जनवरी 02, 2015

एक फौरी टिप्पणी


गोवा गया था । यह एक ऐसे राज्य की यात्रा थी जिसके बारे में तरह तरह से अलग अलग तरह की बातें सुन रखी थी। वो कहते हैं न कि अपने मरे ही स्वर्ग दिखता है तो ठीक यही बात थी । वहाँ गया तो पता चला कि गोवा जैसा सुन रखा था वैसा तो जो है सो है यह अपने आप में अनोखा जरूर है ।

छोटा सा राज्य । छोटे छोटे शहर और एक साथ पचास गाडियाँ सड़क पर दिख जाएं तो समझिए कि जाम लगा ! पर सड़कें इतनी साफ सुथरी थी कि वहाँ जाम का भी अपना मजा था । वहाँ की सड़कें अतिक्रमण से मुक्त हैं । हाँ वही अतिक्रमण जिसमें दुकानदार अपने दुकान के सामने वाली जगह को भी अपनी समझते हैं और उनका वश चले तो जो स्थान गाड़ियों के चलने के लिए है वहाँ तक अपना सामान पसार दें । देश में अबतक जहां भी रहा हूँ और जितना भी घूमा-फिरी की है मैंने उनमें से पहला ऐसा राज्य देखा जहां दूकानदारों ने सड़क तो जाने दीजिये फुटपाथ तक को अपनी दुकान से मुक्त रखा है । वहाँ जाकर पता चलता है कि बाजार में भी फुटपाथ पर चला जा सकता है । वरना चले जाइए दिल्ली के बाज़ारों में जहां बाजार ही फुटपाथ पर सजता है । हमारे सहरसा की बात भी सुन लीजिये जहां रेलवे का फ्लाईओवर इसलिए नहीं बन पा रहा है क्योंकि उससे वहाँ का बंगाली बाजार, जो पूरा का पूरा अतिक्रमण का नमूना है, वह टूट जाएगा ! हमारे यहाँ की सब्जी मंडी भी ऐसी ही है ।

गोवा की दुकानों के सामान बाहर पसरे नहीं होते इसलिए उनकी समृद्धि और उनके भीतर मिलने वाले सामानों का अंदाजा नहीं लग पता । लेकिन ज्यों ही आप दुकानों के भीतर जाते हैं त्यों ही महसूस कर सकते हैं कि वे बाहर से जितने मामूली दिखते हैं उतने हैं नहीं । इसका फायदा यह है कि बाहर सड़क अनावश्यक रूप से भरी नहीं लगती । लोग सामान दुकानों में जाकर खरीदते हैं , फुटपाथ चलने के लिए है और बाकी रहा सड़क का कोलतार वाला हिस्सा तो वह गाड़ियों के चलने के लिए है । ठीक इसी तरह की बनावट लखनऊ के हजरतगंज बाजार की भी है पर वहाँ अतिक्रमण ने पूरे सौन्दर्य और बाजार के मकसद को ही बिगाड़ के रखा हुआ है । जबकि हजरतगंज में कभी उतनी भीड़ नहीं जुटती जिनती गोवा में समय समय पर जुटती रहती है ।

अब सड़क आदि की बात चल रही है तो लगे हाथ गोवा की परिवहन व्यवस्था की बात भी कर लें । छोटा राज्य है ठीक है पर उसकी परिवहन व्यवस्था ठीक नहीं है । परिवहन में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा भागीदारी  निजी क्षेत्र की है इसलिए बहुत ज्यादा मनमानी है । वहाँ आपको अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए मोटरसाइकिल सवार मिल जाएँगे जिन्हें ‘पायलट’ कहा जाता है , तिपहिया ऑटो है , टैक्सी और छोटी बसें हैं । देखिये स्थानीय और बाहर से आने वाले पर्यटकों में जो धनी लोग हैं उन्हें गोवा की यातायात व्यवस्था में कोई खराबी नजर नहीं आएगी लेकिन वहाँ के स्थानीय निम्नवर्ग के लिए और बजट टूर पर गए पर्यटकों के लिए गोवा की परिवहन व्यवस्था खराब है । अब लगे हाथ यह भी जान लीजिये कि गोवा कोई बहुत ज्यादा अमीर लोगों का राज्य नहीं है और बजट टूर करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती है ।

मोटर साइकिल सवार जिनको पायलट कहा जाता है वे सामान्यतया ज्यादा पैसे मांगने के लिए बदनाम हैं , ऑटो वाले तो साधारण हैसियत के पर्यटकों और स्थानीय लोगों को मुंह भी नहीं लगाते और ज्यादा बात की तो आपको बस स्टॉप का रास्ता बता देंगे । रही बात टैक्सी वालों की तो मैंने उनसे बात भी नहीं की लेकिन कुछ लोग जो वापसी में ट्रेन में मिले उनहोने कहा कि टैक्सी वाले ने ‘लूट’ लिया । आपके पास ले दे के उन छोटी बसों का ही विकल्प रह जाता है जो बहुत ठुँसी हुई भरी रहती हैं या नहीं तो ठुँसकर भरने तक का इंतजार करती रहती हैं ।

गोवा जाएँ तो वहाँ के खाने जरूर खाएं । वहाँ की तरकारी की तरी में अपना ही स्वाद पाया मैंने । जीभ को वह स्वाद एक बार तो अटपटा लगा लेकिन स्वाद अच्छा था । वहाँ गोवा समोसा मिलता है जिसकी स्टफिंग तो समोसों जैसी ही रहती है लेकिन मसाले और भुने जाने के अपने तरीके के कारण उसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है । कोंकण का इलाका है और वडा – पाव न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता । पाव-भाजी भी मिलती है लेकिन उसके स्वाद में कोई खास अंतर नहीं था । हाँ मडगाँव के इलाके में बन के साथ परोसी गयी रस-ऑमलेट बेहतरीन थी । ठीक इसी तरह अलग स्वाद बन के साथ मशरूम करी का भी था । मीठे में वहाँ गुलाब जामुन भी थे , शीरा भी था और लड्डू-जलेबी जैसी राष्ट्रीय मिठाइयाँ भी लेकिन काजू की बनी हुई एक भरवां मिठाई का स्वाद अभी तक जीभ पर बना है । वह मिठाई बहुत महंगी थी और उसका नाम भी मैं भूल गया ।

गोवा को जितना फिल्म वालों ने दिखाया है वह कमोबेश वैसा ही है । सबसे बड़ी समानता कपड़ों को लेकर देखी मैंने । आम गोवन स्त्रियाँ फ्रॉक पहनती हैं जिसमें जांघ के नीचे के बाहर का हिस्सा खुला रहता है । उम्रदराज औरतें भी इस तरह के कपड़े पहनती हैं । अपने उत्तर भारत में तो उल्टे आँचल की साड़ी पहनने पर हंगामा शुरू हो जाता है !

खैर , गोवा से आने के बाद उसकी कुछ और बातें यहाँ डालनी हैं इसे पहले हिस्से के रूप में समझा जा सकता है । जब समय मिलता है तब आऊँगा फिर से ! 

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