जनवरी 08, 2013

विकास के लिए

कहानी बहुत फिल्मी लगती है ! एक लड़का दिल्ली के एक बस स्टॉप पर हाथ में एक छोटा सा सॉफ्ट ट्वाय लेकर खड़ा था ! लड़की आई और वह पूरी हिम्मत करने के बाद भी उसे दे नहीं पाया ... हल्की सी हाय हल्लो के बाद लड़की ने बस पकड़ ली । लड़का थोड़ा मायूस था ... पर वह हारा नहीं ... उसने भी दौड़कर बस पकड़ ली । शायद बहुत देर में वह घर लौटा हो ... या उस रात किसी दोस्त के यहाँ रुक गया हो ...

कुछ समय बाद वही लड़का फिर से मिला था ... उस लड़की के प्रति घृणा की इंतहा थी उसकी बातों में ... एक वैराग सा निकाल रहा था उसके मन से प्यार , दोस्ती , लड़की आदि के संबंध में ... 
ऐसा नहीं था कि उस लड़के से यही दो मुलाकातें हुई थी बल्कि इन दोनों मुलाकातों के बीच हजार क्षण आए थे जहां बीच का जीवन चरम पर था ... अर्थात प्रेम की अपनी उपस्थिती और उसकी स्वीकृति के बीच के क्षण जो निश्चय ही एक आम से लड़के लिए बहुत मायने रखते हैं उन क्षणों में वह शरमा कर अपने ' मत्था टेकने ' को जस्टिफ़ाई करता था । हालांकि इसमें वो सभी काम शामिल थे जो हर प्रेमी अपने प्रेम को बचाए रखने के लिए करता है ... यहाँ-वहाँ प्रेमिका के लिए जाना , उसके बहुत से ऐसे काम भी कर देना जो खुद वो भी कर सकती थी , जाड़े में उसके लिए लाइन तक लग जाना वगैरह ... पर ये काम तो करने ही पड़ते हैं ...  सबसे बड़ी बात तो ये कि अपने सारे विकल्प खत्म कर डालना सिर्फ उसी के लिए यह भी उसने किया और आज यह उसे अपनी सबसे बड़ी गलती लगती है ... 
          बार बार यह लगता है कि क्या इसे प्रेम कहा जा सकता है ? प्रेम का टूटना एक सरल कार्य नहीं होता और यह जब टूट रहा होता है तो मन में इतना तो जरूर भर जाता है दोनों के कि उनके बीच ऐसा कभी कुछ रहा हो इस पर संदेह सा होने लगता है । फिर देखे गए वो तमाम दृश्य किसी श्वेत-श्याम सपने जैसे अविश्वसनीय से लागने लगते हैं । लगता है के ये दोनों कभी आर्ट्स फेकेल्टी का हिस्सा थे ही नही , इनहोने कभी एक ही कक्षा  में पढ़ाई नहीं की , एक दूसरे को कभी फ़ोटोस्टेट करा के नहीं दिया , साथ में कभी नहीं आए  या देर रात तक पटेल चेस्ट पर लड़की का प्रोजेक्ट टाइप करवाते हुए ठंढ नहीं खाई । 
        प्रेम के टूटने की बात हमेशा यह कह कर ही जताई जाती है कि जो कुछ था उसे तुमने यदि प्रेम समझ लीआ तो ये तुम्हारी गलती है ... मैं तो तुम्हें अपना दोस्त ही मानती रही या मानता रहा । और बात जब रकीब के होने की हो तो 'मुझे जाने भी दो यारों ' फिल्म का एक संवाद याद आ जाता है-
'' तरनेजा ... अंत में जीत उसी की होगी जिसके पास लाश होगी ... '' । होता भी यही है । लड़की जिसके पक्ष में पलड़ा उसका भारी फिर रकीब को कुछ करना नहीं होता है बल्कि सब हो जाता है और वह बस एक बात कह के या बोल के रह जाता है कि ' ये तुम्हारा आपस का मामला है ' । यह गंभीरता इसलिए क्योंकि लाश उसी के पास होती है । फिर पुराने लड़के के कुछ नादां वाक्य होते हैं , जोरदार खीझ और टूटे हुए दिल की बेतरतीब आवाज़ । 
      इस बार भी तो यही सब हुआ था ... पर बार बार वो मासूम शाम  याद आ जाती है जब लड़का सॉफ्ट ट्वाय लेकर बस स्टॉप पर खड़ा होता है .... उसकी चमक को उन तमाम तोहफों जो कि लड़के ने बाद में दिये थे उसे लौटा देने जैसे कठिन क्षण भी कम नहीं कर पाते ।
   यहाँ मैं रामचन्द्र शुक्ल की तरह दोस्ती , प्यार आदि को परिभाषित करने या मापने नहीं बैठा हूँ बल्कि यह समझने कि प्यार या दोस्ती समय समय पर अपनी जरूरत के हिसाब से अलग अलग नाम देता रहूँ । काम निकल जाने पर घंटों बिताए पल दोस्ती के हो जाते हैं ... इसे प्यार के बदले भावनात्मक रैगिंग कहा जाना चाहिए ... । हमेशा रैगिंग करने वाला ही जीतता है जिसकी होती है उसके नाम तो केवल आत्महत्या या अवसाद ही आता है ... 
 रकीब 
     अक्सर रकीब दोस्त ही क्यों होते हैं ? ऐसे दोस्त जिन्हें पहले तो 'उनके' द्वारा पसंद ही नहीं किया जाता ... और जब परतें उघड़ती हैं और एक लंबा फासला चला जा चुका होता है तब वही रकीब 'उनका' सबसे करीबी बन जाता है । प्रेम त्रिकोण करीबियों में ही आकार लेते हैं और यही वह स्थिति है जब यह मानना पड़ता है कि ' प्रेम साहचर्य से पैदा होता है ... रकीब शुरू में तो अपनी बातें छिपाने के लिए बहुत से पापड़ बेलता है फिर बाद में जब लड़की उसके साथ हो तो उसकी अकड़ देखते ही बनती है । 
       कुछ लोग प्रेम को बस प्रेम की तरह ही करते हैं , कुछ फायदे की तरह और कुछ जीत हार की तरह ... पर एक समय ऐसा लगता है कि प्रेम को केवल किया नहीं जाता बल्कि इसे पैसे , थोड़ी सी देखरेख से खरीदा जाता है । 
 लड़के को देखकर लगता है कि ये सब पहले अनगिनत बार हो चुका है ... अनगिनत भोले लोगों की अब तक रैगिंग हो चुकी है पर ये यहीं थम जाए ऐसा किसने कह दिया ?

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