सितंबर 26, 2013

चयन में आभाव की भूमिका ...


ज्यों-ज्यों देश आगे के चुनावों की ओर बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विशाल लोकतन्त्र का नेतृत्व किन संभावित हाथों में होगा । उम्र कम है फिर भी कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के अनुभव तो हैं ही । उन अनुभवों के आधार पर यदि एक ट्रेंड पहचानने की कोशिश करूँ तो यह कहने में गुरेज नहीं कि चुनाव के दो-तीन साल पहले तो ऐसा लगता है कि चुनाव आते-आते चयन के लिए बहुत से नाम होंगे और नेतृत्व के लिए एक सुयोग्य महानुभाव का चयन बहुत सरल होगा । इससे और आगे बढ़कर यह कह सकते हैं कि बहुत से सुयोग्य में से एक चुनना कठिन हो जाएगा । लेकिन , जब चुनाव सर पर आ जाते हैं तो स्पष्ट तौर पर एक दो कद्दावर नाम ही रह जाते हैं फिर कई बार उनमें जरा-जरा सी योग्यता ढूँढने में भी मशक्कत करनी पड़ती है । ऐसा छोटे से वार्ड सदस्य लेकर प्रधानमंत्री तक के चुनाव में देखा है । शुरू-शुरू में काफी अफवाहें उड़ती हैं और फिर वे अफवाहें ठोस होती जाती हैं और छोटी-छोटी अफवाहों को खा जाती हैं । कई बार देखने में आया है कि छोटी-छोटी अफवाहें खाये जाने के लिए ही उठती हैं । इसी खाये जाने की प्रक्रिया में कई बार संभावनाशील मगर छोटी शक्तियाँ भी लील ली जाती हैं या हालात ऐसे बना दिए जाते हैं कि उनका लील लिया जाना स्वाभाविक सा लगने लगता है । इस सब का समेकित प्रभाव अंतिम परिणाम में दिखता है । जब परिणाम आते हैं तो कुछ लोगों के चयन के साथ निबाह करना पड़ता है । इसे ही प्रतियोगी राजनीति कहते हैं ।

आगे बहुत सारे चुनाव हैं जिन्हें विधानसभा और लोकसभा चुनावों के खाँचे में रखने की परंपरा रही है । कम से कम आगामी लोकसभा चुनावों के लिए भी लगभग वही प्रक्रिया चल रही है और अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है जहां से तस्वीर साफ सी नजर आने लगी है कि नेतृत्व किन-किन हाथों में जा सकता है । लेकिन अब से ठीक डेढ़ साल पहले की स्थिति पर गौर करें तो लग रहा था कि आम चुनाव आते-आते कुछ निरा-परिवर्तनकामी लोगों का समूह सामने आएगा जो नेतृत्व भले ही न कर पाये पर नेतृत्व को दिशा देने की स्थिति में जरूर रहेगा । लेकिन शायद यही प्रतियोगी राजनीति की मांग है कि सबसे पहले परिवर्तनकामियों की लामबंदी को तोड़ा गया और उसे एक छितरी हुई और विश्वास न की जा सकने वाली शक्तियों की हैसियत तक पहुंचाया गया । इस पूरी प्रक्रिया में भूमिका तो देश के दोनों प्रमुख दलों ने निभाई लेकिन फायदे की माप में भाजपा ने कॉंग्रेस को पीछे छोड़ दिया । क्योंकि जब एक दबाव समूह जो कॉंग्रेस का पहले से विरोधी था वह टूटा तो उसका बहुत सारा हिस्सा भाजपा के खेमे में चला गया । उस समूह के भाजपा में जाने वाले लोग कॉंग्रेस की सरकार के विरोधी थे और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के प्रति आशंकित । इसलिए बहुत से लोग हाल तक यह दावा करते रहे हैं कि वह दबाव समूह भाजपा की तरफ से ही खेल रहा था । अब बचे हुए हिस्से में न तो दम है और न ही उसकी विश्वसनीयता रहने दी गयी है इसलिए एक संभावनाशील समूह अगले बहुत से सालों के लिए परिदृश्य से परे हो गया । अब फिर से भारतीय राजनीति उसी अवस्था में वापस लौट गयी है जहां मुख्य मुक़ाबला केवल दो ध्रुवों में ही होगा । बहुध्रुवीय अवस्था में चयन के लिए ज्यादा विकल्प होते तो उम्मीदवारों के लिए प्रतियोगिता भी ज्यादा होती लेकिन अब एक कि हार और दूसरे की जीत में ही इस मुक़ाबले का तर्जुमा हो सकता है । यदि स्पष्ट हार-जीत न भी हुई तो उसके बाद की राजनीति में नए - नए सौदेबाजी विशेषज्ञ उभरेंगे जो किसी भी हार को जीत में बदल देंगे ।

इस दो ध्रुवीय मुक़ाबले में फायदा भाजपा का है क्योंकि उसके पास वर्तमान सरकार की असफलताओं को जनता में ले जाने का अवसर है । ऐसी दशा में कॉंग्रेस के पास कुछ पैंतरेबाज किस्म के आइडिया बचे हैं जो गाहे-ब-गाहे सामने आ रहे हैं । हालांकि भाजपा के पास इससे पहले के आम चुनाव में यह अवसर था लेकिन वह उसका उपयोग नहीं कर पायी और शायद इसीलिए उसने इस बार मुद्दों के बजाय व्यक्ति को आगे किया है ताकि मुद्दे से मुद्दा लड़ा कर कोई जीत भी जाये तो व्यक्ति से व्यक्ति न लड़ा पाये । यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति आगे किया नहीं गया बल्कि वह आगे आ गए और अब जब आ गया है तो उसमें ही भाजपा को अपनी भलाई दिख रही है ।

इस तरह से भारतीय लोकतंत्र लोक-स्वीकृति के बदले व्यक्ति की महत्वाकांक्षा को पोषित करने लगा है । स्थानीय स्तर पर तो इसे कई बार और लगभग हर चुनाव में देखा गया लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा पहली बार दिख रहा है जहां स्वयं को देश का प्रधानमंत्री मनवाने की कवायद अब अंतिम रूप ले चुकी है । फिलहाल कॉंग्रेस को इस दोष से मुक्त रखा जा सकता है और बिना किसी लाग लपेट के सारी उँगलियाँ नरेंद्र मोदी की तरफ उठेंगी ।

नरेंद्र मोदी का इस तरह अपने को थोपना ऐसा लगता है जैसे बचपन की लड़ाई सी चल रही हो । किसी भी तरह से अपने को स्वीकार करवाने की उत्कटता लोकतान्त्रिक राजनीति में भी आ जाए तो उसे तानाशाही ही कह देना पड़ेगा । उसने स्वयं को खबर में रखने से लेकर अपनी छवि की मजबूती और उसके सबंध में प्रचार-प्रसार को लगातार बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास किए हैं और ऐसा कह देना कोई खुलासा नहीं है बल्कि यह एक तथ्य का रूप ले चुका है । वह कई बार निर्लज्जता की हदें भी पार करता दिखाई देता है । मोदी के उत्तराखंड के रेम्बो एक्ट को देख कर तो यही कहा जा सकता है और उसके अनुयाइयों का अंधविश्वास इस कदर था कि वे इस झूठ को सच मानकर फैलाते रहे । फिर अमिताभ बच्चन से मोदी को सबसे योग्य कहलवाना , उसके भाषणों में आंकड़ों की बाजीगरी आदि उसकी इसी अधीरता को साबित करते हैं ।

भारत में वाचिक परंपरा खत्म नहीं हुई है । यूं तो इसके चिह्न हर जगह मिल जाएंगे लेकिन राजनीति अभी भी इस ऋग्वैदिक परंपरा को न सिर्फ जीवित रखी हुई है बल्कि इससे अपना उल्लू भी सीधा कर रही है । ज़ोर से और प्रवाहमय भाषा में बात करने वाला व्यक्ति जन्मजात नेता माना जाता है और जो राजनेता लच्छेदार भाषण दे सकता हो वह तो जनता के दिलों पर राज करता है । भीड़ के आत्मविश्वास की समूहिक कमी और उसकी सामूहिक  हीनभावना का बोध उसे स्वतः ही आकर्षक वक्ता की ओर आकर्षित होने के लिए विवश कर देता है । भीड़ के इसी मनोविज्ञान से बहुत से नेताओं ने फायदा उठाया और भीड़ को भीड़ ही रहने दिया क्योंकि भीड़ ने यदि बोलना सीख लिया तो उनकी अबाध सत्ता खतरे में पड़ जाती । अटल बिहारी वाजपेयी के परिदृश्य से बाहर हो जाने के बाद लगा कि अब शायद यह लच्छेदार भाषणों का युग समाप्त हो गया लेकिन मोदी ने उस दौर को पुनर्जीवित किया है । उसके समर्थक उसी भीड़ का हिस्सा हैं जिसे अपनी अभिव्यक्ति करने में हजार डर दिखाई देता है । उनका मनोविज्ञान यह स्वीकार कर चुका है कि मोदी की अभिव्यक्ति उन सबकी सामूहिक अभिव्यक्ति है । यह अवस्था चिंतन से नहीं बल्कि भावुक उद्वेगों से आई है । मोदी ने जिस तरह से इस रणनीति की परिणति चाही होगी यह उससे भी बढ़कर है । आज उसके समर्थकों की संख्या केवल इसलिए बढ़ रही है कि वह प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रख रहा है । भारत में आज भी वही दौर जारी है जिसमें ऊंची आवाज़ में कहे गए अतार्किक और बहुधा निरर्थक बातों को धीमी या मंद तार्किकता के बदले स्वीकार किया जाता है ।
सामंतवादी मूल्यों के कई स्तरों में दबे नागरिकों के लिए यह ज्यादा आसान दिखता है कि उसके बदले कोई और बात करे और वह बात करने वाला धीरे-धीरे उसके मनोविज्ञान पर कब हावी होकर उससे अपनी अतार्किक बातें भी मनवाने लगता है यह पता ही नहीं चल पाता है । यही वजह है कि अपने आस पास आजकल लोगों का मोदिमय होते जाना अस्वाभाविक नहीं लगता । फेसबुक पर जो दोस्त पहले मोदी का विरोध करते थे वे आज समर्थन में सामने आ रहे हैं । जो फेसबुक के ग्रुप पहले तमाम राजनीति पर चुहल करते थे वे अब प्रो-मोदी चुहल ही करते हैं । इन्हें उनका असली रंग दिखाने जैसे तय मुहावरे में बांधना गलत होगा । यह सामंतवाद के साये में विकसित हुई हीनता ग्रंथि है जिस पर बांसुरी बजाने वाले का कब्जा है जिसकी धुन इतनी मोहक है कि चूहों को नदी नही दिख रही । इसने न केवल मोदी को अबाध भावनात्मक समर्थन दिया बल्कि एक ऐसी भावुक सेना दी है जो केवल अपनी बात रखना जानती है , जिसके लिए उसके अपनी सोच के अलावा सारी सोच गलत है । स्थिति इतनी भयावह है कि उसके समर्थक अपने आप में विरोधाभासी और अतार्किक बातें करते हुए भी दूसरे विचारों के लिए कोई स्थान नहीं छोडना चाहते इसलिए उनके यहाँ बहस की गुंजाइश ही नहीं है ।

मोदी के समर्थक आजकल एक नए शिगूफ़े पर काम कर रहे हैं । पिछले स्वतन्त्रता दिवस के बाद से उनको लगता है कि भारत की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर गयी है जहां अमेरिका की तरह प्रधानमंत्री का फैसला दो लोगों में बहस करवा कर हो जाए । लेकिन मोदी के फर्जी करिश्मे से चौंधियाई आँखें अपने देश की वास्तविकता तक देख नहीं पा रही हैं जहां आम चुनाव केवल एक पद के लिए नहीं बल्कि लोकसभा की करीब साढ़े पाँच सौ सीट के लिए होता है । जिसमें हो सकता है एक-दो राष्ट्रीय मुद्दे हों पर बहुधा स्थानीयता ही विजेता तय करती हैं फिर राज्यवार जो विविधताएँ हैं सो अलग । उनकी इस मांग को देखकर लगता है कि उनके लिए चुनाव देश के एक–एक बूथ पर नहीं बल्कि फेसबुक पर होने वाला है जहां लच्छेदार और मज़ाकिया भाषा से ही बात बन जाएगी ।
एक व्यक्ति के इस अप्रत्याशित उत्थान ने भारतीय राजनीति में बहुत से धड़ों की अकर्मण्यता और शिथिलता को उजागर कर दिया है । विशेष रूप से वामदलों के संबंध में इस बात को पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है । आज की भारतीय राजनीति में जब बड़े परिणामों की आशा करने के बजाय जमीनी स्तर पर जड़ें जमाने का काम उन्हें करना चाहिए उस समय वे महज हवाई लफ़्फ़ाज़ी और शिथिलता से काम चला रहे हैं । ऐसी शिथिलता से तो क्रांति नहीं ही आएगी ऊपर से लोकतंत्र से भी बेदखल होने की नौबत आने वाली है । केरल के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनकी स्थिति कितनी गंभीर है । लोग कहते हैं कि उनहोंने तो यही देखा कि वामदलों के पास कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली नहीं है हाँ विचारधारा के नाम पर सच में वह सब आकर्षित करने वाला है लेकिन कई बार उनको सत्ता में लाकर देख लिया लेकिन विचारधारा पर कार्य में नहीं बदल सकी । इन दलों का लगभग यही हाल देश के स्तर पर है जो कई बार इनके आपसी सिर-फुटौव्वल से और गहरा जाता है । 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद से यदि किसी दल की लोकप्रियता घटी है तो वह कॉंग्रेस नहीं बल्कि वामदल हैं ।


लोकतान्त्रिक राजनीति में फिर से भीड़तंत्र का दौर आ गया है जिसे मोदी नेतृत्व दे रहा है । इस स्थिति में सबसे दुखद यह है कि भले ही हार जाने के लिए ही सही पर भीड़ को मोदी के सम्मोहन से जगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं । जिन राजनीतिक दलों पर इसकी ज़िम्मेदारी थी या है वे इसे पहले से ही एक हारी लड़ाई मानने की हीनभावना में लिपटते हुए दिखाई दे रहे हैं । 

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