फ़रवरी 20, 2012

मांसाहारी चूना

आज तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर कहीं पढ़ रहा था । पढ़ते हुए लगा कि यदि आपके पास विकल्प हों और उनमें से चयन की स्वतंत्रता हो तब आप उसके विषय में विचार - विमर्श करने की दशा में होते हैं । यदि ऐसा नहीं है तो जो भी उपलब्ध है फिर उसके गुण-दोषों की ओर ध्यान देने की जरूरत भी महसूस नहीं होती ।
इस बार मैं अपने नाना जी से मिला तो मुझे बातों बातों में ही पता चला कि बहुत समय पहले चूने का उत्पादन घोंघा के खोल को जला कर किया जाता था । तब मकानों के निर्माण में जिस चूने का प्रयोग होता था उसके लिए मुसहर जाति की स्त्रियाँ नदियों , तालाबों और चौरों से बड़े पैमाने पर घोंघा पकडती थी । फिर उनके मांसल भाग को अलग कर बड़े -बड़े बर्तनों में भर कर बेचने निकल जाती थी । सस्ते मांस के रूप में यह काफी लोकप्रिय था । (आज की संचार क्रांति और तकनीकी युग में घोंघा का मांस एक सस्ते मांसाहार का विकल्प ग्रामीण क्षेत्र में दे रहा है । ) वे स्त्रियाँ शाम को लौटकर घोंघा के खोल को जलाती थी और जलकर वह सफेद पाउडर में बदल जाता फिर उस जमाने में मकान बनाने के लिए व रंगाई-पुताई के लोग उसे चूने की तरह इस्तेमाल करते । इससे उन स्त्रियों की दोहरी आमदनी होती थी । घोंघा से प्राप्त चूना उसके मांस की तुलना में बहुत महँगे बिकता था ।
चूने का प्रयोग तब भी और आज भी पान एवं तम्बाकू के सेवन में किया जाता है । जबतक चूना-पत्थर से प्राप्त चूना उस बाजार में नहीं पहुँचा था तबतक उसी घोंघा के खोल को जलाकर प्राप्त किए गए चूने का ही प्रयोग लोग पान और तम्बाकू मे करते थे । लेकिन जैसे ही उनके सामने पत्थर वाले चूने का विकल्प आया वैसे उन्होंने पुराने प्रकार के चूने को त्याग दिया । इसके पीछे कारण यह बताया गया कि वह मांसाहारी चूना है और मुँह लगाना पाप है । फिर मकानों के निर्माण से भी धीरे धीरे वह दूर हो गया ।
यदि कल्पना की जाए तो कुछ संकेत तो अवश्य मिलते हैं कि हो न हो पत्थर वाले चूने की खपत बढ़ाने के लिए यह मांसाहार वाला पत्ता फेंका गया हो । मुसहर स्त्रियों के रोजगार का एक बड़ा साधन समाप्त हो गया । बड़ी पूँजी ने उन्हें बाजार से अपदस्थ कर दिया ।
समाज में लोगों के पास दो प्रकार के चूने का आ गया अब वे चयन कर सकते थे । इतना ही नहीं लोग अब चूने जैसी चीज तक को शाकाहार और मांसाहार जैसे द्वितीय स्तर के चिंतन में ला सकते थे । अन्यथा ये विचार तो पहले भी थे ।
अब गाँवों से घोंघा के मांस के साथ साथ केंकडे , छोटी मछलियाँ आदि के स्वाद गायब हो गये और गायब हो गया भूमिहीन लोगों की आमदनी का एक साधन । आज वहाँ भी स्वाद का मानकीकरण हो गया है । वहाँ की मछलियों का भी वही स्वाद है जो चेन्नई का है । और इसके साथ ही अपना रोजगार बदलकर ठेकेदारी और पलायन में फँस गया ।

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