अगस्त 03, 2013

बेघर से रह गए ...


अब तो पक्के तौर पर लगने लगा है कि शहर नहीं छूटता , हम छूट जाते हैं ! वह तो हमारे नहीं रहने पर भी उसी तरह चलता रहता है जैसा हमारे रहने पर रहता था । पहले ऐसा लगता था कि एक सुबह जब हम शहर में नहीं होंगे तो शायद ये शहर वैसा ही न रहे जिसमें मैं जीता रहा था । तब शहर के न छूटने का पूरा विश्वास था । इसलिए जबतब उसके छूट जाने की कल्पना कर लेने में बड़ा ही रस आता था । फिर भी कहीं यदि फिल्म प्रेम रोग का वह गीत ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना न दोबारा सुन लेता तो मन की विकलता बढ़ जाती थी ।

उस दिन चुपके से शहर दिल्ली में दाखिल हुआ था । उसी दिल्ली में जहां पैसे बचाने के लिए बस में कुछ घंटे प्रतिदिन देता था , मैं हवाई अड्डे से एक टैक्सी में चल रहा था । मेरे लिए शहर में इस तरह जाना नया था और शहर के लिए भी मैं उतना ही अजनबी हो चुका था । जिस शहर ने आपको अपने पुराने दिनों में देखा हो वह आपके इस नए अवतार पर अवश्य ही मुंह चिढ़ाएगा । यही वजह थी कि उसने एक अतिथि से ज्यादा कि हैसियत देने से परहेज़ किया ।

दिल्ली से दाना-पानी उठने के बहुत दिनों बाद भी लगता था कि मन वहीं है और मैं भले ही वहाँ नहीं रहूँ पर मेरे होने के कुछ लक्षण तो वहाँ होंगे ही । इसलिए किसी के पूछने पर घर का पता दिल्ली का ही निकलता था । यह शायद महानगरीय जीवन की आवश्यक विशेषता हो कि वह बहुत दिनों तक कुछ यादों को जीता नहीं रह सकता । मैं यह नहीं कहता कि वह यादों को सहेजता नहीं है पर ज्यादा दिनों तक सहेज सकने का अवकाश उसके पास नहीं है । मेरे आने से पहले ही भाई ने लगातार वह स्थान छोडने के मंसूबे बनाने शुरू कर दिए थे जहां हम कई वर्ष रहे थे । और मुझे लगने लगा था कि यह देर-सवेर हो कर ही रहेगा । हम जहां रहते थे वह जगह शायद हमारे लिए ही बनी थी या कि उस जगह के हिसाब से हम ढल गए थे । वस्तुओं से लेकर हमारा स्थान तक सब निश्चित । आम तौर पर हम बहुत साफ-सफाई न रखते हों पर किसी के आने पर वह स्थान ईर्ष्या करने लायक जरूर हो जाता था । पिताजी द्वारा भेजी जानेवाली बंधी हुई रकम के लिए एक मुफीद और सटीक जगह । टीवी है तो गैलरी से जा रहा  केबल कनेक्शन भी है ! शुरू में तो हम चुपके से और रात को ही टीवी से जोड़ा करते थे लेकिन जब धीरे धीरे रहते हुए थोड़ी हिम्मत बढ़ गयी तो किल्ला-ठोंक कर जोड़ दिया । लगभग 3 साल के बाद हम पकड़े गए । उस पर भी आगे कनेक्शन लगा लेने के नाम पर काम बन गया ।

ऐसा नहीं था कि दिल्ली में इस बार अपने रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था पर जब आपका अपना ठिकाना उठ चुका हो तो आपका दायरा आपके बैग तक ही सीमित होता है उन्हीं तक आपका अधिकार भी रहता है । यदि भाई अब भी उसी घर में रह रहा होता जहां हम पहले रह रहे थे तो वस्तु और व्यक्ति का संबंध उतना अजनबी नहीं रहता जितना कि मैंने महसूस किया । भाई ने घर ही नहीं मुहल्ला तक छोड़ दिया सो उधर जाकर उस जैसा महसूस करने का भी अवकाश नहीं रहा । यूं यहाँ एक बात तो कही ही जा सकती है कि कितने दिनों तक एक ही स्थान को पकड़ कर बैठे रहेंगे और यह सही भी है पर इसके इतनी जल्दी होने ने निश्चित तौर पर खालीपन जोड़ा ।

नेहरू-विहार या कि दिल्ली-विश्वविद्यालय के आस-पास की अन्य कोई भी जगह वही जगहें थी जहां से में रात-बिरात का खयाल किए बिना भी यमुना-विहार भाग जाता था । क्योंकि अपना बिस्तर तो अपना ही होता है (था) । पर इस बार मेरी सारी दौड़ नेहरू-विहार पर जाकर खत्म हो जाती थी ।

कोई दूसरे दिन वहाँ जाना हुआ जहां भाई ने अपना नया ठिकाना बनाया है ! वह जगह पहले से जानी-पहचानी थी क्योंकि चचेरे भाई का परिवार वहाँ कुछ वर्षों से रह रहा है । सो आना-जाना लगा रहता था । ठीक बगल वाले कमरे में भाई के चले जाने से एक बार मन में यह भी उठा था कि जाया ही न जाए । अपनी भावुकता के बदले भाई से मिलकर उससे कुछ बातें कर सकने के मोह ने ज़ोर जरा ज्यादा लगा दिया था । जितनी देर रहा भाई के सेट-अप में ही रहा यहाँ तक कि खाना भी भाभी इसी कमरे में ले आयी थी । यहाँ तक कि जिन बच्चों को मैं अपने से खेलने की खुली छूट दे दिया करता था वे भी अच्छे नहीं लग रहे थे ।

भाई के कमरे में उसी के समान पड़े थे और होना भी चाहिए । पर वहाँ जाते ही मेरी नजरें उन सामानों में अपना समान खोजने लगी । भाई ने जिस तरह से मेरे सामानों को अपना लिया था उसमें किताबों को छोड़कर अब कुछ भी मेरा नहीं रह गया था । कुछ किताबें तो सामने रखी भी थी । उन्हें देखकर लगा कि मेरा कौन सा हिस्सा दिल्ली में रह गया है । शेष किताबें , नोट्स , पत्रिकाएँ और अखबार की कतरनें जिनमें मेरी कुछ छपी समग्रियाँ थीं वे नहीं दिखीं । पूछने पर पता चला कि वह सब बांध कर कहीं रख दिया गया है । मन में ऐसे भाव उठे कि सबको तभी साथ लेकर आ जाने का मन किया ।

इधर हवाई जहाज के मालिकों ने यात्री के साथ अतिरिक्त वजन की सीमा को भी पहले से लगभग आधा कर दिया है और बिना किसी प्रतिक्रिया के यह बात यात्रियों ने स्वीकार भी कर लिया । नयी सीमा के अतिरिक्त वज़न पर अलग से शुल्क देना होगा । हालांकि यह पहले भी देना पड़ता था लेकिन तब वज़न की सीमा ज्यादा थी । कंपनियाँ जानती हैं कि हवाई जहाज में चलने वाले ज़्यादातर लोग हील-हुज़्ज़त से बचने वाले लोग हैं जिनके लिए हर चीज़ का साधारण सा इलाज़ है धन । वे लोग किसी भी सूरत में विरोध नहीं करेंगे । यही काम यदि रेलयात्रा में कर दिया जाए तो जो बवाल मचेगा कि पूछिए भी मत । खैर , जब भाई के यहाँ किताबें छांट रहा था तो ये वज़न वाली बात तो ध्यान में थी ही । वापस सुशील के यहाँ नेहरू विहार आया और उसके घर के पहले वाली दुकान में किताबों का वज़न पता किया तो वह 6 किलो ही निकला !

इधर मन बार-बार पुराने दिनों की तरह ही व्यवहार करने के मूड में आ जाता था । वही किसी और के जन्मदिन को लगभग अपना ही कार्यक्रम बना लेने जैसी जिद ( और लगभग वही बन भी गया था) वही अपने तरह का व्यवहार ! रेस्तरां यदि इतना भारी सेवा कर लेता है तो वह एक जने के आने तक समय तो दे ही सकता है । अपनी यह चीप जिद और सुसंस्कृत व्यवहार करने वाले दोस्तों की शान में उससे पड़ती खलल ने तो एक बार को माहौल कड़वा बना ही दिया । तो लगा कि शहर एक मैं ही हूँ जो अपने तरह का व्यवहार करने पर आमादा हूँ । जबकि शहर से लेकर अपने दोस्तों के हिस्से से कुछ महीने ही सही अलग हो जाने के कारण अब मेरा पुराना व्यवहार बेदखल हो चुका है और लगभग विस्मृत-सा ! यही पहले से दिन होते तो शायद कोई उस तरह से प्रतिक्रिया नहीं देता जैसा कि मिला । तब मेरा वह कार्य उनके प्रतिदिन के अनुभव का हिस्सा होता ।

यात्रा का अंत आते-आते बीमार भी पड़ गया । मित्र के यहाँ टिका था उसको दी गयी असुविधाओं में यह भी जुड़ना था । कोशिश तो अपनी थी कि उन्हें और न प्रताड़ित किया जाए पर कै की आवाज़ से उनका जागरण भी हो ही गया । मित्र के यहाँ ही अपना बैग पड़ा था और उसी बैग तक अपना ज़ोर था इसलिए बहुत सी असुविधाओं के बारे में खयाल भी नहीं आया ।



अपना डेरा-डंटा उखड़ जाने के बाद पहली बार दिल्ली जाना हो पाया था सो बहुत सारे नये अनुभव भर रहे थे । यही कारण था कि दिन के जल्दी शुरू हो जाने के बाद भी रात देर से हुई उन दिनों !

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