अक्तूबर 26, 2011

बुद्ध सर्किट लाईव, बोले तो पेट पे कार !

इस फार्मूला रेस का क्या कोई तय फार्मूला नहीं है कि यह भारत में हो रहा है ! वह भी ऐसे समय में जब क्रिकेट का बाजार अपने विकास के चरम पर है ! दरअसल इसे लाया ही इसी लिए गया है ! आज जो क्रिकेट की स्थिति है वह उच्च और निम्न दोनों ही प्रकार के मध्यवर्ग की वजह से है क्योंकि बाजार में खर्च की जा सकने वाली रकम उसी के पास है और उच्च वर्ग की देखादेखी वह इसे 'उड़ाता' भी है । निम्न वर्ग कभी भी भारत में बाजार को संचालित करने वाले कारक के रूप नहीं रहा अतः खेलों में उनकी भूमिका नगण्य ही रही । क्रिकेट पर बढ़ते मध्यमवर्गीय प्रभाव के कारण उच्च वर्ग के लिए एक नया खेल लाना जरूरी हो गया जहाँ केवल उन्हीं का अधिकार हो । कार रेसिंग इसी प्रकार का खेल है और उसका उद्देश्य उसी उच्चवर्गीय विशिष्टता को पुष्ट करना है । यह लगभग वैसी ही स्थिति है जब सब को अंग्रेजी सीखता देख उच्च वर्ग संस्कृत या अन्य पुरानी भाषा की ओर उन्मुख़ हो रहा है । इससे पहले एक अन्य खेल गोल्फ को इस दृष्टि से पोषित किया गया परंतु रोमांच के अभाव ने उसे कम से कम भारत जैसे देश में जहाँ क्रिकेट के कारण रोमांच की आदत पड़ी है उसे जड़ जमाने नहीं दिया । रेसिंग को लंबे समय से टीवी पर दिखाया जा रहा है,उसे भारत में दर्शक भी मिल रहे हैं और यह क्रिकेट जितना सस्ता और सर्वसुलभ भी नहीं है अतः उच्च वर्ग के लिए क्रिकेट का अच्छा विकल्प लगा जहाँ वे अपनी उच्चता लंबे काल तक बनाए रख सकते हैं ।
कार रेसिंग एक सामान्य खेल नहीं है कि गिल्ली ली , डंडा लिया और चल पड़े खेलने ! वस्तुतः यह धनी युवाओं की गर्व से भरी रात को चलने वाली वाहन प्रदर्शन प्रतिस्पर्धा का ही संभ्रांत रूप है । इस खेल को भारत में कराने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों की ओर से विभिन्न प्रकार की छूट दी गयी । इस आधार पर देखें तो लगता है कि इस खेल का भारत आना बहुत जरूरी था , इसके बिना लोग जी ही नहीं सकते थे ! इसकी यह अपरिहार्यता किन लोगों की कीमत पर है यह देखना जरूरी है । साधारण शब्दों में देखें तो कोई भी छूट वस्तुतः आर्थिक ही होती है चाहे रेसिंग के लिए भूमि खरीद में छूट हो या विभिन्न करों में छूट । और ये सारा आम आदमी की जेब से ही दिया जाता है भले ही प्रत्यक्ष रूप में इसका पता न चले ! तो अब प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत का आम आदमी इस के लिए तैयार है और क्या वह रेसिंग चाहता भी है ? लगातार बढ़ती महँगाई से त्रस्त भारतीय के लिए इसका उत्तर हाँ में देना संभव ही नहीं है । फिर इस रेस के लिए छूट देना एक तरह की तानाशाही को स्पष्ट करता है ।
यह समझ पाना कठिन प्रतीत हो रहा है कि सरकार को आम आदमी की कीमत पर कुछ लोगों का ही फायदा क्यों दिखता है !

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