मई 01, 2013

शादी , चाँद और कुछ इधर उधर की


पांचवें दिन का चाँद था बहुत मद्धिम, ऐसा लगता था आकाश के उत्तर पूरब में किसी ने कभी एक लगभग तिकोनी सी लकड़ी जलायी हो और उसकी आग अब बहुत धीमी पड़ती जा रही हो, बुझते अंगारे-सा ! चाँद के इस तिकोनेपन में बहुत सी गोलाइयाँ भी थी पर वो गोलाई अंततः तिकोन में मिलती थी । सड़क पर चलते हुए यूं तो बहुत सी रोशनी थी पर ऐसा चाँद बरबस अपनी ओर देखने को विवश करता ही था । उपर से मैं जिस सीट पर बैठा था वहाँ से दायीं ओर देखने का विकल्प सरल था । रात जब छा रही हो तब शहर से दूर सफर करते जाने में जो सुख मिल रहा था उसको कह देने के लिए लगता है एक नयी भाषा चाहिए । भाषा को मैं कई बार बहुत सीमित पाता हूँ साथ ही साथ इसका सामर्थ्य भी दिखता है कि कुछ हुआ न हुआ , कुछ दिखा न दिखा झट से भाषा ही ढूँढी जाती है ।
 चाँद हमारे रास्ते से बहुत दूर खड़ा था पर उसके रहने से लगा कि वो भी साथ में चल रहा हो उसी गति से जिस गति से गाड़ी भाग रही थी । हम एक शादी के लिए जा रहे थे । यूं इस शादी को उस तरह नहीं माना जा रहा था जिस तरह से आम मैथिल शादियाँ होती हैं । इस शादी में माँ-बाप तो राजी थे पर क्योंकि गाँव के लोगों की भागीदारी न्यूनतम थी इसलिए उनकी नाराजगी हवा में लगातार बनी हुई थी । इसे एक ही नाराजगी में नहीं रखा जा सकता बल्कि वो कई नाराजगी यां थी जो एक साथ चल रही थी जैसे एक ही शादी के कई मुंह हों । हर रीति के निष्पादन में यही स्थायी भाव चल रहा था । इसलिए जब गाड़ी शादी के लिए चल पड़ी तो एक बड़ी राहत हल्के हवा के झोंके की तरह चेहरे पर फैल गयी । पर ये तो एक दो चेहरे से झलक ही जाता था कि कुछ अलग करने के लिए जाने की हिम्मत यदि हो भी तो मिथिला की भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं है । शादी में जो भी जा रहे थे सबको पुचकारने की जरूरत थी , सबको बहलाने की जैसे शादी न बल्कि कोई पाप किया जा रहा हो । ये सारा मामला अंततः सामाजिक भागीदारी को सीमित करने के खामियाजे के रूप में घट रहा था । कम से कम शादी जैसा व्यक्तिगत विषय तो इतना सामाजिक है कि समाज अपना जरा-सा हक़ खोने के लिए तैयार नहीं है । वजह यही थी कि मन बार बार गाड़ी से बाहर हो जाता था । बाहर , अंधेरे का बाहर था तेज भागती गाड़ी, ऊपर कोने में टिमटिमाता तिकोना चाँद, शिरीष के ऊंचे पेड़ों से नीचे गिरती धीमी पर मोटी महक । हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिरीष के फूल निबंध की याद न चाहते हुए भी आ गयी । लेकिन सड़क पर ये मोटे मोटे  पेड़ कितनी दूरी तक रह सकते हैं ! इसके बाद दोनों ओर खड़ी भांग की मोटी झाड़ियों से उठती तीखी गंध का राज फैल गया ।
चाँद अब उस पौधे की तरह था जिसने पूस की भयानक ठंढ काट ली थी थोड़ा सा अपने पैरों पर खड़ा हुआ सा । एक और परिवर्तन चाँद में यह भी आया था कि वह अब कोने पे टिका नहीं था वह अब बड़ी तेजी से हमारे पीछे भाग रहा था । इधर शादियों के मौसम में एक दो दिन चार दिन छोड़ के या कभी कभी लगातार शादियों के दिन पड़ते हैं और उनमें एक ही दिन कई कई शादियाँ होती हैं । हालांकि ऐसा भारत में कई जगह होता है । एक और मामले में भारतीय शादियाँ एक ही जैसी होती हैं बहुत सारा खर्चा और नशेबाजी ! जब गाड़ी आबादी के बीच से गुजरती तो जगह-जगह शादियों की सजावट दिखती थी । कहीं कहीं सड़क पर सिर पर ट्यूब लाइट रखे बच्चे खड़े थे और उनके बीच अपने-अपने तरीके से नाचते लोग । उनके नृत्य अपने ही तरह के होते हैं और इन्हें देखते हुए ये कहा जा सकता है कि गंगनम वालों ने पहले वीडियो बना लिया नहीं तो यह नाच भी अलग तरह का ही होता है भारत के बहुत से हिस्सों में ।
सड़क पर बिखरे प्लास्टिक के गिलास, शीशे की बोतलें , बियर के डिब्बे आपकी ओर गौर से देखते हैं उनकी फटी हुई आँखें देख कर उनके नशे का पता चलता है । आगे बढ़ते ही गाड़ी के सामने एक मोटर साइकिल आ जाती है ड्राइवर बार बार हॉर्न बजते हुए रास्ता चाहते हैं पर आगे के वाहन में कोई हरकत नहीं होती । शोर बहुत हो गया तो मोटर साइकिल सवार ने वहीं उतर के कई झन्नाटेदार गालियां ड्राइवर को दे दी ! इस बीच एक लंबा जाम लग गया । दो चार उत्साही लोगों ने प्रयास कर के उस मोटर साइकिल सवार को रास्ते से हटाने लगे । इस प्रयास में वह सवार कुछ यूं रास्ते से हटा जैसे बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो और वह अपना अधिकार छोड़ रहा हो ।
अब तक हम सिंहेश्वर पहुँच चुके थे । एक मित्र ने गूगल किया था थिएटर कंपनियों के संबंध में तो उसे इस स्थान के कुछ पहचान भी मिले थे। गूगल पर सबकुछ इतना सकारात्मक ही क्यों मिलता है ! यहाँ एक मंदिर है बड़ा सा । प्राचीन काल का स्थानीय मंदिर कालांतर में आसपास के एक बड़े तीर्थ स्थल के रूप में बदल गया । इसकी मार्केटिंग का आलम यह रहा कि इसे ज्योतिर्लिंगों से जोड़ने का भी प्रयास किया गया । कहा गया कि सती की लाश का एक टुकड़ा यहाँ भी गिरा और उसकी रक्षा के लिए एक शिवलिंग रातोंरात यहाँ अवतरित हो गया । और इत्तिफाक़ देखिये कि सती के शरीर का टुकड़ा गिरने से सती के नाम से यह स्थल नहीं जाना गया बल्कि उसकी रक्षा करने वाले पुरुष नाम शिव से यह स्थल प्रसिद्ध हुआ । मंदिरों के मामले में ये रातोंरात वाला किस्सा गज़ब है हर जगह ये मंदिर रातोरात ही बन जाते हैं । समय बीतने के साथ प्रखर आदि विशेषण इस शिवलिंग से जुड़ गए ।
यहाँ फागुन के महीने में एक मेला लगता है मेला बिहार राज्य के पर्यटन नेटवर्क का भी हिस्सा बन गया है । इस मेले में बहुत से अन्य मनोरंजन के साधनों के साथ साथ थियेटर कंपनियाँ यहाँ का मुख्य आकर्षण होती हैं । इनमें अंग्रेजी के शब्द थियेटर जैसा कुछ नहीं होता । इन कंपनियों में रात के बीतने के साथ माहौल जमता जाता है फिर नृत्य – गीत अर्थहीन हो जाता है और मंच पर नाचती लड़कियां एक एक कर अपने कपड़े उतारने लगती हैं । यहाँ जब ये कहा जाता है कि वे अपने कपड़े उतारने लगती हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वो ऐसा करते हुए पूरी तरह से अपने नियंत्रण में होती हैं या ये सब अपनी मर्जी से करती हैं । वे अपने अन्तःवस्त्रों में नाचती हैं या नाचने के लिए मजबूर कर दी जाती हैं । ये मजबूर करना बहुत बार बंदूक की नोंक पर भी होता है । यहाँ रेणु की कहानी तीसरी कसम के हीरामन और उसके दोस्त नहीं होते जो अपने बैलों को हाँकने वाली दुआली से उपद्रवीयों को पीट दें । वहाँ तो सभी उपद्रवी हो जाते हैं । क्योंकि मजा उसी का है । कई बार यह और वीभत्स रूप ले लेता है जब थियेटर और मेला प्रबंधन भी निरीह हो जाए । शाम में या उससे पहले उसी के टिकटों की बिक्री ज्यादा होती है जो ज्यादा से ज्यादा खुलापन देने का दावा करे । कई बार टिकट खरीदने के क्रम में भी भयानक लड़ाइयाँ हुआ करती हैं । बचपन में काफी सुन रखा था इन थियेटरों के संबंध में पर जाने दिया नहीं जाता था । बाद में एक बार गया तो देखा कि मुहल्ले के जो तोंदीयल चाचे हमें इसमें नहीं जाने की हिदायत देते थे वो मजे से अगली पंक्ति में बैठे थे । बहरहाल उन लड़कियों की ये नौकरी थी जिसे करने में उन्हें मजा आता हो ये कह नहीं सकता पर और पता नहीं उनका परिवार हो भी या नहीं फिर वे अपने परिवारों में लौटती भी हो या नहीं ये सब नहीं पता । इस कोने से यदि इस देवस्थल को देखा जाए तो ये धार्मिक नजरों में भी पाप ही होगा जो उस देवभूमि पर होता है । खैर इतना विचार कौन सा धर्म करता है और उनके संचालक तो गज़ब की संकीर्णता लिए रहते हैं उनके लिए ये सब देखने की चीज नहीं हैं । हद तो तब है जब वे भी इन पर टिप्पणी करते हुए उन लड़कियों को ही दोषी ठहराते हैं ।
सिंहेश्वर एक धार्मिक जगह है और वहाँ ठीकठाक खुलापन भी है फिर वहाँ  तथाकथित प्रखर देवता भी है तो उसके समक्ष की शादी बहुमान्य हो जाती है । इधर तलाक का चलन न के बराबर है सो इसकी जांच हुई नहीं है । यहाँ की शादी के संबंध में यह एक आम धारणा है कि ये सीमित और सादी होती हैं । इसलिए जो शादी पर ज्यादा खर्च नहीं कर सकते वे अपने बच्चों को यहीं लाते हैं । मंदिर परिसर में लग्न के दिन हजार से ऊपर शादियाँ होती हैं ।
उस दिन भी बहुत सी शादियों के बीच एक ये शादी भी हो रही थी । लड़के लड़की के अलावा जो लोग उस शादी में गए थे उनका मन इसे शादी जैसा मानने से भी इंकार कर रहा था । क्योंकि उनकी भूमिका कोई थी ही नहीं । समाज अपना अधिकार छोडना नहीं चाहता और उसमें निर्णय लेने की स्थिति में खड़े लोग इसे जाहीर भी करते हैं । जैसे इसी शादी को लें तो इसे बहुत सादे तरीके से निभाने की बात पहले से ही थी पर जो लोग गए थे उनके ठीक ठीक खातिरदारी न हुई तो शादी को विफल करार देने की खबरें अभी तीन चार दिनों बाद तक आ रही हैं । जबकि यह तो पहले से ही तय था कि यहाँ सुविधाएं न्यूनतम ही होंगी पर अपने कद्र की तौहीन उस असंभव सी लगने वाली शादी के हो जाने कि खुशी से ज्यादा लगी लोगों को । 
वहाँ चल रही उन सैकड़ों शादियों के शोर में भी नींद का आ जाना चकित करने वाला था वह भी फूल बेचने वाले की चौकी पर । सुबह जब उठा तो कई दुलहनों के ठुनकने की आवाजें आ रही थी । वे अपने घर को तो छोड़कर आ ही चुकी थी अब साथ में आए चार छह परिजनों से भी बिछुड़ने का समय आ गया था । कुछ पुते हुए चेहरों पर आँसू की लकीर दिख रही थी । इधर मक्खियाँ मुंह के क्षेत्रफल को नापने में लगी थी । रात का साथी चाँद कब का डूब चुका था । मुंह धोने से पहले सामने के पोखर में खाने के लोभ में किनारे पर आ जाने वाली मछलियों को देर तक देखता रहा ।  

1 टिप्पणी:

  1. Sajiv chitran. Sahi kaha aapne mithila abhi bhi bahut hi band samaj hai jo aparivartanshilta me adhik viswas rakhti hai

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