अक्टूबर 14, 2012
बहुत से दुखों को समेटने का दुख
कुछ चीजें घर की ऐसी होती हैं जिनका हमे इल्म तो होता है कि वो घर में हैं पर कहाँ और किस हाल में हैं ये देखने की न हिम्मत होती है और न ऐसी जहमत हम लेना चाहते है । साहित्य में तो ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनका जिक्र आ जाने पर भले ही हो जाता है पर उस से मुह फेर कर बैठना हमारी आदत में शुमार है । क्योंकि कभी कभी वह अरजनीतिक होता है और कभी कभी उसमें वो मसाला नही रहता कि उस के माध्यम से अपने को दूसरों पर थोपा जा सके या उनसे स्वयं को बीस साबित किया जा सके । हिन्दी साहित्य में शैलेश मटियानी और उनका साहित्य ऐसी ही वस्तुओं में से एक है । उनके नाम पर कोई गोष्ठी नही होते देखी और न ही कहीं किसी को उन्हें उद्धृत करते हुए सुना । विवाद उठाने के लिए भी नही (जबकि आज की हिन्दी आलोचना की विवाद प्रियता किसी से छिपी नही है ) ।
वो 2004 का वर्ष था जिसमें भारत सरकार की साहित्य केन्द्रित पत्रिका आजकल ने शैलेश मटियानी पर केन्द्रित एक अंक निकाला था । उस अंक की और कुछ विशेषता हो न हो पर वह अंक मटियानी के जीवन और साहित्य से पाठकों का परिचय करने के लिए काफी था । वो जिस तरह से माता-पिता के गुजर जाने के बाद के अपने जीवन से जूझ रहे थे और अपने भाई-बहन की ज़िम्मेदारी छोडकर मुंबई भागे थे वो उनकी आर्थिक हैसियत को बयां करने के लिए काफी है । उन्होने जो जीवन बिताया उसका एक ठीक ठाक हिस्सा भीख मांगने में , कसाई की दुकान पर कीमा कूटने में और भीख मँगवाने वाले गिरोहों के आस पास गुजरा था । ज़ाहिर है इनका असर उनके साहित्य पर पड़ता ही ।
शैलेश मटियानी का साहित्य उनके भोगे हुए यथार्थ से बिलकुल अलग नही है । वो जिन ज़िंदगियों में रहे वहाँ की हर स्याह - सफ़ेद सच्चाई बड़ी बारीकी से उनके यहाँ चित्रित हुई है । भीख मांगने और उसे मँगवाने के तमाम खटकरम उनकी बहुत सी कहानियों में आते हैं । ' दो दुखों का एक सुख ' उनकी ऐसी ही एक कहानी है जिसमें तीन भीख मांगने वाले लोग हैं - एक कोढ़ पीड़ित अधेड़ ,एक कानी युवती और एक नेत्र विहीन युवक । तीनों रेल्वे स्टेशन के पास भीख मांगते हैं । जब कानी गाती है तो नेत्रहीन युवक का मन हरा हो जाता है और कोढ़ी को उसका रूप प्रभावित करता है । कोढ़ी और युवक दोनों कानी को पाना चाहते हैं । और दोनों इसके लिए अपने अपने तिकड़म भिड़ाते हैं । कोढ़ी , नेत्रहीन युवक पर स्त्रीयों को छेड़ने का आरोप लगाता है वहीं युवक नगरपालिका द्वारा कोढ़ियों को हटाने के अभियान से खुश होता है । बाद में नेत्रहीन युवक और कानी में दोस्ती हो जाती पर उनके लिए रहने का कोई ठिकाना नही है और ठिकाना होता है कोढ़ी के पास । इनकी आवश्यकताएँ और उसका फाइदा ! इस बीच कानी गर्भवती हो जाती है और कहीं भीख मांगते हुए कोई नौटंकी कंपनी वाले उसे उठा ले जाते हैं । 10-15 दिनों बाद वे उसे छोड़ भी जाते हैं । ये दिन कोढ़ी और युवक के लिए किस कष्ट में गुजरे ये कहने की बात नही । बाद में कानी एक बच्चे को जन्म देती है । जन्म के दिन दोनों ये सोचते हैं कि बच्चा उनके जैसा कोढ़ी या नेत्रविहीन न हो ।
भीख मँगवाने का धंधा करने वालों का जिक्र उनकी कई कहानियों में आया है । एक कहानी में मटियानी जी जिक्र करते हैं कि किस प्रकार बच्चे चुराये जाते हैं , भीखमंगों के बच्चे ये धंधेबाज दो एक दिन की उम्र में ही छिन लेते हैं फिर उनके पैरों को बांध कर , दबा कर ऐसा कर दिया जाता है उनमें स्वाभाविक रू से विकृति आ जाती है ... उन्हे किसी और की गोद में डाल कर ज्यादा पैसा कमवाया जाता है ।
इन कहानियों को पढ़ के ऐसा लगता है के हम हाल में आई फिल्म स्लमडॉग ..... फिल्म का कोई दृश्य देख रहे हों पर ताज्जुब देखिये कि हमें उस फिल्म को देखते हुए कभी ये नही लगा होगा के ये तो मटियानी के साहित्य में भी है । इसके लिए पाठकों पर ज़िम्मेदारी नही डाली जा सकती क्योंकि यह तो आलोचकों के जिम्मे है । जिसने इस पूरे दौर में नवलेखन , नया - पुराना आदि के विवाद को हवा दी बस कुछ सार्थक नही ढूंढा या फिर जो है उसे पाठकों के संज्ञान तक लाने का प्रयत्न नही किया । पाठक दो-चार नयों और कुछ 'स्टार ' लेखकों को तो पढ़ पाये हैं क्योंकि उनके संबंध में खूब लिखा पढ़ा गया है । लेकिन शैलेश मटियानी जैसे लेखक आज भी अपने पाठकों से बहुत दूर हैं । आज अङ्ग्रेज़ी से नकल की गयी कहानी पर बहुत बड़ा विमर्श चल सकता है पर मटियानी जैसे साहित्यकर पर नही ।
आगे उनकी एक कहानी 'मैमुद' याद आती है । जद्दन जिसने अपने बकरे को बड़े प्यार से पाला है उसका नाम भी रखा है- मैमुद । बक़रईद पर परिवार वाले उसे काट देते हैं । बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाए इस मुहावरे के आस पास बुनी गयी एक मार्मिक कहानी है यह ।
शैलेश मटियानी जैसे लेखक यदि याद नही किए जाएंगे और उनका जिक्र साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा में नही होगा तो साहित्य के जिम्मे से बहुत सारी चीजें , हजारों संदर्भ आदि छुट जाएंगे । साहित्य केवल नए और आज के संदर्भों तक सीमित नही है बल्कि पीछे रह गए लोगों की हिस्सेदारी भी है । आगे देखते हैं क्या सब हो पता है ।
अक्टूबर 02, 2012
बिहार के अनुबंधित शिक्षकों के समर्थन में ...
किसी भी समाज में शिक्षकों का आंदोलन करना और उनका जेल जाना समाज की गतिकी को प्रभावित ही नही करता है बल्कि उस पर दूरगामी प्रभाव डालता है । वे अपना आंदोलन उस समय में से समय निकाल कर करते हैं जिसमें उन्हें कक्षा में होना चाहिए । कक्षा का समय समाज के सबसे मत्वपूर्ण हिस्से बच्चों के लिए मुकर्रर है जो उन्हें न केवल शिक्षित करता है बल्कि आगे के जीवन की तैयारी में भी भूमिका निभाता है । हालांकि इन कुछ वाक्यों में आदर्श की उपस्थिती है पर जरा उस स्थिति की कल्पना करते हैं जहां एक गैर बराबरी का समाज है और सामाजिक गतिशीलता में अपनी दशा को ठीक करने के लिए सरकार के द्वारा दी जा रही शिक्षा ही एक मात्र ऐसा कारक है जो व्यक्ति की मदद कर सकता है उस समाज में यदि शिक्षक ही कक्षा से अनुपस्थित होकर आंदोलन कर रहे हों तो वहाँ यह विचार का मुद्दा बन जाता है । बिहार का समाज ऐसा ही समाज है और वहाँ चल रहा अनुबंधित शिक्षकों का उग्र होता आंदोलन इसी बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है । इस पर गौर करें तो हम पते हैं कि इन शिक्षकों के आंदोलन की भूमिका इनकी नियुक्ति में ही निहित है ।
एक तो अनुबंध अर्थात ठेका आधारित नौकरी है जहां नौकरी में आवश्यक स्थायित्व का अभाव है जो किसी के भी आत्मविश्वास को लगातार प्रभावित करने के काफी है । यह साधारण मनोविज्ञान है कि यदि आप अस्थायी प्रकार की सेवा में हैं तो सेवा के प्रति आपकी असुरक्षा लगातार बनी रहती है और अंततः यह आपकी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है । शिक्षक के मामले में यह केवल उसी तक सीमित नही होता बल्कि आगे बढ़ कर विद्यार्थियों पर भी असर डालता है । इसका लब्बोलुआब यह कि सेवा में इस प्रकार की असुरक्षा से समाज की एक पीढ़ी प्रभावित होती है । अनुबंधित शिक्षकों पर हुए बहुत से शोध में इस बात को रेखांकित भी किया गया है । 'प्रोब रिपोर्ट' का भी मानना है कि अस्थायी प्रकार की सेवा के कारण अनुबंधित शिक्षक अपने काम के प्रति बहुत अन्यमन्स्क हो जाते हैं और इस व्यवस्था में पूरी निष्ठा से काम करने वाले शिक्षक विरले ही मिलते हैं ।
आगे वेतन का मुद्दा है जो इस असुरक्षित प्रकार की नौकरी में 'कोढ़ में खाज' जैसी दशा का निर्माण करता है । अनुबंधित शिक्षकों को 6000-8000 तक प्रति महीने वेतन मिलता है जो वेतनमान पर नियुक्त शिक्षकों की तुलना में चार गुना कम है । इतने कम पैसे में गुजारा चलाने के लिए बहुत बड़े कौशल की आवश्यकता है । इस संबंध में इस लेखक ने एक शोध किया था और उस दौरान बिहार के सहरसा जिले के कई शिक्षक - शिक्षिकाओं का साक्षात्कार किया था । उसी साक्षात्कार के कुछ अंशों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ।
1 शिक्षिका कल्याणी कहती हैं '' इतने वेतन में कैसे संतुष्ट होंगे ? मंहगाई के चलते कैसे संतुष्ट होंगे .....एतना मंहगाई में हमलोग को ई साते हज़ार (7000) वेतन मिलता है .... अभी सात हज़ार हुआ है पहले तो पाँचे था । ... तो सात में सोच लीजिये कि एतना मंहगाई में हमलोग कैसे संतुष्ट होंगे । किसी तरह काम चलता है ।''
इस सेवा में विकास की संभावना पर कल्याणी कहती हैं ''इसमें क्या विकास होगा ! इसी में समय कट जाए यही बहुत है । ''
2 शीला कुमारी कहती हैं '' वेतन कुछ संतुष्टि नही है ... जरूरी आवश्यकता की भी पूर्ति नही कर पति हूँ...
इसको हमलोग ठेका पर काम करना समझते हैं ...जिसमें सरकार हमको सात हज़ार में खरीद ली है ....''
'' इसमें कोई विकास नही है ''
3 महबूबा खातून कहती हैं '' एक तो वेतन बहुत कम है दूसरे हमारा वेतन का आधे से ज्यादा तो आने जाने में ही खर्च हो जाता है । सहरसा से यहाँ तक आने में रोज़ का 50-60 रुपया लगा जाता है । अब सोच लीजिये कि हमारे लिए क्या बचता कि खाएं और मौज करें ... ''
4 निरंजन जो सहरसा जिला शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी हैं वे कहते हैं '' इतने कम वेतन के कारण कोई इस संघ में पद धरण करने के तैयार ही नही होता है क्योंकि यदि पद लिया तो दस लोग आपसे मिलने आएंगे चाय -पान , फोन , पटना जाने आने आदि में सात - आठ हज़ार कब उड़ जाते हैं पता ही नही चलता ... मैं तो अध्यक्ष बन कर पछता रहा हूँ ...''
इस से एक अंदाज़ा आ जाता है कि शिक्षक-शोक्षिकाओं में इस सेवा में मिल रहे वेतन को लेकर कितनी संतुष्टि है और इसमें विकास की वो कितनी संभावना देखते हैं ।
आगे इसी वेतन से जुड़ा एका और पहलू है विद्यालय में शिक्षकों बीच गैर-बराबरी का । नियमित वेतनमान पर काम करने वाले शिक्षक और अनुबंधित प्रकार के शिक्षक में विद्यालय परिसर से लेकर निजी जीवन दोनों में एक स्पष्ट विभाजन है । निम्न आर्थिक हैसियत के कारण उन्हे कई बार ताने सुनने पड़ते हैं और बार बार उन्हे यह जताया जाता है कि वे नियोजित शिक्षक हैं और दूसरे नियमित वेतनमन वाले । ( इस तरह की अनेक स्थिति इस लेखक ने स्वयं अपने शोध के दौरान देखी और इस सामान्य मानव व्यवहार का अनुमान करना कोई कठिन भी नही है । )इस तरह की स्थिति नियोजित शिक्षकों में हीनता को बढाती है ।
अनुबंधित शिक्षक -शिक्षिकाओं की नियुक्ति शहर तथा गावों के स्थानीय निकायों के द्वारा हुई है जो उन्हें इन निकायो के प्रति जिम्मेदार बनाती है । इसका असर यह होता है कि साधारण सा जन प्रतिनिधि भी इनकी जांच कर सकता है और इसके साथ साथ आम आदमी भी । हालांकि यह एक अच्छा प्रयास है लेकिन इसका खामियाजा अंततः शिक्षकों कोण ही उठाना पड़ता है । उनकी जांच करने वालों की संख्या बहुत हो जाती है और यह उनके कार्यों में अनावश्यक दखल को बहुत ज्यादा बढ़ा देती है जो पुनः उनकी कार्यक्षमता को ही प्रभावित करती है । आगे उनका वेतन मुखिया या इस तरह के अन्य जन प्रतिनिधियों की अनुशंसा के अधीन है जो उन्हे मुखिया के इर्द - गिर्द घूमने के लिए बाध्य कर देता है । बहुत बार उन्हे उन जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत कार्य भी करने पड़ते हैं मसलन घर के काम आदि । यदि वह प्रतिनिधि जीवन बीमा का अभिकर्ता है तो शिक्षक को उसकी पॉलिसी भी लेनी पड़ती है अन्यथा बिहार सरकार की इस व्यवस्था में अनुबंधित शिक्षक के वेतन को लटका दिया जाएगा ।
इन सब को ध्यान में रखकर अब बिहार में उग्र होते जा रहे अनुबंधित शिक्षक-शिक्षिकाओं के आंदोलन को देखें । हाल में वेतन को लेकर लंबा इंतजार चल रहा है , उनका पदस्थपन एसी जगहों पर है जो उनकी रिहाइश से काफी दूर है , ट्रांसफर करने के लिए बिचौलियों की एक पूरी फौज है जो पैसे मांगती है और अंत में नियमित वेतनमान में जाने की उत्कट इच्छा । ये सब मिल कर अभी के उनके आंदोलन की एक आधारभूमि तैयार करते हैं । उस पर मुख्यमंत्री की अधिकार यात्रा जो उनके लिए एक वरदान का ही काम कर रही है क्योंकि वो जिले जिले में घूम रहे मुख्यमंत्री से सीधे तौर पर विरोध जाता सकते हैं जो कि उनके राजधानी में रहने पर इस तरह संभव नही था । और अब यह संक्रामक तरीके से विस्तार भी ले रहा है । मुख्यमंत्री इसमे विपक्षी की साजिश देख रहे हैं और अपनी हत्या के षड्यंत्र से भी इसे जोड़ रहे हैं जो बड़ा ही बचकाना और हास्यास्पद प्रकार का स्पष्टीकरण प्रतीत हो रहा है । यहाँ हम शिक्षा के स्तर को तो रहने ही दें उसके स्थान पर मुख्यमंत्री केवल शिक्षकों के असंतोष के कारणों को देखें तो उनहे लग जाएगा कि यह उन अनुबंधित शिक्षकों की सहज अभिव्यक्ति है जो अपेक्षित ध्यान न दिए जाने से अराजक स्थिति को भी प्रपट कर सकती है । क्योकि इस समूह में युवाओं की संख्या ज्यादा है जो इस आंदोलन को ठीकठाक गति दे रहे हैं । ऊपर से यदि विपक्ष इसे मदद देता है तो यह नितीश कुमार के लिए खतरे की घंटी है ।
इस आंदोलन में भाग लेने वाले शिक्षक बधाई के पात्र हैं जो इसे प्रकाश में ले आए । बस इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि यह किसी भी दल या गठबंधन के हाथ में न खेलने लगे क्योंकि इससे इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो जाएगा और उनके अपने मुद्दे धरे रह जाएंगे ।
सितंबर 29, 2012
अखबार का विभाजन
हालांकि इसकी शुरुआत काफी पहले से ही हो चुकी है पर आज कल इसका चलन काफी ज़ोर पकड़ रहा है । अखबार अपने परिशिष्ट में महानगरीय जीवनशैली को ही प्रमुख रूप से स्थान देने में लगे हुए हैं । यह एक ऐसी स्थिति है जब हम किसी भी महानगर को एक समांगी संरचना के रूप में ही देखने के आदि होने लगते हैं । इस दशा में उसमें बने हुए स्तर या तो दिखते नही या हम उन्हें देखना नही चाहते । अभी एक हिन्दी अखबार में 'लाइफ स्टाईल' को समर्पित परिशिष्ट को देख रहा था । उसमे छापे हुए सारे लेख दिल्ली की एक अलग ही छवि गढ़ रहे हैं जो उनसे पक्के तौर पर अलग हैं जो झुग्गी बस्तियों वाली दिल्ली की छवि है । कुछ लोग होंगे जो रात में मजे करने के लिए निकलते होंगे या ऐसा भी हो सकता है की इनकी संख्या ज्यादा भी हो पर ये कभी भी उन लोगों से ज्यादा नही हो सकते जो पुरानी सीमापुरी , सुंदर नगरी या जहांगीर पूरी की सड़कों पर खड़े सरकारी संडास से उठती दुर्गंध के बीच खुले में अपनी रात बिताते हैं । जहां गर्मी की रातें बहुत छोटी हो जाती हैं क्योंकि बिजली के अभाव में उन नीची छत वाले कमरों में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है । ऐसी दिल्ली में नाइट लाइफ एक ही नही हो सकती न । बेशक बहुत से लोग इंडिया गेट पर या किसी बड़े होटल के क्लब में अपनी रात बिताने की क्षमता रखते हैं पर एक अखबार के लिए उनका जरूरी होना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है ।
ऐसे अखबार जिनका प्रसार कुछ और राज्यों में भी है उनकी स्थिति बहुत हास्यास्पद हो जाती है । इसकी बानगी हाल ही में पटना में देखने को मिली । एक तो ये तथाकथित राष्ट्रीय अखबार दिल्ली में जो चीजें आज छपते हैं वही चीजें अगले दिन या उसके भी अगले दिन दूसरे राज्यों में छापते हैं । खैर , वाकया ये हुआ कि परिशिष्ट में जो लेख दिल्ली से पढ़ के गया था वही अगले दिन उसी लेखक के नाम से पटना में भी पढ़ने को मिला लेकिन कुछ चीजों में बदलाव के साथ जैसे दिल्ली का 'मिरण्डा हाउस कॉलेज' बन गया था पटना का विमैंस कॉलेज और इंडिया गेट बन गया था पटना का गांधी मैदान । बहरहाल कहना ये है कि अखबारों के माध्यम हम जो पढ़ते हैं वह क्या बहुसंख्यक के लिए है ? शायद नही । अपने देश में अखबार आज भी इंटरनेट से ज्यादा पढे जाते हैं और इसकी सबड़े बड़ी वजह है इसका सस्ता और सबके लिए आसानी से उपलब्ध होने वाला भी । इसमें ज़्यादातर लोग महानगरों और नगरों से बाहर भी रहते हैं ।
आजकल अखबार को देखने पर लगता है कि उसका स्पष्ट विभाजन हो रखा है । समाचारों का हिस्सा बहुसंख्यक के लिए हो तो हो पर परिशिष्ट तो उसके लिए बिलकुल नही लगता है । ज़्यादातर परिशिष्ट , सोसाइटी ,मौज मस्ती , ट्रेंड्स ,सैर सपाटा , पेज 3,वीकेंड प्लानर जैसे शीर्षकों के साथ आते हैं जो शायद ही आम आदमी के लिए कोई मतलब रखते हों । यह महानगरीय माध्यम वर्ग का जीवन भले ही हो पर उसी महानगर मे रह रहे बहुत से लोग उससे बिलकुल अलग जीवन जीते हैं । वहाँ खाने का ठीक - ठिकाना ही नही है मोटापा कहाँ से । शास्त्री पार्क की वो स्त्रियाँ फैशन और पेज़ 3 के ट्रेंड्स जान कर क्या करेंगी जो 2 रूपय के मुनाफे के लिए दिन दिन भर बैठ कर मोबाइल चार्जर और नकली गहने बनाती हैं ।
ये अलग बात है कि हम जिस समय में जी रहे हैं उसमें सहज तरीके से कह दिया जाता है कि आज अखबार आंदोलन के नही चलते और अखबार निकालना समाज सेवा नही है । इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि ये एक उद्योग है लेकिन ये क्या जरूरी है कि 70 फीसदी लोगों पर कुछ लोगों की रुचियों को थोपा जाए ! और यदि ऐसा हो रहा है तो उस 70 फीसदी लोगों को भी मौका दिया जाना चाहिए और उनकी रुचियों को भी स्थान मिले । लोकतान्त्रिक संरचना में पत्रकारिता यदि इस प्रकार का विभाजन कायम रखती है तो उससे नुकसान पत्रकारिता का ही है क्यूंकी आम आदमी का कम होता प्रतिनिधित्व उसे अखबारों से दूर ही करेगा ।
सितंबर 03, 2012
केबीसी अब ह्क़ भी दिलाता है .....
दिन भर में बहुत कुछ मिल जाता है जो सोचने को विवश कर दे । तमाम जगहें हैं जहां पर बड़े बड़े विज्ञापन हमारा ध्यान ही नही खींचते बल्कि ये दावा भी करते हैं वे हमारा ज्ञान बढ़ाते हैं । और कभी कभी ऐसा करते भी हैं । आज कल हमारे' सम्मानित बुजुर्ग 'अमिताभ बच्चन अपने कार्यक्रम कौन बनेगा करोडपति को लेकर हर जगह छाए हैं । मेट्रो से निकलते हुए देखा किस प्रकार वे अपने काम की विशेषता बता रहे थे - अखबार के पन्ने जैसे होर्डिंग मे एक स्वस्थ सा चेहरा लेकर । उनके चेहरे के पास बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था - ज्ञान ही सबको अपना हक़ दिलाता है । इस पंक्ति को पढ़कर सहजता से कहा जा सकता है कि वे और उनकी पूरी टीम ज्ञान कि अपनी व्याख्या ही नही कर रहे बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानता का सरलतम समाधान दे रहे हैं । फौरी तौर पर यह लगता है कि कितनी महत्वपूर्ण बात कही गयी है परंतु इसे गहराई से देखे तो यह हमारी ज्ञान के प्रति मानसिकता और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैचारिक अस्पष्टता को भी प्रदर्शित करता है ।
ज्ञान को किस तरह से समझा जाए यह विमर्श का विषय हो सकता है और आज भी यह विमर्श केवल शिक्षाशास्त्रीय ही नही बल्कि दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय स्तरों पर चल रहा है । उन विमर्शों से यदि एक सर्वमान्य बात उठाई जाए तो वह ये हो सकती है कि सूचना ज्ञान का एक हिस्सा है तथा सूचना और ज्ञान में अंतर है । सूचनाओं को ही ज्ञान मान लेने कि प्रवृत्ति ने एक शैक्षिक संकट का सा वातावरण खड़ा कर दिया है । यह क्रमिक रूप से भारत जैसे समाज में जहां आज भी बहुत से लोगो को शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नही मिल पाता है ,सूचनाओं के जानकारों को विशिष्ट होने का दर्जा देता है । यही विशिष्टता तथाकथित ज्ञान आधारित वर्चस्व को स्थापित करती है और एक बड़ी आबादी को हाशिये पर ला कर खड़ा कर देता है । इस प्रवृत्ति को बढ्ते हुए हम इस प्रकार देख सकते हैं कि देश भर मे किताबी ज्ञान को ही महत्व दिया जाता है। आम दैनिक जीवन में किताबी ज्ञान ज़्यादातर काम नही देते या इसे यों कहें कि दिन प्रतिदिन के ज्ञान में से ही किताबी ज्ञान के लिए अवसर बनता है । किताबी ज्ञान पर निर्भरता न सिर्फ सामान्य ज्ञान के लिए अवसर सीमित करता है बल्कि ज्ञान कि एक पंगु परिभाषा बनाती है । इसी को आगे बच्चों पर उनके माँ बाप द्वारा दिए जा रहे दबाव के रूप में द्देखा जा सकता है । एक समय अमेरिका में सरकार द्वारा अश्वेतों की शिक्षा पर किए जा रहे खर्चों पर रोक लगाने के लिए श्वेतों ने अलग अलग तरह के तर्क दिए थे । कुछ मनोविज्ञानियों ने तो तरह तरह के टेस्ट भी ईज़ाद कर के दिए जिससे ये साबित किया गया की अश्वेत शिक्षा के लायक ही नही हैं । एक दिलचस्प शोध तो यह था कि एक खास समयान्तराल में अमेरिकियों द्वारा खेल एवं शिक्षा , विज्ञान आदि क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों कि तुलना । खेल में ज़्यादातर सफलता अश्वेतों को और अन्य में श्वेतों को मिली थी । इस आधार पर कहा गया कि अश्वेत पढ़ाई लिखाई के काबिल ही नही हैं और उन पर पैसा खर्च करना बेकार है । यह किताब आधारित ज्ञान के वर्चस्व कि ऐतिहासिक बानगी है । और भारत उसी दिशा में बढ़ता जा रहा है ।
कौन बनेगा करोडपति जैसे कार्यक्रम किताब आधारित ज्ञान ही नही बल्कि उससे आगे बढ़कर सूचना को ही ज्ञान मान रहे हैं । और यह सूचना केवल उनके पास ही है या वो ही इस पर अधिकार रख सकते हैं जिनके पास उसे ग्रहण करने के अवसर हैं । जो यह अवसर नही रखते वो इस नए प्रकार के ज्ञान कि पूरी प्रक्रिया से ही बाहर हैं । यह ठीक उसी प्रकार कि स्थिति है जैसी कि अवशयक संसाधनों के अभाव में देश के लाखों लोग शिक्षा से वंचित हैं । इस प्रकार के वंचित लोगों कि संख्या निरंतर बढ़ ही रही है । इस दशा में ऐसे कार्यक्रम नए प्रकार के संकट का निर्माण कर रहे हैं जहां विभिन्न प्रकार के ज्ञान जो लोक में और स्थानीय स्तरों पर उपलब्ध हैं विलुप्ति के कगार पर हैं । यह प्रक्रिया अलग अलग प्रकार के श्रमों के प्रति हमारी स्वीकार्यता को भी कम कर रही है ।
भारत जैसे देश में जहां असमानता का कोई एक स्वरूप नही है वहाँ पर हक़ को प्राप्त करना बहुत सरल नही है । इस अवस्था में ज्ञान से हक़ प्राप्त कराने का दावा करना दूर कि कौड़ी जैसी लगती है । यदि इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास किया भी जाए तो उससे पहले इन असमानताओं को समझने कि जरूरत है । कौन बनेगा करोडपति हक़ दिलाने का जो तरीका बता रहा है वह समाज में व्याप्त भेद को स्वीकार करते हुए उसी में जीते रहने के पुराने तौर तरीकों का ही प्रातिनिधित्व करता है । अमिताभ बच्चन और उनका समूह मुहावरे तो नए गढ़ रहे हैं पर उनके आधार वही सामंतवादी हैं जिसमें यथास्थिति को ही स्वीकार करने की प्रवृत्ति है ।
जुलाई 26, 2012
बरस जाओ कहद से पहले
उस दिन अखबार मे एक खबर देख कर हैरान हो गया |लिखा था कि ग्रामीणों ने गाँव को जोड़ने वाली कच्ची सड़क को खोद कर उसे खेत की शक्ल दे दी और उसमे कीचड़ बना कर धान की रोपाई कर दी | खबर अनोखी थी पर अपने आप मे कुछ कह रही थी |उसमे आगे लिखा था कि ऐसा इसलिए किया गया है क्योकि बारिश नही हो रही और धान के बीचड़ बेकार हो रहे हैं एवं इस संबंध मे सरकार भी कुछ नही कर रही है | यह कार्य सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने के लिए किया गया है | सरकारी तंत्र तक अपनी बात पहुँचाने यह बड़ा ही कारगर विकल्प था क्योंकि सड़क प्र्यत्यक्ष रूप से जनजीवन को प्रभावित करती है |दिल्ली मे रहने के बाद अपने शहर वापस जाना और वहाँ के आसपास के गावों के बारे मे ऐसी खबरें पढ़कर अनोखी ही लगती हैं इसके साथ ही कौतूहल भी होता है कि ऐन घटनास्थल पर क्या हुआ होगा उस स्थान पर लोगो की भीड़ लग गयी होगी एक तरह का तमाशा बन गया होगा | जैसा कि हमारी फिल्मों ने हमे सिखाया है की अपना देश किस तरह तमाशा प्रधान है जहां छोटी सी बात पर भी बड़ा तमाशा जाम जाता है |इसी आशा के साथ कि वहाँ तो बड़ी भीड़ होगी घटना वाले गाँव क ओर चल पड़ा | हाय रे मेरी निराशा ! वहाँ तो कोई नही था |उस स्थान से सौ कदम आगे बढ्ने पर ही गाँव शुरू होता था सो ग्रामीण अपने अपने घरों मे होंगे | उनसे बात करने पर पता चला कि ये कोई अनोखी बात नही है |इधर तो 2000 ईस्वी के बाद से हर साल बारिश कम ही हो रही है बीच मे एक बार कोशी की भयानक बाढ़ आई थी उस साल तो सबकुछ पानी से ही तबाह हो गया था। हर साल धान की रोपणी के समय अब ऐसा ही रहता है बारिश कम होती है जिसके पास साधन है वह बोरिंग से अपने खेत की पटाई कर धान रोपते हैं । जो गरीब हैं वो दिन रात भगवान से गुहार लगाते हैं कि पानी बरसा दो । फिर भी बारिश नही आती तो कभी कभी सड़क काट कर उस पर रोपणी कर देते हैं ताकि सरकार का ध्यान इस ओर जाए वह खेत मे पानी देने की कोई व्यवस्था करे | पर सरकार ने आज तक तो ऐसा नही किया | पिछले साल जब बलहा वालों ने सड़क काटकर धान की रोपाई की थी तो कुछ लोगों को पुलिस पकड़ कर ले गयी । अब मुझे समझ मे आ रहा था कि वहाँ कोई क्यो नही है ।
लौटते वक़्त देखा तो लगा की यहाँ पुलिस क्या करने आएगी ये धान कौन सा यहाँ फल फूल जाएंगे । निसंठ जमीन को हल्का सा खोद कर तो इन्हे लगा दिया गया था और यहाँ कौन सी बारिश हो रही है जो ये जीवित रह जाएंगे । फिर बलहा वालों को पुलिस क्यों ले गयी ? होगा कुछ और पुलिस के हजार तिकड़म !दोनों ओर खेत थे पर उनपर हल्की बारिश से उग आए घास की झीनी सी चादरें | दूर एक खेत मे बोरिंग से पानी पटाया जा रहा था साथ ही साथ ट्रेक्टर से जुटाई भी चल रही थी आसपास लोग खड़े थे और ढेर सारे बगुले उड़ उड़ कर आ रहे थे कि पानी भरने से जो कीड़े बाहर आएंगे उन्हें खा सकें । ये बगुले तो कीड़े खा लेंगे पर यहाँ के लोग क्या करेंगे जब बारिश ही नही होगी ! मुझे याद है जिस साल बारिश नही होती थी या कम कम होती थी उस साल मेरे गाँव मे लोग उदास उदास रहते थे | कृष्ण जन्माष्टमी के मेले में कोई उत्साह नही होता था ! और जब कृष्ण की मूर्ति को मेले की समाप्ती के बाद विसर्जित किया जाता था तो उस के गले में धान के बीचड़ की गाँठें बांध दी जाती थी कि संदेश पहुँच जाए की इस साल यहा बारिश नही हो रही अब कुछ करो |
बहुत प्रतीकात्मक लगता है ये सब । पर एक ऐसा देश जहां कृषि के योग्य भूमि का बहुत कम हिस्सा सिंचित हो वहाँ तो बारिश ही एक मात्र आधार है । और जब वही न हो तो आँख से आग निकलेगी ही । पानी आकाश से गिरता है और उस पर किसी का अख़्तियार नही है ये सब इसे सहज ही ईश्वरीय बना देता है और साधनहीन निराश लोग सहज रूप से दैवी प्रतीको का सहारा लेने लगते हैं। अब लोगों को लगता है की सरकारें भी उनकी जरूरतों को पूरा कर रही हैं तो वे सरकार के उपकरणो जैसे सड़क आदि का प्रयोग कर अपनी बात पहुँचाने की कोशिश करने लगे हैं | पता नही इस कोशिश का अंजाम क्या हो | हो सकता है बलहा वालों की तरह ये भी पुलिस द्वारा उठा लिए जाएँ ।
जून 30, 2012
शादियों के मौसम में उत्तर बिहार में होना एक ऐसा अनुभव है जो हर बार याद दिलाता है कि समय कितना रुका हुआ है और कुछ भी बदला नहीं है । शादी की तिथियां हिंदू पंचांग से ली जाती हैं और उन तिथियों को अनेक सादियां होती हैं ! अभी छत पर हूँ और चारों तरफ से आवाजें आ रही हैं लाउडस्पीकर पर तरह तरह के गानों की ! कहीं बाराती पहुँच गए हैं सो विधि-विधान के गीत गाए जा रहे हैं , कहीं 'बिच्छु मेरे नैना' और कहीं से ' आज मेरे यार की शादी है' सुनाई दे रहा है । एक बात मुझे समझ नहीं आती कि बैंड वाले शादी में ' ये देश है वीर जवानों का' की धुन क्यों बजाते हैं , उसका शादी से क्या संबंध ?
आज यदि शादी का दिन नहीं होता तो अबतक ये शहर नींद में चला गया होता ! ऐसा लगता है ये आवाजें पूरे शहर को जगा रखा है । गीतों से ही पता चल पाता है कि शादी हो रही है ! चाँद डूब रहा है और विधि - विधान के गीतों की संख्या बढ़ रही है । इसका एक पैटर्न समझ में आ रहा है- पहले देवी-देवताओं के समर्पित गीत , फिर चंद रीति-रिवाजों के गीत जैसे अठोंङर, लाबा, सिंदूरदान आदि के गीत फिर कुछ हँसी मजाक के गीत और बीच बीच में ' फिलर्स ' के रूप में कुछ अलग गीत । अभी थोड़ी देर पहले ऐसा ही एक गीत गाया जा रहा था जिसका मजमून था कि मिथिला में बेटी के रूप में जन्म नहीं लेना चाहिए और जन्म ले लिया और बड़ी हो गई तो किसी के कुएँ में कूद के जान दे दे । गीत में इसका कारण भी बताया गया है ! लड़की देखती है कि उसकी शादी के खातिर उसके पिता लड़के वालों के यहाँ जा जा कर मिन्नतें करते हैं और लड़के वाले शादी के बदले दहेज के लिए बड़ा सा मुँह फाड़ते हैं जिसके नहीं स्वीकार किए जाने पर वे लोग लड़की के पिता को दुत्कार कर भगा देते हैं और ऐसा ही लगभग हर लड़के का बाप करता है । गीत के अंत में वह पूछती है कि ईस दशा में डूब मरना सही है कि नहीं !
एक जगह शायद बारात में आए लोग खा रहे हैं तभी उन्हें अलग गीत सुनाया जा रहा है जिन्हें 'डहकन' कहते हैं । ये हँसी ठिठोली और ढिठाई भरे गीत होते हैं । एक स्त्री गा रही है कि दूल्हे को अब अपने बाप को बाप नहीं कहना चाहिए क्योंकि उसे तो पैसों से खरीद कर लाया गया है । वह चाहे तो लड़की पक्ष के किसी को भी अपना बाप मान सकता है । फिर वो गीत में ही कुछ नाम सुझाती हैं और उनके गुण भी बताती है ।
एक अन्य शादी में मैं गया था वहाँ डहकन तो नहीं पर फिलर्स के रूप में एक गीत में कहा जा रहा था कि लड़के , तुम्हारी माँ ने जो तुम्हें अपना दूध पिलाया उसकी भी कीमत वसूली लड़की के पिता से कर ली ।
'कूटे नै जाने अठोंङर हे हरजैइया के पूत ' विधि के इस गीत में दूल्हे के अनाडी पन को उसकी माँ के हरजाई होने से जोड़ कर देखा गया है ।
अभी शादियों के इस मौसम की शुरुआत के समय मेरे एक मित्र ने एक अखबार में खबर में लिखा था कि उत्तर बिहार में सबसे महँगा दूल्हा बिकता है ।
दहेज अन्य जगहों पर भी दिए-लिए जाते हैं पर इतनी मात्रा में अन्यत्र ऐसा नहीं होता । इससे पीड़ित होना इतना सहज है कि गानों में , आम बोलचाल में इसे सहज ही देखा जा सकता है । यह इतने गहरे रूप में जमा है कि यदि किसी ने अपने बेटे की शादी 'आदर्श ' में करने की बात कही तो माना जाता है कि लड़के में कोई न कोई खोट होगी या कोई अंदरूनी कमी । अकेले दहेज ही नहीं बल्कि भारी संख्या में बाराती भी आते हैं जो अन्य स्थानों की तुलना तरह दुल्हन लेकर विदा नहीं हो जाते बल्कि कम से कम एक दिन तो जरूर रुकते हैं । और बाराती सामंतो की याद दिलाते हैं जिनकी सेवा में हल्की सी भी त्रुटि हुई तो वे आसमान -धरती एक कर देते हैं ! चचेरी बहन की शादी में मछली नहीं खिलाए जाने के कारण बाराती नाराज हो गए थे और अनाप-शनाप बकरे लगे थे ।
और ये हालत तब है जब इधर स्त्री -पुरुष लिंगानुपात भी सामान्य है अर्थात लगभग हर किसी को अपनी बेटी की शादी करनी है ।
जब इन गानों में कोई लड़की कुएँ में कूद कर जान देने की बात नहीं करेगी , कोई बाप दुत्कारा न जाए तब शायद कुछ बदले !
जून 14, 2012
मनाली , मौसम और बिकता शहर !
रात आधी बीत चुकी है ! होटल के इस कमरे में दोस्तों के नाक बजने की घिसघिस है और बाहर है जगे हुए कुछ अंतिम लोगों की आवाज ! नींद नहीं आ रही ! शायद कुछ है जो छूटा सा लग रहा है ! दरवाजा खोल कर बाहर जाने पर भी कुछ अलग नहीं महसूस हो रहा । शहर मनाली को अभी इसी रूप में देख रहा हूँ । चमकती रोशनी में पहाड़ी बनावट के घर और हर घर पर एक नाम- फलाँ होटल । सारे घर होटल बन कर जाग रहे हैं और लगातार रंग -रोगन से पुते चेहरे पर फीकी व्यावसायिक हँसी टांग कर । मौसम बिक रहा है और इसने अपने साथ साथ यहाँ सबकुछ बिकाऊ बना दिया है । पहाड़ है पर पहाड़ी चेहरे नहीं और जो हैं वे खूबसूरत और गुदाज खरगोश या भेंड का बच्चा पकड़े हुए - फोटो खिंचा लो 'लेम' के साथ ! मैदानी चेहरे अपने यहाँ की भीषण गर्मी से राहत पाने आए हैं ! उथली, तेज बहाव वाली ब्यास नदी का ठंडा पानी सबकुछ भुला देने के लिए काफी है । पर दूसरे तरह से देखा जाए तो यह बिक चुका सौंदर्य है और औपनिवेशिक सौंदर्यबोध !
अभी थोड़ी देर पहले तक 'माल रोड' पर बस सैलानी ही सैलानी थे । इस-उस नामवाले होटलों के कमरों से निकल कर आए ये लोग ही इस शहर के वाशी लगते हैं । आज ये हैं कल कोई और उस सड़क पर चल रही भीड़ का हिस्सा होगा । पर इन घरों को पता है कि भीड़ तो जरूर रहेगी या तो सुंदरता के नाम पर या नहीं तो बर्फ के नाम पर । जब से आया हूँ तब से देख रहा हूँ जर्रे जर्रे को पता है कि उसका मोल क्या है और नहीं पता है तो उसका मोल कैसे बनाया जा सकता है । अखरोट की लकड़ी के यादगार मिल रहे हैं , चाभी का छल्ला मिल रहा है जबकि सब जानते हैं ये सब ऐसे ही पड़े रह जाते हैं । और जब कूडेदान में डालने की बारी आती है तो कोई भी लकड़ी हो कोई फर्क नहीं पड़ता । यहाँ या तो होटल हैं या दुकानें । एक मुख्य क्रिया जो लगातार चलती रहती है वह है -बिक्री ! बेशक लोग खरीद रहे हैं पर उससे ज्यादा बेचा जा रहा है । आज हम आसपास के दर्शनीय स्थानों पर पैदल ही घूम आए पर इतने के लिए ही कल शाम जब एक टैक्सी-ड्राइवर से बात की थी तो उसने तीन हजार का खर्चा बताया था । शहर से जरा से बाहर के होटल वाले अपने आगे या पीछे को हिस्से में सेब के पेड़ लगा रखे हैं उसके नीचे खाने की मेज और कुर्सियां ! सेब के पेड़ के नीचे खाने का मजा खाने की बिक्री के लिए विस्तृत अवसर का निर्माण करता है । हिमाचल प्रदेश के फल अन्य राज्यों में बिकते हैं पर यहाँ वे छोटे - छोटे पियो-फेंको कप में मिल रहे हैं और कीमत किसी भी स्थान से ज्यादा ।
इस शहर में आज दिन भर भटक कर पता चल गया कि इसका अपना कोई स्वाद नहीं है । हो सकता है कभी इसका अपना स्वाद रहा हो पर अब तो वही दाल है और वही पनीर ! बनाने का तरीका भी वही । और उन्हें बेचना है तो नदी के किनारे हल्के पानी में कुर्सी डाल दी जाती है , उस कुर्सी पर बैठा इंसान क्षण भर के लिए ही सही लेकिन परंपरागत सामंत जरूर दिखता है ।
पतली पतली सड़कों पर जाम है और गाड़ियों से निकलता धुआँ ! सड़कें अन्य राज्यों में भी खराब हैं और इससे बहुत ज्यादा खराब हैं पर यहाँ सड़क की खराब हालत के लिए जगह जगह खेद व्यक्त किया गया है और जहाँ सड़क की मरम्मती हो रही है उसके तुरंत बाद सहयोग के लिए धन्यवाद दिया गया है । खेद और धन्यवाद बाजारू कृत्रिमता से ज्यादा कुछ नहीं है । जो भी दिख रहा है सब बिक रहा है मोल लगाओ और आँखों , झोले या कमरों में भर लो । भीड़ शाश्वत है लोग बदलते हुए । पहाड़ के आसपास है तो किताब की अबतक देखी एकमात्र दुकान पर योग और आध्यात्म ही बिक रहा है ।
मन कर रहा है मैं भी कहीं से जाकर रात भर नींद खरीद लाउं !
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