नवंबर 24, 2013

सौंवी पोस्ट


मेरे पास मेरी एक तस्वीर है । उसमें मैं बहुत बच्चा हूँ । काफी पुरानी वह तस्वीर धुंधला सी गयी है इसके बावजूद उसमें साफ़ नज़र आता है कि मेरे बाल कितने लम्बे थे । कल जब बाल बनवा रहा था तो अचानक याद आई वो तस्वीर और याद आया पहली बार बाल बनवाना ।

बहुत दिन हो गए जब नानी के यहाँ रहता था । ये रहना ठीक उसी तरह था  जैसे देहातों में कोई अपने नानी के यहाँ रहता है । कहने का अर्थ यह कि वहां का पूरा वातावरण यह अहसास दिलाता था कि आपको यहाँ रखा जा रहा है तो वह एक भरपूर एहसान है । अपने बाल बनवाने की पहली याद बहुत पुरानी है पर बचपन के बहुत से रंगीन चित्रों की तरह वह अब भी ताज़ी है । लगभग पांच साल की उम्र तक मेरे बाल काटे नहीं गए थे क्योंकि पारिवारिक मान्यता मुंडन की थी । उस उम्र तक आते आते मेरे बाल बहुत लम्बे हो गए थे ।  इतने लम्बे कि लड़कियां तक चिढ जाएँ । जब कभी नदी या पोखर में मैं नहाने जाता था तब बालों के छोर में छोटी छोटी मछलियाँ लटक जाती थी । जब पहली बार किसी ने देखा होगा और दूसरों को बताया होगा तब से मेरे बाल मेरी मौसियों और हमउम्र मामाओं के लिए कौतुक जैसे हो गए ।

और मुझे वह दिन भी याद है जब महीने - डेढ़ महीने बाद मेरे बाल कटने वाले थे तो मेरे बालों की याद को रखने के लिए फोटो उतरवाये गए । जिस दिन फोटो के लिए मैं ले जाया गया उस दिन पप्पू मामा ने कंधे पर बिठाकर नदी पार करवाई थी । मेरी माँ , नानी और एक दो अन्य स्त्रियाँ जो निश्चित तौर पर नानियाँ ही होंगी मेरे पिताजी के साथ सहरसा गए थे । ये सारे लोग इसलिए नहीं गए थे कि बालों में मेरी फोटो ली जाएगी बल्कि इसलिए गए थे कि मेरी दादी मुझे और मेरी माँ को देखने आने वाली थी मेरे गाँव से । दरअसल मेरी माँ का गौना लम्बे समय तक नहीं हुआ था सो हमलोग गाँव नहीं जा सकते थे । गौना जब होगा तब होगा इस बीच वह बुढ़िया ( दादी) मर गयी तो बहू और पोते का मुंह देखे बिना संसार से विदा हो जाएगी । इसलिए तय हुआ कि शहर सहरसा जहाँ आज मेरा परिवार रहता है वहीं जमा होकर सभी एक दूसरे से मिल मिला लें । और इसी बहाने मेरी फोटो भी खिंच जाएगी ।

मैं बहुत रोमांचित था केवल इसलिए नहीं कि मेरी फोटो खिंचेगी बल्कि इसलिए कि अपनी दादी से मिलूँगा । दादी मेरे लिए एक कौतुहल का विषय थी क्योंकि जहाँ मैं अब तक रहा था वहां सभी मेरी नानी थी और वे सब किसी न किसी की दादी । इसलिए दादी से मिलने का रोमांच मन में  था । जब उनसे मतलब एक बुढ़िया से मिला जिसे मेरी दादी कह कर मिलवाया गया और जिसे मेरे पिता ने भी माँ कहा तब मैंने पाया कि वह मुझसे मिलकर उतनी रोमांचित नहीं थी जितनी कि मेरी नानी और उसकी सास एवं एक दो अन्य स्त्रियों से । मेरी माँ तो खैर घूँघट में लिपटी थी सर हिलाने के अलावा कोई और तरीका जवाब देने का न तो उन्होंने अपनाया और न ही उन से अपेक्षित ही था । बहरहाल उस बुढ़िया स मिलने का भूत उतर गया और महावीर चौक सहरसा के महावीर मंदिर का वह हाता जिसमें आज थूकने भी न जाऊं मेरे लिए समय काटने का  एक मात्र जरिया रह गया । मैं जल्दी से अपने नानी के यहं लौट आना चाहता था ताकि अकेलापन कम हो सके । और कुछ नहीं तो कम से उन लोगों के साथ 'ढेंगा-पानी' ही खेल लूँगा जो मेरे साथ रोज खेलते थे और मेरे आने का इन्तजार करते थे ।

खैर मैं लौटा भी और फोटो भी खिंची । उसके बाद बहुत दिन हुए जब सहरसा में रहने लगा तब उस महावीर मंदिर को देखता और आज भी देखूं तो अपने पर तरस आता था । बूजुर्ग चेहरों के बीच एक बालक सा मैं कैसा उदास कैदियों सा लगता होऊंगा ।  उस मंदिर के पास से आज भी गुजरता हूँ तो अपने को उसकी 'ढढी'(बांस की बत्तियों का घेरा ) के पास गुमसुम सा पाता हूँ । यह तो तय ही है कि वह मैं नहीं होता हूँ पर अपने जैसे किसी बच्चे को उधर खेलता कूदता पाता हूँ । वह मंदिर अज भी इस तरह के मेलजोल का गजब स्थान बना हुआ है । शहर तो आखिर शहर ही है वह अपने यहाँ नहीं रह रहे लोगों को अलग ही तरह से देखता है ।

थोड़े दिनों बाद तस्वीर आई तो मैं ठीक उसी उदासी से भरा था जो उस दिन महसूस हुई थी । दादी के प्रति थोड़े से नकारात्मक भाव उसी दिन बन गए जो आगे चलकर मजबूत ही हुए । और ताज्जुब ये कि जिस दादी के मरने की आशंका जताई जा रही थी वह अभी तक जीवित है और बिना किसी लाग-लपेट के परिवार के अन्य सदस्यों को गालियाँ देती हैं जैसे नुक्कड़ पड़ बैठा कोई पागल हो ।

आखिर मेरी माँ का भी गौना हुआ और हमलोग अपने गाँव पहुंचे । एक दो दिनों के भीतर ही मेरे मुंडन का आयोजन था । वहां अपने गाँव जाकर मैंने महसूस किया कि एक गोद से दूसरे गोद में जाना क्या होता है । और जिस दिन मेरा मुंडन था उस दिन तो मैं हीरो था । उस बड़े आयोजन में बड़ा सा भोज रखा गया था । बहुत से कपड़ों और बहुत से हजार रूपए भी मिले । मिले हुए कपड़ों में से दुसरे बच्चों को दिए जाने के बाद जो बचे वे मेरे थे और रूपए पिताजी के । इस सारे आयोजन के कुछ दिनों के बाद हमें वापस नानी के यहाँ आना था क्योंकि यहाँ मामा का गौना था । आने से पहले माँ को दहेज़ में मिले ड्रेसिंग टेबल के पास मैं कई बार खड़ा होता और अपने नए चेहरे को आत्मसात करने की कोशिश करता था । उससे पहले का चेहरा एक लम्बे बालों वाले एक लड़के का था जो दूर से किसी लड़की के होने का ही भान देता था । और एक दो बुजुर्ग की बात सुनकर तो बहुत गुस्सा भी आता था क्योंकि उनको लगता था कि मेरे माता पिता इसलिए मेरे बाल बढ़ा रहे हैं क्योंकि वे मुझे लौंडा नाच का नटुआ बनायेंगे । इतना सुनते ही मैं बहुत दुखी हो जाता था और चाहता था कि ये बाल जो कल कटने हैं आज कट जाएँ । पर ये इतने भी आसन नहीं था । क्योंकि उन बालों के कटने के लिए मेरा अपने गाँव जाना जरुरी था उसके लिए मेरी माँ का गौना होना और उसमें दहेज़ देने के लिए नाना की अंटी में पैसा होना ।
जब नाना के हाथ पैसे आ गए तब वह बहुप्रतीक्षित गौना दिया गया । और फिर मेरा मुंडन । उस बाल काटने वाले का चेहरा मैं बूल नहीं सकता जिसने पहली बार मेरे बाल काटे थे । आज भी उनके बच्चे उधर हमारे गाँव में बाल ही काटते हैं । उनके परिवार से कोई बाहर गया भी तो केवल इसलिए कि बाल काटने से गाँव में नकद आमदनी नहीं होती और जो भी होती है वह इतनी नहीं कि सबका पेट चल जाये । खैर , मेरे मुंडन कें बहुत से लोग आये थे । इतने कि लग सके कि कोई बड़ा आयोजन है और शायद इसलिए भी यह सब याद रह गया है । यदि वह एक साधारण सा आयोजन होता तो शायद ही इतने दिनों तक याद रह पाता । बाल काटने के वक़्त गीत गए जा रहे थे । मेरी माँ और पिता दोनों ही पक्ष की स्त्रियाँ आपस में हंसी मजाक कर रही थी और डहकन के गीतों में एक- दूसरे को नाई को बाल काटने के एवज़  में दे रही थी । माँ के पक्ष से गयी स्त्रियों की संख्या कम थी इसे भी ध्यान में रखना चाहिए । मेरे बाल कटे तो नए कपडे, सर पर पीले तौलिये का साफा और पता नही क्या क्या खातिर की गयी मेरी । पर सबसे ज्यादा ख़ुशी तब होती थी जब पैर छूने के एवज में कुछ न कुछ रूपए देते थे ।

तब से बालों के कटने का सिलसिला चल पड़ा । कल जब बाल बनवा रहा था तो नहीं सोचा था कि अनायास ही एक साथ इतने सन्दर्भ याद पड़ जायेंगे । पर लिखने लगा तो एक से दूसरे में आते जाते बहुत से ऐसे बिंदु मिले जहाँ से हजार और जगह जाया जा सकता है । शायद इसी बाल काटने पर एक और छोटा सा कुछ बन जाये ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. Interesting description of childhood emotions.If I were there I wud have teased u saying Ladki ladki.hehehe

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  2. Interesting description of childhood emotions.If I were there I wud have teased u saying Ladki ladki.hehehe

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