दिसंबर 07, 2013

एक शहर में कुछ दिन

पिछले कुछ दिनों में एक बात ने बहुत परेशान किया है कि भई कितनी भाषाएं जानी जाएँ । कितनी कि काम चल सके । जब बहुत ज्यादा यात्रा करनी हो तो यात्रा के हिसाब भाषा का गंभीर असंतुलन पैदा हो जाता है । उस समय उन तमाम दावों और दलीलों की हवा निकल जाती है जिनमें यह कहा जाता है कि भारत में हर जगह हिंदी समझी जाती है और सबसे बड़ा तो ये कि अंग्रेजी विश्वभाषा है । इन यात्राओं में हमने देखा कि न तो विश्वभाषा काम देती है और न ही देश की संपर्क भाषा । तब लग जाता है कि यार हम तो जो भाषा सीख लें लेकिन वह हमेशा काम देंने वाली नही है । इधर यात्रायें बहुत की हैं और ये यात्रायें ऐसी हुई हैं कि ज्यादातर दक्षिण भारत के भीतरी इलाकों में जाना पड़ा है । एक बार को दक्षिण भारत के बड़े शहरों में अंग्रेजी बोल के काम चला लिया जाये पर उन शहरों के कुछ किलोमीटर दायें बाएं निकल गए तो साहब फिर शहर क़स्बा या गाँव कुछ भी हो आप समझाते रह जाओ सामने वाले भी समझाते रह जायेंगे । अंतिम किस्सा तो जनाब इसी आंध्र प्रदेश का है जहाँ अभी टिका हुआ हूँ ।

उस किस्से पर जाने से पहले थोड़े समय में इस शहर और इसकी संभावनाओं को देखते हैं जो शायद इसलिए जरुरी जान पड़ता है कि ये शहर दक्षिण के उन शहरों में से है जिसका जिक्र बहुत ज्यादा नहीं आता है ।

एक शहर है गुंटूर । वैसा ही जैसा एक शहर हो सकता है ।  बहुत सी गाडियों की चीख पुकार , उनकी एक दुसरे से आगे निकल जाने की होड़ और उनके बीच से स्कूटी से निकल जाती खुशनुमा चेहरे वाली युवती सब है इस शहर में । हाँ इस बीच बड़ी - छोटी दुकानों और लाइन से लगे कोचिंग संस्थानों की भीड़ भी है । इन कोचिंग में भीड़ सी लगी देखी है सुबह सुबह और उन चेहरों में कहीं अपना चेहरा तलाशने की कोशिश की जो पंद्रह साल पहले इसी तरह इंटर की कोचिंग के लिए सहरसा की गलियों में घूमता था । छात्रों के चेहरों पर वही किशोर भाव लेकिन यहाँ दबाव ज्यादा दिख रहे थे । हो सकता है ऐसा ही दबाव सहरसा के कोचिंग जाने वाले छात्रों पर रहा हो लेकिन चूँकि बहुत दिनों से वहां गया नही इसलिए उन भावों की कोई जानकारी नहीं है । आगे ये दबाव बहूत सी परीक्षाओं के पास करने की है । नौकरी कम हुई लेकिन बहुत सी नयी परीक्षाएं आ गयी और उनकी तैयारियों के लिए कोचिंग ।

कोचिंग के बोर्ड पर सबकुछ तेलुगु में लिखा है पर बैंक, एसएससी ,आइ बी पी एस आदि अंग्रेजी में । ये सब अंग्रेजी में लिखकर क्या सन्देश दे रहे हैं यह जानना बहुत कठिन नहीं है । ये तो उस सपने के लिए है जिसको पूरा करना अंग्रेजी के हाथ में माना जाता है । हिंदी हो या कि तेलुगु मैं इन सबको हाशिये से ऊपर की भाषा नहीं मानता हूँ और शायद इससे ज्यादा इन सबकी स्थिति है भी नहीं । तेलुगु में आदमी सपने तो देख सकता है लेकिन उन्हें पूरे करवाने की हैसियत इसकी नहीं रही । इसकी ही क्यों किसी भी भारतीय भाषाओं की यह औकात नहीं रह गयी कि सपनों को पूरा करने में मदद कर दे ।

भारतीय भाषाएँ बहुत जल्दी से अपनी हैसियत खोती जा रही हैं । हम चाहे लाख अपनी भाषा को लेकर उठते बैठते रहें पर ये सब अब कुछ कौड़ियों के बराबर हैं । यहाँ ये कौड़ियाँ चिनुआ  अचबे के अफ्रीका की तरह ही है जहाँ स्थानीयता ने बड़ी जल्दी  अपना स्वाभिमान खो दिया । यहाँ गुंटूर के कोचिंग सेंटरों को मैं उन दुकानों की तरह देख रहा हूँ जहाँ पौ फटते ही सपनों की बिक्री शुरू हो जाती है और खरीददार इस भाव में आते दीखते हैं कि सपना अब पूरा हुआ कि तब । पर यह इतना ही सहज होता तो कोचिंग सेंटर वाला भी कोचिंग के बदले सरकारी नौकरी ही कर रहा होता ।

गुंटूर को बचे हुए आंध्र की राजधानी के काबिल माना जाता है इसलिए लोग कहते हैं कि जबसे राज्य के विभाजन की बात चली है तब से इन कोचिंग सेंटरों ने कमर कस ली है वह भी इसलिए कि राजधानी बने तब तो जरुरत है ही पर यदि  विजयवाड़ा से राजधानी की लड़ाई हारने की नौबत भी आ जाये तो भी दोनों के बीच की कम दूरी इस शहर को बहुत महत्वपूर्ण बनाये रखेगी । उस स्थिति में और कुछ चाहिए न चाहिए अंग्रेजी चाहिए । क्योंकि गुंटूर में सिकंदराबाद बन्ने की क्षमता देख रहे हैं कोचिंग वाले । इसलिए वे अपने यहाँ अंग्रेजी सिखाने की विशेष व्यवस्था कर रहे हैं । इन बहुत सी स्थितियों में कोचिंग कोई धर्मार्थ काम नही  कर रहे बल्कि एक और नया भ्रम बेचकर पैसे पीट रहे हैं । और इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय भाषा पीछे छूट रही है ।

पर इसी गुंटूर में इसी बाज़ार को अपने लिए  तेलुगु भाषा को इस्तेमाल करते हुए भी  देखा जा सकता है । हालाँकि बाजार के सम्बन्ध मं यह कोई नयी बात नहीं है लेकिन वही तेलुगु बाजार के दबाव में लोगों के संदर्भों से बाहर हो रही है और दूसरी तरफ वही स्थानीय भाषा बाजार की मांग के दबाव में बहुराष्ट्रिय कंपनियों की संपर्क भाषा बन रही है । सभी बड़े ब्रांड यहाँ तेलुगु में अनूदित होकर लोगों को बाजार तक लाने का कार्य कर रही है । इससे भी घाटा भाषा का ही है और फायदा बाजार का । लेकिन इसकी यह जटिलता इस स्थानीय भाषा को सीमित कर रही है जहाँ कुछ ही शब्द होंगे जिनसे काम चलाया जायेगा और बहुत सी स्थितियों के लिए न तो संबोधन रह जायेंगे और न ही नाम पर कोचिंग और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उसी तरह काम करती रहेंगी जैसे पहले करती थी ।

इस शहर का होना इसके बड़े या कि छोटे होने में नहीं है बल्कि विजयवाड़ा के पास होने में है । जैसे जैसे गुंटूर के राजधानी बनने की उम्मीद कम होगी इसके विकास की सम्भावना बढ़ेगी । क्योंकि विजयवाड़ा के पास फैलने का स्कोप नहीं है और गुंटूर अभी बढ़ रहा है जो ज़ाहिर है सबको आकर्षित करेगा ही । उस  बैकड्राप में यहाँ का भाषाई संतुलन बहुत कुछ कहता है । इतना कि भाषा जिन्दगी बदलने वाली बन जाय । कोचिंग संस्थान तेलुगु को 'रिप्लेस' करने में लगे हैं ताकि वे अपने बाजार को एक 'मोमेंटम' दे सकें ।

यह शहर बहुत सी संभावनाओं से भरा है पर जहाँ तक उन संभावनाओं की बात है वह यहाँ की स्थानीयता की कीमत पर टिकी है । अब देखने की बात रह जाती है कि यह स्थानीयता जो टूटनी शुरू हो गयी है कहाँ तक अपने को बचा पाती है । कल थोड़ी बहुत घुमा फिरि और बातचीत के बीच ऐसे लोगों की भरमार देखी जो 'सॉफ्ट स्किल' 'लाइफ स्किल' सीखने की बात कर रहे थे । पता नहीं क्यों वे इस बात पर जोर दिए हुए हैं कि यहाँ के बच्चों में इन सब की कमी है । ये अमेरिकी चिंतन को सीधे लागू कर देते हैं बिना यह सोचे कि ये गुंटूर है ! कम से कम हैदरबाद भी होता तो मान लिया जाता कि अब बच्चों पर से माँ बाप का ध्यान हट गया है और वे बहुत व्यस्त हो गए हैं । यहाँ तो ससुरा बाप कुछ काम धाम ही न करता तो किस बात का व्यस्त भैया । खैर ये इन कोचिंग वालों और चंद मनेजमेंट वालों के सपनों को पूरा करने वाला शहर बन रहा है तो चाह कर भी इसे कोई आयातित मानसिकता से बचा नही सकता क्योंकि प्रभावित करने वाली स्थिति में वही हैं ।

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