अक्तूबर 31, 2012

स्थायी क्षति की ओर बढ़ती शिक्षा !

अभी हाल ही में दूरदर्शन के एक कार्यक्रम के दौरान 'मॉडर्न स्कूल' की प्रधानाचार्य बार-बार आरटीई वाले बच्चे , आरटीई वाले बच्चे कह रही थी । जाहिर है यह उनके यहाँ और उस तरह के अन्य विद्यालयों में हाल में बने शिक्षा गारंटी कानून के तहत पढ़ रहे चंद गरीब बच्चों के लिए सबसे सम्मानित नाम है । लेकिन यही नाम एक तरह से उनके लिए नई श्रेणी गढ़ रहा है जो उसी तरह से उन्हें उपहास का आधार बना रहा है जैसे कि गरीब बच्चे या कि अन्य नाम ! बड़े स्कूल की किसी भी एक कक्षा में इस कानून के अंतर्गत पढ़ने आ रहे बच्चों की संख्या उसमें पढ़ रहे खानदानी रूस बच्चों की तुलना में बहुत कम है जो उस धनी चकाचौंध भरी दुनिया में उनके लिए एक कष्टकारी स्थिति से कम नहीं होगा जहाँ वे अपना टिफिन खोलने तक की हिम्मत नहीं करते होंगे ! वो प्रिंसिपल आगे बोलती हैं कि कानून बनते ही हमने अपने शिक्षकों को यह निर्देश दिया और उनकी ट्रेनिंग शुरु कर दी क्योंकि 'आरटीई वाले बच्चों' को कक्षा के स्तर तक लाने के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है । ऐसे प्रधानाचार्य की बात समझ से परे है क्योंकि बड़े स्कूल में पढ़ रहा एक बच्चा , किसी झुग्गी बस्ती में रहकर सरकारी स्कूल जा रहे या स्कूल नहीं भी जा रहे बच्चे से बहुत ज्यादा अलग नहीं है । यदि हम किताबी ज्ञान को बच्चे की विशेषता मान कर उसके आधार पर बच्चे- बच्चे में विभेद कायम करते हैं तो निश्चय ही यह एक गंभीर स्थिति है । पुस्तकों में जो ज्ञान निहित हैं उन्हें पुस्तक पढ़ कर जान लेना कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है । यहीं एक दूसरी बात भी आती है कि यह ज्ञान किस प्रकार हासिल किया जा सकता है ? यदि दोनों ही बच्चों के लिए समान स्थितियाँ होती तो शायद नतीजे के रूप में हमें कुछ और ही देखने को मिलता ! समान किताबें , पढ़ने के लिए समय , उचित रोशनी यदि झुग्गी झोपड़ी में जी रहे बच्चे को मिलते तो उसके विकास की भी बराबर संभावना बन सकती थी । ऐसी दशा में हम यदि गरीब पृष्ठभूमि से आ रहे बच्चों को कक्षा में पढ़ रहे धनी बच्चों की तुलना में रखेंगे तो जाहिर है वे कहीं नहीं ठहरेंगे ! उनके अपने अनुभव भी उन्हें कक्षा के अन्य विद्यार्थियों से अलग ठहराते हैं । एक तरह से यह दशा 'मिस-मैच' की है । हालाँकि अभी इस व्यवस्था को लागू हुए दो साल ही हुए हैं सो किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी लेकिन इसके अबतक सामने आए लक्षण उत्साहवर्धक नहीं हैं । बड़े बड़े निजी विद्यालय अपने यहाँ काम कर रहे गार्ड, माली आदि के बच्चों को दिखाकर इस कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं । आगे जिन लोगों के बच्चे किसी कारणवश इन बड़े स्कूलों में दाखिला नहीं ले पाते वे जहाँ तहां से फर्जी बीपीएल कार्ड बनवा कर वास्तविक गरीब बच्चों का हक मार रहे हैं और इसमें कुछ स्कूल भी उनकी मदद कर रहे हैं । कानून बने दो साल हो गए हैं और लगभग इतना ही समय उसकी तोड़ ढूँढने वाले दिमाग ने खपाए हैं । इसमें भला जिन बच्चों का होना चाहिए था उनका नहीं हुआ । भला देश की शिक्षा का होना चाहिए था वह तो सिरे से खानापूर्तियों के चक्रव्यूह में फँस गया ! जरूरत देश के शिक्षा माफियाओं के चरित्र को समझ कर सभी शिक्षा संस्थाओं के राष्ट्रीकरण की है ताकि सबको समान शिक्षा मिल सके ! 12 वीं शिक्षा के क्षेत्र में जबतक विभेद और स्तरीकरण की स्थिति रहेगी तबतक उच्च शिक्षा में ज्यादा लोगों का आना संभव नहीं हो पाएगा और गुणवत्तापूर्ण शोध के क्षेत्र में हम निरंतर पिछड़ते ही रहेंगे । शिक्षा का अधिकार कानून का लक्ष्य केवल यह हो कि बहुत से छात्रों का नामांकन हो जाए बाद में वे क्या पढ़ते हैं, कहाँ जाते हैं उससे कोई सरोकार नहीं है । हम जिस चुनौती भरे समय का सामना कर रहे हैं , उसमें मात्रा के साथ साथ गुण भी होना जरूरी है ! क्योंकि केवल मात्रा पर ध्यान देना हमारी शिक्षा को चिरस्थायी क्षति पहुँचा सकता है ।

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