नवंबर 01, 2012

दरबारी साहित्य की एक शाम ( व्यंग्य रिपोर्ताज )

उस दिन इस घुमन्तु ,बेकार को एक संगी बँहियाते हुए राजधानी के महल में ले गया ! क्या चिक्कन-चुनमुन महल था ! दीवारों में झकझक चेहरा झलक जाए ऐसी चिकनाई ! भीतर एक प्रकोष्ठ में दरबार लगना था और बाहर बरामदे में उससे पहले की औपचारिकता अंतिम दौर में थी । अंतिम दौर में इसलिए कि , दरबार में उपस्थित होने आए गणमान्यों की हल्की-क्षुधा-तृप्ति के लिए जो पकवान आदि लाए गए थे वे चुकने वाले थे । दूसरे जब इस चिर-अतृप्त ने जब बिना एक पल भी जाया किए एक थाली में जो जो मिला भर लिया और भकोसने के लिए स्थान ग्रहण किया तो उपस्थित सज्जनों (दुर्जन हों तो अपनी ओर से योगदान करें) व सज्जनानियों ने थाली की ओर अतृप्ति नहीं बल्कि घृणा की दृष्टि से देखा । अर्थात सबके उदर यथा खाली स्थान तृप्त हो चुके थे ।

 जब से राजे-रजवाडों का अत हुआ है तब से साहित्य का दरबार संपादक और प्रकाशकों के यहाँ स्थानांतरित हो गया है । ये साहित्य में नए राजा बने और आश्रय देने लगे । इसके साथ साथ पूरी प्रक्रिया का रूपांतरण नए संदर्भों में हुआ । मसलन अबके राजाओं का प्रशस्ति गान खुलकर नहीं कर सकते तो उनको झेलने का चलन आरंभ हो गया । हाँ ठकुरसुहाती का केवल नाम भर बदला यह अब प्रकाशक-सुहाती हो गया । यह एक ऐसे ही राजा का दरबार था जहाँ दस नए दरबारियों को शामिल किया जाना था । तिथि भी विजयादशमी चुनी गई थी-रावण के दस सिरों की भाँति ये भी देदीप्यमान, रंग-रोगन से चेहरे की खाईयां भरे हुए । दरबारी उनके चमचे , प्रेमी आदि पहले से ही प्रकोष्ठ में बैठे थे। मोबाइल के ध्वनि नियंत्रण की औपचारिक घोषणा के साथ सभा की शुरुआत हो गयी । सर्वप्रथम राजा का बोलना जरूरी है सो वे उठे कुछ टूं-फां की, अपने संबंध में यत्र-तत्र किए गए प्रशस्ति वाचन को अहंकार पूर्वक सुनाया । फिर पता नहीं क्यों 'राग गर्दभ' में एक अजीब-सा गीत रेंकने लगे ! सभा बगलें झांकने लगी थी ।

अब नए दरबारियों को शामिल करने का समय आ गया था । वे बारी-बारी बुलाए गए लाल-नीले पैकेट फाड़ के उनकी पुस्तकें वरिष्ठतम दरबारियों के हाथ में देकर फोटो ली गई और हर नए को दो शब्द कहने को बुलाया । नए माईक पकडते ही इतना अवश्य बोलते कि ,उन्हें बोलना नहीं आता पर बोलते जरूर -पहले विवाद, फिर भडास, फिर हर्ष अंत में धन्यवाद !
 जब इनकी नुमाईशें खतम हुईं तो शुरु हुआ पर वरिष्ठतमों का वाचन । प्रायोजित होकर बोलने का मजा ही अलग है मित्रो ! केवल अच्छा और कर्णप्रिय ही निकलता है । इस प्रायोजन का मूल्य क्या तय हुआ होगा यह न कभी उजागर हुआ है और न ही होगा । लेकिन जिन-जिन यह प्रायोजन मूल्य नहीं चुकाया उनका प्रोमोशन रह गया । उनके लिए दो-तीन बार यह वाक्य फेंक दिया गया-'हर कृति पर बात करना संभव भी नहीं है ' ।इधर उन 'लाँच होते 10 रॉकेट' पर कुछ फब्तियाँ भी उन मझोले साहित्यिकों द्वारा फेंकी गयी जिनका कैशोर्य पिता की कडाई में बीता था और यौवन पत्नी की जी हुजूरी में बीत रहा था इसलिए यहाँ मौके बेमौके अपनी भडास छाप रहे थे ।

 मध्यकालीन दरबारों में बीच-बीच में कविताएँ , दोहे या फिर साधु-साधु का स्वर उठता होगा पर यहाँ कैमरे , टैब आदि की चमक मिश्रित आवाज ही चलती रही । दरबार बदस्तूर जारी था वरिष्ठतमों की आपसी लल्लो-चप्पो से लबरेज ! बीच में कुछ चमक उभर जाती जब चिपकाए हुए मुस्कान के साथ एक स्त्री , बच्ची के समान इधर से उधर फुदक जाती ।( संचालक महोदय यूँ तो बहुत सा बोल गए लेकिन इस फुदकन पर कुछ नहीं बोले । अधिकारियों से कौन लगे भैया )

शाम रात में बदलने लगी । दरबार की औपचारिकता में जितना होना था हो चुका लोग ऊबने लगे थे ।
ऐसे आयोजनों के अध्यक्ष अपनी उर्जा बचा कर रखते हैं ताकि अंत में बोलते वक्त निंदियाते लोगों को झिंझोडकर अपने शब्द सुनाएं । किसी तरह से सब निपटा , सभा विसर्जित घोषित हो गयी पर अन्य आयोजनों की तरह लोग दरवाजों या जन सुविधाओं की ओर नहीं भागे !! आश्चर्य ! दो-दो, चार-चार के रूप में बताने लगे जैसे कि वहीं रहना हो । कुछ संवाद रोचक थे - ' यहाँ तो कितना आदर्श पेल गया पर उसके अखबार में कभी कोई हेडलाईन देखी जो पत्रकारिता के आदर्श का पासंग भी हो ?'
 ' आऽऽ... नाईस साड़ी ! कहाँ से ली ? दिल्ली हाट ! ओ ऽऽ !'
उधर मंच पर ही धूम्रदंडिकाएँ प्रज्वलित की जा चुकी थी । तभी बँहिया कर लाने वाले संगी भी आ गए - चलना नहीं है मित्र ?
मैं -हाँ ! पर ये सब ?
 संगी - ये सब तो अभी ऐसे ही रहेंगे । अस्सल कार्यक्रम तो अब होगा -पीने का कार्यक्रम ! वैसे ये राजा बड़ा कंजूस है बहुत कम को बुलाया है ! ...तुम न होते तो मैं भी मजा लेता .............!
बाहर हल्की ठंड थी ! संगी का बोलना जारी था -
 लास्ट टाईम जब अमुक जी का बर्थडे था तो उस महिला ने ...अरे वो जो पीछे नहीं बैठी थी उसी ने सारा इंतजाम किया ........मैं भी गया था ! बहुत कुछ होता है उसमें बे । असली समीक्षा तो वहाँ होती है !

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