दिसंबर 12, 2011

इतिहास की नवीनता में शहर दिल्ली

बात शुरू करते हैं दूरदर्शन के धारावाहिक 'मैं दिल्ली हूँ ' से ....! इसमें राज्य के विकास की प्रक्रिया को दिखाया गया गया है और सत्ता के निरंतर प्रबल होते जाने को भी प्रदर्शित किया गया है । और इसके केन्द्र में है शहर दिल्ली ! इस धारावाहिक के माध्यम से इस शहर की ऐतिहासिकता को प्राचीन काल तक ले जाने का प्रयास किया गया है । इस धारावाहिक का समय वही है जब देश में आर्थिक उदारीकरण के फल दिखने लगे थे । फिर भी आज जो तमाम बड़े और मझोले शहरों में एफएम चैनलों का संजाल फैला है वह उस समय नहीं था और इसकी कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी । ऐसे में जाहिर है कि आज जो लोग इसमें काम कर रहे हैं उन्होंने इसे एक रोजगार के रूप में नहीं देखा होगा । ये लोग किसी और क्षेत्र में जाने की तैयारी कर रहे होंगे । हाँ ये और बात है कि एफएम के आ जाने से इन्हें अपनी आवाज के बल पर पैसा कमाने का मौका मिल गया ! ऐसे में आज के एफएम प्रस्तोता उस समय उपरोक्त धारावाहिक देखते होंगे इसमें संदेह है । इस संदेह का दूसरा आधार यह है कि उस समय तक भारत में केबल टीवी का आगमन हो गया था तो दूरदर्शन का ऐतिहासिक धारावाहिक देखना तब के भी महानगर एवं नगरीय युवा के कार्यकलाप में नहीं था । यही वह समय है जब टीवी के माध्यम से पॉप भारत में पहुँचने लगा था । इन सबको ध्यान में रखकर एक बात कही जा सकती है कि दिल्ली के आज के जितने भी एफएम प्रस्तोता हैं वे दिल्ली की ऐतिहासिकता को धारावाहिक 'मैं दिल्ली हूँ' के माध्यम से तो नहीं जानते होंगे । यहाँ इस धारावाहिक का उदाहरण इसलिए लिया गया कि यह उसी लोकप्रिय संस्कृति के माध्यम (टीवी) से आई थी जिसे नगरीय समाज अपना रहा था । दूसरे इस धारावाहिक में दिल्ली शहर की स्थिति को प्राचीनता प्रदान करने का प्रयास किया गया है ।
बहरहाल दिल्ली अति प्राचीन शहर न हो पर इतनी पुरानी अवश्य है कि इसके इतिहास को मध्यकाल तक ले जाया जा सके । ऐसे में इसका 'जन्म' 1911 से मानना इसके इतिहास को खारिज करना है । इस वर्ष यह अँगरेजों की राजधानी बनी थी । ऐसे में यहाँ से दिल्ली की स्थापना मान लेना उपनिवेशवादी सोच की ओर इशारा करता है । परंतु यह इतना सरल नहीं है । वर्तमान उपभोग आधारित संस्कृति में बाजार का स्थान केन्द्रीय है । और वह अपनी निर्मितियों , संस्थाओं के माध्यम से मुनाफे का कोई मौका चुकता नहीं है और यदि बात न बन रही हो तो उन मौकों का निर्माण भी करता चलता है ।
दिल्ली के सौ साल का उत्सव मनाना बाजार द्वारा अपने लिए मौके का निर्माण है । अब बाजार को भी पता है कि दिल्ली 1911 से शुरू नहीं होती पर ज्यादा पीछे जाने पर कुछ अस्मिताओं के उभरने का खतरा है जहाँ से विवादों की उत्पत्ति भी हो सकती है ।
यहाँ बाजार ने बड़े ही संगठित रूप में संचार माध्यमों का प्रयोग किया । अब इस दिवस को मनाने के विज्ञापन मिले , खाने पीने और मौज मस्ती का एक अवसर आया जिसका फायदा अंतिम रूप से पूंजपति समूह को मिला ।
दिल्ली में बजने वाले एफएम चैनल्स के प्रस्तोता जब इस दिन को मनाने शहर की पराठे वाली गली जाते हैं तो यह भूल जाते हैं कि ये उस दिल्ली का हिस्सा नहीं है जिसका जन्म 1911 में हुआ था !

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