जुलाई 01, 2021

भुतहा फूल

 


 

जंगल आपको चकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते ऊपर से जब मानसून हो तो कहना ही क्या । केरल का मानसून जंगल से लेकर रिहायशी इलाकों में भी वनस्पतियों की अबाध वृद्धि में भारी योगदान करता है । जो पहाड़ियाँ गर्मियों में सूखकर भूरी हो जाती हैं उन पर हरे रंग की अलग-अलग छटा देखने को मिल जाती है । तरह तरह एक फूल और जड़ी – बूटियाँ जो आम दिनों में देखने को नहीं मिलते उन्हें हर सौ मीटर पर बहते झरनों के साथ किसी ऊँचे पेड़ से टपकती बूंद के झटके से झूलती – झूमती मिल जाती हैं ।

 

कल की शाम जंगल के उस हिस्से की ओर जाना हुआ जिधर अक्सर कम जाना होता है । वह जंगल की बजाय उसकी शुरुआत है । वहाँ कभी कभी खाने की तलाश करते हिरण दिख जाते हैं । वहाँ एक सोता बहता है । उस ओर पहाड़ी की ऊंचाई बहुत नहीं है तो ढाल के सहारे बहते पानी को झरना नहीं कहा जा सकता । बेशक, कहीं कहीं पानी एक झटके में नीचे आ जाता है और उसकी चाल के साथ साथ आवाज़ भी बदल जाती है पर वह सोता ही है ।

 

मैं उस सोते के किनारे एक पत्थर पर बैठा था । मानसून के दिनों में पानी के सोतों के पास बड़ी ही सावधानी बरतने की आवश्यकता है । वहाँ मलाबार वाइपर किसी मेंढक या मछली की ताक में घात लगाए हो सकते हैं । अपनी सावधानी के मद्देनज़र बहते पानी की मधुर आवाज़ के साथ मैं इधर उधर भी देखता जा रहा था । वहीं एक फूल दिखा । फूल अकेला नहीं था बल्कि वे झुंड में खिले थे । फूलों के खिलने में क्या चौंकना ! फूल तो खिलते ही हैं !

 

उस फूल का शरीर अपनी ओर देखने के लिए विवश कर रहा था । एक लंबी तीली जैसे शरीर के ठीक छोर  पर खिला फूल । न पत्ते, न डाली, न अन्य कलियाँ ! आधे बित्ते का यह पौधा एक अजूबा ही था । मैंने अपने देखे हुए पौधों में इस तरह का पौधा नहीं देखा था जिस पर केवल फूल ही खिला हो पत्ती – वत्ति कुछ नहीं । और फूल बेहद सुंदर । गुलाब की ऐसी कली के समान जो बस अब खुलने ही वाली हो । रंग भी आकर्षक । मैंने तस्वीरें ले ली । 


 

 

लौटने पर फूल के बारे में पता करने के लिए हाथ पाँव मारने की बारी आयी । पता चला कि इसे भुतहा फूल माना जाता है । विज्ञान के अध्यापक ने इसका वैज्ञानिक नाम बताया – एजिनेशिया इंडिका । नाम से ही स्पष्ट है कि यह भारतीय मूल का पौधा है और केवल मानसून में ही दिखता है । नमी वाले स्थान में सड़े गले पत्तों में यह पौधा पनपता है ।

 

फूल किसी खूबसूरत ऑर्किड की तरह और उगना किसी मशरूम की तरह ! असल में यह पौधा एक परजीवी है । स्थानीय लोग आयुर्वेद में इसका प्रयोग करते हैं । माना जाता है कि दाह और शरीर के भीतर जमा विषैले पदार्थों के उत्सर्जन में इसके सेवन से लाभ होता है । चूँकि यह फूल उष्णकटिबंध के कई देशों में पाया जाता है इसलिए अलग अलग जगहों की स्थानीयता में इसका शामिल हो जाना स्वाभाविक ही है । इस फूल के रस को चावल के आटे के साथ मिलाकर कनोम डोक डिननमक एक थाई मीठा बनाया जाता है ।  

मेरे लिए पूरी तरह अनजान यह पौधा काफी रोचक निकला । इस परजीवी के कई उपयोग भी सामने आ गए लेकिन एक बात समझ नहीं आयी कि इसे भुतहा पौधा क्यों कहा जाता है ।

शायद इसके अचानक से निकल आने , बिना पत्ती और डालों का होने और केवल फूल भर होने से यह नाम पड़ा हो । कौन जाने ! पर कोई तो जानता होगा ! 

 


 

जून 26, 2021

अधिकार चेतस समाज और दहेज़ आधारित अपराध


 

               

       

       समूचा केरल आजकल दहेज़ से जुड़ी हत्या , अत्महत्या और प्रताड़नाओं की खबरों से ओतप्रोत है । जिधर देखो इसी बात की चर्चा है और सरकार से लेकर आम जन के बीच समझदारी का ऐसा ज्वार उठा है कि लगता है दहेज़ सदा के लिए इसमें बहकर हिन्द महासागर में समा जाएगा । मीडिया ने इन मुद्दों को मजबूती से उठा रखा है, सरकार पर दबाव बन रहा है और उस दबाव में से वह अदर्श निर्णय ले रही है । सरकारी आदेश देखकर कोई भी व्यक्ति प्रशंसा कर उठेगा । बल्कि केरल और इस सरकार के प्रशंसक देश भर में इन आदेशों को आदर्श सरकार के तौर – तरीके की तरह पेश कर रहे हैं । सरकार के निर्णयों में कुछ भी बुरा नहीं है न ही उसकी प्रशंसा बुरी है । लेकिन एक प्रगतिशीलसरकार तब जागती है जब उत्पीड़न की कई खबरें आ जाती हैं । वह उस समय नहीं चेतती जब एक पति अपनी पत्नी को साँप से कटवा देता है और दुल्हन ऊपर से नीचे तक सोने में लदकर मंडप में पहुँचती है और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो महिलाओं के प्रति हिंसा में केरल को काफी ऊपर रखता है ।

 

            आम तौर पर देखा जाये तो केरल एक आदर्श राज्य प्रतीत होता है । निकट इतिहास में हुई सामाजिक क्रांतियों, आधारभूत संरचना और शिक्षा – स्वास्थ्य आदि की दिशा में किए गए सरकारी प्रयासों के मद्देनज़र जो केरल उभरता है वह वाक़ई किसी भी राज्य को ईर्ष्या से भर देने में सक्षम है । हाल में आयी नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस बात पर मुहर लगाती है । केरल एक आदर्श राज्य है जहाँ साक्षरता दर उच्च है , चमचमाती सड़कें और सक्षम परिवहन व्यवस्था है । फिर दहेज़ हत्या जैसी प्रतिगामी चीज क्यों होती हैं ?

 

        केरल को बाहर से देखने वाले या फिर पर्यटन की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए इस राज्य की आम छवि से निकल पाना कठिन है साथ में सरकारी प्रचार और यहाँ के आम नागरिकों का श्रेष्ठता बोध आदि मिलकर जो मुखौटा निर्मित करते हैं उसके भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो छिपकर रह जाता है । लैंगिक भेदभाव ऐसा ही पक्ष है । ऊपर से देखा जाये तो केरल में वह नहीं दिखेगा । इस न दिखने कारण भेदभाव को देखने वाले मानकों में निहित है । केरल में महिला साक्षरता दर काफी ज्यादा है , बड़ी संख्या में स्त्रियाँ घर के बाहर काम करने जाती हैं, स्त्री – पुरुष लिंगानुपात बहुत बुरा नहीं है । आँकड़ों के आधार पर राय बनाने वालों के लिए केरल में लैंगिक भेदभाव जैसी किसी चीज का होना एक अपवाद की तरह होगा । केरल में स्त्री की दशा का आकलन आँकड़ों की बजाय सामान्य पारिवारिक निर्णयों में उनकी भूमिका , सड़कों पर उनकी आम उपस्थिती , अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को हतोत्साहित के तरीकों, उनके पहनावे संबंधी दृष्टिकोण और कपड़ों पर पड़ते परंपरा के दबाव व उनके प्रति होते अपराध के आधार पर हो तो स्थिति बेहतर तरीके से साफ होगी । फिर उस मुखौटे के भीतर की असल छवि बाहर आएगी ।

 

    केरल के मालाबार इलाके में बाल-विवाह होता है । इस राज्य के बाहर के लोगों के लिए यह एक चौंकाने वाली खबर हो सकती है लेकिन स्थानीय लोगों के लिए नहीं । वे इतना कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह केवल मुसलमानों में प्रचलित है । एक झटके में साढ़े छब्बीस प्रतिशत आबादी को अपने से अलग कर दिया जाता है जैसे वे इस राज्य के निवासी ही न हों । जबकि धार्मिक आधार पर देखें तो हिंदुओं के बाद इस्लाम मतावलंबियों की ही संख्या आती है । स्त्रियों पर नियंत्रण को यहाँ बिना किसी धार्मिक भेदभाव के देखा जा सकता है, पहनावे में ख़ासकर । बहुत साल नहीं हुए जब प्रसिद्ध गायक येसुदास ने लड़कियों के जींस पहनने पर टिप्पणी की थी । इस तरह की बातें उत्तर भारत में ख़ासकर बीमारू प्रदेशों में सुनी और देखी जाती हैं । ऐसे में केरल के नागरिकों और इसके बाहरी प्रशंसकों के तर्क इस बात की ओर जाते हैं कि अन्य राज्यों की अपेक्षा यहाँ ये बातें कम हैं । अव्वल तो यह कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े इस अपेक्षाकृत कम वाली बात को ख़ारिज़ करते हैं दूसरे स्त्री के प्रति कम और ज्यादा अपराध वाली बात यदि मान भी ली जाये तो यह केवल मात्रा का फर्क बताता है , अपराध तो हो ही रहे हैं । जब यही हाल रहना है तो जिस उच्च साक्षरता दर के कसीदे पढे जाते हैं और उसकी कसमें खायी जाती है वह किसी काम की नहीं मालूम पड़ती ।

 

    इसी राज्य में एक गांव है निलांबुर । उसके प्रवेश द्वार पर ही यह बता दिया जाता है कि आप दहेज़ मुक्त गाँव में प्रवेश कर रहे हैं। देश भर में इस बात का खूब प्रचार – प्रसार होता है । अच्छी बातों का प्रचार होना चाहिए साथ ही दहेज़ से जुड़ी प्रताड़ना और मौतों को भी स्थानीय समाज को स्वीकार करना होगा । कम और ज्यादा का द्वैत खड़ा करके मुँह मोड़ लेने से बचना होगा ।   

 

जून 25, 2021

बारिश और हाथी


 

 

         पिछली गर्मी की बात है । पास की एक बस्ती एक स्त्री रात में किसी काम से अपनी रसोई में गयी । वहाँ का नज़ारा देखकर उसके होश उड़ गए । सामने खड़ा हाथी बड़े ही डरावने अंदाज़ में दीवार तोड़ने की कोशिश कर रहा था । वह डरकर भागी और फिसल गयी , उसका हाथ टूट गया ।  

     जब पानी खूब बरसने लगता है पशु – पक्षी अपनी तृप्ति के स्रोत अपने आसपास ही पाने लगते हैं । रुक जाता है उनका असंख्य कथा कहानियों में आना । गर्मी में जब हाथी बाहर निकलते हैं तो खबर बनती है , भय का एक वातावरण घिर आता है , रोमांच की चाह वाले लोग सूखे पत्तों की एक खड़क पर भागने का अभ्यास करने लगते हैं ।

       

       मुझे हाथी बड़े प्रिय लगते हैं । बहुत से लोग हाथियों के प्रिय होने से इत्तिफाक़ नहीं रखते । क्या कहा हाथी प्रिय नहीं लगते ? हाथी किसे प्रिय नहीं लगते ? कितने तो प्यारे होते हैं , कभी चाल देखी है उनकी ? जंगल से सटे गाँव के किसी दालान पर बैठे - बैठे लोग हाथी की चाल के बारे में नहीं सोचते । वे हाथियों द्वारा अपनी फसल को नष्ट होते देखते हैं । अपनी आजीविका के आधार को नष्ट करने वाले के प्रति स्नेह और प्यार कैसे पनप सकता है ! हाथी को प्यारा वही कहते हैं जिनका कुछ भी दाँव पर न लगा हो ।  

 

         इस बारिश के पहले वाली गर्मी में कई बार हाथी देखने को मिल गए । मेरे लिए यह रोमांच और आनंद की बात थी । अबतक के केरल प्रवास में ऐसा पहली बार हुआ था । कोविड के कारण इंसानी गतिविधियों के सीमित हो जाने से हाथी सहित अन्य जंगली जीव जैसे कि हिरण और भेड़ियों के लिए बाहर आना आसान हो गया । नितांत शहरी और अपनी दुनिया में मस्त इंसान की तरह देखें तो इससे बढ़िया बात नहीं हो सकती । ये जीव अपना क्षेत्र विस्तार कर रहे हैं बाहर रहे हैं । मनुष्यों ने बहुत नुकसान किया इनका वगैरह । लेकिन ये भरे पेट वालों की बातें हैं । 

 

                जब ये जीव बस्ती में घुसते हैं, बिना नुकसान किए नहीं जाते । झुंड से निकाल दिया गया नर तो सुरक्षित स्थान पाने तक हफ्तों रुक सकता है । हाथियों को केला , गन्ना , ऑयल पाम के पेड़ बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और ये सब लोग आम तौर पर लगाते हैं इधर ! थोड़ी बहुत फेंसिंग सरकार ने कर रखी है लेकिन वह हाथियों के लिए कम ही पड़ती है । जिनके पास थोड़ा बहुत पैसा है वे अपनी ओर से फेंसिंग करवा लेते हैं । बाकी बचे लोगों के लिए खतरा लगातार बना रहता है । तभी कोई पटाखे का इस्तेमाल करता है तो कोई बारूद के गोले का ।

 

जून 23, 2021

टेल ऑफ फॉक्स टेल

 

 


 
 
ऐसी ही बारिशों के दिन थे जब थोड़ी सी दूर निकलने का अर्थ था भीगना और न भीगना हो तो कहीं किसी टपरी में बैठे बूंदों की तेज़ी को कम होते हुए देखते रहना । हम एक छिपे हुए झरने को देखने गए थे । सड़क पर चलने वालों को उसकी आवाज़ तो आती लेकिन ग्रेट हॉर्नबिल की तरह आम नज़र से छिपा रहना वह सीख गया था । पर लोग कहाँ जंगल की बात मानते हैं उन्हें तो सब देखना ठहरा । बारिश कम हुई तो हम संभल संभालकर गीली पहाड़ी के तलुए से उँगलियों की ओर बढ़ने लगे । हमारा इरादा उसके पैर के आसपास ही रहने का था । निश्चित रूप से हममें से कोई भी उतना हिम्मती नहीं रह जाता कि गीली पहाड़ी पर चढ़ने का साहस कर ले । पहाड़ सूखा हो तो पैरों को पकड़ता है , एक पकड़ बनती है फिर सारा काम संतुलन बनाने का ही रहता है । लेकिन, गीला पहाड़ अपने ऊपर कुछ भी नहीं रखता । पानी के साथ सबकुछ लुढ़कता हुआ नीचे आ सकता है । पता नहीं काई कैसे जमी रह जाती है ! वह शायद सबकुछ नीचे गिराने में पहाड़ की मदद करती है इसलिए पहाड़ उसे छोड़ देता है ।

 

हमने आवाज़ का सहारा लेकर झरना खोज लिया । फिर वहाँ तस्वीरें न लेते तो उस चढ़ाई का क्या अर्थ । उस क्षण हममें में से हरेक एक पर्वतारोही था जिसने एवरेस्ट फ़तह कर ली हो । छोटे छोटे लक्ष्य पाते रहने से जीवन में विश्वास बना रहता है । वहीं हमें वह फूल दिखा । किसी गिलहरी की पूँछ सा फूल । यही फूल मैंने असम में भी देखा था । असम का राजकीय पुष्प – कोपू फूल ! वहाँ इसे उर्वरता का प्रतीक माना जाता है इसलिए शादी – ब्याह के अवसर पर इसका उपयोग होता है । उर्वरता को मनुष्य अपनी वंश-वृद्धि और धनधान्य की वृद्धि से जोड़कर अपने अधीन कर लेना चाहता है । यदि ये फूल जंगल में खिलते तो सार्वजनिक उर्वरता की ही बढ़त होती न ! सार्वजनिक को व्यक्तिगत बनाने की कवायद में ही जंगल , नदी, तालाब सब खो रहे हैं । जंगलों पर निर्भर लोग बेबस होकर रह जा रहे हैं ।

 


 

 

साधारणतया फॉक्सटेल ऑर्किड के नाम से जाना जाने वाला यह फूल वेणी में लगे गुलाबी गजरे जैसा था जिसे बस लगाना बाकी था । इधर उधर नज़र बचाकर हम कुछ टहनियाँ ले आए । मेरे हिस्से जो टहनी आयी उसमें एक फूल खिला हुआ था । नारियल के छिलके के बीच रखकर पौधा लगा दिया गया । जंगल के इस पौधे को तेज़ धूप नहीं चाहिए लेकिन नम वातावरण अवश्य चाहिए । भीषण गर्मी में तो बहुत ज्यादा पानी भी । मैंने नारियल के खोल के नीचे एक प्लास्टिक का डब्बा रख दिया । जब भी पानी दिया जाता तो डब्बे के भर जाने के खयाल के साथ ताकि कहीं चले जाने की दशा में कुछ दिनों तक पानी रहे और पौधा मुरझाए नहीं । कुछ दिन रहकर वह फूल सूख गया । फिर मेरी उम्मीद अगले मौसम पर टिक गयी ।

 

अगला मौसम यानि घोर बारिश के शुरुआती दिन ! एक बात अजीब देखी – देश के दूसरे हिस्सों में जहां यह फूल ठंड में खिल जाता है वहीं केरल में इसका समय बारिश का है । इसकी जड़ों के बढ़ने , एक एक कोंपल के आने से अजीब खुशी होती मुझे । मैं इसे खिलते हुए देखना चाहता था । फिर एक शंका भी होती कि अपने वातावरण से कटकर क्या यह पौधा फूल खिला पाएगा ? मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन का नायक एक दिन अपनी जड़ों की ओर लौट आता है उसे अपने ग्राम समाज की प्रेरणा चाहिए । उसकी प्रतिभा नगर में एक समय के बाद प्रफुल्लित नही हो पा रही । अपने आसपास से सबकुछ सोख लेने की यह कौन सी ज़िद होती है हमारी ?


 

 

पिछले साल गर्मी की छुट्टियाँ लॉकडाउन की भेंट चढ़ गयी बाहर जाना भी हुआ तो इतने दिन के लिए नहीं कि पौधे को पानी भी न मिल पाये । लेकिन इस बार दो महीने यहाँ नहीं रहा । भला हो केरल की भौगोलिक स्थिति का कि हमारे निकलते न निकलते छोटी मोटी बारिशें शुरू हो गयी । छुट्टियाँ बिताकर लौटा तो  अलग ही नज़ारा था । कुछ पौधे बहुत ज्यादा पानी के कारण सूख चुके थे तो कुछ बाहर से की गयी पेंटिंग से नयी ढब में ढल गए थे । यह पौधा अपनी जगह पर यूँ ही पड़ा था उसके सिर से यह फूल लटक रहा था – कोपू फूल, उर्वरता का प्रतीक , असम का राजकीय फूल ! दूसरे पौधों के सूख जाने का दुख जाता रहा ।

 

हमारे साथ जिन साथियों ने यह पौधा लगाया उनमें किसी में फूल नहीं आए हैं । मैं अक्सर सतीश भाई को तस्वीरें भेजकर चिढ़ा देता हूँ । उनके कुछेक और मित्र हैं जिनके यहाँ फूल आ रहे हैं । कल शाम वे अपने पौधे  के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और कहने लगे – मेरी इज्ज़त का खयाल करो कम से कम एक फूल तो दे दो ।


 

एक फूल कितनी बातों से जुड़ता है , हमारे छिपे व्यवहार भी खोल देता है । उम्मीद है इस मौसम में और फूल खिलेंगे ।

जून 22, 2021

तस्वीरों में बारिश की यात्रा

बारिश बहुत खूबसूरत होती है बस उसका हुस्न देखने की फुर्सत हर रोज़ नहीं मिलती । इधर तो जब भी नींद खुलती है बारिश की आवाज़ ही सुनाई देती है लेकिन उसे महसूस करने के बजाय भाग भागकर धंधे पर जाने की तैयारी में लगे होने के कारण कुछ भी देखना और आत्मसात कर पाना मुश्किल हो जाता है ।
 
 
 
 
हाँ कभी कभी बारिश ने यूं भी दीवाना किया था कि मैं चलती कक्षा रोककर खिड़की से बाहर देखने लगता , कुछ बच्चे भी ऐसा करते , कुछ उस अंतराल का उपयोग कुछ सेकेंड की नींद के लिए करते ।  अब तो दौर ही बदल गया । 



  
         यहाँ की बारिश तो यूं है कि कोई लगातार पकौड़े तैयार रखे बस । कुछ भी गरम पीने या पकड़ने से अलग ही सुकून मिलता है । हाँ कपड़े देर से सूखते हैं । छाता अभिन्न अंग बन चुका होता है शरीर का । छाते की जरूरत ही इतनी पड़ती रहती है कि आप उसे कहीं छोड़ ही नहीं सकते । 

                  मैंने अपना बिस्तर जिस कमरे में लगा रखा है उससे सामने की पहाड़ी साफ दिखती है । दो बड़ी बड़ी खिड़कियाँ किसी बड़ी स्क्रीन की तरह एक भव्य नज़ारा सामने बनाए रखती है । 
 
 
बारिश जब भी आती है उसी पहाड़ी की ओर से आती है । बूंदों का संकुल पहाड़ी की हरीतिमा को अपने धुंधलके से ढँक लेता है ठीक उसी तरह जिस तरह कोई सुंदरी किसी शीशे वाले  बाथरूम में नहा रही हो और दीवारों पर जमी पानी की बारीक बूंदों में उसका झिलमिलाता सौन्दर्य खुलता हो ।
 

आती हुई बारिश को यूं महसूस कर सकते हैं यहाँ । ऐसे बचपन में देखा करता था जब नानी गाँव में पूरब की ओर बसे रामपुर गाँव से बारिश आती दिखती थी । रामपुर के ऊपर के क्षितिज पर काले होते बादलों को भी खूब देखा था । आती हुई आँधी भी दिख जाती थी । तब बहुत वक्त हुआ करता था और सामने उतना ही खाली स्थान भी कि दुनिया, प्रकृति को वेश बदलते हुए देख सके ।

हिंदी हिंदी के शोर में

                                  हमारे स्कूल में उन दोनों की नयी नयी नियुक्ति हुई थी । वे हिन्दी के अध्यापक के रूप में आए थे । एक देश औ...