अप्रैल 01, 2012

बेतरतीब यादें और उनका छूटते जाना !

जिन दिनों मैं अपने नानी के यहाँ रहता था उन दिनों उतने बड़े गाँव में शहतूत का एक ही पेड़ था । फागुन के खत्म होते ही लंबी और मोटी हवाओं में धूल के बड़े बड़े बादल यहाँ से उड़कर वहाँ जाते रहते थे । सुबह में हल्की सर्दी लगती थी पर 'टाभ नींबू' और सड़क के कात की 'भैंठ' की झाडी से उठती खुशबूओं के लिए सबेरे ही उठ जाना बड़ा ही आकर्षक हो जाता था ! पिताजी ऐसी ही सुबहों में कहते : प्रभाते भ्रमणं पथ्यम । मुझे लगता है उन्हें भी इस मौसम के अलावा बाद की सुबहें शायद नहीं लुभाती इसीलिए बाद के दिनों में कभी ऐसा नहीं कहा ।
बहरहाल उस नानी गाँव वाले शहतूत पर जाने से पहले एक बात और । उन धूल भरे दिनों में सबसे ज्यादा डर अगलगी का होता था । बहुत कम ऐसी शामें होती जिसमें ये खबर न आती की अमुक गाँव में आग लग गई ढेर सारे घर जल गए । सबसे ज्यादा दुख उन मवेशियों के लिए होता जो बँधे बँधे ही जल जाते थे !
फिर जिनके मवेशी इस तरह मर जाते थे उन्हें 'वध' लग जाता था । वे लंबे समय तक प्रतीक रूप में गले में एक रस्सी बाँध लेते और मौन रहते थे । हमारे इलाके में 'बध लगना' आज भी एक मुहावरे के तौर पर इस अर्थ में प्रयुक्त होता है जब किसी को कोई भारी दुख लग जाए और उससे वह अवाक़ हो जाए ! पशुपालक समाज में मवेशी कमाऊ सदस्य होते हैं उनके जाने का दुख उतना ही गहरा जितना घर के किसी मनुष्य का !!
उस शहतूत पर बच्चे क्या बड़े बड़े भी लगे रहते । उन फलों के पकने का इंतजार और ऐसा होने देने का धैर्य किसे था ! उन हरे हरे खट्टे फलों में ही सारा स्वाद था और यदि किसी को ज्यादा हाथ लग गए तो उसके घर शहतूत की चटनी ! बेचारा शहतूत लाठी पत्थर और पता नहीं क्या क्या झेलना सीख चुका था ।
और रही सही कसर उस पर चढ़ने वाले निकाल देते । शहतूत के खतम हो जाने के बाद ऐसा लगता जैसे दूसरी बार उस पेड़ पर पतझड आ गया हो ! तब उसकी ओर कोई मुँह भी नहीं करता । छूछा पेड़ -हुंह !!
आज दिल्ली में जहाँ भी जाईये शहतूत ही शहतूत नजर आते हैं । पक पक कर जमीन पर गिरते और अपना दाग छोड़ते शहतूत ! यहाँ ये जितने फलते हैं उसका एक प्रतिशत भी लोग खा लें बहुत है । दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में तो छोटे बच्चों को पेड़ से शहतूत 'चुनते' देखा पर अन्यत्र नहीं । एम के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय की लाइब्रेरी के भीतर लॉन में जो शहतूत का पेड़ था उसकी डालियां फल लगने से काफी नीचे तक झुक जाती थी । मैं और नंदू जबतक फल रहते तबतक बिला नागा जरूर खाते थे । वह पेड़ आज भी वहीं है अलबत्ता उसकी डालियों को जरूर पांग कर छोटा कर दिया है जिससे जो फल पहले हाथ से ही पकड़ में आ जाते वे अब कई मीटर उपर हो गए हैं । नंदू कब का दिल्ली छोड़ चुका है अभी उसने फोन कर बताया था कि उसकी शादी तय हो गयी है । उसने उस दिन एक और बात कही कि हम न के बराबर बात कर पाते हैं फिर भी हमारे बीच दोस्ती वही पुरानी है । तब लगा कि गला फाड़ के रोऊं कि जब हम मिलते थे तो कभी ये नहीं सोचा कि यह सब खत्म हो जाएगा, हम सब की राहें इस कदर अलग होंगी ! नंदू क्या बहुत सारे मेरे दोस्त और मैं आज इसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ शहतूत से हाथ की दूरी बढ़ती ही जा रही है ।
मेरे नानी के गाँव वाला शहतूत नहीं रहा और नहीं रहे भरी धूप में वहाँ जाने से रोकने वाले लोग ! दिल्ली में शहतूत का वह पेड़ तो है ही और दूसरे भी हैं पर फल हाथों की पहुँच से दूर होते जा रहे हैं ।
नंदू की शादी उन पुराने दिनों में खुशी देती थी पर अब वह दोस्ती के दायरे से हम दोनों की अंतिम विदाई जैसी लगती है ।
ये मौसम है कि हर बार आएगा और शहतूत में फल हर साल लगेंगे और दोस्तों से मिलने की तडप हर बार उठेगी !!

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