सितंबर 29, 2012
अखबार का विभाजन
हालांकि इसकी शुरुआत काफी पहले से ही हो चुकी है पर आज कल इसका चलन काफी ज़ोर पकड़ रहा है । अखबार अपने परिशिष्ट में महानगरीय जीवनशैली को ही प्रमुख रूप से स्थान देने में लगे हुए हैं । यह एक ऐसी स्थिति है जब हम किसी भी महानगर को एक समांगी संरचना के रूप में ही देखने के आदि होने लगते हैं । इस दशा में उसमें बने हुए स्तर या तो दिखते नही या हम उन्हें देखना नही चाहते । अभी एक हिन्दी अखबार में 'लाइफ स्टाईल' को समर्पित परिशिष्ट को देख रहा था । उसमे छापे हुए सारे लेख दिल्ली की एक अलग ही छवि गढ़ रहे हैं जो उनसे पक्के तौर पर अलग हैं जो झुग्गी बस्तियों वाली दिल्ली की छवि है । कुछ लोग होंगे जो रात में मजे करने के लिए निकलते होंगे या ऐसा भी हो सकता है की इनकी संख्या ज्यादा भी हो पर ये कभी भी उन लोगों से ज्यादा नही हो सकते जो पुरानी सीमापुरी , सुंदर नगरी या जहांगीर पूरी की सड़कों पर खड़े सरकारी संडास से उठती दुर्गंध के बीच खुले में अपनी रात बिताते हैं । जहां गर्मी की रातें बहुत छोटी हो जाती हैं क्योंकि बिजली के अभाव में उन नीची छत वाले कमरों में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है । ऐसी दिल्ली में नाइट लाइफ एक ही नही हो सकती न । बेशक बहुत से लोग इंडिया गेट पर या किसी बड़े होटल के क्लब में अपनी रात बिताने की क्षमता रखते हैं पर एक अखबार के लिए उनका जरूरी होना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है ।
ऐसे अखबार जिनका प्रसार कुछ और राज्यों में भी है उनकी स्थिति बहुत हास्यास्पद हो जाती है । इसकी बानगी हाल ही में पटना में देखने को मिली । एक तो ये तथाकथित राष्ट्रीय अखबार दिल्ली में जो चीजें आज छपते हैं वही चीजें अगले दिन या उसके भी अगले दिन दूसरे राज्यों में छापते हैं । खैर , वाकया ये हुआ कि परिशिष्ट में जो लेख दिल्ली से पढ़ के गया था वही अगले दिन उसी लेखक के नाम से पटना में भी पढ़ने को मिला लेकिन कुछ चीजों में बदलाव के साथ जैसे दिल्ली का 'मिरण्डा हाउस कॉलेज' बन गया था पटना का विमैंस कॉलेज और इंडिया गेट बन गया था पटना का गांधी मैदान । बहरहाल कहना ये है कि अखबारों के माध्यम हम जो पढ़ते हैं वह क्या बहुसंख्यक के लिए है ? शायद नही । अपने देश में अखबार आज भी इंटरनेट से ज्यादा पढे जाते हैं और इसकी सबड़े बड़ी वजह है इसका सस्ता और सबके लिए आसानी से उपलब्ध होने वाला भी । इसमें ज़्यादातर लोग महानगरों और नगरों से बाहर भी रहते हैं ।
आजकल अखबार को देखने पर लगता है कि उसका स्पष्ट विभाजन हो रखा है । समाचारों का हिस्सा बहुसंख्यक के लिए हो तो हो पर परिशिष्ट तो उसके लिए बिलकुल नही लगता है । ज़्यादातर परिशिष्ट , सोसाइटी ,मौज मस्ती , ट्रेंड्स ,सैर सपाटा , पेज 3,वीकेंड प्लानर जैसे शीर्षकों के साथ आते हैं जो शायद ही आम आदमी के लिए कोई मतलब रखते हों । यह महानगरीय माध्यम वर्ग का जीवन भले ही हो पर उसी महानगर मे रह रहे बहुत से लोग उससे बिलकुल अलग जीवन जीते हैं । वहाँ खाने का ठीक - ठिकाना ही नही है मोटापा कहाँ से । शास्त्री पार्क की वो स्त्रियाँ फैशन और पेज़ 3 के ट्रेंड्स जान कर क्या करेंगी जो 2 रूपय के मुनाफे के लिए दिन दिन भर बैठ कर मोबाइल चार्जर और नकली गहने बनाती हैं ।
ये अलग बात है कि हम जिस समय में जी रहे हैं उसमें सहज तरीके से कह दिया जाता है कि आज अखबार आंदोलन के नही चलते और अखबार निकालना समाज सेवा नही है । इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि ये एक उद्योग है लेकिन ये क्या जरूरी है कि 70 फीसदी लोगों पर कुछ लोगों की रुचियों को थोपा जाए ! और यदि ऐसा हो रहा है तो उस 70 फीसदी लोगों को भी मौका दिया जाना चाहिए और उनकी रुचियों को भी स्थान मिले । लोकतान्त्रिक संरचना में पत्रकारिता यदि इस प्रकार का विभाजन कायम रखती है तो उससे नुकसान पत्रकारिता का ही है क्यूंकी आम आदमी का कम होता प्रतिनिधित्व उसे अखबारों से दूर ही करेगा ।
सितंबर 03, 2012
केबीसी अब ह्क़ भी दिलाता है .....
दिन भर में बहुत कुछ मिल जाता है जो सोचने को विवश कर दे । तमाम जगहें हैं जहां पर बड़े बड़े विज्ञापन हमारा ध्यान ही नही खींचते बल्कि ये दावा भी करते हैं वे हमारा ज्ञान बढ़ाते हैं । और कभी कभी ऐसा करते भी हैं । आज कल हमारे' सम्मानित बुजुर्ग 'अमिताभ बच्चन अपने कार्यक्रम कौन बनेगा करोडपति को लेकर हर जगह छाए हैं । मेट्रो से निकलते हुए देखा किस प्रकार वे अपने काम की विशेषता बता रहे थे - अखबार के पन्ने जैसे होर्डिंग मे एक स्वस्थ सा चेहरा लेकर । उनके चेहरे के पास बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था - ज्ञान ही सबको अपना हक़ दिलाता है । इस पंक्ति को पढ़कर सहजता से कहा जा सकता है कि वे और उनकी पूरी टीम ज्ञान कि अपनी व्याख्या ही नही कर रहे बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानता का सरलतम समाधान दे रहे हैं । फौरी तौर पर यह लगता है कि कितनी महत्वपूर्ण बात कही गयी है परंतु इसे गहराई से देखे तो यह हमारी ज्ञान के प्रति मानसिकता और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैचारिक अस्पष्टता को भी प्रदर्शित करता है ।
ज्ञान को किस तरह से समझा जाए यह विमर्श का विषय हो सकता है और आज भी यह विमर्श केवल शिक्षाशास्त्रीय ही नही बल्कि दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय स्तरों पर चल रहा है । उन विमर्शों से यदि एक सर्वमान्य बात उठाई जाए तो वह ये हो सकती है कि सूचना ज्ञान का एक हिस्सा है तथा सूचना और ज्ञान में अंतर है । सूचनाओं को ही ज्ञान मान लेने कि प्रवृत्ति ने एक शैक्षिक संकट का सा वातावरण खड़ा कर दिया है । यह क्रमिक रूप से भारत जैसे समाज में जहां आज भी बहुत से लोगो को शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नही मिल पाता है ,सूचनाओं के जानकारों को विशिष्ट होने का दर्जा देता है । यही विशिष्टता तथाकथित ज्ञान आधारित वर्चस्व को स्थापित करती है और एक बड़ी आबादी को हाशिये पर ला कर खड़ा कर देता है । इस प्रवृत्ति को बढ्ते हुए हम इस प्रकार देख सकते हैं कि देश भर मे किताबी ज्ञान को ही महत्व दिया जाता है। आम दैनिक जीवन में किताबी ज्ञान ज़्यादातर काम नही देते या इसे यों कहें कि दिन प्रतिदिन के ज्ञान में से ही किताबी ज्ञान के लिए अवसर बनता है । किताबी ज्ञान पर निर्भरता न सिर्फ सामान्य ज्ञान के लिए अवसर सीमित करता है बल्कि ज्ञान कि एक पंगु परिभाषा बनाती है । इसी को आगे बच्चों पर उनके माँ बाप द्वारा दिए जा रहे दबाव के रूप में द्देखा जा सकता है । एक समय अमेरिका में सरकार द्वारा अश्वेतों की शिक्षा पर किए जा रहे खर्चों पर रोक लगाने के लिए श्वेतों ने अलग अलग तरह के तर्क दिए थे । कुछ मनोविज्ञानियों ने तो तरह तरह के टेस्ट भी ईज़ाद कर के दिए जिससे ये साबित किया गया की अश्वेत शिक्षा के लायक ही नही हैं । एक दिलचस्प शोध तो यह था कि एक खास समयान्तराल में अमेरिकियों द्वारा खेल एवं शिक्षा , विज्ञान आदि क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों कि तुलना । खेल में ज़्यादातर सफलता अश्वेतों को और अन्य में श्वेतों को मिली थी । इस आधार पर कहा गया कि अश्वेत पढ़ाई लिखाई के काबिल ही नही हैं और उन पर पैसा खर्च करना बेकार है । यह किताब आधारित ज्ञान के वर्चस्व कि ऐतिहासिक बानगी है । और भारत उसी दिशा में बढ़ता जा रहा है ।
कौन बनेगा करोडपति जैसे कार्यक्रम किताब आधारित ज्ञान ही नही बल्कि उससे आगे बढ़कर सूचना को ही ज्ञान मान रहे हैं । और यह सूचना केवल उनके पास ही है या वो ही इस पर अधिकार रख सकते हैं जिनके पास उसे ग्रहण करने के अवसर हैं । जो यह अवसर नही रखते वो इस नए प्रकार के ज्ञान कि पूरी प्रक्रिया से ही बाहर हैं । यह ठीक उसी प्रकार कि स्थिति है जैसी कि अवशयक संसाधनों के अभाव में देश के लाखों लोग शिक्षा से वंचित हैं । इस प्रकार के वंचित लोगों कि संख्या निरंतर बढ़ ही रही है । इस दशा में ऐसे कार्यक्रम नए प्रकार के संकट का निर्माण कर रहे हैं जहां विभिन्न प्रकार के ज्ञान जो लोक में और स्थानीय स्तरों पर उपलब्ध हैं विलुप्ति के कगार पर हैं । यह प्रक्रिया अलग अलग प्रकार के श्रमों के प्रति हमारी स्वीकार्यता को भी कम कर रही है ।
भारत जैसे देश में जहां असमानता का कोई एक स्वरूप नही है वहाँ पर हक़ को प्राप्त करना बहुत सरल नही है । इस अवस्था में ज्ञान से हक़ प्राप्त कराने का दावा करना दूर कि कौड़ी जैसी लगती है । यदि इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास किया भी जाए तो उससे पहले इन असमानताओं को समझने कि जरूरत है । कौन बनेगा करोडपति हक़ दिलाने का जो तरीका बता रहा है वह समाज में व्याप्त भेद को स्वीकार करते हुए उसी में जीते रहने के पुराने तौर तरीकों का ही प्रातिनिधित्व करता है । अमिताभ बच्चन और उनका समूह मुहावरे तो नए गढ़ रहे हैं पर उनके आधार वही सामंतवादी हैं जिसमें यथास्थिति को ही स्वीकार करने की प्रवृत्ति है ।
जुलाई 26, 2012
बरस जाओ कहद से पहले
उस दिन अखबार मे एक खबर देख कर हैरान हो गया |लिखा था कि ग्रामीणों ने गाँव को जोड़ने वाली कच्ची सड़क को खोद कर उसे खेत की शक्ल दे दी और उसमे कीचड़ बना कर धान की रोपाई कर दी | खबर अनोखी थी पर अपने आप मे कुछ कह रही थी |उसमे आगे लिखा था कि ऐसा इसलिए किया गया है क्योकि बारिश नही हो रही और धान के बीचड़ बेकार हो रहे हैं एवं इस संबंध मे सरकार भी कुछ नही कर रही है | यह कार्य सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने के लिए किया गया है | सरकारी तंत्र तक अपनी बात पहुँचाने यह बड़ा ही कारगर विकल्प था क्योंकि सड़क प्र्यत्यक्ष रूप से जनजीवन को प्रभावित करती है |दिल्ली मे रहने के बाद अपने शहर वापस जाना और वहाँ के आसपास के गावों के बारे मे ऐसी खबरें पढ़कर अनोखी ही लगती हैं इसके साथ ही कौतूहल भी होता है कि ऐन घटनास्थल पर क्या हुआ होगा उस स्थान पर लोगो की भीड़ लग गयी होगी एक तरह का तमाशा बन गया होगा | जैसा कि हमारी फिल्मों ने हमे सिखाया है की अपना देश किस तरह तमाशा प्रधान है जहां छोटी सी बात पर भी बड़ा तमाशा जाम जाता है |इसी आशा के साथ कि वहाँ तो बड़ी भीड़ होगी घटना वाले गाँव क ओर चल पड़ा | हाय रे मेरी निराशा ! वहाँ तो कोई नही था |उस स्थान से सौ कदम आगे बढ्ने पर ही गाँव शुरू होता था सो ग्रामीण अपने अपने घरों मे होंगे | उनसे बात करने पर पता चला कि ये कोई अनोखी बात नही है |इधर तो 2000 ईस्वी के बाद से हर साल बारिश कम ही हो रही है बीच मे एक बार कोशी की भयानक बाढ़ आई थी उस साल तो सबकुछ पानी से ही तबाह हो गया था। हर साल धान की रोपणी के समय अब ऐसा ही रहता है बारिश कम होती है जिसके पास साधन है वह बोरिंग से अपने खेत की पटाई कर धान रोपते हैं । जो गरीब हैं वो दिन रात भगवान से गुहार लगाते हैं कि पानी बरसा दो । फिर भी बारिश नही आती तो कभी कभी सड़क काट कर उस पर रोपणी कर देते हैं ताकि सरकार का ध्यान इस ओर जाए वह खेत मे पानी देने की कोई व्यवस्था करे | पर सरकार ने आज तक तो ऐसा नही किया | पिछले साल जब बलहा वालों ने सड़क काटकर धान की रोपाई की थी तो कुछ लोगों को पुलिस पकड़ कर ले गयी । अब मुझे समझ मे आ रहा था कि वहाँ कोई क्यो नही है ।
लौटते वक़्त देखा तो लगा की यहाँ पुलिस क्या करने आएगी ये धान कौन सा यहाँ फल फूल जाएंगे । निसंठ जमीन को हल्का सा खोद कर तो इन्हे लगा दिया गया था और यहाँ कौन सी बारिश हो रही है जो ये जीवित रह जाएंगे । फिर बलहा वालों को पुलिस क्यों ले गयी ? होगा कुछ और पुलिस के हजार तिकड़म !दोनों ओर खेत थे पर उनपर हल्की बारिश से उग आए घास की झीनी सी चादरें | दूर एक खेत मे बोरिंग से पानी पटाया जा रहा था साथ ही साथ ट्रेक्टर से जुटाई भी चल रही थी आसपास लोग खड़े थे और ढेर सारे बगुले उड़ उड़ कर आ रहे थे कि पानी भरने से जो कीड़े बाहर आएंगे उन्हें खा सकें । ये बगुले तो कीड़े खा लेंगे पर यहाँ के लोग क्या करेंगे जब बारिश ही नही होगी ! मुझे याद है जिस साल बारिश नही होती थी या कम कम होती थी उस साल मेरे गाँव मे लोग उदास उदास रहते थे | कृष्ण जन्माष्टमी के मेले में कोई उत्साह नही होता था ! और जब कृष्ण की मूर्ति को मेले की समाप्ती के बाद विसर्जित किया जाता था तो उस के गले में धान के बीचड़ की गाँठें बांध दी जाती थी कि संदेश पहुँच जाए की इस साल यहा बारिश नही हो रही अब कुछ करो |
बहुत प्रतीकात्मक लगता है ये सब । पर एक ऐसा देश जहां कृषि के योग्य भूमि का बहुत कम हिस्सा सिंचित हो वहाँ तो बारिश ही एक मात्र आधार है । और जब वही न हो तो आँख से आग निकलेगी ही । पानी आकाश से गिरता है और उस पर किसी का अख़्तियार नही है ये सब इसे सहज ही ईश्वरीय बना देता है और साधनहीन निराश लोग सहज रूप से दैवी प्रतीको का सहारा लेने लगते हैं। अब लोगों को लगता है की सरकारें भी उनकी जरूरतों को पूरा कर रही हैं तो वे सरकार के उपकरणो जैसे सड़क आदि का प्रयोग कर अपनी बात पहुँचाने की कोशिश करने लगे हैं | पता नही इस कोशिश का अंजाम क्या हो | हो सकता है बलहा वालों की तरह ये भी पुलिस द्वारा उठा लिए जाएँ ।
जून 30, 2012
शादियों के मौसम में उत्तर बिहार में होना एक ऐसा अनुभव है जो हर बार याद दिलाता है कि समय कितना रुका हुआ है और कुछ भी बदला नहीं है । शादी की तिथियां हिंदू पंचांग से ली जाती हैं और उन तिथियों को अनेक सादियां होती हैं ! अभी छत पर हूँ और चारों तरफ से आवाजें आ रही हैं लाउडस्पीकर पर तरह तरह के गानों की ! कहीं बाराती पहुँच गए हैं सो विधि-विधान के गीत गाए जा रहे हैं , कहीं 'बिच्छु मेरे नैना' और कहीं से ' आज मेरे यार की शादी है' सुनाई दे रहा है । एक बात मुझे समझ नहीं आती कि बैंड वाले शादी में ' ये देश है वीर जवानों का' की धुन क्यों बजाते हैं , उसका शादी से क्या संबंध ?
आज यदि शादी का दिन नहीं होता तो अबतक ये शहर नींद में चला गया होता ! ऐसा लगता है ये आवाजें पूरे शहर को जगा रखा है । गीतों से ही पता चल पाता है कि शादी हो रही है ! चाँद डूब रहा है और विधि - विधान के गीतों की संख्या बढ़ रही है । इसका एक पैटर्न समझ में आ रहा है- पहले देवी-देवताओं के समर्पित गीत , फिर चंद रीति-रिवाजों के गीत जैसे अठोंङर, लाबा, सिंदूरदान आदि के गीत फिर कुछ हँसी मजाक के गीत और बीच बीच में ' फिलर्स ' के रूप में कुछ अलग गीत । अभी थोड़ी देर पहले ऐसा ही एक गीत गाया जा रहा था जिसका मजमून था कि मिथिला में बेटी के रूप में जन्म नहीं लेना चाहिए और जन्म ले लिया और बड़ी हो गई तो किसी के कुएँ में कूद के जान दे दे । गीत में इसका कारण भी बताया गया है ! लड़की देखती है कि उसकी शादी के खातिर उसके पिता लड़के वालों के यहाँ जा जा कर मिन्नतें करते हैं और लड़के वाले शादी के बदले दहेज के लिए बड़ा सा मुँह फाड़ते हैं जिसके नहीं स्वीकार किए जाने पर वे लोग लड़की के पिता को दुत्कार कर भगा देते हैं और ऐसा ही लगभग हर लड़के का बाप करता है । गीत के अंत में वह पूछती है कि ईस दशा में डूब मरना सही है कि नहीं !
एक जगह शायद बारात में आए लोग खा रहे हैं तभी उन्हें अलग गीत सुनाया जा रहा है जिन्हें 'डहकन' कहते हैं । ये हँसी ठिठोली और ढिठाई भरे गीत होते हैं । एक स्त्री गा रही है कि दूल्हे को अब अपने बाप को बाप नहीं कहना चाहिए क्योंकि उसे तो पैसों से खरीद कर लाया गया है । वह चाहे तो लड़की पक्ष के किसी को भी अपना बाप मान सकता है । फिर वो गीत में ही कुछ नाम सुझाती हैं और उनके गुण भी बताती है ।
एक अन्य शादी में मैं गया था वहाँ डहकन तो नहीं पर फिलर्स के रूप में एक गीत में कहा जा रहा था कि लड़के , तुम्हारी माँ ने जो तुम्हें अपना दूध पिलाया उसकी भी कीमत वसूली लड़की के पिता से कर ली ।
'कूटे नै जाने अठोंङर हे हरजैइया के पूत ' विधि के इस गीत में दूल्हे के अनाडी पन को उसकी माँ के हरजाई होने से जोड़ कर देखा गया है ।
अभी शादियों के इस मौसम की शुरुआत के समय मेरे एक मित्र ने एक अखबार में खबर में लिखा था कि उत्तर बिहार में सबसे महँगा दूल्हा बिकता है ।
दहेज अन्य जगहों पर भी दिए-लिए जाते हैं पर इतनी मात्रा में अन्यत्र ऐसा नहीं होता । इससे पीड़ित होना इतना सहज है कि गानों में , आम बोलचाल में इसे सहज ही देखा जा सकता है । यह इतने गहरे रूप में जमा है कि यदि किसी ने अपने बेटे की शादी 'आदर्श ' में करने की बात कही तो माना जाता है कि लड़के में कोई न कोई खोट होगी या कोई अंदरूनी कमी । अकेले दहेज ही नहीं बल्कि भारी संख्या में बाराती भी आते हैं जो अन्य स्थानों की तुलना तरह दुल्हन लेकर विदा नहीं हो जाते बल्कि कम से कम एक दिन तो जरूर रुकते हैं । और बाराती सामंतो की याद दिलाते हैं जिनकी सेवा में हल्की सी भी त्रुटि हुई तो वे आसमान -धरती एक कर देते हैं ! चचेरी बहन की शादी में मछली नहीं खिलाए जाने के कारण बाराती नाराज हो गए थे और अनाप-शनाप बकरे लगे थे ।
और ये हालत तब है जब इधर स्त्री -पुरुष लिंगानुपात भी सामान्य है अर्थात लगभग हर किसी को अपनी बेटी की शादी करनी है ।
जब इन गानों में कोई लड़की कुएँ में कूद कर जान देने की बात नहीं करेगी , कोई बाप दुत्कारा न जाए तब शायद कुछ बदले !
जून 14, 2012
मनाली , मौसम और बिकता शहर !
रात आधी बीत चुकी है ! होटल के इस कमरे में दोस्तों के नाक बजने की घिसघिस है और बाहर है जगे हुए कुछ अंतिम लोगों की आवाज ! नींद नहीं आ रही ! शायद कुछ है जो छूटा सा लग रहा है ! दरवाजा खोल कर बाहर जाने पर भी कुछ अलग नहीं महसूस हो रहा । शहर मनाली को अभी इसी रूप में देख रहा हूँ । चमकती रोशनी में पहाड़ी बनावट के घर और हर घर पर एक नाम- फलाँ होटल । सारे घर होटल बन कर जाग रहे हैं और लगातार रंग -रोगन से पुते चेहरे पर फीकी व्यावसायिक हँसी टांग कर । मौसम बिक रहा है और इसने अपने साथ साथ यहाँ सबकुछ बिकाऊ बना दिया है । पहाड़ है पर पहाड़ी चेहरे नहीं और जो हैं वे खूबसूरत और गुदाज खरगोश या भेंड का बच्चा पकड़े हुए - फोटो खिंचा लो 'लेम' के साथ ! मैदानी चेहरे अपने यहाँ की भीषण गर्मी से राहत पाने आए हैं ! उथली, तेज बहाव वाली ब्यास नदी का ठंडा पानी सबकुछ भुला देने के लिए काफी है । पर दूसरे तरह से देखा जाए तो यह बिक चुका सौंदर्य है और औपनिवेशिक सौंदर्यबोध !
अभी थोड़ी देर पहले तक 'माल रोड' पर बस सैलानी ही सैलानी थे । इस-उस नामवाले होटलों के कमरों से निकल कर आए ये लोग ही इस शहर के वाशी लगते हैं । आज ये हैं कल कोई और उस सड़क पर चल रही भीड़ का हिस्सा होगा । पर इन घरों को पता है कि भीड़ तो जरूर रहेगी या तो सुंदरता के नाम पर या नहीं तो बर्फ के नाम पर । जब से आया हूँ तब से देख रहा हूँ जर्रे जर्रे को पता है कि उसका मोल क्या है और नहीं पता है तो उसका मोल कैसे बनाया जा सकता है । अखरोट की लकड़ी के यादगार मिल रहे हैं , चाभी का छल्ला मिल रहा है जबकि सब जानते हैं ये सब ऐसे ही पड़े रह जाते हैं । और जब कूडेदान में डालने की बारी आती है तो कोई भी लकड़ी हो कोई फर्क नहीं पड़ता । यहाँ या तो होटल हैं या दुकानें । एक मुख्य क्रिया जो लगातार चलती रहती है वह है -बिक्री ! बेशक लोग खरीद रहे हैं पर उससे ज्यादा बेचा जा रहा है । आज हम आसपास के दर्शनीय स्थानों पर पैदल ही घूम आए पर इतने के लिए ही कल शाम जब एक टैक्सी-ड्राइवर से बात की थी तो उसने तीन हजार का खर्चा बताया था । शहर से जरा से बाहर के होटल वाले अपने आगे या पीछे को हिस्से में सेब के पेड़ लगा रखे हैं उसके नीचे खाने की मेज और कुर्सियां ! सेब के पेड़ के नीचे खाने का मजा खाने की बिक्री के लिए विस्तृत अवसर का निर्माण करता है । हिमाचल प्रदेश के फल अन्य राज्यों में बिकते हैं पर यहाँ वे छोटे - छोटे पियो-फेंको कप में मिल रहे हैं और कीमत किसी भी स्थान से ज्यादा ।
इस शहर में आज दिन भर भटक कर पता चल गया कि इसका अपना कोई स्वाद नहीं है । हो सकता है कभी इसका अपना स्वाद रहा हो पर अब तो वही दाल है और वही पनीर ! बनाने का तरीका भी वही । और उन्हें बेचना है तो नदी के किनारे हल्के पानी में कुर्सी डाल दी जाती है , उस कुर्सी पर बैठा इंसान क्षण भर के लिए ही सही लेकिन परंपरागत सामंत जरूर दिखता है ।
पतली पतली सड़कों पर जाम है और गाड़ियों से निकलता धुआँ ! सड़कें अन्य राज्यों में भी खराब हैं और इससे बहुत ज्यादा खराब हैं पर यहाँ सड़क की खराब हालत के लिए जगह जगह खेद व्यक्त किया गया है और जहाँ सड़क की मरम्मती हो रही है उसके तुरंत बाद सहयोग के लिए धन्यवाद दिया गया है । खेद और धन्यवाद बाजारू कृत्रिमता से ज्यादा कुछ नहीं है । जो भी दिख रहा है सब बिक रहा है मोल लगाओ और आँखों , झोले या कमरों में भर लो । भीड़ शाश्वत है लोग बदलते हुए । पहाड़ के आसपास है तो किताब की अबतक देखी एकमात्र दुकान पर योग और आध्यात्म ही बिक रहा है ।
मन कर रहा है मैं भी कहीं से जाकर रात भर नींद खरीद लाउं !
मई 25, 2012
शहर दिल्ली और मैं -1
दिल्ली के मंडी हाउस इलाके को दिल्ली से बिल्कुल अलग करके देखना पड़ता है । यह आम दिल्ली नहीं है ! आरंभ में जब मैं नया नया दिल्ली आया था तो नाटकों का क्रेज था पर यह नहीं जानता था कि यहाँ नाटक होते कहाँ पर हैं ! और दूसरे यह भी कि उस समय मैं दिल्ली से अपरिचित तो था ही साथ ही दिल्ली के विस्तार से डर भी लगता था ! बाद में मंडी हाउस का पता चला कि वहाँ ढेर सारे प्रेक्षागृह हैं जहाँ नाटक आयोजित होते हैं ! इसके साथ ही यह भी कि वहाँ हर आधे घंटे में एक फिल्म बनती है , लगती है और उतरते ही अभिनेता को रातोंरात सुपरहिट बना देती है ।
शायद मेरे लिए ही उन दिनों सुरेंद्र शर्मा के ग्रुप ने आ 'रंगभूमि' को नाटक के रूप में पेश किया और हमारी एक परिचित उसमें एक छोटा सा किरदार कर रही थी ।
नाटक देखा तो पाया कि ये तो हमारे शहर के नाटकों से बिल्कुल अलग है ! मंच सज्जा तो बेहतरीन थी ! सुविधाएँ रहने पर साधारण अभिनेता भी अलग ही नजर आने लगते हैं जो मैंने बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के संदर्भ में भी महसूस की । हमारे यहाँ तो आज भी लड़की का किरदार निभाने के लिए लड़की नहीं मिलती । इसीलिए वहाँ एक तो ऐसे नाटक ही किए जाते हैं जिनमें स्त्रियों की भूमिका ही नहीं होती और यदि एक दो स्त्री चरित्र हैं तो उनकी भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं ।
बहरहाल जब मैं 'रंगभूमि' देखकर निकला तो मैं लगा मंडी हाउस के भूगोल को देखने ! तब वहाँ आज की तरह मेट्रो नहीं बनी थी फिर भी रोशनी और चमक - दमक का अंदाज वही था । मेरे लिए यह अनुभव बड़ा ही रोचक रहा क्योंकि उसके बाद तो उधर जाने की आदत पड़ गयी ! इस आदत को विकसित करने में रितेश का भी बराबर योगदान है । नाटकों के प्रति उसका जुनून गहरा है । उन दिनों हमारे पास दिल्ली विश्वविद्यालय का बस पास हुआ करता था सो कहीं भी कभी भी चलने में सोचने तक की आवश्यकता नहीं थी !
धीरे - धीरे मैं दिल्ली से परिचित होता गया फिर ये उतनी आक्रामक और विस्तृत नहीं रह गई ! फिर तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय , साहित्य अकादमी , त्रिवणी कला केंद्र , श्रीराम सेंटर , कमानी , एलटीजी , बंगाली मार्केट ये सब आम शब्दों जैसे लगने लगे ! इनके साथ जो महाकाव्यीय भाव थे वे सब जाते रहे !
इस इलाके में लगता था कि चाय की दुकान के आसपास मँडराने वाला कुत्ता भी अभिनेता ही है और जो उसकी चाल है वह कोई गंभीर अदा है ! मनुष्यों की तो बात जाने ही दीजिए ! श्रीराम सेंटर के पास एक चाय नाश्ते की दुकान है, उसके बाजू में एक गराज जिसके मालिक का हुक्का और उसके गुड़गुडाने का अंदाज लाजवाब ! हमारे जैसे दर्शकों के अलावा वहाँ जो भी हैं अभिनेता ही हैं । लगता है उन्हें ही देखकर शेक्सपीयर ने कहा था ' दुनिया एक रंगमंच है और हम उसके अभिनेता ' !
एक दोपहर में यूँ ही किसी इंतजार में वहीं श्रीराम सेंटर के चौराहे पर बैठा था वहाँ एक लड़की एक व्यक्ति से बातें कर रही थी । उसके हाथ में उसका पोर्टफोलियो था । व्यक्ति उसकी तस्वीरें देखता जा रहा था । वह एक फोटो पर जाकर रुख गया और कहने लगा कि ये तस्वीर तुम्हें फिल्मों में काम दिला सकती है। लड़की की आँखें चमक उठी उसने फिर से बताया कि वह कई नाटकों में अभिनय कर चुकी है । व्यक्ति ने कहा मुख्य भूमिका तो मिलना थोड़ा कठिन है पर बहन ,भाभी का किरदार तो पक्का मिल जाएगा । लड़की की आँखों की चमक थोड़ी कम हुई ! तभी वहाँ एक और व्यक्ति आया । वही रंगमंचीय पात्र एक बार को शक हो जाए कि यहाँ कोई नाटक तो नहीं चल रहा ! उसने पहले व्यक्ति को 'हाय' किया और बिना पूछे ही पोर्टफोलियो लेकर देखने लगा ! एक तस्वीर पर जाकर वह भी रुख गया । उसने कहा तुम्हारी ये तस्वीर तुम्हें लीड रोल दिला सकती है और वो मैं तुम्हें दिलाउँगा ! फिर वह उठ कर एक कोने में चला गया लड़की भी पीछे -पीछे ! बातें होने लगी ! 'सर मैंने कई नाटकों में रोल किया है ' । 'तुम मेरे घर पर क्यो नहीं आती ! वहीं बातें करते हैं । डरो मत मेरे पत्नी भी है तुम्हारी तो बहन ही हुई !' बड़ी चालाकी से वह लड़की साली बना ली गई थी !
थोड़ी देर बाद सब जाने लगे । जाते जाते लड़की ने अगले संडे उस व्यक्ति के घर आने का वादा भी दिया !
मेरा इंतजार जारी था !
मई 14, 2012
तेज रफ्तार जिंदगी रुकी थी उस दिन !
दिल्ली में ऐसा बहुत ही कम होता है जब आप किराएदार हों और आपका मकान मालिक घर की पुताई कराने के लिए बार बार जोर दे ! यहाँ किराए के लिए मकान मालिक को लगातार चिख-चिख करते देखा है । कुछ साल पहले जब अपने पास मोबाइल नहीं था तो नीचे आंटी के फोन पर ही फोन आता था । जब भी कोई कॉल आती आंटी इतने जोर से चिल्लाती थी कि तीन घर छोड़कर रहने वाले विकास तक को पता चल जाता था । किसी रात रेडियो बजता रह जाता तो धमकी आ जाती थी कि आगे से ऐसा कुछ पाया गया तो 50 रूपए प्रति महीने किराया बढ़ जाएगा ! हम दिल्ली में नए थे सो हर धमकी के बाद एक दो महीने तक रात के 10 बजे ही रेडियो बंद कर देते थे ।
ऐसे में मकान की पुताई किस चिड़िया का नाम है !
इधर दिल्ली में रहते हुए काफी दिन भी हो गए और किराए पर रहना एक आदत सी बन गयी और हम भी मकान मालिक और आसपास के लोगों के प्रति जिद्दी हो गए । पहले जहाँ हमें धीमे बोलने के लिए कहा जाता था वहीं अब इसका कोई लिहाज नहीं करते और देर रात तक रोशनी भी जला कर रखते हैँ । इन हालात में मकान मालिक का बार बार पुताई के लिए कहना दिल्ली में एक किराएदार होते हुए अलग ही एहसास देता था । कुछ पर्चे सर पर थे सो मन चाहता था कि यह टल जाए । पर एक मकान मालिक की भी सत्ता है वह कितना भी उदार हो आखिर चलती उसी की है । उस दिन सुबह सुबह आकर भैया ने फरमान जारी किया कि आज से पुताई का काम चालू हो जाएगा कल तुम्हारी बारी आएगी । तीन दिन बाद एक पर्चा और ये सदमा ! शाम में पुताई वाले ने खबर दी कि रात में सामान हटाकर एक कमरे में कर लेना दूसरे की पुताई होगी और फिर जल्दी से सामान को दूसरे में रख लेना ताकि पहले की पुताई हो सके !
परीक्षा और पुताई ! एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा उस पर सामानों को जल्दी - जल्दी इधर उधर करना एक नए मुहावरे की माँग करता है ! अलमारी से किताबें हटाना , टीवी को दूसरे कमरे में शिफ्ट करना कोई बड़ा काम नहीं था पर टाँड की सफाई बाप रे बाप ! सोचकर ही हालत खराब हो रही थी ! पर करना तो था ही ! आखिर में हम जुट गए । राजीव नीचे खड़ा था और मैं टाँड पर ! जो भी सामान नीचे उतरता पुराना ही उतरता ! ज्यादातर तो कबाड ही पड़े थे । ऐसे कपड़े जो पुराने पड़ गए थे या फिर ऐसे जिन्हें अब पहना नहीं जा सकता । बैग जिसे चूहे ने काट दिया था । अबतक खरीदे गए फोन के डब्बे । पुरानी सीडी । पचास के करीब पुरानी कलम । इन सामानों में एक पैटर्न था जो सामान जितना पुराना टाँड में वह उतना ही पीछे । चूहे का खाया हुआ बैग वही बैग था जिसे चाचा ने पहली बार दिल्ली आते समय दिया था । उसी बैग में दिल्ली आते समय सिलवायी पैंट भी मिली जो अब किसी तौर पर मुझे नहीं आ सकती क्योंकि अब कमर की गोलाई अपेक्षाकृत बढ़ गयी है । वो पैंट बहुत खूबसूरत थी और उसकी फिटिंग़ भी बहुत अच्छी थी । उस पर लगा डायमंड टेलर का टैग देखते ही मन सहरसा के कपड़ापट्टी की गलियों से होता हुआ उस घर की पहली मंजिल पर जा पहुँचा जहाँ कभी कमाल चाचा ने कमीज की नाप लेते हुए बाबूजी से कहा था कि ये लड़का बड़ा आदमी बनेगा , इसकी बाहीं की नाप देखिए ! उस दिन बाबूजी की आँखों में दुर्लभ प्यार देर तक दिखा था । फोन के डिब्बे तकनीक में बदलाव साफ दिखा रहे थे ! पहला डब्बा काफी गंदा हो चुका था पर उसे देखते ही वह खुशी एक बार पुनः आ गई जो उस दिन पहला फोन खरीदते हुए हुई थी । ठीक से मोबाइल फोन चलाना भी नहीं आया था कितने तो रुपए यूँ ही बर्बाद हो गए थे ! और उसी शाम बाबूजी की नसीहत भी आई थी कि मोबाइल लेने खर्चा न बढ़े इसका ध्यान रखना । बाद में उस महँगे मोबाइल का डब्बा भी दिखा जो कितनी ही बचत और दोस्तों से उधार लेकर खरीदा था ! उन दिनों जीवन सस्ता भी था ठीक - ठाक बचत हो जाती थी । याद है बड़ी जल्दी ही दोस्तों का उधार भी चुका दिया था । बाद में वह मोबाइल चोरी हो गया । उसके बाद से जिसके भी हाथ में वह मोबाइल दिखता लगता मेरा ही फोन है !
टाँड के एक कोने में राजीव द्वारा खाए गए बिस्कुट , ब्रेड और चॉकलेट के कवर भी मिले जो उसके बढ़े वजन के प्रमाण के रूप में थे । इस पर आंटी का कहना था कि जो भी खाओ भाई पर पिन्नी तो बाहर फेंक दो !
सफाई करते करते यादों की यात्रा भी चलती रही । जाहिर है समय तो लगना ही था ! आनेवाले पर्चे को तो प्रभावित होना ही था पर उन पुराने सामानों ने कुछ यादों को जोड़ने का मौका दे दिया था ! एकाध को छोड़कर उनमें से संभाल कर रखने जैसा कुछ नहीं था सबको फेंक दिया पर भागते जीवन के बीच के वो रुके हुए क्षण कमाल के थे !
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