अक्तूबर 09, 2011

इस दौर का यह समय

यह समय मेरे लिए भी है पर इसका यकीन मुझे नहीं होता क्योंकि यह मुझसे अजनबी और बेपरवाह ही रहा है अबतक ! लाख कोशिशें की कि हमारी थोड़ी जान पहचान हो जाए लेकिन जो नतीजा है वह है सिफर .... यूँ मुझे इस नतीजे की उम्मीद और आदत पहले से थी पर टेढ़ी पूँछ सी अपनी जिजीविषा ! ये जीने की इच्छा शायद वही है जो द्विवेदी जी के कुटज की थी ! जो एक बात कुटज और मुझमें नहीं मिलती वह है उसका बिना मन का होना ।
बिना इसके पहाड़ तोड़ कर पनप जाना तो आसान है अपना हिस्सा ले पाना कठिन । यहाँ हर क्षण नजरें उपर की ओर ही रखनी पड़ रही है - आशा में !
इसे एक कुर्बानी ही मानी जाए जो हर प्यार लेता है या फिर बड़ी ही निरीहता से देता है । दो जन या और भी इसमें बस अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं ... पर यह इतना सरल नहीं है ....। इन भूमिकाओं को अलग अलग समझें यह एक कसाईबाडे जैसी संरचना बनाता है जिसमें सारे अपने दाँत निकाले पेट तक फाड़ देने को बढ़ रहे हैं । यह मौत की हसीन और लचकीली चाल है जो अपनी खूबसूरती से बहकती चल रही है पर है तो मौत ही । ये एक मुर्दनी है जो चारों ओर छाई है पर मेरे लिए एक जश्न से बढ़कर !
हर शहर की वो गली जहाँ यह सब होता है, अनजान नहीं है हम सबसे क्योंकि हम सब तो उसी में रहते हैं । हमारे रहने से ही उस जैसी हर गली का अस्तित्व है क्योंकि हम ही गली हैं । मन इस वक्त भी वैसा ही स्थिर है जबकि उसके आसपास कई बेहद खूबसूरत सांय सांय बह रही हैं चुपचाप ! इसे भले ही अजीब कहा जाए पर है यह सचमुच का सच ।
समय ने स्वार्थ की संरचना और इसके गुणों को बदल दिया है अब स्वार्थ एक स्थायी भाव की शक्ल ले रहा है । खुशी एक ही दिन की ही सही पर विशिष्ट थी और इसी को लगातार बनाए रखना मेरा स्थायी स्वार्थ ! नदी की धार तेज है जिसके सामने कितनी भी मजबूती स्थायी नहीं ।

अखबार में छपी लड़कियाँ खुद को वस्तु नहीं बनाना चाहती पर पैसे कमाने के लिए उसे यह भी मंजूर है । यदि वे वस्तु नहीं बनना चाहती तो मर क्यों नहीं जाती भूखों या फिर कम क्यों नहीं कर देती अपनी अय्याशियां ! यदि तुम्हारी देह है तो सहज खयाल उसे बेचने का ही क्यों आता है ? क्योंकि तुम स्वयं को वस्तु मानने की आदि हो गयी हो । तुम्हारे तर्क अब संतुष्ट नहीं करते ( टाइम्स आफ़ इंडिया की डायरी लिखने वाली लड़कियों के लिए ) ।

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