अप्रैल 14, 2012

बदला बदला सा रेडियो !

रात रेडियो सुन रहा था....रेडियो क्या एफएम सुन रहा था । आज लगता है कि हम जिस समय बड़े हो रहे थे लगभग उसी समय तकनीक में आ रहे बदलाव सामाजिक संबंधों को बदल रहा था । हमारे ध्यान दिए बिना इतनी बारीकी से यह चलता रहा कि इसके यहाँ आ जाने तक की भनक तक न लगी ।
उन दिनों वहाँ संयुक्त परिवार जैसा ही कुछ था नाना और उनके अन्य तीन भाइयों का परिवार सब एक ही बड़े घर में रहते थे । परिवारों में खाना भले ही अलग अलग बनता था पर एक साथ रहने से एक अपनापा था । सुबह 6.05 बजे जब आकाशवाणी से पहला समाचार प्रसारित होता तब से लेकर बीबीसी की शाम की सेवा खत्म होने तक रेडियो किसी न किसी के हाथ में जरूर रहता था और कोई भी कार्यक्रम अकेले नहीं सुना जाता था । गर्मियों की दोपहर में जब आसपास के लोग अपना काम समाप्त कर मचान पर बैठने लगते और घडियां दो बजाने लगती तब शुरु होता था रेडियो के समाचारों और उन पर साथ साथ टिप्पणियों का दौर ! और रोचक संयोग तो देखिए इसी समय आकाशवाणी पर एक के बाद एक समाचारों की श्रृंखला सी थी 2 बजे अंग्रेजी में , 2.10 पर हिंदी में और उसके बाद धीमी गति के समाचार ! काफी बाद में मीडिया एम ए में मीडिया पढ़ते हुए पता चला कि ये धीमी गति के समाचार दूरदराज के क्षेत्रों में चल रहे छोटे अखबारों तक खबरें देने के लिए दिए जाते थे जिनके पास ढेर सारे संवाददाता नहीं होते । आज इंटरनेट ने धीमी गति के समाचार की आवश्यकता ही खत्म कर दी । 2.10 का बुलेटिन काफी लोकप्रिय था ! और मजा देखिए कि लोग अपने सारे काम उस समय तक खत्म कर देते थे । जो उस समय तक नहीं आ पाते तो माना जाता था कि उन्हें देर हो गई ।
शाम में जब बीबीसी के समय तक लोग अपना खाना पीना निबटाकर बैठ जाते थे । मामाजी उस समय बताते थे कि इंदिरा गाँधी के मरने की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी । उसके बाद जब उनके बेटे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आकाशवाणी पर हर घंटे समाचार का आदेश दिया । चुनाव के समय परिणाम आने तक रेडियो ओवरटाइम करता था । उस दौरान कोई चैनल लगाने में देरी हो जाती तो कितने ही ताने सुनने पड़ते थे ।
इतने सब में एक बात और भी थी इन सारे समय में स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर थी । कभी कभी मेरी माँ पटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली'रस मंजरी' सुनती थी ।
समय इतनी तेजी से बदला आज रेडियो मोबाइल में फिट हो गया । और इतना सर्वसुलभ हो गया कि हर जेब में कम से कम एक तो आ ही गया है । आज रेडियो सुने तो जाते हैं पर नितांत व्यक्तिगत रूप से । समाचारों का स्वरूप बदल गया । समाचार की आवश्यकता भी अब उस तरह नहीं रही । इन 15-20 सालों में जो पीढ़ी सामने आई वह बुजुर्गों के तरीकों से अलहदा हो गई । आज जब गाँव जाता हूँ तो वहाँ रेडियो जैसा कुछ सुनने को नहीं मिलता । नाना और उनके भाई लोग अलग अलग घर बना कर रहने लगे । गाँव के बहुत से लोगों ने शहरों का रास्ता ले लिया । रेडियो अब दूरदराज के इलाकों में बस क्रिकेट बेचने तक का माध्यम भर रह गया है । बिजली नहीं है तो टीवी पर मैच नहीं आ सकता उतनी देर के लिए ही वहाँ अब रेडियो है ।
शहरों में रेडियो तो है पर वह खाली समय बिताने के एक उपकरण के रूप में । एफएम ने रेडियो को तो बदला पर वह व्यक्तिगत हो कर रह गया ।

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