे के बाहर का हिस्सा खुला रहता है । उम्रदराज औरतें भी इस तरह के कपड़े पहनती हैं । अपने उत्तर भारत में तो उल्टे आँचल की साड़ी पहनने पर हंगामा शुरू हो जाता है !

खैर , गोवा से आने के बाद उसकी कुछ और बातें यहाँ डालनी हैं इसे पहले हिस्से के रूप में समझा जा सकता है । जब समय मिलता है तब आऊँगा फिर से ! 

दिसंबर 14, 2014

सचमुच का गुड मॉर्निंग

इस तस्वीर में जो चिड़िया है उसे मेरी माँ गोइठी कहती है ... इसे मैंने अपने कैमरे में कुछ यूं उड़ान भरते पकड़ा 

सुबह और वह भी रविवार की ! इतनी प्यारी तो कोई चीज नही । हम आवासी विद्यालय के मास्टरों के लिए यही एक सुबह होती है जिसे वे अपने माफ़िक इस्तेमाल कर सकते हैं बशर्ते उनकी कोई ड्यूटी न हो तो । मेरी ड्यूटी नही थी इसलिए देर रात तक यू-ट्यूब पर हंसराज हंस , नुसरत फतेह अली और मुनव्वर राणा के वीडियो देखता रहा । सोचा था रविवार की सुबह तो अपनी है वैसे ही जैसे रात तो अपनी है कहकर विश्वविद्यालय के दिनों में या उसके बाद भी हम रात रात भर विश्वविद्यालय में बैठे रहते थे । लेकिन सुबह को अपनी ही न रहने दिया जाये तो ।
एक मुकम्मल सुबह जिसमें आसमान भी साफ हो बारिश के कोई निशान न हों तो वह सुबह जल्दी शुरू हो ही जाती है । 
ऊपर से आजकल क्रिसमस का मौसम है तो आसपास के चर्च पता नहीं कब से जग गए थे । उनके घंटे , बेसुरी आवाज़ में लाउडस्पीकर पर चल रहा उनका समवेत गान सब तो थे ही थे साथ में था पक्षियों का कलरव । हालाँकि पक्षी रोज बोलते हैं पर रोज मैं चाह कर भी देर तक नहीं सो सकता । उनकी ही तरह मुझे भी उजाले के साथ उठना होता है । उनकी तरह आवाज़ तो नहीं ही निकाल सकता लेकिन उठने और स्कूल जाने के बीच के कार्यों की लय उनकी आवाज़ों की तरह ही होती है । इन सब के बीच में सोना तो दूभर ही जाता है ।

किसी तरह आँख दबाकर पड़ा रहा कि नींद ही जिद्दी हो । वह इन आवाज़ों की परवाह किए बिना अपना काम कर जाये । वह कर भी रही थी । मैं सोने और जागने के बीच ही कहीं घूम रहा था । कुछ ऐसा सा जहां दोनों ही बातें महसूस की जा सकें उसी दौरान दरवाजे की घंटी बजी । उस समय उठने में जो कष्ट हो रहा था वह तो सब समझ सकते हैं । कभी न कभी तो ऐसा अनुभव हुआ ही होगा । हो सकता है रविवार को न हुआ हो । दरवाजे पर गया तो पाया कि दो छात्र खड़े थे । चर्च जाने के लिए परमिसन(आज्ञा लिखने वाला था पर उसमें मजा नहीं आया) मांगने आए थे ।

पक्षियों , चर्चों और के अलावा मेरे ये छात्र तीसरे समूह हैं जो रविवार की सुबह पूरे अधिकार के साथ खराब कर सकते हैं । अवसीय विद्यालय में अध्यापक का काम केवल अध्यापक का ही नहीं रह जाता है । ऊपर से यदि विद्यालय सरकारी हो तो वार्डन का अतिरिक्त काम भी हमारे ही जिम्मे है क्योंकि सरकार की प्राथमिकता होती है कम से कम खर्चे में विद्यालय को चलाते रहना । पहले से ही शिक्षक सबसे पालतू कर्मचारी माने जाते रहे हैं तो उन्हें लद्दू बना देना इतनी स्वाभाविकता से हुआ होगा कि किसी को न तो इसका पता चला और न ही किसी ने इसका विरोध किया । मैं भी एक ‘हाउस’ का वार्डन हूँ जिसे यहाँ की तकनीकी भाषा में ‘हाउस मास्टर’ कहते हैं । और वे बच्चे कुछ भी करें उसकी ज़िम्मेदारी मेरी है । कई बार वे कुछ भी कर जाते हैं । शुक्र है किसी ने अत्महत्या नहीं की है वरना मेरे ही साथ के लगे हुए एक मास्टर के हाउस मास्टर बनते ही एक बच्चे ने अपने को पेड़ से टांग लिया था पिछले साल । खैर इस हाउस मास्टरी की भड़ास ज्यादा ही है यहाँ थोड़े में काम चलेगा नहीं और वही लिख दूँ तो जो लिखने बैठा था वह लिख नहीं पाऊँगा ।

हालाँकि मैंने छात्रों को स्पष्ट रूप से कह रखा है कि रविवार को मेरे दरवाजे पर नहीं आना है जबतक कि कोई इमरजेंसी न हो । वह भी मेडिकल वाली । पर छात्र मान जाएँ तो सूरज पश्चिम के बजाय पूरब में न डूबने लगे , कुर्सी-टेबल न सुधर कर परीक्षाएँ पास करने लगें । जब मैं छोटा था तब मेरी माँ ये दोनों फिकरे मेरे ऊपर इस्तेमाल करती थी । इस पर किसी दिन अलग से बात करने का मन है ।

बारहवीं कक्षा के दो छात्रों को विद्यालय की ही एक अध्यापिका के साथ चर्च जाना था तो मुझे कोई आपत्ति नहीं थी हाँ गुस्सा जरूर था कि नींद तोड़ दी । उनके जाने के बाद फिर से ‘अंठा’ कर बिस्तर पर पड़ गया । ये अंठाना ऐसा है जैसे बहाना बनाना लेकिन हमारी मैथिली में ।  नींद फिर से जमने लगी थी । यह सोचकर मोबाइल भी ऑफ कर दिया कि कोई तंग न करे ।

लेकिन साहब मैं फिर से नींद और उससे बाहर होने के बीच में था कि फिर से कानों में ज़ोर ज़ोर की आवाज़ें पड़ी । उस अवस्था में कुछ देर तो यह अंदाजा लगाने में ही लग गया कि यह आवाज क्या है और कहाँ से आ रही है । आँखें खुली और थोड़ा सहज हुआ तो देखा बिस्तर के सामने वाली खिड़की पर दो मैना इधर उधर तेजी से चल रही हैं और तेज तेज स्वरों में कुछ कुछ बोल रही हैं । उनका बोलना तो समझ में नहीं आया पर कान के इतने करीब जब इस तरह से शोर हो तो नींद सबसे पहले उड़ गयी ।

दोनों पक्षी कुछ मुआयना जैसा कर रहे थे । मुझे लगा शायद वे अपना घोंसला बनाने की जगह तलाश रहे हों । यह सोचते ही मेरी स्थिति ठीक उस दुकानदार की तरह हो गयी जिसकी दुकान में बहुत दिनों के बाद गाहक आया हो । पर ये गाहक तो थे नहीं कि दुकानदार उठकर उनकी सेवा को चला जाये । मैं उठता और ये फुर्र हो जाते । अपने को काठ करके उसी तरह लेटा रहा । वे इधर उधर देखते रहे । उनमे से एक उड़ गया और उसी क्षण वापस भी आ गया । पता नहीं वही था या कोई और । इस बार उसके मुंह में सूखी घास का टुकड़ा भी था ।

मैं बहुत खुश हूँ कि मेरी खिड़की में चिड़िया अपना घोंसला बना रही है । बचपन से इस तरह की इच्छा कि मैं चिड़ियों की इतने पास रहूँ । पक्षी हर जगह थे लेकिन पहले जहां भी रहा वे जगहें इस कदर मेरी नहीं थी । इन दोनों मैनों को भी यहाँ रहने की जरूरत नहीं पड़ती । एक तो केरल जहां पहले ही पहाड़ों, नदी के कछारों पर इतने पेड़ हैं ऊपर से हमारे विद्यालय का बड़ा सा कैंपस जहां खेलने के मैदान के अलावा पेड़ ही पेड़ हैं । ऐसे में कौन सी चिड़िया घर की मुंडेर , खिड़की की खोह और रोशनदान के पास घर बनाती । लेकिन हाल में हमारे विद्यालय में करीब दसेक बड़े बड़े पेड़ों की छंटाई कर दी गयी । अब उन पेड़ों की बस ठूंठ है जिनसे महीने भर बाद अब जाकर कुछ हरियाली फूट रही है । इस छंटाइ से बहुत सी चिड़ियों का घोंसला उजड़ गया । जिस दिन पेड़ काटे जा रहे थे उस दिन शिक्षक आवास की ओर के आसमान में बहुत सी चिड़िया आ गयी थी । ये वे पक्षी थे जो उन पेड़ों पर रहते थे । तब अचानक से बशीर बद्र की वह पंक्ति याद आ गयी थी – आसमां भर गया परिंदों से , पेड़ कोई हरा गिरा होगा

जब इनका घर बन जाएगा तब से ये परिंदे मेरे सोने वाले कमरे के बाहर की खिड़की पर ठीक मेरे बिस्तर से चार-पाँच फुट की दूरी पर रहेंगे । इस बात को लेकर मुझे अपने दो दोस्तों मुकेश और शरद से जलन होती थी । इनके सरकारी क्वाटर में चिड़ियों ने घोंसले बनाए और इन्होंने तस्वीरें भी भेजी । एक मैं ही था जिसके आसपास इतनी चिड़िया होते हुए भी घर की मुंडेर या खिड़की की जाली के बाहर कोई घोंसला नहीं था ।यह सब खालिस बचपना लगता है पर तीस की उम्र में बचपन के एहसास के भर जाने को मैं बड़ी बात मानता हूँ । 

बचपन ठीक वह दुनिया थी जहां मनुष्य, प्रकृति, जानवर और परिंदे-चरिंदे सब साथ थे । सबका अस्तित्व था और सब अपनी भूमिका में थे । कौवा हाथ में से कुछ छीनकर भाग जाता था , गरुड़ और गिद्ध को दिखा दिखाकर ‘सेवा’ बाबा डराया करते थे । गरुड़ को वे कहते थे लोलवाली । लोल मतलब चोंच ! बकरी के मेमने वैसे ही प्यारे लगते हैं पर जब वे उछलकूद करते थे तो पूछिए ही मत उन पर बड़ा लाड़ आता था । यही स्थिति गायोंके बछड़ों और भैंस पठरुओं की थी । नए जन्मे ये पठरू या बछड़े जब नौसिखुवा अंदाज में बाँ- बाँ करते हुए चौकड़ी भरते तो उन्हें देखने व पकड़ने में बहुत मजा आता था ।


तब यह हालत थी कि मैं अपने को भी उन पशु-पक्षियों की तरह ही समझता था । उसके बाद तो पशु-पक्षी कभी इतने साथ रहे ही नहीं । यहाँ हमारे स्कूल में बहुतेरे पक्षी हैं । कई रंगों और डिजायन के । उनकी आवाजों से वातावरण हमेशा खुशनुमा बना रहता है लेकिन खिड़की के ऊपर मैनों की इस जोड़ी का बसना सुबह से मन को गनगनाए हुए है । देखने की बात है कि ये यहाँ टिकते हैं या नहीं ! 

नवंबर 22, 2014

संवाद

यह मेरे और स्वाती की फेसबुक के इनबॉक्स में हुई बातचीत है ... उसने मेरा उस समय का ताजा ब्लॉग पढ़ा था उसी से जुड़ी बातें हुई ...वहाँ हुई बातचीत को उसकी अनौपचारिकता के साथ यहाँ डाल रहा हूँ । मेरा दावा नहीं है कि यह बहुत ऐतिहासिक बातचीत थी बस उस गुफ़्तगू की रवानगी मुझे अच्छी लगी ।

स्वाती  : बहुत अच्छा लिखा है आलोक !
मैं : धन्यवाद !  और सुनाओ क्या हाल है
स्वाती  : ठीक है... तुम कहो... पढ़ के बहुत अजीब स लग रहा है...
मैं : मैं भी ठीक हूँ एक और पोस्ट लिख रहा हूँ ..इसलिए थोड़ा सा व्यस्त हूँ अभी ...
स्वाती  : जन्दगी का एक रूप यह भी है न, भयावह लेकिन सच...
मैं : हाँ
स्वाती  : हाँ हाँ लिखो लिखोआराम से...
मैं : और मेरा मानना है कि जो लड़कियां या औरतें इससे अपनी रोजी रोटी चलती हैं उनके हक़ में इसे कानूनी दर्जा जरूर दिया जाना चाहिए
स्वाती  : वही तो.. पर हमारे यहाँ तो उन्हें ही गलत देखा जाता है बस्स...
मैं : हमारे सहरसा में जिन हालातों में वे स्त्रियाँ रहती हैं उनकी कल्पना भी दुर्लभ है
नहीं इसी सोच को बदलने की जरूरत है
स्वाती  : उन मर्दों का कुछ नहीं होता, जो उनकी कीमत लगाते हैं...
मैं : केवल अपने यहाँ की बात नहीं है कल में कुछ बाहरी देशों के बारे में भी इन्टरनेट पर देख रहा था वहाँ भी ऐसा माना जाता है
स्वाती : जाने कैसे इसमे किसी को आनंद मिल सकता है...
मैं : पुरानी ग्रीक सभ्यता में भी ठीक वैसा ही है जैसा अपने यहाँ हम सोचते हैं.... मन के सब दरवाजे बंद कर लेने के बाद जब कोई स्वार्थी हो जाये तो आनंद ही आनंद है ऐसा मुझे लगता है ।
स्वाती  : पर कभी ये बात परेशान न करे, तो ज़िंदा ही क्या है आदमी...
मैं  : यही तो बात है परेशान होने के लिए यहाँ कौन आया है ...
स्वाती  : जहां औरतें किसी की दैहिक ज़रूरतों को पूरा करने का माध्यम भर होती हैं..
मैं : यही एक बात है जो हम पुरुषों को समझने की है... मैं जब हम पुरुषों की बात कर रहा हूँ तो खुद को भी उसमें शामिल कर रहा हूँ...
स्वाती  : और पता है, सोच के बुरा लगे शायद पर कई बार और कई जगह 'सम्बन्धों' के सुन्दर, सम्मानित आवरण के भीतर भी औरत की स्थिति सिर्फ इतनी भर की होती है...
मैं : मैं किसी दिन इस बातचीत का उपयोग करूंगा ... तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है न
स्वाती  : नहीं ... करो..
मैं : सम्बन्धों का दायरा और बड़ा कर लो... सम्बन्धों के भीतर भी यही हाल है ... चलो अब मैं खाने जा रहा हूँ
स्वाती  : ओके बाई ! 

नवंबर 17, 2014

हमें बच्चे ही रहने दो ...



देश भर में बाल दिवस मनाया जा रहा था । इन्टरनेट के विस्तार ने सभी अन्य विशिष्ट दिनों की तरह ही उस दिन के लिए भी इतनी सामाग्री उपलब्ध करा दी थी कि कुछ आरंभिक कंटेंट के बाद रुचि के साथ देखने का धैर्य जाता रहा ।
इस बार का बाल दिवस अपनी भावना से नहीं बल्कि राजनीतिक कलाबाजियों से सनसनीखेज किस्म की सुर्खियां लंबे समय से बटोर रहा था । लिहाज़ा समाचारों , तसवीरों और विचारों की खेपें 12 बजे रात के पहले से ही सोशल मीडिया पर उतरने लगी थी । ट्रेन में था और यात्रा दो बजे रात के आसपास समाप्त होए वाली थी इसलिए अपने को जगाने के तमाम विधानों में बार बार सोशल मीडिया पर जाना शामिल कर लिया था ।

इस तरह अनजाने या जाने में बाल दिवस से लगभग तौबा करा देने की हद तक सामाग्री ग्रहण कर जब विद्यालय की प्रातःकालीन सभा में पहुंचा तो वहाँ स्टेज पर बाल दिवस की शुभकामनाओं का बैनर लगा था । और उसे भव्य तरीके से मनाने की तैयारी दिखी । छोटी कक्षाओं के ढेर सारे छात्र स्टेज पर चढ़े हुए थे । समान्यतया छोटी कक्षाओं के छात्रों की असेंबली में भागीदारी आज का नया शब्द बोलने तक ही सीमित रहती है ।

प्रार्थना के बाद बच्चे कुछ बोलते उससे पहले ही एक वरिष्ठ अध्यापक मंच पर आ गए । अपनी नफ़ीस अंग्रेजी में उन्होने आज की प्रातःकालीन सभा की पूरी रूपरेखा रख दी । साथ ही कुछ ऐसा भी बोला जिसे सुनकर बच्चे खिलखिलाने लगे । अध्यापक महोदय अपने जीवन में फिर से बच्चा बन जाना चाहते थे ।

असेंबली से निकलते हुए मन में एक ही बात थी कि अचानक से छोटी कक्षाओं के बच्चे ही सारी गतिविधियों को अंजाम देने क्यों पहुँच गए । इस पर छात्र ही बेहतर बता सकते थे क्योंकि मुझे कई बार लगा है कि अध्यापक विद्यालय प्रबंधन की ही भाषा बोलते हैं । छात्रों के साथ इस बात की संभावना भी थी कि वे किसी उत्तर पर पहुँचने से पहले ही खुद उलझ जाएँ , मुझे उलझा दें या नए प्रश्न खड़े कर दें । इन तीनों ही स्थितियों में मैं खुश होता क्योंकि कक्षाई वातावरण जिस तरह से बदल रहे हैं उसमें किसी बात पर विचार करना , उसमें उलझकर दूसरों को उलझा देना या नए प्रश्न पैदा कर देना जैसी क्रियाएँ विलुप्त होती जा रही हैं । अच्छे से अच्छा अध्यापक उत्तर देने को ही अपना और छात्रों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन मानने लगे हैं ।

सबसे पहले मेरे सामने दसवीं कक्षा थी जहां छात्र-छात्राओं में मैं सबसे ज्यादा शारीरिक भिन्नता देखता हूँ । कुछ बच्चे इतने विकसित हो गए हैं कि उन्हे वयस्क कहना ही उचित है और कुछ ऐसे जो बच्चों की श्रेणी में ही रह सकते हैं । कई बार इन दोनों तरह के बच्चे एक साथ दिखते हैं तो अजीब लगता है ।

बाल दिवस की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान व विद्यालय से मेरे बाहर रहने की वजह बताने के बाद मैंने उनसे छोटी कक्षाओं के बच्चों द्वारा असेंबली चलाने के बारे में जानना चाहा । यहाँ – वहाँ से आवाज़ें आने लगी । उनके आत्मविश्वास बता रहे थे कि उत्तर उनके पास है । बारी बारी से उत्तर आने लगे । एक , दो , तीन , पाँच , दस तक सभी उत्तर एक ही – प्रिंसिपल मैडम ने कल कहा कि केवल छठी और सातवीं कक्षा के छात्र ही बच्चे हैं बाकी बड़े हो गए इसलिए वे ही असेंबली एक्टिविटी प्रेजेंट करेंगे । 

मैं इस तरह की बात का अंदाजा भी कर पाया था कि स्कूल की तरफ से मान लिया गया है कि कौन से छात्र बच्चे हैं और कौन से बड़े हो गए । अब अलग ही स्थिति  थी और ऐसे में एक नया प्रश्न उभर कर आया – दसवीं कक्षा के ये छात्र अपने को क्या मानते हैं बड़ा या बच्चा ?

इस प्रश्न के उत्तर में सभी हाथ बड़े के पक्ष में खड़े हुए थे । छोटा सा महेश तंगच्चन भी जो अपने को बड़ा मानता है ।
दसवीं कक्षा आते आते बच्चा अपने को बड़ा मानने की जल्दी में है (क्या पता नवीं से ही न अपने को बड़ा मानता आया हो) । प्रिंसिपल उन्हें बड़ा मानती है ।  देश भर में माता पिता से लेकर अध्यापक तक छोटी उम्र में बड़ा कारनामा करने वालों के नाम बताकर उन्हें खींचकर बड़ा बनाने में लगे रहते हैं । बच्चे बड़े हो जाएंगे , ज़िम्मेदारी लेने लगेंगे तो धीरे धीरे अपनी ज़िम्मेदारी उनपर डालकर उन्हें जिम्मेदार तक ठहराया जाने लगेगा । अपनी जिम्मेदारियों से भागने का इससे बेहतर विकल्प तो हो ही नहीं सकता ।

मेरी नानी के गाँव में एक व्यक्ति हैं कामरेट । यह शब्द कॉमरेड से बिगड़कर बना होगा ऐसा अब लगता है और ऐसा भी कि उस व्यक्ति की मार्क्सवादी राजनीति में कोई भागीदारी रही होगी या नहीं तो उसके माता – पिता को यह नाम अच्छा लगा होगा । यह सब आज सोचता हूँ बचपन में तो कामरेट बस एक नाम था जो परचून की अपनी छोटी सी दुकान चलाता था । बहरहाल , कामरेट के चार बेटे हैं उनमे से एक ने बिहार पुलिस की नौकरी की बाकी घर पर ही रहे –बिना किसी काम धंधे के निठल्ले । एक दिन कामरेट ने अपने सबसे बड़े बेटे से कहा कि उसे कोई काम धंधा करना चाहिए कुछ नहीं तो दिल्ली-पंजाब ही चला जाये । इस पर उसके बेटे नीलानन्द ने कहा – इतने दिन तक आपने खिलाया, कुछ दिन और खिला दीजिये फिर मेरे बच्चे दिल्ली-पंजाब जाने लायक हो जाएंगे और वे खिलाने लगेंगे ।

अपनी ज़िम्मेदारी बच्चों पर हस्तांतरित कर उन्हें बड़ा कर देने की जल्दी विद्यालयों से लेकर माता-पिता तक सभी कर रहे हैं ।  इससे बाहर वे बच्चे जो रोटी तक के लिए जूझते परिवारों से आते हैं वे तो पहले से ही उस ज़िम्मेदारी को निभा रहे हैं जो उनके लिए किसी ने नहीं निभाई ।  हालांकि एक बात यह भी है कि उनके लिए बोलने वाले बहुत से लोग हो हैं इस बार का नोबल पुरस्कार बताता है कि साधनहीन बच्चों की तरफ से बात करने वाले तो कम से कम हैं ही । लेकिन बात केवल उनकी ही नहीं है । बचपन तो सबका बचना चाहिए । उनका भी जिनके माँ – बाप उनके परीक्षा के अंकों और ग्रेड के पीछे पड़े रहते हैं ।

हम बच्चों को अपने बनाए हुए साँचों में ढाल रहे हैं । यह ढलाव उनके लिए महंगा पड़ रहा है । हमारे स्कूल में पार्कों में जिस तरह के बेंच लगाए जाते हैं ठीक वैसे ही लगाए गए हैं लेकिन उन पर बैठना तो दूर उनके पास तक फटकने का समय उनके पास नहीं है । स्कूल जो केवल छठी सातवीं तक के छात्रों को ही बच्चा मानता है उसी में साधारणतया हिन्दी और तमिल फिल्में दिखाने पर प्रतिबंध है बस देशभक्ति और बच्चों की फिल्में ही दिखाई जा सकती हैं ।

बाहर बचपन को बचाने का बहुत शोर है लेकिन विद्यालयों के भीतर घरों में उसी बचपन को खदेड़ा जा रहा है । किसी भी विद्यालय में चले जाइए चारों तरफ बड़े बड़े लोगों की उक्तियाँ लिखी हुई मिल जाती हैं , पाठ और सहायक पुस्तकें ऐसे उदाहरणों से अटे पड़े कि कैसे कोई छोटी उम्र में ही महान बन गया । कुछ दिनों पहले कात्यायनी की एक कविता पढ़ी थी जिसमें छात्र अपनी मुश्किलों का जिक्र कर रहे थे और उनके लिए सबसे बड़े  दुश्मन शिक्षक थे । पर उनका बचपन छीनने में जितनी भूमिका उनके माता-पिता निभाते हैं उतनी शायद ही कोई निभाता होगा ।

हमारा विद्यालय आवासीय विद्यालय है । आए दिन देखने को मिलता है कि माता - पिता उन बच्चों को छोडने आते हैं । छोटे बच्चे तो बहुत रोते हैं फिर भी माँ-बाप उनको छोड़ कर चले जाते हैं । कई बच्चों के माता-पिता उनके ग्रेड नहीं आने से परेशान हैं । बच्चे खुद को अपने माँ-बाप की उम्मीदों के साथ चलता हुआ न पाकर लंबे अवसाद में जा रहे हैं । मैं नया नया ही आया था जब दसवीं कक्षा की एक लड़की ने सभी विषयों में 90%अंक न मिलने के कारण छत से छलांग लगा दी थी । इन सबके बावजूद हम बच्चों को खींचकर बड़ा बनाएँगे । केवल बाल दिवस पर बच्ची-बच्ची बातें करेंगे उसके बीतते ही बड़ा बनाने की कवायद फिर शुरू ।


आखिर में अपने एक गुरु के लिए जो छात्रों को बच्चा कहने के सख़्त विरोधी हैं । गुरु जी, बच्चे को समय से पहले बड़ा मत करें । अभी अभी अमेरिका की एक अध्यापिका ने अपने स्कूल की कक्षाओं में बच्चों की तरह दो दिन बिताए । उसकी डायरी पढ़िये आप भी मान लेंगे कि बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने के चक्कर उसे किन चीजों से हम दूर कर दे रहे हैं । 

नवंबर 16, 2014

कमरा नंबर नौ


जब बस गुंटूर से विजयवाड़ा की तरफ बढ़ रही थी तब जरा भी अंदाजा नही था कि ज़िंदगी के उस चेहरे से कुछ यूं मुठभेड़ हो जाएगी जो स्याह है । बाहर अंधेरा बहुत घना था लेकिन यह पता नहीं था कि वह बस अंधेरे से होकर अंधेरे में ही चल रही है । बस रोज चलती होगी । राह का अंधेरा यूं ही रहता होगा और बस जिस अंधेरे में जाती है वह भी यूं ही पसरा होगा ।

वह एक शाम थी । मैं बस से उतरकर स्टेशन की ओर जा रहा था । बस स्टेंड से स्टेशन का रास्ता पूछा और बढ़ गया । मैं आगे बढ़ता जा रहा था और पीछे कुछ ऑटो वाले भी आते जा रहे थे मैं सबको मना करता जा रहा था । कुछ कदम चलने के बाद उन्होने मेरा पीछा छोड़ दिया शायद उन्हें अंदाजा लग गया होगा कि मैं ऑटो नहीं करने वाला । ऑटो वालों से फारिग होकर मैं आगे बढ़ा तो एक पुल नजर आया । पुल छोटा था पर उसके दूसरे छोड़ से रास्ता दो भागों में बंट रहा था । इसलिए अब पुल पार करने से पहले स्टेशन का रास्ता पूछ लेना जरूरी था । पुल पर अंधेरा था । वही अंधेरा जो शहर के बाहर फैला था । उस अंधेरे में भी पुल पर भीड़ थी जैसे लोग शाम की हवाखोरी करने आए हों । या नहीं तो किसी खास बस के लिए खड़े हों जो ठीक पुल पर ही आकर रुकती है । वहाँ खड़े लोगों से रास्ता पूछ लेना जरूरी लगा । एक से पूछा और उसने बताया भी । लेकिन वहाँ खड़े लोगों के खड़े होने के अंदाज से एक बात तो साफ हो गयी कि वे किसी के बस के इंतजार में वहाँ खड़े नही थे । उनके खड़े होने से लेकर हंसी ठट्ठे तक में कहीं जाने की जल्दी या बस न मिलने की व्यग्रता नहीं थी ।

तो वहाँ हो क्या रहा था ? यह प्रश्न अपने से पूछने से बेहतर विकल्प यह था कि थोड़ी देर खड़े होकर देखा जाये कि वहाँ हो क्या रहा है और यह पता लगाया जाये कि लोगबाग खड़े क्यों हैं । वहाँ रुककर जब इधर उधर देखा तो वहाँ की संरचना समझ में आनी शुरू हुई ।

रात के आठ बजे घुप्प अंधेरे में वहाँ पुल की बांह के सहारे खड़े या उस पर बैठे लोगों में केवल पुरुष नहीं थे ठीक ठाक संख्या में स्त्रियाँ भी थी । शाम के ढलने की बाद भी उस अंधेरे में स्त्रियों की उपस्थिती से ज्यादा उनकी और उनके आसपास के लोगों की गतिविधियां मेरे कौतूहल का विषय बन गयी ।

स्त्रियाँ जगह जगह दो-दो , तीन-तीन की संख्या में खड़ी थी । कभी साथ मिलकर किसी पुरुष की तरफ बढ़ती तो कभी अकेले । पुरुष भी उनके आस पास मंडरा रहे थे । अब माजरा समझना मुश्किल नहीं था । जिनकी बात पक्की हो जा रही थी वे आगे बढ़कर ऑटो पकड़ रहे थे ।

मैं थोड़ी देर वहीं रुका रहा । अब मुझे पुल पर दो स्पष्ट विभाजन दिख रहे थे – स्त्री और पुरुष । लेकिन वे स्त्रियाँ उन स्त्रियों से बिलकुल अलग थी जो उन पुरुषों के घरों में रहती हैं । इसलिए वे उन पुरुषों के हंसी मज़ाक और छेड़छाड़ के केंद्र में थी । पुरुष जो सौदा कर रहे थे और पुरुष जो वहाँ खड़े मजे ले रहे थे वे एक सी मानसिक दशा में न भी हों लेकिन व्यवहार में एक से ही लग रहे थे । अधिकार भाव , आनंद उठाने से पहले आंतरिक हलचल और केवल इस सब को महसूस कर लेने से ही आनंदित पुरुष मन वहाँ अलग अलग चेहरों के साथ मौजूद था ।

वे स्त्रियाँ , स्त्रियाँ ही थी – उम्र और पहनावे दोनों से । उनके चेहरे के एक समान भाव और बिना किसी झिझक से एक से दूसरे संभावित ग्राहक से बात करने जाने की क्रिया यह बताने के लिए काफी थी कि वे इसे किसी आनंद के बजाय भूख मिटाने के एक माध्यम की तरह ले रही हैं ।

पुरुष के लिए आनंद और स्त्री के लिए काम । सेक्स का यह मतलब वहीं समझ में आया । यह बात कह देना कि वे यह काम पैसे के लिए झेल रही हैं कोई नयी बात नहीं होगी । लेकिन उनका व्यवहार भरे पेट वाले लोगों के शारीरिक आनंद से बिलकुल मेल नहीं खाता था । यदि किसी ने इसे महसूस किया होगा तो उसके जेहन से आनंद का खयाल ही मिट गया होगा । लेकिन पुरुषबोध जो लंबे समय से परत दर परत चढ़ते हुए निर्मित हुआ है यह बात सोचने तक के लिए तैयार नहीं होता कि जो उसके लिए पैसे देकर खरीदा गया आनंद है वह उसके साथ ही उस कार्य में शामिल विपरीत लिंगी के लिए एक काम भर है । आर्थिक काम । वह बोध इस क्रिया के आनंद पक्ष में ही उगता डूबता रहता है । इस काम के बदले उन स्त्रियों को जो कुछ भी मिलता है उसके साथ यह भी नत्थी रहता है कि वह इस काम को काम नही कह सकती । कोई भी इस काम को काम मानने के लिए तैयार नहीं है । बल्कि वे स्त्रियाँ नहीं रह जाती । 

मोहन राकेश ने अपने नाटक आषाढ़ का एक दिन में मल्लिका के मुंह से कहवाते हैं कि मैंने अपना नाम खोकर अपने लिए विशेषण अर्जित किया है । ये वही तमाम औरतें हैं जो हर छोटे बड़े शहर में किसी खास गली – चौराहों के स्याह हिस्सों में खड़ी रहती हैं । अपनी कमियों को ढँक छिपाकर रखने वाले निगाह फेर लेने में माहिर लोगों की उनपर नजर ही नहीं पड़ती ।  

अब मेरे लिए वह शाम बहुत भारी हो रही थी । ट्रेन रात के तीन बजे आने वाली थी । स्टेशन जाने की जल्दी नहीं थी लेकिन वहाँ से हट जाना ज्यादा जरूरी लगा । वहाँ मौजूद पुरुषों के हास्यास्पद क्रियाकलापों और हावभावों को भी झेल जाता लेकिन उन स्त्रियों में से यदि कोई मेरे सामने आ जाती स्वयं को साथ ले जाने की बात करती तो उनकी आँखों का सामना मैं नहीं कर पाता । इसलिए मैं तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ गया ।

पूछताछ वालों से पता चला कि ट्रेन सात घंटे की देरी से चल रही है दूसरे दिन दस बजे से पहले आने की संभावना नहीं है । पता किया तो स्टेशन पर ही रेलवे के रिटाइरिंग रूम की जानकारी मिली । दरें देखी कमरे सस्ते ही थे । एक कमरे की बुकिंग कर चाभी लेकर चल पड़ा । तीसरी मंजिल के गलियारे में कहीं कमरा नंबर नौ था । कमरा संख्या एक के बाद टिकट निरीक्षकों का विश्राम स्थल और उसके बाद एक के बाद एक कई कमरे । दूर वहाँ तक जहां तक प्लेटफॉर्म की रोशनी भी नहीं पहुँच रही थी । मुझे न तो रोशनी से कोई मतलब था न ही दूरी से । मेरे लिए रात का आराम जरूरी था ।

कमरा संख्या नौ से ऐन पहले सामने से दो लड़कियाँ आकर मेरे पास खड़ी हो गयी । उन्होने तेलुगू में कुछ कहा । मुझे समझ नहीं आया और यही बात मैंने उन्हें हिन्दी में बता दी । फिर उनमें से एक ने कहा फाइव हंड्रेड , फूल नाइट । मैं भागकर अपने कमरे के सामने आ गया , जल्दी से कमरा खोला और दरवाजा बंद कर लिया ।

उन लड़कियों का मैंने चेहरा नहीं देखा लेकिन वे उस समय उसी तरह लगी होंगी जैसी वहाँ बस स्टेंड के पुल पर खड़ी स्त्रियाँ लग रही थी ।

मेरा कमरा बंद था । बाहर ट्रेन के इंजनों की भयानक आवाज़ कभी कभी आने वाली उद्घोषणाओं के स्वर और कमरे में चल रहे बड़े डैने वाले पंखों की डरावनी आवाज़ से मिलकर अलग ही माहौल बना रहे थे । इसके बावजूद मेरा मन वहीं पुल पर अटका था । कई बार तो यह भी लगा कि लड़कियां दरवाजे पर ही खड़ी हैं ।


मेरी रात उन लड़कियों , पुल पर खड़ी औरतों और रेलवे में उद्घोषणा करने वाली स्त्री इन सबके बीच गड्ड-मड्ड हुई जा रही थी । 

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...