दिसंबर 02, 2012

कहने को बहनें बहुत खुश हैं

बहनों को अपने घर की संरचना में देखने का आदि मन उस से बाहर उन्हें  देखकर पहली बार पहचानने से इंकार कर देता है । लगता है न ये वो नही है जो हमारे घर में बड़ी हुई थी । शायद वो उनका भी सुनहरा दौर रहा होगा । एक स्त्री हमारी माँ  भी है पर उन्हे देख के ये कभी नहीं लगा के ये हमारे घर आने से पहले एक अलग ही व्यक्तित्व रही होंगी । क्योंकि उनको जब से देखा है एक जैसा ही  देखा है । शायद उनके बारे में ये सोचता भी नहीं यदि बहनों को उनके ससुराल में नहीं देखता ।
पहले सारा घर उनका था , उनकी तरह से चलता हुआ । उनके मेहनत की छाप तह किए गए कपड़ों तक में दिखती थी । हर आने जाने वालों की प्रशंसा उनके लिए ही होती थी । उनसे जलन होती थी । उस समय वही बहन घर से बाहर जब कोचिंग जाती थी तो लड़के तरह तरह की भंगिमाएँ करते रहते थे और बाद में हम घरवालों में से किसी ने देख लीया तो डांट बहन के हिस्से में ही आती थी । आज लगता है कि उन्हें हमने उसी समय से दराज में रखना शुरू कर दिया था । तभी शायद चाचा जी गर्व से कहते फिरते हैं कि हमारे घर की बेटियों ने कभी 'ताक-झांक' नहीं की । इस लिहाज से उनके व्यकित्व का एक पक्ष तो विकसित ही नहीं हो सका । उनके प्रेम पर प्रतिबंध था पर क्या उनके मन पर भी बंधन रहा होगा ? मुझे बार बार उनका अमरूद खाता हुआ हँसता हुआ चेहरा ही नज़र आता है । वैसे यदि वो प्रेम करती तो वो  भी हमारे मुहल्ले में अपने नाम से जानी जाती । मैं जब ऐसा लिख रहा हूँ तो मुझे लगा रहा है कि मैं भी चाचा बन रहा हूँ उन्हीं की तरह बोल रहा हूँ । पर यदि वो प्रेम करती तो उनको आज मैं मजबूत कहता हालांकि उनको कमजोर करने की हर एक व्यवस्था घर ने और पड़ोस ने कर रखी थी । उन्होने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लीआ था इसीलिए विरोध की बात नही उठी । उनका विरोध उनके मन की इच्छा किसी और रूप में बाहर आई होगी पर मुझे इसका इल्म नही और उस दौरान इतना शऊर भी नही था कि ये सब पहचान पाऊँ । और घरवाले तो जान बूझ के नही जानते ऐसी बातों को । इसके बावजूद घर में बहनों की धूम बनी रहती थी । उनकी हंसी भले ही धीमी थी पर घर के दायरे में खूब गूँजती थी । स्वच्छंद चिड़ियों  की चहचहाहट बनी रहती थी । उनकी शादियों के बाद क्रमशः ये सब कम होता गया । हमें लगता था कि ये सब बस हमारे घर से कम हुआ है । बहुत सी कहावतों में ये सुन राखा था कि बेटियाँ इस घर के बाद उस घर में खिलखिलाती रहती हैं तो लगा था कि ये सच होगा । 
  हाल में जब उनसे उनके ही घरों में मिलना हुआ तो लगा के वो जो इनकी स्वच्छंदता थी शायद तभी खत्म हो गयी थी जब हमारे घर में इनकी चहचहाहट बंद हुई थी । इनकी हर गतिविधि पर किसी न किसी नज़र रहती है कम से कम सास तो कुंडली मार के बैठी ही रहती है । दिन भर किसी न किसी का हुकुम बजाओ जरा सी देर के लिए पलक मारा नही कि बच्चा रोने लगा । दिन भर में बहन तो कहीं थी ही नही । जिन दराजों में हमने उन्हें तब बंद करना शुरू किया था वो अब उनका घर बन गया था । इन दराज़ों के दायरे उनके मन को कितना छीजते होंगे । आज लगता है कि इन दायरों से बाहर निकलने का कोई भी मौका देने से पहले सास ससुर क्यों हज़ार बार सोचते हैं । 
अब तक स्त्री पर चिंतन को समझने का आधार किताबी किस्म का ही रहा था घर के वातावरण ने भी कोई बहुत मदद नहीं की पर बहनों को देख के लगा कि जो सब सिद्धान्त है वह  व्यवहार से कितना दूर है । और जो भी सिद्धान्त बना है उसके अनुप्रयोगों को खोजना  हो तो लगता है किसी और ग्रह पर जाना पड़ेगा ... खैर बहनें हमारे यहाँ भी अपने मन का नहीं करती थी पर उस समय वो जो भी थी आज नही हैं ... मुझसे कम उम्र में ही उनके चेहरे की झुर्रियां मायूस करती हैं । कहने को वो बहुत खुश हैं सुख से जी रही हैं .....

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