दिसंबर 16, 2011

कुछ जो कहना नहीं था !


कुछ दिनों से अपनी मुकम्मल शिनाख्त में उस लोहे के बेंच के अस्तित्व को महसूस कर रहा हूँ जो मिश्रा टी स्टाल के पास पड़ी है । यह अहसास बार बार उसकी कमी के रूप में आ रही है । यूँ तो कितनी ही जगहें हैं बैठकी लगाने को और कई लोग भी जो उन जगहों पर मेरे साथ बैठें पर इधर बड़ी शिद्दत से उस बेंच की कमी का अनुभव कर रहा हूँ ।
विश्वविद्यालय से अब्दुल के जाने के बाद पहली बार कोई जगह इस तरह से हमारे साथ जुड़ी थी । कुछ न करने वाले हमारे वे लंबे दिन और उनमें चलने वाली वो तेज आवाज बकवास वहीं होती और वहीं होता था उन सबका भी आना जिनसे छिप के हम वहाँ बैठते थे । और वहीं मिले हमें वो आवारा, वेल्ले और बाबा के ठप्पे । वहीं से की थी हमने अपने वरिष्ठतम होने और सूरज तक को जूते की नोक पर रखने की घोषणा !
हम तीन थे । हम सब आज भी हैं पर तीन नहीं ! हमें बाँटा खुशियाँ और कामकाजी पन ने ।
इन बेकारियों और गमों में कुछ बात थी जिसने इतनी बारीक बनावट रची जिससे बेडा गर्क कर सकने वाला साहस और किल्लाठोक बोलने की हिम्मत आई । जिंदगी तरीके से काम करती है शायद ! हम समझ भी नहीं पाते हैं पर वह हर क्षण हमें रचती चलती है । इसी प्रक्रिया में लंबे चलने वाले पहचाने चले जाते हैं और छूट जाते हैं अपनी ही दिशा में जाने वाले लोग । दिशाएँ एक जाल तो हैं पर इसके रेशे फिर से नहीं उलझेँगे । कईयों को देखा है खालसा के स्टैंड पर अनजान से खड़े होकर अपनी बस का इंतजार करते हुए । इनमें से काजिम अली भी एक है जो एमए प्रीवियस में साहित्य सभा का उपसभापति बनने के लिए हमारे बीच आया था और वह भी अकेले ! काजिम जीत भी गया ! हमने आज के अपने कुछ शुभचिंतकों के खिलाफ काजिम को पेश किया था । पर वही काजिम बस नजरें फेरने के लिए देखता है ।
उस बेंच से अलगाव एक दिन ही में हो गई घटना नहीं बल्कि पूरे समय में फली फूली थी । और वो हम ही थे जिन्होंने अपने ही खिलाफ हर तरह की साजिश की । उस प्यार को ढूँढ ढाँढ़ कर उन के बीच ला देने का वह मिथकीय़ जाम्बवंत सुलभ कार्य भी हमारा ही था । हम जानते थे कि ये कुल्हाडी कितनी ही भोथरी क्यों न हो पर हमारे पैर जरूर काटेगी और हमने इस बात कितनी ही बार मजा भी लिया था । उस शाम को एक परिचित ने जब पूछा कि तुम यहाँ तब भी मैने कितने गर्व से कहा था कि विश्वविद्यालय में जो हम तीन आवारागर्दी करते हैं उनमें से एक की शादी है । वो शायद हमारे एक होने का अंतिम और चरण पल था । उस रात की खुशी में किसी ने नहीं देखा हम तीनों अपने से उपर होकर एक दूसरे से बिना विदा लिए अलग हो रहे थे । पर नहीं अभी इस टूटन का गवाह उस बेंच को भी बनना था । हम फिर मिले थे एक बार । अंत के बाद का मिलना कभी सुखद मिलन नहीं होता । हम दो बैठे थे और तीसरे को आने में कुछ देरी हो रही थी । इस दूसरे ने दो बार कहा कि तीसरे को समझना चाहिए कि वह अब घर परिवार वाला हो गया है जिसे जल्दी घर जाना है । वहाँ आवाजें और थी पर उनका भारीपन बेंच के रोने से कम था ।
खालिस बतकही का मजा तो बहुत है पर इसका नशा किसी से कम नहीं ! वह है तो है ही पर नहीं है तो तलब बढ़ती ही जाती है । चाहिए तो वही पानी चाहिए नहीं तो हम दूध तक से कुल्ला नहीं करते । मैने कितनी ही बार अनुभव किया है कि जिंदगी कई मातबरों के हाथ रेहन रखे गये खेत की फसल है जिसके तैयार होने से पहले ही सब अपना अपना हिस्सा लेने आ जाते हैं ।
फसल बिचारी जान भी नहीं पाती है कि बँटकर क्षीण हो जाती है ।

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