जून 30, 2012

शादियों के मौसम में उत्तर बिहार में होना एक ऐसा अनुभव है जो हर बार याद दिलाता है कि समय कितना रुका हुआ है और कुछ भी बदला नहीं है । शादी की तिथियां हिंदू पंचांग से ली जाती हैं और उन तिथियों को अनेक सादियां होती हैं ! अभी छत पर हूँ और चारों तरफ से आवाजें आ रही हैं लाउडस्पीकर पर तरह तरह के गानों की ! कहीं बाराती पहुँच गए हैं सो विधि-विधान के गीत गाए जा रहे हैं , कहीं 'बिच्छु मेरे नैना' और कहीं से ' आज मेरे यार की शादी है' सुनाई दे रहा है । एक बात मुझे समझ नहीं आती कि बैंड वाले शादी में ' ये देश है वीर जवानों का' की धुन क्यों बजाते हैं , उसका शादी से क्या संबंध ? आज यदि शादी का दिन नहीं होता तो अबतक ये शहर नींद में चला गया होता ! ऐसा लगता है ये आवाजें पूरे शहर को जगा रखा है । गीतों से ही पता चल पाता है कि शादी हो रही है ! चाँद डूब रहा है और विधि - विधान के गीतों की संख्या बढ़ रही है । इसका एक पैटर्न समझ में आ रहा है- पहले देवी-देवताओं के समर्पित गीत , फिर चंद रीति-रिवाजों के गीत जैसे अठोंङर, लाबा, सिंदूरदान आदि के गीत फिर कुछ हँसी मजाक के गीत और बीच बीच में ' फिलर्स ' के रूप में कुछ अलग गीत । अभी थोड़ी देर पहले ऐसा ही एक गीत गाया जा रहा था जिसका मजमून था कि मिथिला में बेटी के रूप में जन्म नहीं लेना चाहिए और जन्म ले लिया और बड़ी हो गई तो किसी के कुएँ में कूद के जान दे दे । गीत में इसका कारण भी बताया गया है ! लड़की देखती है कि उसकी शादी के खातिर उसके पिता लड़के वालों के यहाँ जा जा कर मिन्नतें करते हैं और लड़के वाले शादी के बदले दहेज के लिए बड़ा सा मुँह फाड़ते हैं जिसके नहीं स्वीकार किए जाने पर वे लोग लड़की के पिता को दुत्कार कर भगा देते हैं और ऐसा ही लगभग हर लड़के का बाप करता है । गीत के अंत में वह पूछती है कि ईस दशा में डूब मरना सही है कि नहीं ! एक जगह शायद बारात में आए लोग खा रहे हैं तभी उन्हें अलग गीत सुनाया जा रहा है जिन्हें 'डहकन' कहते हैं । ये हँसी ठिठोली और ढिठाई भरे गीत होते हैं । एक स्त्री गा रही है कि दूल्हे को अब अपने बाप को बाप नहीं कहना चाहिए क्योंकि उसे तो पैसों से खरीद कर लाया गया है । वह चाहे तो लड़की पक्ष के किसी को भी अपना बाप मान सकता है । फिर वो गीत में ही कुछ नाम सुझाती हैं और उनके गुण भी बताती है । एक अन्य शादी में मैं गया था वहाँ डहकन तो नहीं पर फिलर्स के रूप में एक गीत में कहा जा रहा था कि लड़के , तुम्हारी माँ ने जो तुम्हें अपना दूध पिलाया उसकी भी कीमत वसूली लड़की के पिता से कर ली । 'कूटे नै जाने अठोंङर हे हरजैइया के पूत ' विधि के इस गीत में दूल्हे के अनाडी पन को उसकी माँ के हरजाई होने से जोड़ कर देखा गया है । अभी शादियों के इस मौसम की शुरुआत के समय मेरे एक मित्र ने एक अखबार में खबर में लिखा था कि उत्तर बिहार में सबसे महँगा दूल्हा बिकता है । दहेज अन्य जगहों पर भी दिए-लिए जाते हैं पर इतनी मात्रा में अन्यत्र ऐसा नहीं होता । इससे पीड़ित होना इतना सहज है कि गानों में , आम बोलचाल में इसे सहज ही देखा जा सकता है । यह इतने गहरे रूप में जमा है कि यदि किसी ने अपने बेटे की शादी 'आदर्श ' में करने की बात कही तो माना जाता है कि लड़के में कोई न कोई खोट होगी या कोई अंदरूनी कमी । अकेले दहेज ही नहीं बल्कि भारी संख्या में बाराती भी आते हैं जो अन्य स्थानों की तुलना तरह दुल्हन लेकर विदा नहीं हो जाते बल्कि कम से कम एक दिन तो जरूर रुकते हैं । और बाराती सामंतो की याद दिलाते हैं जिनकी सेवा में हल्की सी भी त्रुटि हुई तो वे आसमान -धरती एक कर देते हैं ! चचेरी बहन की शादी में मछली नहीं खिलाए जाने के कारण बाराती नाराज हो गए थे और अनाप-शनाप बकरे लगे थे । और ये हालत तब है जब इधर स्त्री -पुरुष लिंगानुपात भी सामान्य है अर्थात लगभग हर किसी को अपनी बेटी की शादी करनी है । जब इन गानों में कोई लड़की कुएँ में कूद कर जान देने की बात नहीं करेगी , कोई बाप दुत्कारा न जाए तब शायद कुछ बदले !

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