अक्तूबर 16, 2012

वो त्योहारी रोमांच बुलाता है ....

न मुझे दुर्गा पसंद और न ही मेरी अब पूजा में रुचि है पर दुर्गापूजा का यह समय बहुत लुभाता है । इसके पीछे वो पुराने रोमांचक अनुभव हैं जो बार -बार अपनी ओर खींचते हैं । लोग ये भले ही न माने कि बिहार में भी दुर्गापूजा का अपना मजा और सौंदर्य है जो कहीं से भी कम नही है पर यह बहुत भव्य रूप से वहाँ भी मनाया जाता है । हालांकि बिहार, बंगाल का ही हिस्सा था और बंगाल की पूजा को अंग्रेजों ने भी सराह दिया तो हम औपनिवेशिक गुलामों को कहीं और जा कर देखने और विचार करने की जरूरत ही नही रही । दुर्गा पूजा को मैं एक त्योहार नही कहता बल्कि मेरे लिए यह एक अवसर है और शायद एक समय जब हर तरफ एक अलग ही प्रकार की खुशबू रहती है । इस अवसर कि शुरुआत का धान के फूलों की महक से ही पता चल जाता है और मन अपने आप से त्योहारी हो जाता है । चूंकि हमारे उधर इस समय जहां देखिये वहाँ धान ही धान दिखता है सो उसकी महक ,उसका रंग आवश्यक रूप से इस समय के साथ जुड़ जाता है । यदि धान की फसल अच्छी नही प्रतीत होती तो ये त्योहारी चमक फीकी ही रहती है । और यदि सारा मामला दुरुस्त रहा तो क्या कहिए ! अगतीया भदई धान कट कर आ जाता है, जब बैलों से उनकी दौनी चल रही होती है उस समय बैलों के पैरों के नीचे दबने से धान एक अलग ही गंध छोडते हैं । फिर उस समय कहीं से गरम-गरम मूढ़ी-शक्कर मिल जाए तो मत पूछिए-मुंह में पानी आ गया ! खैर बात तो अभी हम दुर्गा पूजा पर कर रहे हैं । ये अवसर है और ऐसा अवसर तो साल भर बाद ही मिलता था । जिसमे लंबे समय तक इसकी आड़ ले के हम स्कूल के चक्कर से बच जाते थे , खाने के लिए भले ही मांस-मछली और प्याज-लहसुन वाली तरकारी नही मिलती थी पर मौज थी । वैसे भी मांस-मछली कौन सा महीने- डेढ़ महीने से पहले खाने को मिलती थी । बहरहाल , दुर्गा पूजा का मजा तो बहुत था । पता नही अभी भी वैसा मजा आता है या नही ।

 फूल चुनने का आनंद :

 फर्ज़ कीजिये एक ऐसी जगह का जहां कोई बाज़ार न हो जिसमें दिल्ली की तरह फूलों की कोई मंडी या दुकानें न हो । ऐसी जगहें उधर एक नही बल्कि सभी हैं । छोटी जोत वाले सीमांत किसान अपने दालान पर यदि एक बैगन का पौधा लगाते हैं तो मौसम आने पर दोनों साँझ के लिए सब्जी की व्यवस्था हो जाती है वहाँ फूलों वाले पौधे या पेड़ लगाने का तो प्रश्न ही नही उठता है । और पड़ोस के गाँव में जो दो घर माली थे उनसे चार कनेर के फूल और उसके चालीस पत्ते के लिए तीन-चार रूपय का गेंहु देना कहीं से भी अच्छा सौदा नही रहता था । दुर्गा पूजा में जो कभी पूजा का 'प' भी न करे वो कम से कम एक टुकड़ा फूल और एक लोटा पानी तो जरूर चढ़ाता है । सो सब के लिए फूल भी चाहिए और फूल कहाँ मिलते हैं । पर फूल मिलते हैं किसी मंदिर के पास , गाँव के समृद्ध लोगों के दालान पर एक तो वहाँ से फूल लाना टेढ़ी खीर रहती थी दूसरे ऐसा करने वाले आप अकेले नही होते थे । सो हर बार फूल हाथ लग ही जाएँ ऐसा नही था । पर हम इसके लिए एक से एक चालाकियाँ किया करते थे । कभी आधी रात ही निकल जाते थे और कभी कभी तो ऐसा भी किया कि अड़हूल (जिसे आप गुड़हल कहते हैं ) की कोढ़ि(कली) ही तोड़ लेते थे और वो सुबह में वो खिल जाते थे । फिर बहुत बाद में एक फूल आया था 'सिंगार हार' (हर शृंगार ) बहुत खिलता था मह-मह महकने वाला और खूब सारा खिलने वाला ! सिंगार हार के एक दो पेड़ हो जाएँ तो गाँव भर को फूल मिल जाए और फूल होते ही इतने छोटे हैं के कितना चढ़ाओगे बेटा -चढ़ाओ ! बाद में जब शहर में रहने आ गए और किराए के मकान में रहते थे तो वहाँ थोड़ी सी जगह थी जहां हम फूल लगाते थे । आगे जब पिताजी ने अपनी जमीन खरीद ली और उस शहर में अपना भी एक घर हो गया था फिर तो फूल लगाने की पूरी आज़ादी थी और हमने लगाया भी -अड़हूल, सिंगार हार , तीरा-मीरा और पछतीया खिलने वाला गेंदा । लेकिन इसके साथ ही शुरू हो गया अपने फूलों को जोगने का कार्य ताकि कोई और हमारे फूल चुरा न ले - आखिर कितनी ऊंची दीवार चिनवाएंगे आप लोग सब कूद सकते थे वो फूल चुराने का जुनून ही ऐसा होता है कि क्या कहें ! फिर हम अपने फूलों की रक्षा करते और उजाला होने पर बड़े अंदाज़ से तोड़ते थे । बहुत मज़ा था भई !

 तुमने कितनी डायनें देखि :

 दुर्गा पूजा आते ही डायन का डर और उसे देखने की बात चलने लगती थी । दुर्गा पूजा के दौरान माएं अपने बच्चों को शाम के बाद निकलने नही देती थी । पर माओं को भी पता होता था कि बच्चे तो इधर उधर निकल ही जाएंगे सो वे 'डिबिया' की फुनगी जो पूरी कालीख ही होती थी कान के पीछे लगा देती थी । मुझ महानुभाव को भी लगाया गया था भई ! बहरहाल , हमलोगों को बताया जाता था कि चौराहा पर डायनें निर्वस्त्र होकर नृत्य करती हैं । जो वहाँ चला जाता है उसकी जान भी ले लेतीं हैं वे । सुबह चौराहे पर उनके पूजने के सुबूत भी होते थे - सींदूर का निशान , फूल , अरवा चावल ,पूरियाँ । दिन भर हम उन पदार्थों से बच के निकलते थे । शुरू में तो हम मानते थे के वे सच में ऐसा करती थी पर जब हम भी किसी के घर के सामने ऐसा करने लगे थे । जब रात में किसी के दरवाजे के सामने ऐसा कर दिया तो दिन भर गालियाँ सुनने को मिलती थी और ये हम करने वाले ही जानते थे कि वो अनाम गालियां हमें ही दी जा रही हैं । पर हम तो उस समय बुद्ध हो जाते थे किसी की गाली स्वीकार नही की तो हमें नही लगी । इससे डायन जैसे मुद्दे के प्रति जो भय था वो जाता रहा । बाद में हमने कुछ स्त्रीयों को सचमुच ऐसा करते देखा था जिन्हें हम सब पहचानते भी थे लेकिन उनके जीवन इसका कोई नफा-नुकसान मुझे आज तक दिखाई नही दिया है । मुझे लगता है कि वो भी उसी विश्वास में डायन पूजती होंगी जिसमें ये कहा जाता है कि दुर्गापूजा की रातों को ये तमाम तरह के कार्य और पूजा पाठ करने से सिद्धि मिल जाती है । सच मानिए मैं बहुत दिनों तक उनकी सिद्धियों की प्रतीक्षा करता रहा पर आज तक उनको उसी गरीबी और जहालत में देखता हूँ जिसमें वो पहले थीं । हे सिद्धि देने वाली देवी या जो भी हो उन्हें सिद्धि दो ताकि वे अपने परिवार की माली हालत ठीक कर पाएँ , जिस महाजन से कर्जा लिया है उसके घर आग लगा सकें जिसमे उसका खाता जल जाए या वो ऐसा अगिनबान मारें कि उनकी बेटियों की इज्जत छूने वाला वहीं जल के स्वाहा हो जाए ....

शाकाहारी बलि :

 आज तक आपने जानवरों , मनुष्यों की बलि के बारे में सुना होगा क्या कभी सब्जियों की बलि सुनी है ! ये सही बात है साब । ये तो आप को पता ही होगा कि ये पूजा लगभग दस दिनों तक चलती है लगभग इसलिए कि कभी कभी तो आठ - नौ दिनों में ही इसे निबटा दिया जाता है । इसे दस दिनों का मानते हुए आगे बढ़ते हैं । इन दस दिनों में जो सातवाँ दिन होता है उस रात की गयी पूजा को निशा पूजा कहा जाता था । पता नही शायद कहीं लिखा हो के उस रात को जिसने भी अपने यहाँ दुर्गा की स्थापना की है उसे बलि देनी होती है । इस सूत्र से अमूमन हर घर में बलि पड़नी चाहिए । उस समय एक 'छागर' (बकरा ) की कीमत 4-5 सौ रूपय थी जो आज दो-ढाई हजार है फिर बलि कैसे दी जाए ? पर भैया सब का जुगाड़ है इस देश में । काले झींगा [1] (तोरई) को महिषासुर का प्रतीक मान कर उसकी बलि दी जाती थी । उसके लिए शाम से बड़े ज़ोर की तैयारी चलती थी । लोग मोटा-ताज़ा काला झींगा ढूंढ के लाते , कचिया (दराँती , अब तोरई को काटने के लिए कत्ता या तलवार तो चाहिए नही ) को पिजाया जाता था फिर धोकर उसे पवित्र मान लिया जाता था । फिर रात में जब निशा पूजा होती थी तो उससे झींगे को काटा जाता था । रात का पवित्र झींगा सुबह झाड़ू के साथ दो टुकड़ों में बंटा हुआ बाहर आता था फिर किसी राख़ की ढ़ेरी की शोभा बढ़ाता था । कभी कभी ये निशा पूजा , नशा पूजा भी हो जाती थी । इन सब के बाद आता था दशमी का दिन जब नहा धो के नीलकंठ को देखने के लिए लोग निकलते थे । हमें भी तैयार कर के भेज दिया जाता था । कहा जाता था कि नीलकंठ देखने से यात्रा बढ़िया होती है ... पर भैया मुझे बालक को तो कहीं जाना भी नही होता था ।उसी दिन शाम के समय मामाजी के साथ हम मेला जाते थे । बरसम के मेले की अब बस धुंधली यादें हैं - सीता मौसी गोदी में उठा कर ले जा रहीं है । आज सीता मौसी से मिले कितने ही साल हो गए ! कितनी ही यादें ताज़ा हो गयी इस दुर्गा पूजा के बहाने आज तो । इसके नितांत रोमांचक अनुभवों और मौज को आज भी जीने का मन करता है .... ।

[1] हमारे यहाँ तोरई को झींगा कहा जाता है । इसकी दो किस्में होती है एक काली जो आम तौर आप भी खाते हैं पर इन्हें हमारे यहाँ नही खाया जाता । दूसरी हल्के हरे रंग की किस्म होती है जिसकी बेल हर किसी के घर -आँगन में मिल जाती है ।

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