अप्रैल 27, 2012
क्या फायदा ऐसे दिवस का ?
एक मई यानि मजदूर दिवस ! एक ऐसा दिन जिस दिन के बारे में वह कह सकता है कि यह दिन उसका भी है । पर क्या वाकई में ऐसा हो पाता है । दिन हो या सप्ताह या फिर साल ही किसी को देने से स्थितियाँ परिवर्तित हो जाएँ ऐसा कहना कभी खतरे से खाली नही रहा ।
अभी साल भर ही तो हुआ है उस दिन भी एक मई ही था ! हिंदुस्तान अखबार में एक पुस्तक समीक्षा छपी थी । वह समीक्षा की तो मैंने थी पर वहाँ नाम किसी और का छपा था ! दिमाग भन्ना गया ! जिस काम को करने में मैंने उतना समय दिया उस काम का श्रेय किसी और को दिया गया ! अखबार के जिस कर्मी से मैंने समीक्षा के लिए पुस्तक ली थी और जिसे समीक्षा सौंपी थी उसे फोन किया तो उसने सीधे - सीधे मना कर दिया कि जो समीक्षा छपी है वह मेरी है ! उसने कहा उसने किसी और से लिखवायी है जिसका नाम भी छपा है । मेरे लिए यह एक सदमे से कम नहीं था ! मेरे इतना कहने पर कि समीक्षा में जो लिखा हुआ है वो मेरे शब्द हैं और बड़ी चालाकी से एक दो पंक्तियाँ उपर नीचे की गई हैं उसका कहना था कि एक ही किताब की समीक्षा है तो बातें तो मिलेंगी ही न ! और अब मुझे तंग मत करो मैं मीटिंग में हूँ । फोन कट गया था । उस आदमी ने कितनी सरलता से मेरे किए हुए काम को किसी और का साबित कर दिया था ! मैं उससे पूछना चाह रहा था कि जब किताब मेरे पास थी तो दूसरे किसी ने उसकी समीक्षा कैसे कर दी ? पर वह शख्स तो मीटिंग में चला गया था । व्यस्त होने से क्या कोई अपने अपराध से मुक्त हो सकता है ? उस दिन मेरे एक मित्र का जन्मदिन भी आता है सो मैं उसके जन्मदिन पर जेएनयू में था । दोस्तों को पता था कि मेरे साथ क्या हुआ है सो वे मुझे खुश करने की कोशिश कर रहे थे पर मन तो वहीं अटक रहा था जहाँ मेरे का श्रेय किसी और के हिस्से गया था ।
हम सब खाना खा रहे तो अखबार से उसी व्यक्ति का फोन आया । उसने कहा जो भी हुआ वो गलत हुआ उसके लिए मैं माफी माँगता हूँ । पर वो व्यक्ति यह स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हुआ कि अगले दिन इस संबंध का कोई माफीनामा अखबार में आए । मैं बस इतना कह पाया कि इतने बड़े अखबार से नए लेखकों के इस तरह के शोषण की उम्मीद नहीं थी और आज एक भरोसा टूट गया ।
ये मैं भी समझ रहा था कि इन बातों का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह गया था पर एक दर्द था जो बलबला कर शब्दों का आकार ले रहा था ।
इस घटना से पहले मैंने इस तरह के कामों के विषय में सुना था पर प्रत्यक्ष अनुभव उसी दिन हुआ ! अपने मरने पर नर्क देखने जैसा ! एक कार्य को करने पर मजदूरी तो दूर उसका श्रेय तक भी नहीं मिलना आज के लिए नया नहीं है । जबकि हम कितने ही बरसों से ये मजदूर दिवस मना रहे हैं पर मजदूरों में बने वर्गों में जो 'बड़े' और 'ऊँचे' मजदूर हैं बड़ी सरलता और सहजता से 'निम्न' श्रेणी के मजदूरों का हिस्सा खा रहे हैं ।
नया लेखक लिखना चाहता है और पुराने घाघ ये जानते हैं । अतः वे लिखाते हैं और फिर बड़ी चालाकी से उस लिखे हुए के अपना या अपने चमचों का करार कर देते हैं क्योंकि उनके पास संस्था की शक्ति है जो हमेशा उसी का साथ देती है ।
मैं जानता हूँ स्थितियाँ बदली नहीं हैं पर इस साल भर में इतना तो हो गया कि मैं कोई काम माँगने उस अखबार के दफ्तर नहीं गया । पर क्या मैं सच्चा मजदूर हूँ - नहीं ! यदि मैं सच्चा मजदूर होता तो मेरे पास वहाँ जाने के अलावा कोई चारा नहीं था । और शायद कुछ और शर्तें लाद दी जाती क्योंकि मैंने पूछने - जानने की हिमाकत की थी ।
मेरे कुछ दोस्त आज भी कभी - कभी मजाक में मुझे उसी नाम से बुलाता हैं जो नाम पिछले साल एक मई को उस समीक्षा के नीचे छपा था ।
समझ नही पाता हूँ कि ये सीख है या किसी भी क्षेत्र में नए लोगों के प्रवेश करने से लगायी गयी रोक । यह कहना नितांत गलत होगा कि मैं यदि लिखता तो सबसे अच्छा लिखता पर अपना स्थान तो बनाने का प्रयास करता ही । लेकिन पहले ही दौर ने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया ।
अप्रैल 14, 2012
बदला बदला सा रेडियो !
रात रेडियो सुन रहा था....रेडियो क्या एफएम सुन रहा था । आज लगता है कि हम जिस समय बड़े हो रहे थे लगभग उसी समय तकनीक में आ रहे बदलाव सामाजिक संबंधों को बदल रहा था । हमारे ध्यान दिए बिना इतनी बारीकी से यह चलता रहा कि इसके यहाँ आ जाने तक की भनक तक न लगी ।
उन दिनों वहाँ संयुक्त परिवार जैसा ही कुछ था नाना और उनके अन्य तीन भाइयों का परिवार सब एक ही बड़े घर में रहते थे । परिवारों में खाना भले ही अलग अलग बनता था पर एक साथ रहने से एक अपनापा था । सुबह 6.05 बजे जब आकाशवाणी से पहला समाचार प्रसारित होता तब से लेकर बीबीसी की शाम की सेवा खत्म होने तक रेडियो किसी न किसी के हाथ में जरूर रहता था और कोई भी कार्यक्रम अकेले नहीं सुना जाता था । गर्मियों की दोपहर में जब आसपास के लोग अपना काम समाप्त कर मचान पर बैठने लगते और घडियां दो बजाने लगती तब शुरु होता था रेडियो के समाचारों और उन पर साथ साथ टिप्पणियों का दौर ! और रोचक संयोग तो देखिए इसी समय आकाशवाणी पर एक के बाद एक समाचारों की श्रृंखला सी थी 2 बजे अंग्रेजी में , 2.10 पर हिंदी में और उसके बाद धीमी गति के समाचार ! काफी बाद में मीडिया एम ए में मीडिया पढ़ते हुए पता चला कि ये धीमी गति के समाचार दूरदराज के क्षेत्रों में चल रहे छोटे अखबारों तक खबरें देने के लिए दिए जाते थे जिनके पास ढेर सारे संवाददाता नहीं होते । आज इंटरनेट ने धीमी गति के समाचार की आवश्यकता ही खत्म कर दी । 2.10 का बुलेटिन काफी लोकप्रिय था ! और मजा देखिए कि लोग अपने सारे काम उस समय तक खत्म कर देते थे । जो उस समय तक नहीं आ पाते तो माना जाता था कि उन्हें देर हो गई ।
शाम में जब बीबीसी के समय तक लोग अपना खाना पीना निबटाकर बैठ जाते थे । मामाजी उस समय बताते थे कि इंदिरा गाँधी के मरने की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी । उसके बाद जब उनके बेटे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आकाशवाणी पर हर घंटे समाचार का आदेश दिया । चुनाव के समय परिणाम आने तक रेडियो ओवरटाइम करता था । उस दौरान कोई चैनल लगाने में देरी हो जाती तो कितने ही ताने सुनने पड़ते थे ।
इतने सब में एक बात और भी थी इन सारे समय में स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर थी । कभी कभी मेरी माँ पटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली'रस मंजरी' सुनती थी ।
समय इतनी तेजी से बदला आज रेडियो मोबाइल में फिट हो गया । और इतना सर्वसुलभ हो गया कि हर जेब में कम से कम एक तो आ ही गया है । आज रेडियो सुने तो जाते हैं पर नितांत व्यक्तिगत रूप से । समाचारों का स्वरूप बदल गया । समाचार की आवश्यकता भी अब उस तरह नहीं रही । इन 15-20 सालों में जो पीढ़ी सामने आई वह बुजुर्गों के तरीकों से अलहदा हो गई । आज जब गाँव जाता हूँ तो वहाँ रेडियो जैसा कुछ सुनने को नहीं मिलता । नाना और उनके भाई लोग अलग अलग घर बना कर रहने लगे । गाँव के बहुत से लोगों ने शहरों का रास्ता ले लिया । रेडियो अब दूरदराज के इलाकों में बस क्रिकेट बेचने तक का माध्यम भर रह गया है । बिजली नहीं है तो टीवी पर मैच नहीं आ सकता उतनी देर के लिए ही वहाँ अब रेडियो है ।
शहरों में रेडियो तो है पर वह खाली समय बिताने के एक उपकरण के रूप में । एफएम ने रेडियो को तो बदला पर वह व्यक्तिगत हो कर रह गया ।
उन दिनों वहाँ संयुक्त परिवार जैसा ही कुछ था नाना और उनके अन्य तीन भाइयों का परिवार सब एक ही बड़े घर में रहते थे । परिवारों में खाना भले ही अलग अलग बनता था पर एक साथ रहने से एक अपनापा था । सुबह 6.05 बजे जब आकाशवाणी से पहला समाचार प्रसारित होता तब से लेकर बीबीसी की शाम की सेवा खत्म होने तक रेडियो किसी न किसी के हाथ में जरूर रहता था और कोई भी कार्यक्रम अकेले नहीं सुना जाता था । गर्मियों की दोपहर में जब आसपास के लोग अपना काम समाप्त कर मचान पर बैठने लगते और घडियां दो बजाने लगती तब शुरु होता था रेडियो के समाचारों और उन पर साथ साथ टिप्पणियों का दौर ! और रोचक संयोग तो देखिए इसी समय आकाशवाणी पर एक के बाद एक समाचारों की श्रृंखला सी थी 2 बजे अंग्रेजी में , 2.10 पर हिंदी में और उसके बाद धीमी गति के समाचार ! काफी बाद में मीडिया एम ए में मीडिया पढ़ते हुए पता चला कि ये धीमी गति के समाचार दूरदराज के क्षेत्रों में चल रहे छोटे अखबारों तक खबरें देने के लिए दिए जाते थे जिनके पास ढेर सारे संवाददाता नहीं होते । आज इंटरनेट ने धीमी गति के समाचार की आवश्यकता ही खत्म कर दी । 2.10 का बुलेटिन काफी लोकप्रिय था ! और मजा देखिए कि लोग अपने सारे काम उस समय तक खत्म कर देते थे । जो उस समय तक नहीं आ पाते तो माना जाता था कि उन्हें देर हो गई ।
शाम में जब बीबीसी के समय तक लोग अपना खाना पीना निबटाकर बैठ जाते थे । मामाजी उस समय बताते थे कि इंदिरा गाँधी के मरने की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी । उसके बाद जब उनके बेटे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आकाशवाणी पर हर घंटे समाचार का आदेश दिया । चुनाव के समय परिणाम आने तक रेडियो ओवरटाइम करता था । उस दौरान कोई चैनल लगाने में देरी हो जाती तो कितने ही ताने सुनने पड़ते थे ।
इतने सब में एक बात और भी थी इन सारे समय में स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर थी । कभी कभी मेरी माँ पटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली'रस मंजरी' सुनती थी ।
समय इतनी तेजी से बदला आज रेडियो मोबाइल में फिट हो गया । और इतना सर्वसुलभ हो गया कि हर जेब में कम से कम एक तो आ ही गया है । आज रेडियो सुने तो जाते हैं पर नितांत व्यक्तिगत रूप से । समाचारों का स्वरूप बदल गया । समाचार की आवश्यकता भी अब उस तरह नहीं रही । इन 15-20 सालों में जो पीढ़ी सामने आई वह बुजुर्गों के तरीकों से अलहदा हो गई । आज जब गाँव जाता हूँ तो वहाँ रेडियो जैसा कुछ सुनने को नहीं मिलता । नाना और उनके भाई लोग अलग अलग घर बना कर रहने लगे । गाँव के बहुत से लोगों ने शहरों का रास्ता ले लिया । रेडियो अब दूरदराज के इलाकों में बस क्रिकेट बेचने तक का माध्यम भर रह गया है । बिजली नहीं है तो टीवी पर मैच नहीं आ सकता उतनी देर के लिए ही वहाँ अब रेडियो है ।
शहरों में रेडियो तो है पर वह खाली समय बिताने के एक उपकरण के रूप में । एफएम ने रेडियो को तो बदला पर वह व्यक्तिगत हो कर रह गया ।
अप्रैल 08, 2012
जो देना है अभी दे दो बाद में तुम अपने घर हम अपने घर ।
सुबह सुबह शोर से नींद खुल गई है । आँखें मुँह फुलाये बैठी हैं - उन्हें और सोना है । पर क्या किया जा सकता है जब नीचे इतनी आवाजें आ रही हों उसमें सोया भी तो नहीं जा सकता । ये चिल्लम-चिल्ली निगम चुनाव के उम्मीदवारों ने मजा रखी है । सुबह सुबह जब लोग नींद में ही हों तब आकर इतनी आवाजें की जाए कि बंदा उठ जाए और समझ जाए कि ये कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है । आज के दौर में हर जगह प्रतियोगिता का राज है , दूसरों से पहले स्वयं पहुँच जाने की इच्छा । विज्ञापन की दुनिया की तरह नये से नया तरीका ढूँढना इस समय की पहचान ! चुनाव है तो इसमें भी यही । आज मतदाता को जरूर महसूस हो गया होगा कि वह महाभारत के उस दृश्य में जी रहा है जहाँ वह गहरी नींद में सो रहा है और युधिष्ठिर - दुर्योधन उसके नींद से बाहर आने का इंतजार कर रहे हैं । एक बार को बड़ा अच्छा लगता है सोचना कि मतदाता इतना महत्वपूर्ण तो है ही कि उसके लिए इस तरह से किया जा रहा है । पर क्या यह ऐसा है ? इस व्यस्त से समय में मुश्किल से अपनी नींद के लिए अवकाश निकाल पाता है और उसके नितांत व्यक्तिगत पलों में उसे व्यक्तिगत नहीं रहने देने की कवायद की जाती है । बहरहाल नींद तो गई तेल लेने । मैंने गैलरी में जाकर देखा तो बड़ा ताज्जुब हुआ कि एक साथ इतने सारे बच्चे हाथों में खास पार्टी का चुनाव चिन्ह ले कर आगे आगे नारे लगाते चल रहे हैं । वे बच्चे किसी भी तरह से इस मोहल्ले के नहीं लग रहे हैं । प्रत्याशी के और उनके रिश्तेदारों के बच्चे हों इसकी संभावना तो प्रत्याशी को देखकर नहीं लगती । कम से कम जो काला चश्मा मैडम चढ़ा रखा है उसे देखकर तो पक्का कहा जा सकता है कि ये बच्चे उनके और उनके रिश्तेदारों के नहीं हैं । मैं नहीं जानता कि ये बच्चे कहाँ के हैं पर इसी तरह के बच्चों को कई बार विश्वविद्यालय मेट्रो पर दो दो रुपए माँगते देखा है ।
अभी परसोँ दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास घूम रहा था तो देखा लगभग सौ की संख्या में महिलाएँ किसी खास पार्टी के पर्चे बाँट रही थी । एक ही प्रकार के आर्थिक परिवेश की झलक उन स्त्रियों से क्यों आ रही थी , जिस इलाके में मैं घूम रहा था वहाँ इस आर्थिक समूह की स्त्रियाँ रहती ही नहीं है और जब मैं बस से यमुनापार आता हूँ तो वो प्रचार करने वाली स्त्रियों की तरह ही दिखने वाली स्त्रियाँ इस तरह की बातें कि 'आज यहाँ गए वहाँ गए ' '250 रुपए कम दे रहे हैं ' ' कितना भी खर्च कर ले जीतेगा नहीं' क्यों करती नजर आती हैं ये समझ पाना बहुत कठिन नहीं है ।
कल शाम बाल बनवा रहा था और वहीं पास में एक चुनावी सभा हो रही थी जिसमें स्थानीय विधायक भी उपस्थित थे । उन्होंने तमाम सूचना दी कि फलाँ दल के प्रत्याशी ने जब से पर्चा दाखिल कराया है तब से आफिस में दिन रात खुल्ला खाना दे रहे हैं , वो वाला शराब बाँट रहा है और ये निर्दलीय नोट ! जब उन लोगों की चुनावी सभा खत्म हुई तो उद्घोषक ने वहाँ बैठे लोगों से अनुरोध किया कि वे थोड़ी देर और बैठें उनके लिए नाश्ते की व्यवस्था की गई है ।
देश की चुनावी राजनीति, देश की दशा से बहुत आगे चली गयी है । अब यह मतदाता और नेता दोनों ही स्तरों पर माना जा चुका है कि इस गरीबी या महँगाई या कि सड़क आदि का इलाज किसी के पास नहीं है । ऐसी स्थिति में दोनों ही एक ने तरह के संबंध में बँध रहे हैं और यह है तात्कालिक और व्यक्तिगत फायदे का संबंध । जो देना है अभी दे दो बाद का झंझट ही क्यों पालें ! इस बीच एक नए तरह का वर्ग भी उभरा है जो चुनाव प्रचार के लिए एक तरह से 'स्किल्ड लेबर' का काम कर रहा है । ये दिखने में भले ही लुंजपुंज , गंदे दिखते हों पर इनमें एक प्रोफेशनल के गुण भरे पड़े हैं एक बार यदि पैसा लिया तो उसकी पूरी कीमत भर काम करते हैं । यह स्थिति भी एक तरह से लोकतंत्र के हित में ही है । पैसे का किसी रूप में सही नीचे की ओर प्रवाह हो तो रहा है । पहले जहाँ दूर दराज से ऐसे लोगों को चुनाव -प्रचार के लिए केवल 'पेट-भात' पर पकड़ लाया जाता था उससे तो स्थिति बदली है ।
अभी परसोँ दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास घूम रहा था तो देखा लगभग सौ की संख्या में महिलाएँ किसी खास पार्टी के पर्चे बाँट रही थी । एक ही प्रकार के आर्थिक परिवेश की झलक उन स्त्रियों से क्यों आ रही थी , जिस इलाके में मैं घूम रहा था वहाँ इस आर्थिक समूह की स्त्रियाँ रहती ही नहीं है और जब मैं बस से यमुनापार आता हूँ तो वो प्रचार करने वाली स्त्रियों की तरह ही दिखने वाली स्त्रियाँ इस तरह की बातें कि 'आज यहाँ गए वहाँ गए ' '250 रुपए कम दे रहे हैं ' ' कितना भी खर्च कर ले जीतेगा नहीं' क्यों करती नजर आती हैं ये समझ पाना बहुत कठिन नहीं है ।
कल शाम बाल बनवा रहा था और वहीं पास में एक चुनावी सभा हो रही थी जिसमें स्थानीय विधायक भी उपस्थित थे । उन्होंने तमाम सूचना दी कि फलाँ दल के प्रत्याशी ने जब से पर्चा दाखिल कराया है तब से आफिस में दिन रात खुल्ला खाना दे रहे हैं , वो वाला शराब बाँट रहा है और ये निर्दलीय नोट ! जब उन लोगों की चुनावी सभा खत्म हुई तो उद्घोषक ने वहाँ बैठे लोगों से अनुरोध किया कि वे थोड़ी देर और बैठें उनके लिए नाश्ते की व्यवस्था की गई है ।
देश की चुनावी राजनीति, देश की दशा से बहुत आगे चली गयी है । अब यह मतदाता और नेता दोनों ही स्तरों पर माना जा चुका है कि इस गरीबी या महँगाई या कि सड़क आदि का इलाज किसी के पास नहीं है । ऐसी स्थिति में दोनों ही एक ने तरह के संबंध में बँध रहे हैं और यह है तात्कालिक और व्यक्तिगत फायदे का संबंध । जो देना है अभी दे दो बाद का झंझट ही क्यों पालें ! इस बीच एक नए तरह का वर्ग भी उभरा है जो चुनाव प्रचार के लिए एक तरह से 'स्किल्ड लेबर' का काम कर रहा है । ये दिखने में भले ही लुंजपुंज , गंदे दिखते हों पर इनमें एक प्रोफेशनल के गुण भरे पड़े हैं एक बार यदि पैसा लिया तो उसकी पूरी कीमत भर काम करते हैं । यह स्थिति भी एक तरह से लोकतंत्र के हित में ही है । पैसे का किसी रूप में सही नीचे की ओर प्रवाह हो तो रहा है । पहले जहाँ दूर दराज से ऐसे लोगों को चुनाव -प्रचार के लिए केवल 'पेट-भात' पर पकड़ लाया जाता था उससे तो स्थिति बदली है ।
अप्रैल 01, 2012
बेतरतीब यादें और उनका छूटते जाना !
जिन दिनों मैं अपने नानी के यहाँ रहता था उन दिनों उतने बड़े गाँव में शहतूत का एक ही पेड़ था । फागुन के खत्म होते ही लंबी और मोटी हवाओं में धूल के बड़े बड़े बादल यहाँ से उड़कर वहाँ जाते रहते थे । सुबह में हल्की सर्दी लगती थी पर 'टाभ नींबू' और सड़क के कात की 'भैंठ' की झाडी से उठती खुशबूओं के लिए सबेरे ही उठ जाना बड़ा ही आकर्षक हो जाता था ! पिताजी ऐसी ही सुबहों में कहते : प्रभाते भ्रमणं पथ्यम । मुझे लगता है उन्हें भी इस मौसम के अलावा बाद की सुबहें शायद नहीं लुभाती इसीलिए बाद के दिनों में कभी ऐसा नहीं कहा ।
बहरहाल उस नानी गाँव वाले शहतूत पर जाने से पहले एक बात और । उन धूल भरे दिनों में सबसे ज्यादा डर अगलगी का होता था । बहुत कम ऐसी शामें होती जिसमें ये खबर न आती की अमुक गाँव में आग लग गई ढेर सारे घर जल गए । सबसे ज्यादा दुख उन मवेशियों के लिए होता जो बँधे बँधे ही जल जाते थे !
फिर जिनके मवेशी इस तरह मर जाते थे उन्हें 'वध' लग जाता था । वे लंबे समय तक प्रतीक रूप में गले में एक रस्सी बाँध लेते और मौन रहते थे । हमारे इलाके में 'बध लगना' आज भी एक मुहावरे के तौर पर इस अर्थ में प्रयुक्त होता है जब किसी को कोई भारी दुख लग जाए और उससे वह अवाक़ हो जाए ! पशुपालक समाज में मवेशी कमाऊ सदस्य होते हैं उनके जाने का दुख उतना ही गहरा जितना घर के किसी मनुष्य का !!
उस शहतूत पर बच्चे क्या बड़े बड़े भी लगे रहते । उन फलों के पकने का इंतजार और ऐसा होने देने का धैर्य किसे था ! उन हरे हरे खट्टे फलों में ही सारा स्वाद था और यदि किसी को ज्यादा हाथ लग गए तो उसके घर शहतूत की चटनी ! बेचारा शहतूत लाठी पत्थर और पता नहीं क्या क्या झेलना सीख चुका था ।
और रही सही कसर उस पर चढ़ने वाले निकाल देते । शहतूत के खतम हो जाने के बाद ऐसा लगता जैसे दूसरी बार उस पेड़ पर पतझड आ गया हो ! तब उसकी ओर कोई मुँह भी नहीं करता । छूछा पेड़ -हुंह !!
आज दिल्ली में जहाँ भी जाईये शहतूत ही शहतूत नजर आते हैं । पक पक कर जमीन पर गिरते और अपना दाग छोड़ते शहतूत ! यहाँ ये जितने फलते हैं उसका एक प्रतिशत भी लोग खा लें बहुत है । दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में तो छोटे बच्चों को पेड़ से शहतूत 'चुनते' देखा पर अन्यत्र नहीं । एम के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय की लाइब्रेरी के भीतर लॉन में जो शहतूत का पेड़ था उसकी डालियां फल लगने से काफी नीचे तक झुक जाती थी । मैं और नंदू जबतक फल रहते तबतक बिला नागा जरूर खाते थे । वह पेड़ आज भी वहीं है अलबत्ता उसकी डालियों को जरूर पांग कर छोटा कर दिया है जिससे जो फल पहले हाथ से ही पकड़ में आ जाते वे अब कई मीटर उपर हो गए हैं । नंदू कब का दिल्ली छोड़ चुका है अभी उसने फोन कर बताया था कि उसकी शादी तय हो गयी है । उसने उस दिन एक और बात कही कि हम न के बराबर बात कर पाते हैं फिर भी हमारे बीच दोस्ती वही पुरानी है । तब लगा कि गला फाड़ के रोऊं कि जब हम मिलते थे तो कभी ये नहीं सोचा कि यह सब खत्म हो जाएगा, हम सब की राहें इस कदर अलग होंगी ! नंदू क्या बहुत सारे मेरे दोस्त और मैं आज इसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ शहतूत से हाथ की दूरी बढ़ती ही जा रही है ।
मेरे नानी के गाँव वाला शहतूत नहीं रहा और नहीं रहे भरी धूप में वहाँ जाने से रोकने वाले लोग ! दिल्ली में शहतूत का वह पेड़ तो है ही और दूसरे भी हैं पर फल हाथों की पहुँच से दूर होते जा रहे हैं ।
नंदू की शादी उन पुराने दिनों में खुशी देती थी पर अब वह दोस्ती के दायरे से हम दोनों की अंतिम विदाई जैसी लगती है ।
ये मौसम है कि हर बार आएगा और शहतूत में फल हर साल लगेंगे और दोस्तों से मिलने की तडप हर बार उठेगी !!
बहरहाल उस नानी गाँव वाले शहतूत पर जाने से पहले एक बात और । उन धूल भरे दिनों में सबसे ज्यादा डर अगलगी का होता था । बहुत कम ऐसी शामें होती जिसमें ये खबर न आती की अमुक गाँव में आग लग गई ढेर सारे घर जल गए । सबसे ज्यादा दुख उन मवेशियों के लिए होता जो बँधे बँधे ही जल जाते थे !
फिर जिनके मवेशी इस तरह मर जाते थे उन्हें 'वध' लग जाता था । वे लंबे समय तक प्रतीक रूप में गले में एक रस्सी बाँध लेते और मौन रहते थे । हमारे इलाके में 'बध लगना' आज भी एक मुहावरे के तौर पर इस अर्थ में प्रयुक्त होता है जब किसी को कोई भारी दुख लग जाए और उससे वह अवाक़ हो जाए ! पशुपालक समाज में मवेशी कमाऊ सदस्य होते हैं उनके जाने का दुख उतना ही गहरा जितना घर के किसी मनुष्य का !!
उस शहतूत पर बच्चे क्या बड़े बड़े भी लगे रहते । उन फलों के पकने का इंतजार और ऐसा होने देने का धैर्य किसे था ! उन हरे हरे खट्टे फलों में ही सारा स्वाद था और यदि किसी को ज्यादा हाथ लग गए तो उसके घर शहतूत की चटनी ! बेचारा शहतूत लाठी पत्थर और पता नहीं क्या क्या झेलना सीख चुका था ।
और रही सही कसर उस पर चढ़ने वाले निकाल देते । शहतूत के खतम हो जाने के बाद ऐसा लगता जैसे दूसरी बार उस पेड़ पर पतझड आ गया हो ! तब उसकी ओर कोई मुँह भी नहीं करता । छूछा पेड़ -हुंह !!
आज दिल्ली में जहाँ भी जाईये शहतूत ही शहतूत नजर आते हैं । पक पक कर जमीन पर गिरते और अपना दाग छोड़ते शहतूत ! यहाँ ये जितने फलते हैं उसका एक प्रतिशत भी लोग खा लें बहुत है । दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में तो छोटे बच्चों को पेड़ से शहतूत 'चुनते' देखा पर अन्यत्र नहीं । एम के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय की लाइब्रेरी के भीतर लॉन में जो शहतूत का पेड़ था उसकी डालियां फल लगने से काफी नीचे तक झुक जाती थी । मैं और नंदू जबतक फल रहते तबतक बिला नागा जरूर खाते थे । वह पेड़ आज भी वहीं है अलबत्ता उसकी डालियों को जरूर पांग कर छोटा कर दिया है जिससे जो फल पहले हाथ से ही पकड़ में आ जाते वे अब कई मीटर उपर हो गए हैं । नंदू कब का दिल्ली छोड़ चुका है अभी उसने फोन कर बताया था कि उसकी शादी तय हो गयी है । उसने उस दिन एक और बात कही कि हम न के बराबर बात कर पाते हैं फिर भी हमारे बीच दोस्ती वही पुरानी है । तब लगा कि गला फाड़ के रोऊं कि जब हम मिलते थे तो कभी ये नहीं सोचा कि यह सब खत्म हो जाएगा, हम सब की राहें इस कदर अलग होंगी ! नंदू क्या बहुत सारे मेरे दोस्त और मैं आज इसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ शहतूत से हाथ की दूरी बढ़ती ही जा रही है ।
मेरे नानी के गाँव वाला शहतूत नहीं रहा और नहीं रहे भरी धूप में वहाँ जाने से रोकने वाले लोग ! दिल्ली में शहतूत का वह पेड़ तो है ही और दूसरे भी हैं पर फल हाथों की पहुँच से दूर होते जा रहे हैं ।
नंदू की शादी उन पुराने दिनों में खुशी देती थी पर अब वह दोस्ती के दायरे से हम दोनों की अंतिम विदाई जैसी लगती है ।
ये मौसम है कि हर बार आएगा और शहतूत में फल हर साल लगेंगे और दोस्तों से मिलने की तडप हर बार उठेगी !!
फ़रवरी 20, 2012
मांसाहारी चूना
आज तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर कहीं पढ़ रहा था । पढ़ते हुए लगा कि यदि आपके पास विकल्प हों और उनमें से चयन की स्वतंत्रता हो तब आप उसके विषय में विचार - विमर्श करने की दशा में होते हैं । यदि ऐसा नहीं है तो जो भी उपलब्ध है फिर उसके गुण-दोषों की ओर ध्यान देने की जरूरत भी महसूस नहीं होती ।
इस बार मैं अपने नाना जी से मिला तो मुझे बातों बातों में ही पता चला कि बहुत समय पहले चूने का उत्पादन घोंघा के खोल को जला कर किया जाता था । तब मकानों के निर्माण में जिस चूने का प्रयोग होता था उसके लिए मुसहर जाति की स्त्रियाँ नदियों , तालाबों और चौरों से बड़े पैमाने पर घोंघा पकडती थी । फिर उनके मांसल भाग को अलग कर बड़े -बड़े बर्तनों में भर कर बेचने निकल जाती थी । सस्ते मांस के रूप में यह काफी लोकप्रिय था । (आज की संचार क्रांति और तकनीकी युग में घोंघा का मांस एक सस्ते मांसाहार का विकल्प ग्रामीण क्षेत्र में दे रहा है । ) वे स्त्रियाँ शाम को लौटकर घोंघा के खोल को जलाती थी और जलकर वह सफेद पाउडर में बदल जाता फिर उस जमाने में मकान बनाने के लिए व रंगाई-पुताई के लोग उसे चूने की तरह इस्तेमाल करते । इससे उन स्त्रियों की दोहरी आमदनी होती थी । घोंघा से प्राप्त चूना उसके मांस की तुलना में बहुत महँगे बिकता था ।
चूने का प्रयोग तब भी और आज भी पान एवं तम्बाकू के सेवन में किया जाता है । जबतक चूना-पत्थर से प्राप्त चूना उस बाजार में नहीं पहुँचा था तबतक उसी घोंघा के खोल को जलाकर प्राप्त किए गए चूने का ही प्रयोग लोग पान और तम्बाकू मे करते थे । लेकिन जैसे ही उनके सामने पत्थर वाले चूने का विकल्प आया वैसे उन्होंने पुराने प्रकार के चूने को त्याग दिया । इसके पीछे कारण यह बताया गया कि वह मांसाहारी चूना है और मुँह लगाना पाप है । फिर मकानों के निर्माण से भी धीरे धीरे वह दूर हो गया ।
यदि कल्पना की जाए तो कुछ संकेत तो अवश्य मिलते हैं कि हो न हो पत्थर वाले चूने की खपत बढ़ाने के लिए यह मांसाहार वाला पत्ता फेंका गया हो । मुसहर स्त्रियों के रोजगार का एक बड़ा साधन समाप्त हो गया । बड़ी पूँजी ने उन्हें बाजार से अपदस्थ कर दिया ।
समाज में लोगों के पास दो प्रकार के चूने का आ गया अब वे चयन कर सकते थे । इतना ही नहीं लोग अब चूने जैसी चीज तक को शाकाहार और मांसाहार जैसे द्वितीय स्तर के चिंतन में ला सकते थे । अन्यथा ये विचार तो पहले भी थे ।
अब गाँवों से घोंघा के मांस के साथ साथ केंकडे , छोटी मछलियाँ आदि के स्वाद गायब हो गये और गायब हो गया भूमिहीन लोगों की आमदनी का एक साधन । आज वहाँ भी स्वाद का मानकीकरण हो गया है । वहाँ की मछलियों का भी वही स्वाद है जो चेन्नई का है । और इसके साथ ही अपना रोजगार बदलकर ठेकेदारी और पलायन में फँस गया ।
इस बार मैं अपने नाना जी से मिला तो मुझे बातों बातों में ही पता चला कि बहुत समय पहले चूने का उत्पादन घोंघा के खोल को जला कर किया जाता था । तब मकानों के निर्माण में जिस चूने का प्रयोग होता था उसके लिए मुसहर जाति की स्त्रियाँ नदियों , तालाबों और चौरों से बड़े पैमाने पर घोंघा पकडती थी । फिर उनके मांसल भाग को अलग कर बड़े -बड़े बर्तनों में भर कर बेचने निकल जाती थी । सस्ते मांस के रूप में यह काफी लोकप्रिय था । (आज की संचार क्रांति और तकनीकी युग में घोंघा का मांस एक सस्ते मांसाहार का विकल्प ग्रामीण क्षेत्र में दे रहा है । ) वे स्त्रियाँ शाम को लौटकर घोंघा के खोल को जलाती थी और जलकर वह सफेद पाउडर में बदल जाता फिर उस जमाने में मकान बनाने के लिए व रंगाई-पुताई के लोग उसे चूने की तरह इस्तेमाल करते । इससे उन स्त्रियों की दोहरी आमदनी होती थी । घोंघा से प्राप्त चूना उसके मांस की तुलना में बहुत महँगे बिकता था ।
चूने का प्रयोग तब भी और आज भी पान एवं तम्बाकू के सेवन में किया जाता है । जबतक चूना-पत्थर से प्राप्त चूना उस बाजार में नहीं पहुँचा था तबतक उसी घोंघा के खोल को जलाकर प्राप्त किए गए चूने का ही प्रयोग लोग पान और तम्बाकू मे करते थे । लेकिन जैसे ही उनके सामने पत्थर वाले चूने का विकल्प आया वैसे उन्होंने पुराने प्रकार के चूने को त्याग दिया । इसके पीछे कारण यह बताया गया कि वह मांसाहारी चूना है और मुँह लगाना पाप है । फिर मकानों के निर्माण से भी धीरे धीरे वह दूर हो गया ।
यदि कल्पना की जाए तो कुछ संकेत तो अवश्य मिलते हैं कि हो न हो पत्थर वाले चूने की खपत बढ़ाने के लिए यह मांसाहार वाला पत्ता फेंका गया हो । मुसहर स्त्रियों के रोजगार का एक बड़ा साधन समाप्त हो गया । बड़ी पूँजी ने उन्हें बाजार से अपदस्थ कर दिया ।
समाज में लोगों के पास दो प्रकार के चूने का आ गया अब वे चयन कर सकते थे । इतना ही नहीं लोग अब चूने जैसी चीज तक को शाकाहार और मांसाहार जैसे द्वितीय स्तर के चिंतन में ला सकते थे । अन्यथा ये विचार तो पहले भी थे ।
अब गाँवों से घोंघा के मांस के साथ साथ केंकडे , छोटी मछलियाँ आदि के स्वाद गायब हो गये और गायब हो गया भूमिहीन लोगों की आमदनी का एक साधन । आज वहाँ भी स्वाद का मानकीकरण हो गया है । वहाँ की मछलियों का भी वही स्वाद है जो चेन्नई का है । और इसके साथ ही अपना रोजगार बदलकर ठेकेदारी और पलायन में फँस गया ।
फ़रवरी 09, 2012
गाना , लड़की और भारत में प्रेम
खिली धूप , तेज हवा और लौटती सर्दी की खूबसूरती है इस फरवरी में ! सर्दी के कपड़ों के बीच रंग दिखने लगे हैं और धूप में कुछ समय के बाद महसूस होने लगा है पसीना । कोई आश्चर्य नहीं कि प्रेम के इतने सारे उत्सवों के लिए यही समय मुफीद है । फूलों के खुले-खिले चेहरे हर तरफ अपने जैसा ही वातावरण बना रहे हैं । लोग मुस्कुराहट के साथ मिल रहे हैं और इस धूपिया खुशी के कारण कोई नहीं जानना चाह रहा है । वेलेंटाइन वाले सप्ताह का मध्य चल रहा है इसकी धमक हर जगह दिखाई दे रही है ।
हमारे एक सीनियर विश्वविद्यालय कैंपस उस समय आते हैं जब अधिकांश लोग चले गये होते हैं और कुछ जा रहे होते हैं । लोगों के जाने और उनके आने में वह संबंध नहीं है जो लोगों के जाने के समय और उनके आने के समय में है । यह समय शाम का होता है जब कैंपस में बहुत कम लोग होते हैं जिनमें से कुछ लाइब्रेरी में पढ़ने वाले और बाकी अँधेरे और एकांत तलाशने वाले होते हैं । लोग कहते हैं हमारे वे सीनियर कभी अपने लिए कैंपस में अँधेरा और एकांत नहीं तलाश पाए और अभी तक उनकी शादी भी नहीं हो पायी है । इस दशा में उनका देर से कैंपस आना किसी और प्रयोजन के लिए होता है । वे उन अँधेरों और एकांतोँ में जाते हैं और वहाँ के कार्यकलापों को महसूस करते हैं । इसे एक मानसिक विकार के तौर पर देखा जा सकता है और ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं । अंग्रेजी विभाग की हमारी एक मित्र बता रही थी कि वे लोग एक खास शिक्षक के रास्ते में नहीं पडना चाहते क्योंकि ' ही इज अ बिग टाइम ठरकी ' ।
आज बस में आ रहा था । भीड़ भरी बस में अब लड़कियाँ भी खूब चलती हैँ । सीट पर बैठे लोग सीट नहीं देते बल्कि पास बिठाने की बात करते हैं और लड़कियाँ दो सीट के बीच की जगह में खड़ी हो जाती हैं । जिस ओर महिलाएँ हैं बस की भीड़ उधर ही केंद्रित हो जाती है । विश्वविद्यालय आने से पहले कुछ लोग बस के गेट की ओर आ जाते हैं और वहाँ ऐसी भीड़ हो जाती है कि कोई भी बहुत आसानी से नहीं निकल पाए । ऐसे में जब वहाँ से लड़कियाँ निकलती हैं तो उनका 'कुछ न कुछ' किसी न किसी से चिपक कर जरूर गुजरता है । और काम पर जाते हुए लोगों (इसमें हर उम्र के लोग होते हैं ) के लिए यह बस में चढ़ने का एक आवश्यक आनंद है और वे इसे अपना अधिकार मानते हैं । आज एक लड़का अपने फोन में गाने बजा रहा था । कैंपस आने से पहले लोग भीड़ पार कर के बस के दरवाजे की ओ आ लगे , लड़कियाँ भी । उस समय 'उ ला ला ' बज रहा था । लड़कों के बीच से एक लड़कियाँ गुजर रही थी वे जोर जोर से गाने लगे ' छेड़ेंगे हम तुमको लड़की तू है बड़ी...' । किसी ने प्रतिवाद किया तो एक लड़के ने कहा ' गाने में ऐसा लिखा है हम अपनी ओर से तो कुछ नहीं कह रहे ' ! इसका जवाब किसी के पास नही था ।
इस माहौल में अपने देश की परिस्थिति में वेलेंटाइन डे की उपस्थिति को देखने की जरूरत महसूस होती है । इसके विरोध में हम कितना भी कह लें पर देश में प्रेम के स्वरूप और उस की स्थिति पर बात करने व इसे समझने का मौका इसने जरूर दिया है ।
कहते हैं प्राचीन काल में मदनोत्सव, रास, महारास आदि होते थे लेकिन यह मुझे किस्से कहानियाँ और कोरे गप्प से ज्यादा कुछ नहीं लगता । ऐसा मानने का कारण यह है कि लोक में इसके कोई प्रमाण आज नहीं दिखते जबकि पूजा-पाठ , जाति-धर्म , और छोटी छोटी रूढ़ियों को हम आज तक प्रमाण के रूप में उपस्थित पाते हैं ।
भारतीय समाज में प्रेम की सहज उपस्थिति के प्रमाण नहीं हैं और यदि कहीं ऐसा होता पाया जाता है तो उसे पाश्चात्य प्रभाव के रूप में देखा जाता है । उपर के दो उदाहरण समाज में व्याप्त यौन कुंठा की ओर संकेत करते हैं । यहाँ प्रेम सहज रूप से करने की चीज नहीं मानी जाती तभी इस पर तमाम वर्जनाएं हैं । खाप , जाति आदि के बंधन को भी इससे जोड़ने की आवश्यकता है । इतिहास में यदि प्रेम सहज रूप में स्वीकृत होता तो कृष्ण - गोपियों जैसे और उदाहरण होते साथ ही राम और सीता विवाह से पहले बस दूर से ही एक दूसरे को देखते नहीं और उनके विवाह को इतने नाटकीय रूप से दिखाया नहीं जाता ।
इस स्थिति में वेलेंटाइन डे और इसके अन्य 'डे' हमें कम से कम प्रेम को सहज रूप में देखने के लिए प्रेरित तो करते हैं । भारत में भले ही यह बाजार के रास्ते आया हो और बाजार के स्तर पर इसे स्वीकार किया भी नहीं जा सकता पर भारत में प्रेम को नये से परिभाषित करने की आवश्यकता के बीच इसकी भी भूमिका है ।
हमारे एक सीनियर विश्वविद्यालय कैंपस उस समय आते हैं जब अधिकांश लोग चले गये होते हैं और कुछ जा रहे होते हैं । लोगों के जाने और उनके आने में वह संबंध नहीं है जो लोगों के जाने के समय और उनके आने के समय में है । यह समय शाम का होता है जब कैंपस में बहुत कम लोग होते हैं जिनमें से कुछ लाइब्रेरी में पढ़ने वाले और बाकी अँधेरे और एकांत तलाशने वाले होते हैं । लोग कहते हैं हमारे वे सीनियर कभी अपने लिए कैंपस में अँधेरा और एकांत नहीं तलाश पाए और अभी तक उनकी शादी भी नहीं हो पायी है । इस दशा में उनका देर से कैंपस आना किसी और प्रयोजन के लिए होता है । वे उन अँधेरों और एकांतोँ में जाते हैं और वहाँ के कार्यकलापों को महसूस करते हैं । इसे एक मानसिक विकार के तौर पर देखा जा सकता है और ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं । अंग्रेजी विभाग की हमारी एक मित्र बता रही थी कि वे लोग एक खास शिक्षक के रास्ते में नहीं पडना चाहते क्योंकि ' ही इज अ बिग टाइम ठरकी ' ।
आज बस में आ रहा था । भीड़ भरी बस में अब लड़कियाँ भी खूब चलती हैँ । सीट पर बैठे लोग सीट नहीं देते बल्कि पास बिठाने की बात करते हैं और लड़कियाँ दो सीट के बीच की जगह में खड़ी हो जाती हैं । जिस ओर महिलाएँ हैं बस की भीड़ उधर ही केंद्रित हो जाती है । विश्वविद्यालय आने से पहले कुछ लोग बस के गेट की ओर आ जाते हैं और वहाँ ऐसी भीड़ हो जाती है कि कोई भी बहुत आसानी से नहीं निकल पाए । ऐसे में जब वहाँ से लड़कियाँ निकलती हैं तो उनका 'कुछ न कुछ' किसी न किसी से चिपक कर जरूर गुजरता है । और काम पर जाते हुए लोगों (इसमें हर उम्र के लोग होते हैं ) के लिए यह बस में चढ़ने का एक आवश्यक आनंद है और वे इसे अपना अधिकार मानते हैं । आज एक लड़का अपने फोन में गाने बजा रहा था । कैंपस आने से पहले लोग भीड़ पार कर के बस के दरवाजे की ओ आ लगे , लड़कियाँ भी । उस समय 'उ ला ला ' बज रहा था । लड़कों के बीच से एक लड़कियाँ गुजर रही थी वे जोर जोर से गाने लगे ' छेड़ेंगे हम तुमको लड़की तू है बड़ी...' । किसी ने प्रतिवाद किया तो एक लड़के ने कहा ' गाने में ऐसा लिखा है हम अपनी ओर से तो कुछ नहीं कह रहे ' ! इसका जवाब किसी के पास नही था ।
इस माहौल में अपने देश की परिस्थिति में वेलेंटाइन डे की उपस्थिति को देखने की जरूरत महसूस होती है । इसके विरोध में हम कितना भी कह लें पर देश में प्रेम के स्वरूप और उस की स्थिति पर बात करने व इसे समझने का मौका इसने जरूर दिया है ।
कहते हैं प्राचीन काल में मदनोत्सव, रास, महारास आदि होते थे लेकिन यह मुझे किस्से कहानियाँ और कोरे गप्प से ज्यादा कुछ नहीं लगता । ऐसा मानने का कारण यह है कि लोक में इसके कोई प्रमाण आज नहीं दिखते जबकि पूजा-पाठ , जाति-धर्म , और छोटी छोटी रूढ़ियों को हम आज तक प्रमाण के रूप में उपस्थित पाते हैं ।
भारतीय समाज में प्रेम की सहज उपस्थिति के प्रमाण नहीं हैं और यदि कहीं ऐसा होता पाया जाता है तो उसे पाश्चात्य प्रभाव के रूप में देखा जाता है । उपर के दो उदाहरण समाज में व्याप्त यौन कुंठा की ओर संकेत करते हैं । यहाँ प्रेम सहज रूप से करने की चीज नहीं मानी जाती तभी इस पर तमाम वर्जनाएं हैं । खाप , जाति आदि के बंधन को भी इससे जोड़ने की आवश्यकता है । इतिहास में यदि प्रेम सहज रूप में स्वीकृत होता तो कृष्ण - गोपियों जैसे और उदाहरण होते साथ ही राम और सीता विवाह से पहले बस दूर से ही एक दूसरे को देखते नहीं और उनके विवाह को इतने नाटकीय रूप से दिखाया नहीं जाता ।
इस स्थिति में वेलेंटाइन डे और इसके अन्य 'डे' हमें कम से कम प्रेम को सहज रूप में देखने के लिए प्रेरित तो करते हैं । भारत में भले ही यह बाजार के रास्ते आया हो और बाजार के स्तर पर इसे स्वीकार किया भी नहीं जा सकता पर भारत में प्रेम को नये से परिभाषित करने की आवश्यकता के बीच इसकी भी भूमिका है ।
फ़रवरी 02, 2012
पराये, तेरे कूचे से बाहर !
कहने को बहुत कुछ है पर किस तरह कहूँ कि छिपा भी दूँ तेरी नादनी को ........!
उस काम को करने की दिली इच्छा थी , ऐसी कि उसके लिए कुछ भी । कुछ भी मतलब कुछ भी ! मन में था और मौका इतनी आसानी से मिलेगा ये सोचा भी नहीं था । आसानी क्या, बाध्यता थी कि उस व्यवस्था में रहना है तो वैसा करना ही पड़ेगा । सोचिये कि जो आप करना चाहें और आपको वही करने के लिए अवसर भी दिए जाएँ तो कितना ही मजा हो । और जब आप आंतरिक रूप से अभिप्रेरित हों तो काम को करने का उत्साह अलग ही होता है । फिर भले ही आप किसी समूह का हिस्सा भी हों तो बार बार आगे बढ़ कर काम करने का ही मन करता है कोई करे न करे आए न आए कोई परवाह नहीं । ये बेफिक्री ही आपको आगे ले जाती है और इसी से आप एक सामान्य दायरे से हट जाते हैं ।
और मामला तब फँसता है जब बेफिक्री से आपके आसपास समस्या पैदा होने लगती है । यहाँ तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि उसको धारण करने की क्षमता समूह में आपकी हैसियत तय करने लगती है । आपके पास यदि अपेक्षित उपकरण नहीं है तो आप वे तमाम शऊर जो उस कार्य के लिए अपेक्षित हैं, रखकर भी नाकारे हैं और जिसके पास वो खरीदी हुई तकनीकी हो वो नासमझ भी हो तो भी किसी भी समूह में पूज्य है । हालाँकि इसमें कुछ भी नया नहीं है पर इसे एक उदाहरण द्वारा और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है जैसे आप किसी समूह में होँ और आपको कोई फिल्म बनानी हो और आप दृश्य को पकड़ने की बारीक नजर भी रखते हों इसके बावजूद पूरा समूह वही करेगा जो कैमरे वाला कहेगा । पूरी गणित पूँजी की है । जो खरीदने की क्षमता रखता है आज लीडर वही है । ऐसा नहीं होता तो इतने गो-पों पंडित नेतागिरी में न रहते(कम से कम मेरे शहर के विधायक तो पक्के तौर पर ) । बहरहाल समूह को कद्र तो सोच की नहीं बल्कि पूँजी की करनी थी सो बेचारे सोचक के लिए वहाँ कोई स्थान ही नहीं रह गया था । यह स्थिति लगातार कुछ दिनों से बनी थी लेकिन एक सोच ही थी जो बराबर अपनी किल्लाठोक उपस्थिति जता रही थी । पर वह भी स्वयं को समझाने और खुश करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं थी । अंततः जीत पूँजी की ही हुई और एक अपनी क्षमता दिखाने का अवसर जाता रहा । कहने को तो समूह छोड़ना मेरा ही था इसे भी खुद को खुश करने का एक बहाना ही मानिए ।
सामाजिक स्थिति और स्वीकृति पूँजी तय करती है और इससे लगातार आपका साबका पड़ता रहता है । बात कुछ पुरानी है पर है जेहन में उसी तरह लिखी जैसे उस समय हुई थी ।दिल्ली में लंबे समय तक तैयारी करने के बाद भी कोई सरकारी नौकरी न करने के कारण घर जाने पर मेरी स्थिति अदना सी थी वहीं आठवीं पास बीएमपी एक सम्मानित व्यक्ति हो गया था ।
काम तो मिलते रहेंगे और होते भी रहेंगे पर मेरा उस समूह से निकलना समूह के समाजशास्त्र को समझने का अवसर देता है । हम सब चाहे मानें या न मानें पर पूँजी की ही गुलामी करते हैं । आज मैंने इसे झेला है तो मैं इस तरह की बात कर रहा हूँ लेकिन कल को मैं भी ऐसा कर सकता हूँ और उस समय मेरे पास भी उसके पक्ष में तर्क होंगे । समूह एक मजबूत गठजोड़ है लेकिन उस में सत्ता जब पूँजी हथिया ले तो उसका समूहपना नष्ट होकर उसे एक विकृत रूप दे देता है जहाँ विचार , बहस और यहाँ तक कि हँसी-मजाक के लिए भी गुंजाइश नहीं बचती ।
आगे की राह पर बहुत से मकाम हैं और वहाँ ढेरों समूह पर उनमें जाने का नया भय सर उठा रहा है । ऐसी स्थिति रही तो लोग एक दूसरे से बोलना-भूंकना छोड़ देंगे । बाबा भारती को अपना घोड़ा चोरी होने का मलाल नहीं था बल्कि उस घटना के प्रकाश में आने के बाद लोग विश्वास करना छोड़ देंगे इसका दुख था ।
उस काम को करने की दिली इच्छा थी , ऐसी कि उसके लिए कुछ भी । कुछ भी मतलब कुछ भी ! मन में था और मौका इतनी आसानी से मिलेगा ये सोचा भी नहीं था । आसानी क्या, बाध्यता थी कि उस व्यवस्था में रहना है तो वैसा करना ही पड़ेगा । सोचिये कि जो आप करना चाहें और आपको वही करने के लिए अवसर भी दिए जाएँ तो कितना ही मजा हो । और जब आप आंतरिक रूप से अभिप्रेरित हों तो काम को करने का उत्साह अलग ही होता है । फिर भले ही आप किसी समूह का हिस्सा भी हों तो बार बार आगे बढ़ कर काम करने का ही मन करता है कोई करे न करे आए न आए कोई परवाह नहीं । ये बेफिक्री ही आपको आगे ले जाती है और इसी से आप एक सामान्य दायरे से हट जाते हैं ।
और मामला तब फँसता है जब बेफिक्री से आपके आसपास समस्या पैदा होने लगती है । यहाँ तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि उसको धारण करने की क्षमता समूह में आपकी हैसियत तय करने लगती है । आपके पास यदि अपेक्षित उपकरण नहीं है तो आप वे तमाम शऊर जो उस कार्य के लिए अपेक्षित हैं, रखकर भी नाकारे हैं और जिसके पास वो खरीदी हुई तकनीकी हो वो नासमझ भी हो तो भी किसी भी समूह में पूज्य है । हालाँकि इसमें कुछ भी नया नहीं है पर इसे एक उदाहरण द्वारा और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है जैसे आप किसी समूह में होँ और आपको कोई फिल्म बनानी हो और आप दृश्य को पकड़ने की बारीक नजर भी रखते हों इसके बावजूद पूरा समूह वही करेगा जो कैमरे वाला कहेगा । पूरी गणित पूँजी की है । जो खरीदने की क्षमता रखता है आज लीडर वही है । ऐसा नहीं होता तो इतने गो-पों पंडित नेतागिरी में न रहते(कम से कम मेरे शहर के विधायक तो पक्के तौर पर ) । बहरहाल समूह को कद्र तो सोच की नहीं बल्कि पूँजी की करनी थी सो बेचारे सोचक के लिए वहाँ कोई स्थान ही नहीं रह गया था । यह स्थिति लगातार कुछ दिनों से बनी थी लेकिन एक सोच ही थी जो बराबर अपनी किल्लाठोक उपस्थिति जता रही थी । पर वह भी स्वयं को समझाने और खुश करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं थी । अंततः जीत पूँजी की ही हुई और एक अपनी क्षमता दिखाने का अवसर जाता रहा । कहने को तो समूह छोड़ना मेरा ही था इसे भी खुद को खुश करने का एक बहाना ही मानिए ।
सामाजिक स्थिति और स्वीकृति पूँजी तय करती है और इससे लगातार आपका साबका पड़ता रहता है । बात कुछ पुरानी है पर है जेहन में उसी तरह लिखी जैसे उस समय हुई थी ।दिल्ली में लंबे समय तक तैयारी करने के बाद भी कोई सरकारी नौकरी न करने के कारण घर जाने पर मेरी स्थिति अदना सी थी वहीं आठवीं पास बीएमपी एक सम्मानित व्यक्ति हो गया था ।
काम तो मिलते रहेंगे और होते भी रहेंगे पर मेरा उस समूह से निकलना समूह के समाजशास्त्र को समझने का अवसर देता है । हम सब चाहे मानें या न मानें पर पूँजी की ही गुलामी करते हैं । आज मैंने इसे झेला है तो मैं इस तरह की बात कर रहा हूँ लेकिन कल को मैं भी ऐसा कर सकता हूँ और उस समय मेरे पास भी उसके पक्ष में तर्क होंगे । समूह एक मजबूत गठजोड़ है लेकिन उस में सत्ता जब पूँजी हथिया ले तो उसका समूहपना नष्ट होकर उसे एक विकृत रूप दे देता है जहाँ विचार , बहस और यहाँ तक कि हँसी-मजाक के लिए भी गुंजाइश नहीं बचती ।
आगे की राह पर बहुत से मकाम हैं और वहाँ ढेरों समूह पर उनमें जाने का नया भय सर उठा रहा है । ऐसी स्थिति रही तो लोग एक दूसरे से बोलना-भूंकना छोड़ देंगे । बाबा भारती को अपना घोड़ा चोरी होने का मलाल नहीं था बल्कि उस घटना के प्रकाश में आने के बाद लोग विश्वास करना छोड़ देंगे इसका दुख था ।
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