अप्रैल 18, 2013

ये बोलते पेड़



कितना अच्छा होता कि हम सब न कुछ बोल पाते और न ही सुन पाते । सहज रूप से एक दूसरे को या कि और अधिक लोगों को देखते हुए सारे कार्यकलाप करते जाते तो बहुत सारी स्थितियों में फँसने की आवश्यकता ही न पड़ती । किसी से कुछ बोलना ही नहीं होता तो चुगली हो जाने या अपनी बात के गलत तरीके से इस्तेमाल होने या गलत बोल दिए जाने की स्थिति ही न आती । कभी किसी बात के लिए कठघरे में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ती । झगड़े झंझटों से शर्तिया मुक्ति मिल जाती । पेड़ों को देखिये कितने मजे में खड़े रहते हैं सब बिना कोई आवज किए चुपचाप खड़े रहते हैं किसी को किसी से कोई शिकवा नहीं और यदि है भी तो वह ज़ाहिर न हो पाती ।
        बोलने की आदत ने जितना हमारा काम आसान किया उससे ज्यादा जीवन को जटिल कर दिया ।  इसने अभिव्यक्ति को एक माध्यम तो दिया जिससे कि हम मन में चल रही अपनी तमाम उठापटकों को शब्द दें और दूसरों तक पहुंचा सकें पर इसी दशा ने जो जटिलताएँ दी उसमें जितनी बार घिरा हूँ उसे महसूस कर लगता है कि न ये बोला होता , वो न बोला होता । बोलना जितना भी व्यक्ति सापेक्ष हो इसकी पूरी प्रक्रिया उतनी ही समाज सापेक्ष हो जाती है । मैं जब बोलता हूँ तो हमेशा वह नहीं बोलता जो मैं सोचता हूँ या कि जो मुझे बोलना चाहिए बल्कि यह कि अपने आस पास को देख के बोलता हूँ या तो उनकी बातों से संगत बातें या उनसे सीधे तौर पर मुखतलिफ़ ।
  कई लोग इससे सहमत हो सकते हैं कि बोलने से उनका नुकसान हुआ है । सैद्धांतिकी, विमर्श , बोलने का समाजशास्त्र आदि हमें जो भी बताएं पर सामान्य जिंदगी में उनका कोई लेना देना उस हद तक नहीं है जिस हद तक कि बड़े-बड़े विद्वान उसे मानते हुए अपनी दुकान चलाने के लिए शोर मचाते हैं ।
बोली गयी बात एक ऐसा उत्पाद है जिस पर किसी का स्वाभाविक अधिकार रहनहीन जाता फिर उसे समेटने, लपेटने, ओढ़ने-बिछाने का कार्य भी बोलने वाले की हद  से बाहर हो जाता ही है । आपकी बोली हुई बात कब शिकायत और एक मजबूत हथियार बनकर आपके सामने खड़ी हो जाए यह तय कर पाना कठिन है । उस दशा में अपना मन ही यह मानने को तैयार नहीं होता कि ये हमने ही कहा है । मुझे याद है एक बार मेरी माँ ने अपनी सहजता में किसी के द्वारा किसी के विरोध में कही गयी बात को उसके सामने ज्यों का त्यों रख दिया । बोलते वक्त बहुत कम लोगों को अंदाजा रहता होगा कि कोई भी बात कितना और किस किस दिशा में असर करेगी । ये अंदाजा मेरी माँ को भी नहीं था फिर जिन लोगों ने आपस में एक दूसरे के लिए कुछ का कुछ बोला था उन दोनों ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया .... इसका नतीजा ये हुआ कि माँ ने उस दिन से लोगों से खुद को काट लिया । ये तय है कि मेरी माँ के द्वारा किया गया कार्य चुगली (वैसे भी चुगली करने और बोलने में ज्यादा अंतर नहीं है ... मैं अपने बहुत से मित्रों को जनता हूँ जो अपनी स्थिति श्रेष्ठ करने के लिए किसी और की काही गयी  बातों को चुगली की शक्ल देकर पेश करते हैं । उन्हें स्वाभाविक रूप से इसका फायदा मिल भी जाता है ) की श्रेणी में आता है पर उनके स्वभाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वो चुगली नहीं करती । फिर भी करने वाले से ज्यादा बोलने वाले का दोष हो गया ।
बोलने में मज़ाक का एक बड़ा हिस्सा है और इसी तरह इसका असर भी ज्यादा होता है । आपकी अपनी गलती से आपका नुकसान हुआ हो फिर भी यदि आपका किसी ने मज़ाक उड़ा दिया तो आपको अपनी गलती नहीं दिखेगी बल्कि मज़ाक करने वाला सबसे बड़ा अपराधी नजर आएगा । ऐसा जैसे उसी ने सारा किया धरा हो और आप बेवजह घसीट लिए गए हों । पर गलती तो आपकी है ही । ये बात बहुत सरलता से न आपका मन मानेगा और नहीं आप इसे बहुत जल्द महसूस कर पाएंगे । जब ऐसा होता है तो यह आपके अंतरवैयक्तिक संबंध पर बहुत असर डालता है । आपके अंदाजे से बहुत पहले ही सम्बन्धों की टूटन स्पष्ट होने लगेगी ।
  ये लिखते हुए मुझे लगता है कि मेरी शैली शिवशंभू के चिट्ठे जैसी हो गयी है – जिसको कहा जाए उसे सीधे सीधे । शायद उन सब तक बात पहुंचाने का यही रास्ता हो । उनके बोले गए शब्द बड़ी आसानी से यथार्थ मान लिए जाते हैं फिर वो बातें एक बहुत लंबा रास्ता तय करते हुए अपने ही आस पास पहुँच जाती है । अजीब स्थिति तब होती है जब आपके बोले गए शब्द घूम फिर कर मगर बदले हुए स्वरूप में आप तक पहुँचते हैं । वे ऐसे परिवर्तित होते हैं कि हठात आप कह दें कि ये तो आपने कहा ही नहीं । पर जब इसकी पूरी तहक़ीक़ात-ओ- दरियाफ्त करेंगे तो आपको लगेगा कि आपने गोबर की ढेरी में ढेला मारा है । एक अनावश्यक सी छीछालेदर के अलावा हासिल होने जैसा कुछ रह नहीं जाता है ।
अभी हाल का प्रसंग है । कुछ दोस्तों में आपसी खींचतान चल रही थी । उन सब के अलावा हम सब भी चाहते थे कि ये सब बहुत जल्द खत्म हो जाए सो अपने अपने प्रयास कर रहे थे । मुझे यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है  कि प्रेमचंद की एक कहानी की तरह ही सभी पक्षों को खुश कर के मनमुटाव खत्म करवाने का तरीका हम सबने अपनाया पर एक पक्ष तो इतना ज्यादा खुश हो गया कि उसे अपनी गलतियों का आभास ही नहीं रहा । उसके लगा कि ये सब तो उसके ही खिलाफ किया जा रहा है वह तो पूर्णतया मासूम है । उसने इसे ही हथियार बनाकर अपनी स्थिति को ऊंची करने की कोशिश की इसी कोशिश में में कब उसने मध्यस्थों का विश्वास खो दिया उसे पता ही चला ।
धूप जितनी तेज थी उससे भी बढ़कर लग रही थी । मौसम को छेड़ने की हिम्मत किसी में कहाँ थी ।

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