अगस्त 22, 2013

नापसंदगी के कारण


शाहरुख़ खान को पसंद करना लगातार ऐसा काम रहा है जिसमें किसी की भी आलोचना की गुंजाईश बनी ही रहती है . वह भी उसी तरह का एक अभिनेता जिस तरह के कि कई अन्य हैं लेकिन उसकी अस्वीकार्यता अन्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है . यही कारण है कि उसके प्रशंसकों से ज्यादा संख्यां उन लोगों की है जो उसे नापसंद करते हैं . यह पसंद – नापसंद का मामला यूँ तो बहुत व्यक्तिगत सा है परन्तु लोकप्रिय व्यक्ति से जुड़ता हो तो सहज ही व्यक्ति के दायरे से बहार आ जाता है . फिर उस पसंद और नापसंद की तहों में जाने का मौका मिल जाता है .

चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म आने के बाद जो पहला रविवार पड़ा था उस दिन द हिन्दू समाचार पत्र में चार ट्वीट छपे थे जो पता नहीं किन स्वनामधन्य ब्लागरों के थे ! उन ट्वीटस का विषय शाहरुख़ के चेन्नई एक्सप्रेस का घटियापन था . यहाँ तक कि अमूल के विज्ञापन चित्र श्रृंखला ने भी फिल्म को ‘बकवास’ मानते हुए अपने सामायिक ‘ज्ञान’ का परिचय दिया . पर जब फिल्म की कामयाबी को देखें तो वह या तो यह बताती है कि हम दर्शकों में फिल्म देखने का शऊर नहीं है या फिर फिल्म दर्शकों के लिए बनायीं गयी और उन्होंने उसको देखा बस ! अब जो स्थिति बन गयी है उसे देखते हुए क्या फिल्म समीक्षक फिर से विचार करना चाहेंगे कि समीक्षा के मानदंड क्या होने चाहिए ?

जब मैं एम.ए. कर रहा था तो सुधीश पचौरी हम मीडिया विकल्प वाले छात्रों को पढ़ाते थे . फिल्म और धारावाहिक की समीक्षा संबंधी कक्षा के नोट्स आज भी देखता हूँ तो लगता है कि उन मानदंडों के अनुरूप धारावाहिक तो खैर कोई बना ही नहीं और फिल्में ज्यादा से ज्यादा चार-छः बनी होंगी वह भी समानांतर सिनेमा के दौर में . फिर भी समीक्षा के मानदंड वही रखे जाते हैं ! वस्तुनिष्ठ समीक्षा के मीटर पर तो आज की कोई फिल्म नहीं ठहरती . ऐसी दशाओं में जितनी समीक्षाएं होती हैं वह फिल्मों की नितांत निजी व्याख्याएं ही हैं . तब इन व्याख्याओं के लिए यह जरुरी हो जाता है कि वह वह व्यक्ति के पसंद-नापसंद आदि बहुत से तत्वों और पूर्वाग्रहों से लिपट कर आये . शाहरुख़ के मामले में यह पूर्वाग्रह कई बार उभर कर आता है .

जब फिल्मों से क्रांति नहीं हो रही और जब आज की फ़िल्में और धारावाहिक विशुद्ध व्यवसाय बं गयी हैं तब तो जो मनोरंजन करा जाये और जिस भी तरह से मनोरंजन करा जाये उसी की जीत मानी जाएगी . यह भी एक सर्वसामान्य तथ्य है कि आमिर खान का वह तथाकथित ‘सामाजिक सरोकारों से जुड़ा’ धारावाहिक भी शुद्ध व्यापार था और उसने उसे उसी तरह से बेचा जिस तरह से कि तारे ज़मीन पर बिकी थी – भावनाओं के मोल ! सामाजिक मुद्दे और भी हैं , कन्या भ्रूण हत्या आज भी हो रही है पर आमिर साहब मोटी रकम लेकर भी कोई धारावाहिक नहीं ला रहे हैं !

यहाँ एक दूसरा पेंच भी है . यदि दूसरे अभिनेता की कोई ‘बिना दिमाग’ वाली फिल्म आती है तो कोई बात नहीं बल्कि यहाँ तक भी देखा गया है कि वे अभिनेता परदे पर आकर दर्शकों पर एहसान करने जैसा अभिनय कर के निकल जाता है तो भी वह ‘प्यारा’ ही लगता है . इसके उदहारण के लिए दबंग के बाद की सलमान की फ़िल्में , सिंघम सर, अक्षय कुमार और न जाने ऐसे कितनों को शामिल किया जा सकता है . पर उसी तरह की बिना दिमाग की फिल्म शाहरुख़ की आये तो पसंद - नापसंद से आगे बढ़कर भर्त्सना तक के मुखर स्वर सुनाई देने लगते हैं .

शाहरुख़ के प्रति इस अस्वीकार का उत्तर ढूंढनें के लिए न तो बहुत दूर जाने की जरुरत है और न ही ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता है . इसके लिए बस भारत की सामान्य सामाजिक विशेषताओं को एक बार देखने की जरुरत है . शाहरुख़ ने लम्बे समय तक रोमांटिक फिल्में की . आज भी जब तब वह ऐसा करता रहता है और नहीं तो कम से कम हर फिल्म में रोमांस तो करता ही है . शायद यही कारण है कि वह कम से कम रोमांस तो सबसे अच्छा कर लेता है . यहीं भारत की रूढ़ी-प्रियता आ जाती है . फिल्मों के मामले में तो आज भी साधारण सामाजिक यथार्थ सामने आते हैं . लड़के और ‘मर्द’ माड़-धाड़ पसंद करते हैं वहीँ लड़कियों और स्त्रीयों के लिए रोमांस छोड़ा गया है . इस पुरुष केन्द्रित मानसिकता ने शाहरुख़ को स्त्रियों का हीरो बना दिया और उसमें भी उन स्त्रीयों का जो खाते पीते घरों से हैं और जिनके पास प्यार, रोमांस आदि पर सोचने के लिए खाली वक्त है . वैसे भारत में बहुत सी स्त्रीयां तो ऐसी हैं ही जिनको फिल्म देखना नसीब नहीं होता और यदि होता भी है तो घर के पुरुष की पसंद की फ़िल्में ही देखनी पड़ेगी . उनके मन में तो कोई हीरो हो क्या लेना-देना वाला भाव ही रहता है ! भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की पसंद की चीजों को अपनाना आवश्यक रूप से निषिद्ध ही हो जाता है . यह रूढ़ि स्वयं शाहरुख़ अपने एक विज्ञापन में भी प्रयोग कर लेता है और मर्दों वाली क्रीम बेचता है ! यही वजह है कि आज भी गाँव के मेले में यदि विडियो हॉल आया तो किसी भी फिल्म से ज्यादा अमिताभ बच्चन की ‘मर्द पिक्चर’ पसंद की जाती है .

हाल के वर्षों में शाहरुख़ ने इस्लाम और दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अपना प्रेम स्पष्ट रूप से ज़ाहिर किया है . जो किसी भी सूरत में गलत नही है . लेकिन बहुसंख्यक हिन्दू जनसँख्या जो दर्शक में बदलती है उसकी नज़र में यह एक अपराध है . इस दिशा में यदि कोई शोध किया जाये तो इसे आंकड़ों के हिसाब से भी साबित करना कठिन नहीं रहेगा . अभी शाहरुख़ अन्य अभिनेताओं के साथ उत्तराखंड की आपदा से पीड़ित लोगों के लिए आगे आया तब तक ठीक था लेकिन जैसे उसने पकिस्तान के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए नृत्य किया कि राजस्थान में हिन्दू संगठनों ने उसके फिल्म को रोकने तक की धमकी दे डाली ! यहाँ हिन्दू दर्शक यह देने से भी नहीं चूकते कि अन्य मुसलमान अभिनेता इस तरह खुलेआम इस्लाम की बात नहीं करते . बल्कि आमिर खान तो बाक़ायदा लालकृष्ण अडवाणी के लिए तारे ज़मीन पर फिल्म की स्क्रीनिंग करता है . शाहरुख़ एक मुसलमान है पर यदि वह हिन्दू बहुल धर्मनिरपेक्ष देश में अभिनय कर के अपना पेट चलाना चाहता है तो उसे दिलीप कुमार की तरह हिन्दू नाम रख लेना चाहिए या नहीं तो हिन्दुओं को खुश रखने वाला व्यवहार करना चाहिए जो ज़ाहिर है उसके इस्लाम को परे रखने से होगी .


फिल्म देखना और उसके आधार पर पसंदीदा नायकों का चयन आवश्यक रूप से भारत के सामाजिक सच  का प्रतिबिम्बन है और उसे रूढ़िबद्ध मनःस्थिति की सहज प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है . मुद्दा शाहरुख़ को पसंद या नापसंद करने का नहीं है बल्कि उसके माध्यम से यह समझने का है कि हम सदियों से जहाँ खड़े थे उससे एक कदम भी आगे नहीं बढे हैं बल्कि और गहरे धंसते गए हैं . फिल्मों के व्यावसायिक रूप से सफल हो जाने और नहीं हो जाने से इस बात को कभी पुष्ट नही किया जा सकता कि शाहरुख़ के माध्यम से हमारी बहुसंख्यक मानसिकता में बड़ा बदलाव आ गया है .  

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