दिसंबर 25, 2013

ग्लोरीफिकेशन ऑफ ए फेज़ : भाग दो


दिल्ली में कितने ही लोगों से मिलने के वादे कर रखे थे वे किए गए वादों की तरह ही रह गए और मैं किसी से नहीं मिल सका । न मिल सकने का उतना अफसोस नही है जितना लोगों के न समझ पाने का है कि मैं सचमुच बीमार था । खैर मैं बीमार रहूँ या ठीक काम पर लौटना ही था । दवाओं ने असर करना शुरू किया था लेकिन  जैसा कि मेरे परिवार में होता है ठंड और बुखार जाते जाते भयंकर खांसी दे के जाती है । मेरी माँ खाँसते खाँसते बेदम हो जाती है । और प्राप्त सूचना के अनुसार वह अभी भी इसी खांसी की शिकार है । मैं भी खाँसने लगा और कई बार खाँसना इस तरह ज़ोर पकड़ता कि कक्षा में एक पंक्ति भी बोलना दूभर हो जाता ।

शुक्र है मैं अभी अपने घर पर नहीं हूँ या कि यहाँ लोग एक दूसरे की जिंदगी में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते हैं । अन्यथा इस खांसी को छुड़ाने के लिए क्या क्या न खाने-पीने को कहा जाता ! मैं यहीं से अंदाज़ा लगा सकता हूँ माँ ने अपनी खांसी छुड़ाने के लिए कितनी बार तुलसी, हर-शृंगार के के पत्तों का काढ़ा पिया होगा, काली मिर्च या लौंग मुंह में रखा होगा , मछली का शोरबा पिया होगा होगा । और जब वह रात को उठकर खाँसती होगी तो पिताजी दबे हुए गुस्से से कहते होंगे कि कितनी बार कहा है दिन भर गले में गरम कपड़ा लपेटकर रहा करो । कई बार मैंने माँ को दिन भर गले में गरम कपड़ा लपेटे देखा है लेकिन इन तमाम उपायों का कोई फायदा नहीं होता देखा । हाँ एक बात और हमारे यहाँ यदि पड़ोस में यदि किसी कि खांसी ठीक हो जाय या कि उसके कहीं के किसी रिश्तेदार की खांसी ठीक हो जाए तो उसकी स्थिति लगभग खांसी के डॉक्टर की हो जाती है । लेकिन हास्यास्पद स्थिति तब हो जाती है जब इस मौसम में खांसी की दवाई बताने वाला अगले मौसम में महीने भर खों खों करता रहता है । अभी बहुत दिन नहीं हुए । हमारे सामने एक चाची (सहरसा में रहती हैं इसलिए चाची और दिल्ली में होती तो आंटी या आंटी जी ) जब भी मेरी माँ को खाँसते देखती तो अपनी गैलरी से आधा धड़ लटकाकर माँ को कई सलाह दिया करती । अगली बार खुद उनकी ही खांसी दो-तीन महीने तक चली थी ।

इसलिए मैं इस बार घरेलू उपायों और दादी माँ के नुसख़ों को मानने वाला नहीं था । एक नए डॉक्टर के बारे में पता चला जिससे हमारे विद्यालय के ही एक अध्यापक ने अपनी खांसी का इलाज़ करवाया था । भारत में तो डॉक्टर से लेकर नीम हक़ीम तक के बारे में ऐसे ही पता चलता है । डॉक्टर ने कुछ महंगी दवाइयाँ दी और एक अजीब से स्वाद वाला कफ का शर्बत । जब मैंने उपचार लेना शुरू किया तो गज़ब ! दिन भर आलस रहने लगा । पलकें ऐसी कि हमेशा नींद में हो । कक्षा में मैं क्या पढ़ा रहा था मुझे खुद पता नहीं चल पाता । जहां दो कक्षाओं के बीच समय मिलता स्टाफ़रूम में अपनी टेबल पल ही सिर टिका के सो जाता । मैं जनता था कि ऐसा उन दवाओं के कारण हो रहा है लेकिन एक तो खांसी लगभग ठीक हो गयी थी दूसरे डॉक्टर के पास जाने का समय नहीं मिल पाता कि जाकर उससे अपनी दशा कह सकूँ । इसलिए जबतक दवाएं चलती रहीं नींद का जोरदार असर भी तबतक रहा ।

आगे दवा तो खत्म हो गयी  उसके साथ खांसी और हमेशा नींद में ही रहने का एहसास ही लेकिन आलस अभी तक तारी है । लिखने पढ़ने और कहीं हिलने डुलने का मन नहीं करता है । जो लिखना पढ़ना यात्राओं और बीमार होने की वजह से लगभग महीने भर से छूटा था उसमें इस नए इलाज़ ने और वृद्धि कर दी । लिखना पढ़ना तो दूर की बात है साधारण दैनिक काम जैसे कि नहाना और दाढ़ी बनाना तक रुका हुआ था । दिन भर लेटे रहना और नहीं तो सो जाना । किसी तरह कक्षाएं खत्म कर के आना और फिर सो जाना । वो तो भला हो दिसंबर महीने का कि इसमे कुछ परीक्षाएँ पड़ गयी और उन कक्षाओं को पढ़ाना नहीं पड़ा ! इस बीच क्रिसमस की छुट्टियाँ और पड़ गयी सो आलस को बढने का पूरा अवसर भी मिल गया ।


इस बीच एजुकेशन विषय से नेट देने की सोच रहा था । जब फार्म डाल दिया तब सोचना कैसा ! पर हालात ये हैं कि तैयारी करना और समझना तो दूर ध्यान तक एकाग्र नहीं कर पा रहा हूँ । अभी परसों मैंने सोचा किसी को बता दूँ कि मैं किस हालत में हूँ ताकि यदि परीक्षा में पास न हो पाऊँ तो वह व्यक्ति मेरी हालत का गवाह रहे । बात हुई और उधर से गवाह रहने के बजाय किसी तरह मुझे सही हालत में लाने के प्रयास के तौर पर ब्लैकमेल किया जाने लगा । खैर जो हो रहा था वह मैं तो समझ ही रहा था पर शरीर और मन अब तक इस हालत में नहीं आ पाया है कि कुछ करने या पढ़ने का प्रयास कर सके । डरता हूँ कि कल से जब स्कूल शुरू हो जाएगा कक्षाओं में जाना पड़ेगा तब क्या होगा । वैसे हिन्दी के अध्यापक के पास बिना तैयारी के ही कक्षा में जाने का अवसर रहता है लेकिन अपनी आदत वैसी रही नहीं । लगता है कुछ दिनों के लिए वही हिन्दी का मास्टर बन जाऊँ जो कक्षा में जाकर पूछता है कि हाँ तो कल मैं कहाँ पढ़ा रहा था

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